Tuesday, 9 April 2013

भटकती भूख


हाय यह भूख भी कितनी नामुराद है और वह भी विभिन्न विभिन्न प्रकार की ,एक को तो भूखे पेट की अग्नि जला देती है और दूसरे को प्यार और सम्मान की चाहत ,''खाली पेट न भजे गोपाला,''खाली पेट हो तो ईश्वर का नाम भी ध्यान में नही आता,कोई तो पापी पेट की खातिर गुनाह के रास्ते को अपना लेता है तो किसी कोआत्मसम्मान की भूख सताती है ,कोई तो पैसे की भूख के पीछे सारी जिंदगी भटकता रहता  है और किसी की भूख की सुई सेक्स पर ही अटकी रहती है,सत्ता की भूख  का नशा तो और भी निराला है ,एक बार लग गया तो ताउम्र पीछा ही नही छोड़ता ,अपनेपन और प्यार की भूख तो इंसान को वैसे भी दीवाना ही बना देती है ,इस दुनिया में  हर कोई पागल बना  किसी न किसी तरह की भूख के पीछे भटक रहा है | कहते है कि किसी भूखे को भर पेट खाना खिलाने से बढ़ कर कोई पुण्यकर्म नही होता ,मीरा यह सोच ही रही थी कि दरवाज़े की घंटी बज उठी ,लपक कर दरवाज़ा खोला मीरा ने कि शायद बिट्टू स्कूल से आया हो लेकिन उसके सामने पडोस की बूढ़ी अम्मा खड़ी थी ,''बेटा आज पता नही क्यों हलवा पूड़ी खाने का मन हो रहा है ,तनिक बना कर खिला दो न ,''|मीरा ने प्यार से अम्मा को अपने घर के भीतर बुला लिया और पूरी श्रधा से उसने बूढ़ी अम्मा  के आगे हलवा और पूड़ी बना कर परोस दिया |पता नही इस बुढ़ापे में शायद अम्मा की सारी की सारी इन्द्रिया उसकी जुबान के रस में केन्द्रित हो गई थी  जो वह आये दिन नयें नयें व्यंजनों की फरमाइश ले कर उसके दरवाज़े पर खड़ी हो जाती थी ,  ,कभी उसकी जिहा को आलू के गर्मागर्म परांठों  का स्वाद तरसाता था तो कभी गुलाब जामुन के मीठे रस के स्वाद को याद कर उसके मुह में पानी भर जाता था ,मीरा भी उसकी बहू और बेटे से छिप कर उसके मन की मुराद पूरी करती रहती थी  |उस दिन मीरा ने अम्मा से पूछ ही लिया ,''अम्मा ,तुम अपनी  बहू से क्यूँ नही कहती ,वह भी तो  तुम्हे यह सब बना कर खिला सकती है ,''पूड़ी खाते खाते अम्मा के हाथ वहीं रुक गए,आँखें उपर कर मीरा को देखते हुए अम्मा बोली   ,''न बाबा न ,वह जो मुझे दलिया देती है ,उसे देना भी वह बंद कर देगी ,अरे बेटा वह तो फ्रिज  को ताला लगा कर जाती है,बाहर मेज़ पर रखे फलों की गिनती उसे सदा याद रहती है ,बेटा अगर वह कुछ बढ़िया सा खाना बनाती है तो मुझ पर  एहसान कर ऐसे देती है मानो किसी कुत्ते के आगे रोटी का टुकड़ा डाल रही हो ,छि ऐसे खाने को तो  किसी का दिल भी नही करेगा ,''कहते कहते अम्मा की आँखें नम हो गई |अम्मा तो पूड़ी हलवा खा कर मीरा को ढेरों आसीस  देती हुई अपने घर चली गई ,लेकिन मीरा के दिलोदिमाग में अनेक सवाल छोड़ गई ,माँ बाप बहुत  ही प्यार से अपने बच्चों को पाल पोस कर बड़ा  करते है लेकिन बच्चे अपने बुज़ुर्ग और बुढ़ापे से लाचार माता पिता को बिना उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाएं सेवा भाव से दो वक्त की रोटी देने से भी क्यों कतराने लगते है ?अम्मा की बाते मीरा के अंतर्मन को झकझोरने लगी ,किसी कुत्ते के सामने या किसी भिखारी के आगे रोटी फेंकना और अपने बुज़ुर्ग, माता पिता शरीर से लाचार ,जो अब उम्र के आखिरी  पड़ाव पर पहुंच चुके है ,उनको आदर सहित प्रेमपूर्वक दो जून खाना खिलाने  में जमीन आसमान का अंतर होता है ,क्या इसे आज के स्वार्थी बच्चे समझ पा रहें  है ?कोई तो उन्हें अपने संस्कारों की याद दिलाते हुए समझाए की आत्मसम्मान की खातिर तो भगवान् श्री कृष्ण ने भी दुर्योधन के स्वादिष्ट मावायुक्त भोजन को ठुकरा कर विदुर के घर का सादा शाकसब्जी वाला रूख सूखा भोजन ही ग्रहण किया था |अपने ही पेट से जन्मे बच्चों के ऐसे रूखे ,संवेदन शून्य व्यवहार से न जाने कितने ही बुज़ुर्ग बूढ़े माँ बाप ,अम्मा की तरह खून के आंसू पी कर हर रोज़ अपने बच्चों से प्यार की आस लिए और आत्मसम्मान की  भूख से मरते हुए अपनी जिंदगी के बचे खुचे दिन गुज़ार रहें है |क्या यही है हमारी संस्कृति ?क्या हमारे बुज़ुर्ग सम्मान के हकदार नही है ?