Wednesday, 8 May 2013

लहरों पे लहर

  आप सभी की शुभकामनाओं से मेरी यह रचना ''वुमेन आन टाप ''के मई अंक में प्रकाशित हो चुकी है ,आप सब का हार्दिक आभार


विशाल सागर किनारे गिरती उठती लहरों को घंटों निहारते हुए भी मन थकता नही था ,उन लहरों से उठते संगीत से एक अजब सा सकून मिलता था  और इसी मधुर संगीत को सुनने के लिए पंकज हर शाम सुमुद्र के किनारे गोवा के एक बीच पर घंटो बैठा रहता |वह  किनारे पर आती लहर पर लहर का संगीत बड़ी तन्मयता से आँखे मूंदे सुन कर उसमे डूबा रहता था | आज सागर की आती जाती लहरों की थाप पर उसके मानस पटल पर उभरते हुए अनेक चित्र रह रह कर आँखों के सामने आ कर लहराने लगे |ऐसी कितनी ही  खूबसूरत  शामें थी जिसे उसने सीमा के साथ ,हाथों में हाथ लिए इसी बीच पर बिताई थी ,मिल कर जीने मरने की कसमे भी खाई थी ,कितने ही सपने दोनों ने मिल कर संजोये थे और एक दिन अपने मम्मी पापा के आशीर्वाद के साथ वह और सीमा हमेशा के लिए विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए थे ,लेकिन कब वो खूबसूरत प्यार भरे दिन पंख लगा कर हवा में उड़ गए  ,इसका पंकज को अहसास तक नही हुआ ,मालूम नही ऐसी समय की कौन सी लहर आई जो अपने साथ पंकज की सारी खुशियाँ भी  बहा कर ले गई |सीमा एक बहुत ही सुंदर ,सुशील और सुलझी हुई लडकी थी, उसने तो शादी के बंधन को निभाने की जी जान से कोशिश की थी लेकिन पता नही कहाँ से पंकज के दिमाग में शक का कीड़ा घुस गया था ,जिस किसी से भी  सीमा बात करती ,हर बार ,पंकज उसके सामने ढेरों सवाल ले कर आ जाता ,''कौन था  यह ,क्या था इसका नाम ,यह तुमसे क्यों बात कर रहा था ,तुम इसे कैसे जानती हो ..??उन सवालों के जवाब देते देते सीमा कई बार परेशान हो जाती थी ,कई बार तो उसे प्यार से समझाने की कोशिश करती तो कभी नाराज़ हो कर |पंकज भी अपनी गलती मान कर माफ़ी मांग लेता और बात खत्म हो जाती,लेकिन ऐसे कब तक चलता ,बार बार अपनी सफाई देते देते सीमा भी तंग आ चुकी थी और उस दिन तो पंकज ने सारी हदें पार कर दी जब पंकज ने अपने बेटे के पैदा होते ही उसका डी एन ऐ टेस्ट करवाने की बात की थी ,अवाक पंकज का मुहं देखती रह गई थी सीमा|बस अब तो पानी सिर के उपर से गुजर चुका था ,चुप चाप अपना सामान बाँधा और सदा के लिए अपने बेटे को साथ ले कर पंकज को अकेला छोड़ अपने मायके चली गई सीमा |लाख बार पंकज ने उसे मनाने की कोशिश की , फोन किये ,मेसेज भेजे ,माफ़ी भी मांगी लेकिन सीमा ने तो हमेशा के लिए बस चुप्पी साध ली ,उसने तो पंकज से बात करना ही छोड़ दिया |समुद्र की गर्जन से पंकज की विचारधारा भंग हो गई और वह वापिस वर्तमान में आ गया ,वही सागर का किनारा ,वही लहरों पे लहर ,वही  मधुर संगीत ,लेकिन आज वह कितना अकेला हो गया ,कोई अपना नही ,सीमा के साथ बिताये  हर  एक पल उसके सीने में एक तड़प और हलचल पैदा कर रहे थे था ,काश उसके दिमाग में वह शक का कीड़ा न घुसा होता ,उसने  सीमा को दिल की गहराईओं से चाहा था ,लेकिन वह उसके अथाह प्यार को क्यों नही समझ पाई ,सोचते सोचते वह उठ कर वहां टहलने लगा ,लेकिन रह रह कर सीमा की वह भोली सी सूरत उसका पीछा नही छोड़ रही थी ,सीमा के साथ साथ उसने अपने प्यारे से बच्चे को भी खो दिया ,आखिर क्या हासिल हुआ उसे, अपने आप से नफरत सी हो रही थी पंकज को ,हाँ ठीक ही तो किया सीमा ने ,भला अपनी पवित्रता का वह क्या सबूत दे सकती थी ,अच्छा ही किया जो वह चली गई |न जाने सोचते सोचते कब पंकज की पलके भीग गई और आँखों से अविरल आंसूओं की धारा बहने लगी  ,एक ठंडी सांस लेते हुए पंकज आसमान में चमकते हुए सूरज को निहारने लगा  ,शाम ढलने को थी ,बीच पर सैंकड़ो पर्यटक सूरज के डूबने का इंतज़ार कर रहे थे ,अपने चारों ओर लालिमा लिए सूरज धीरे धीरे क्षतिज की ओर बढ रहा था और सबकी आखें दूर आकाश पर टिकी हुई थी |समुद्र  इस रंगीन स्थल को  अपने में लपेट कर लहरों की धुन पर ठंडी हवा के तेज़ झोंकों से सबके दिलों को झूले सा हिला  रहा था |कई देसी,  विदेशी सेनानी और  भीड़ में कई नवविवाहित जोड़े रंग बिरंगी ड्रेसिज़ और  सिर पर अजीबोगरीब हैट पहने ,हाथों में हाथ लिए रोमांस कर रहे थे |कुछ मनचले युवक टोली बना कर घूम रहे थे और कई दम्पति अपने बच्चों सहित छुट्टियाँ मना रहे थे | आकाश में सूरज तेज़ी से धरती के दूसरे छोर जहाँ दूर दूर तक पानी ही पानी दिखाई दे रहा था छूने को बेताब हो रहा था ,उसकी लालिमा समुद्र में बिखरने लगीं थी और धीरे धीरे लाल होता समुद्र सूरज को अपने आगोश में लेने को बैचेन हो रहा था,लेकिन पंकज उन सबसे अलग तन्हा ,अपने अतीत की यादों में खोया हुआ ,आवारा क़दमों से यूँ ही चलता जा रहा था |सूरज अब जल समाधि ले चुका था ,भीड़ भी अब तितर बितर होने लगी थी, लालिमा की जगह कालिमा ने लेना शुरू कर दिया ,सुमुद्र की लहरें चट्टानों से टकरा कर शोर मचाती वापिस समुद्र में लीन हो रही थी ,परछाईयाँ  लम्बी होती जा रही थी और पंकज  रेलिंग पर खड़े हो कर सुमुद्र की आती जाती लहरों को निहार रहा था  ,उसका मन व्याकुल  हो रहा था ,पता नही क्यों आज सीमा की याद उसे बरबस बेचैन कर रहे थे ,अपने प्यार से बिछुड़े पूरा एक साल हो चुका था लेकिन वह उसे भूल नही पा रहा था ,काश वो बीते हुए प्यारे दिन फिर से आ जाए ,पर कैसे ?सीमा तो उससे बात तक नही करना चाहती |अपने ही ख्यालों में गुम पंकज चलता हुआ कब बाहर अपनी कार तक आ पहुंचा उसका उसे अहसास तक नही हुआ |गाडी स्टार्ट कर अपने घर की तरफ चल पड़ा पंकज ,लेकिन शायद नियति को तो कुछ और ही मंजूर था ,पंकज के दिलोदिमाग पर सीमा की दीवानगी  इस कदर छाई हुई थी उसे पता ही नही चला कब उसकी गाडी सीमा की माँ के घर के सामने आ कर रुक गई |बस उसके मुहं से सिर्फ' ओह 'ही निकल पाया  ,समय  से बेखबर न जाने कितनी देर तक वह अपनी गाडी के स्टीयरिंग पर अपना सर झुकाए बैठा रहा ,हाँ कभी कभी उस घर को देख लेता जो उसके परिवार का आश्रयस्थल था ,रह रह कर पंकज को आँखों से आंसू टपक रहे थे और उसका मन आत्मग्लानि और पश्चाताप से भर उठा |उसने कार के गलव बाक्स से एक कागज़ निकला ,कुछ लिखना चाहता था वो लेकिन इससे पहले वह कुछ लिख पाता दो आंसू उस कागज़ पर टपक पड़े ,कांपते हाथों से सिफ 'सौरी ' ही लिख  पाया और वहां लेटर बाक्स में डाल कर चुप चाप अपनी गाडी में बैठ कर भरें मन से वापिस अपने घर आ गया |रात भर करवटें ही  बदलता रहा वह ,नींद  उसकी आँखों से कोसो दूर थी और वह सारी रात पंकज ने अपनी किस्मत पर आंसू बहाते ही काट दी |ट्रिंग ट्रिंग डोर बेल  की आवाज़ से सुबह उसकी नींद टूटी ,आँखे मलते हुए उसने दरवाज़ा खोला ,दरवाज़ा खोलते ही वह हतप्रभ सा बाहर देखने लगा ,उसे अपनी आँखों पर विशवास नही हो रहा था ,उसने एक बार फिर से अपनी आँखे मल कर सामने देखा ,उसकी सीमा,होंठों पर मुस्कराहट लिए  उसके बेटे को गोद में उठाये सामने खड़ी थी |''अंदर आने को नही कहोगे क्या ,?''मंदिर की घंटियों से शब्द उसके कानो में पड़े ,यह कहते ही घर की लक्ष्मी अपने घर वापिस आ गई |''तुमने मुझे माफ़ कर दिया ''बड़ी मुश्किल से पंकज के मुख से शब्द निकल रहे थे ,वह अब भी अपने किये पर शर्मिंदा था |''क्या करती तुम्हारे आंसूओं की दो बूँदों ने मेरे दिल में हलचल मचा दी थी ,जज्बातों का एक तूफ़ान सा आ गया था ,तुम्हारे प्यार की लहरों से  मै अपने को रोक नही पाई और आ गई फिर तुम्हारे पास '',इतना कह कर सीमा ने अपना सर पंकज के काँधे पर रख दिया ,दोनों की आँखों आंसूओं से भीग चुकी थी

रेखा जोशी