Friday, 14 June 2013

लालची चिड़िया [बाल कविता ]


दादी  माँ ने  सुनाई थी
बचपन में इक कहानी
एक कौवा था भोला सा
लालची एक थी चिड़िया
उन दोनों में हुई दोस्ती
लाये  चावल और दाल
मिल के बनाई खिचड़ी
गया कौवा बाज़ार पीछे
खाने की महक सूँघ कर
चिड़िया हो गई पागल
चखा कुछ स्वाद उसका
थोड़ी थोड़ी करके उसने
अपनी कर ली पेट पूजा
कौवा बेचारा रहा भूखा
गर्म गर्म चिमटा उसने
रखा चिड़िया के पाँव पे
उई मेरा तो पाँव जला
चिल्लाने लगी चिड़िया
क्यूँ पराई खिचड़ी खाई
बोला भोला भूखा कौवा