Friday, 26 July 2013

अनजान मंजिल

चला जा रहा हूँ इस निर्जन पथ पर 
अनजानी डगर है मंजिल अनजान 
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ
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आँधियों के थपेड़ो ने डराया मुझको 
गरजते बादलो ने दहलाया दिल को
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ
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भटक रहा कब से पथरीली राहों पर 
पथिक हूँ अनजान कंटीली राहों का 
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ 
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आसन नही चलना हो कर जख्मी 
गिरता पड़ता ठोकरें खाता कितनी 
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ 
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चलता रहूँगा साथ देंगे पाँव जब तक
कहाँ जा रहा हूँ नही जानता अब तक 
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ
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कभी तो मिलेगी यूँ चलते हुए मंजिल 
कहीं तो ले जाएगी ये राह जिंदगी की 
यही सोच मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ 

रेखा जोशी