Wednesday, 31 July 2013

गरीब की भूख

गरीब की भूख

मैली कुचैली फटी पुरानी धोती में माला अपने नंग धडंग एक साल के बच्चे को गोदी में लिए एक शादी के विशाल  पंडाल  के पीछे अपने सीने से चिपकाए बैठी थी ,दो दिन की भूखी माला को आज पेट भर के खाना मिलने वाला था  l पंडाल के सामने लम्बी गाडियों का आना जाना शुरू चुका  था और माला ललचाई आँखों से उस भव्य पंडाल को निहार रही थी l रंग बिरंगे कपड़ों में सज धज कर तरह तरह के लोग पंडाल के भीतर प्रवेश कर रहे थे ,गीत संगीत के साथ माहौल रंगीन बना हुआ था ,कई मन के काले सफेदपोश सत्ता के भूखे तो कई मनचले युवक सुंदर चेहरों को देख अपनी आँखों की भूख मिटाने के लिए पंडाल में जा रहे थे ,लेकिन  माला को तो वहां पक रहे स्वादिष्ट व्यंजनओं की भीनी भीनी खुशबू परेशान कर रही थी जो  उसके पेट की आग को और भड़का रही थी l हाय यह भूख भी कितनी नामुराद है  ,क्या क्या नही करवाती ,कोई तो पापी पेट की खातिर गुनाह के रास्ते को अपना लेता है तो कोई भीख मांगने पर मजबूर हो जाता है तो कोई पापी पेट की खातिर पैसे कमाने के चक्कर में जिंदगी भर भटकता ही रहता  है इस दुनिया में  हर कोई पागल बना  किसी न किसी तरह की भूख के पीछे भटक रहा है,लेकिन किसी गरीब से पूछ कर देखो कि  भूख किस बला का नाम हैl  न जाने कितनी तक देर माला वही बैठी रही ,तभी पंडाल के बाहर जूठी प्लेटों से भरे हुए बड़े बड़े टब आने लगे  ,माला वहां से फुर्ती से उठी और भाग कर उन टबों के पास पहुंच गई ,वह जल्दी जल्दी लोगों का बचा हुआ जूठा खाना इकट्टा करने लगी l आज  उसने अपने घर जा कर अपने घरवालों के साथ मिल कर पार्टी मनानी थी वह जूठन इकट्ठा करने में इतनी व्यस्त थी की उसे आभास ही नही था कि उसके साथ साथ एक कुत्ता भी जूठी प्लेटे चाट रहा था ,हाय री  विडम्बना गरीब की भूख उसे किस हद तक गिरा   देती है ,पेट की अग्नि को शांत करने के लिए वह कितना मजबूर हो जाता है |

रेखा जोशी

Tuesday, 30 July 2013

सावन

घिर आये बदरा सखी छाई घटा घनघोर है
रिम  झिम बरसे सावन की मधुर फुहार है
बन बदली उमड़ पड़ी आँखों से बिरहन  के
मधुर नही फुहार यह अगनकणों की धार है


Saturday, 27 July 2013

तारों की बरात

तारों की बरात

ऊँचे ऊँचे पेड़ों पर हसीं शब ने ली अंगड़ाई है ,
दिल को थाम लो यारो तारों की बरात आई है |
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मस्ती का आलम है दिल में बजती शहनाई है ,
हुस्न तेरा है और प्यार मेरा दुहाई है दुहाई है |
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लहरें प्यार भरी जब से इस दिल में लहराई है ,
लहराती हुई इन लहरों में मेरे प्यार की गहराई है
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दिल दीवाने मत जाना उधर वह इक परछाई है ,
धोखा और फरेब यहाँ पर हरपल देता रुसवाई है |
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आंसू मत बहाना तुम पल दो पल की जुदाई है ,
अच्छा तो अब चलते है घड़ी विदा की आई है |

रेखा जोशी 



Friday, 26 July 2013

अनजान मंजिल

चला जा रहा हूँ इस निर्जन पथ पर 
अनजानी डगर है मंजिल अनजान 
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ
...........................................
आँधियों के थपेड़ो ने डराया मुझको 
गरजते बादलो ने दहलाया दिल को
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ
..........................................
भटक रहा कब से पथरीली राहों पर 
पथिक हूँ अनजान कंटीली राहों का 
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ 
............................................
आसन नही चलना हो कर जख्मी 
गिरता पड़ता ठोकरें खाता कितनी 
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ 
.........................................
चलता रहूँगा साथ देंगे पाँव जब तक
कहाँ जा रहा हूँ नही जानता अब तक 
फिर भी मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ
............................................
कभी तो मिलेगी यूँ चलते हुए मंजिल 
कहीं तो ले जाएगी ये राह जिंदगी की 
यही सोच मै उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ 

रेखा जोशी 

Thursday, 25 July 2013

मन मंदिर

ढूँढ़ते  प्रभु हम सब  तुझे कहाँ  कहाँ 
बसाया  तुम्हे  अपने   दिल  में यहाँ
मन को ही हमने मंदिर  बना लिया 
आरती   उतारते  सुबह   शाम  वहाँ

रेखा जोशी 


Tuesday, 23 July 2013

चाहत

चाहत
तुम्हारी चाहत लिए  हम पल पल मरते रहे
जीने  की  तमन्ना दिल में लिए तड़पते  रहे
दिन का सुकून और रातों  की नींदे  उड़ गई
अनजान बने  तुम्ही इस दिल में धड़कते रहे

मुक्तक

कभी रूकती नही बस चलती ही जाती है जिंदगी
घूमे सदा वक्त का पहिया चाहे बेबस हो जिंदगी
तलाश  सबको यहाँ बस खुशियों ही खुशियों की
सुख  हो याँ दुःख सब पीछे छोड़ जाती है जिंदगी

रेखा जोशी 

और चाँद छुप गया [बाल कथा ]

और चाँद छुप गया [बाल कथा ]


आज चाँद बहुत खूबसूरत  दिखाई दे रहा था ,उसे देखते ही पिंकी उछलने लगी और राजू को आवाज़ दे कर बुलाने लगी ,''देखो भैया आसमान में चाँद कितना बड़ा और सुंदर दिखाई दे रहा है l ''अपनी छोटी बहन की आवाज़ सुन राजू भी चाँद को देखने लगा ,''अरे मेरी प्यारी बहना ,आज पूर्णिमा है और चन्द्र  ग्रहण भी है ,बस अभी कुछ देर में चाँद पर हमारी धरती की छाया पड़ने वाली है l''पिंकी ने हैरानी से राजू की तरफ देखते हुए पूछा ,''यह चन्द्र ग्रहण क्या होता है भैया ,बताओ न ?''देखो पिंकी तुम आसमान को देखती रहो , बस अभी कुछ समय बाद   हमारी धरती सूरज के गिर्द घूमते घूमते सूरज और चाँद के बीच एक सीधी रेखा में आ जाए गी और तब सूरज की रौशनी धरती के एक हिस्से पर पड़ेगी उसकी परछाई धीरे धीरे पूरे चाँद को ढक लेगी और उसे पूर्ण ग्रहण लग जायेगा ,वैसे अगर धरती की छाया पूरे चाँद को न ढककर उसके कुछ हिस्से को ढके तो उसे खंड चन्द्र ग्रहण कहते है ,लेकिन आज तो धरती की छाया  पूरे चाँद पर पड़ने वाली है l'' ''हाँ भैया देखो चाँद पर धरती की गोलाकार छाया पड़ने लगी है ''पिंकी जोर से चिल्लाई,क्या भैया यह छाया पूरे चाँद को छुपा देगी और फिर पूरा अँधेरा हो जाएगा ,''हाँ मेरी बहना तुम देखती रहो अब चाँद धीरे धीरे धरती की परछाई के कारण छुप रहा है ''पिंकी बहुत घबरा कर बोली ''भैया क्या चाँद छिपने के बाद फिर कभी भी दिखाई नही देगा ?'' ''नही नही पिंकी डरने की कोई बात नही ,बस जैसे ही  धरती और चाँद घूमते हुए एक सीधी  रेखा से हट कर अपना स्थान बदल लेंगे चाँद हमे फिर से दिखाई देने लगेगा l''आसमान की ओर हैरानी से देखते हुए पिंकी और राजू दोनों के सामने ही चाँद धरती की परछाई में छुप गया l

तुम्हारा चेहरा

तुम्हारा चेहरा

देखा आईना
चेहरा तुम्हारा था
भोली सूरत
....................
न पहचाना
अनजान था वोह
वह अक्स था
.................
था बुत इक
दर्पण में झाँकता
परेशान था
...................
वोह खोया था
अपनी ही धुन में
किसे ढूँढ़ता
.................
साफ़ दिखती
चेहरे की रेखाएं
चिन्तित मुख

रेखा जोशी


Sunday, 21 July 2013

पापा टेक केयर

रेलगाड़ी में बैठते ही गरिमा ने चैन की सांस ली ,बस अब चंद घंटों में ही वह अपने माँ के घर होगी ,शादी के बाद वह अपनी ही घर गृहस्थी में खो कर रह गई थी,लेकिन वह अपने बूढ़े माँ बाप को याद कर हमेशा परेशान सी रहती थी ,चाह कर भी उनके लिए कुछ नही कर पाती थी |रेलगाड़ी की गति के साथ साथ गरिमा के मानस पटल पर बचपन की यादें उभरने लगी |”बचपन के दिन भी क्या दिन थे ,जिंदगी का सबसे अच्छा वक्त,माँ बाप का प्यार और उनका वो लाड-दुलार ,हमारी छोटी बड़ी सभी इच्छाएँ वह चुटकियों में पूरी करने के लिए सदा तत्पर ,अपनी सारी खुशियाँ अपने बच्चों की एक मुस्कान पर निछावर कर देने वालों का ऋण क्या हम कभी उतार सकते है ?हमारी ऊँगली पकड़ कर जिन्होंने हमे चलना सिखाया ,इस समाज में हमारी एक पहचान बनाई ,आज हम जो कुछ भी है ,सब उनकी कड़ी तपस्या और सही मार्गदर्शन के कारण ही है ”गरीमा अपने सुहाने बचपन की यादो में खो सी गई ,”कितने प्यारे दिन थे वो ,जब हम सब भाई बहन सारा दिन घर में उधम मचाये घूमते रहते थे ,कभी किसी से लड़ाई झगड़ा तो कभी किसी की शिकायत करना ,इधर इक दूजे से दिल कीबाते करना तो उधर मिल कर खेलना ,घर तो मानो जैसे एक छोटा सा क्लब हो ,और हम सब की खुशियों का ध्यान रखते हुए हमारे माँ बाप ,जिसका जो खाने दिल करता माँ बड़े चाव और प्यार से उसे बनाती और हम सब मिल कर पार्टी मनाते” |

जिंदगी कितनी खूबसूरत है ,इसका अहसास हम तभी कर पाते है ,जब हम इसे जीना चाहते है , जब तक हम अपनी जिंदगी के एक एक पल का आनंद उठाते हुए उसका उपभोग करते रहते है तब तक यह जिंदगी हमे फूलों की सेज सी लगती है ,लेकिन जब जिंदगी एक बोझ सी लगने लगती है तब एक एक पल काटना भारी हो जाता है ,हमारे देश में ऐसे कई घर है जहां जिंदगी की गति बहुत धीमी हो गई है ,समय तो जैसे रुक रुक के रेंग रहा हो ,जहां कभी जिंदगी खिलखिलाती थी वहां एक सन्नाटा सा छाया रहने लगा है |उन घरों में हमारे असहाय बुज़ुर्ग लाचारी भरी जिंदगी जीने पर मजबूर है ,बुढ़ापा तो अपने आप में एक बीमारी है ,धीरे धीरे क्षीण होती यह काया जिसे ढेरों दवाईयों से संभालने की कोशिश ,तन से इतने मजबूर कि रोजमर्रा के काम करने में भी असमर्थ , जहाँ एक एक दिन काटना भी मुश्किल हो वहां कैसे कटे गी उनकी बाकी जिंदगी ?ऐसे ही एक बुज़ुर्ग दम्पति से गरिमा हाल ही में मिली ,बेटा बाहर विदेश में और बेटियां अपने अपने ससुराल में ,अपनी जिंदगी के इस आखिरी पड़ाव में भावनात्मक रूप से आहत ,असुरक्षित बुजुर्गों के प्रति उनके बच्चे क्यों उनका सहारा नही बन पाते ,उनका बेटा अमरीका से आ कर कुछ दिन उनके पास रह कर वापिस चला गया ,जाते जाते प्यार के दो बोल , ”पापा टेक केयर ”बोल कर चला गया |उसके पापा सोचते ही रह गए ,”कौन है यहाँ  जो उनकी केयर करे गा ”?


कई बुज़ुर्ग जो संयुक्त परिवारों में रहते है ,अपने बच्चों द्वारा दी गई एक उपेक्षित जिंदगी जीने के लिए मजबूर है ,आये दिन हम समाचार पत्रों में ऐसी अनेकों खबरें पढ़ते रहते है , कही तो एक बेटे ने अपनी माँ को तबेले में रखा और कही पर बेटे ने अपने बूढ़े माँ बाप को घर से निकाल दिया | क्या गुजरी होगी उस माँ के दिल पर ,उसका अपना बेटा ,उसका अपना खून, इतना संवेदनशून्य ,माँ को पशुओं के साथ .यह सोच कर भी रूह कांप जाती है |कितनी ठेस पहुँचती होगी उन माँ बाप के दिल पर जब उनके अपने बच्चे उनकी भावनायों का गला घोंट कर उन्हें पीड़ा देतें है ,कैसे उस बेटे के मुहं में रोटी का ग्रास जाता होगा जबकि उसके द्वारा घर से निकाले गए उसके माँ बाप ,भूखे प्यासे बैठेखून के आंसू पी रहें हो | कुछ अच्छे ओल्ड एज होम्स इनका आश्रय स्थल बन सकते है ,लेकिन क्या वहां उनके अपनों द्वारा घायल हुए मन को शांति मिल पाए गी ?विचारों की उथल पुथल में डूबी गरिमा गाड़ी से उतर कर ,अपनी माँ के पास पहुच गई |उसने फैसला कर लिया ,अब वह अपने माँ बाप को अकेला नही छोड़े गी ,हर हाल में उन्हें अपने साथ ले कर जाए गी |

Friday, 19 July 2013

मुक्तक

आकाश  पर  असंख्य  सूर्य चाँद  तारे सब  विचर रहें है 
अनगिनत  पिंड  भी आकाशगंगा  संग भ्रमर कर रहें है 
अस्तित्व  मानव का  शून्य है यहॉं  विस्तृत बह्मांड में 
शीश झुकाएं अपना नमन उस परम पिता को कर रहें है 

रेखा जोशी 




Monday, 15 July 2013

सौन्दर्य

सौन्दर्य [गीत ]


`बोल उठा है कवि तब ,
असत्य है यह असत्य है ,
ज्ञान और विज्ञानं है भ्रम ,
सौन्दर्य केवल सत्य है ।
......................................
वह पुरुष रच कर प्रकृति को,
था स्वयं इस में खो गया ,
खोजता है फिर स्वयं को ,
क्या आज उसको हो गया ?
......................................
खोज है यह व्यर्थ सी ही ,
है व्यर्थ ही यह भटकना ,
लघु स्वप्न सी यह जिंदगी ,
है व्यर्थ इतना सोचना ।
........................................
सौन्दर्यरस पान ही तो ,
लक्ष्य है इस जिंदगी का ,
सौन्दर्य ही आनंद है ,
सपन है हर किसी का ।
.......................................
जो  मिले  आनंद ले ले ,
गम  बहुत  है जिंदगी में
मत व्यर्थ कर तू इन क्षणों को ,
बहुत कम है क्षण ख़ुशी के ।
.........................................
सौन्दर्य ही इक सत्य है ,
और है शिव भी यही तो ,
सौन्दर्य में मन को समा तू ,
मन में समा आनंद को ।

 प्रो महेन्द्र जोशी


Friday, 12 July 2013

इंतज़ार

या खुदा मेरी उल्फत को जिंदगी दे दे 
गम जुदाई काअब और सहा नही जाता |
तडप तडप के गुजारी है हर घड़ी हर पल ,
मेरी वफा का दिया जल जल के बुझा जाता है |
इंतजार और अभी,और अभी और अभी ,
पैमाना-ए सब्र अब लब से छुटा जाता है |
रात में यह दिल तन्हां डूब जाता है ,
मायूसियों के आलम में दम घुटा जाताहै 

Thursday, 11 July 2013

सतरंगी आसमान [कहानी ]

सतरंगी आसमान [कहानी ]

छुक छुक छुक ,गाड़ी के प्लेटफार्म पर रुकते ही रीमा और उसके चाचाजी ने अनिल को गाड़ी के एक डिब्बे के दरवाज़े पर खड़ा पाया |अनिल को देखते ही रीमा की दिल की धड़कने तेज़ हो गई और वह उसे एक टक देखती ही रह गई |अनिल अपना हाथ हिलाते हुए गाड़ी से नीचे उतरा और जवाब में रीमा और उसके चाचा हाथ हिलाते हुए उसकी ओर बढ़ गए |''नमस्ते ''हाथ जोड़ कर रीमा ने अनिल का अभिवादन किया |उसने आगे बढ़ कर चाचा जी के पाँव छुए ,चाचा जी ने उन्हें उठा कर जोर से गले लगा लिया | धक धक धक रीमा के दिल की धडकने और तेज हो उठी वह  रुकने का नाम ही नही ले रही थी ,उसने घबरा कर इधर उधर देखा ,कही कोई उसकी तेज़ धडकने सुन तो नहीं रहा ,सब को अपने में व्यस्त पा कर रीमा ने एक लम्बी सांस ली ओर अपने चाचाजी की बातें सुनने लगी ,''अनिल बेटा आज से तुम हमारे हो गए ,यह लो शगुन ''और पांच सौ रूपये के उपर एक रूपये का सिक्का रख कर  अनिल के  हाथ में थमा दिया |अपने चाचा जी की आवाज़ सुन कर चौंक उठी रीमा ,''अरे भई हमने तो रिश्ता पक्का कर दिया ''फिर रीमा को देख कर वह बोले ,''ठीक किया न बेटा ''|रीमा की आँखे शर्म से नीचे झुक गई लेकिन वह अनिल को जी भर के देखना चाह रही थी ,अपनी पलकों में उसकी सूरत को बंद कर लेना चाहती थी ,तभी रेलगाड़ी के इंजन ने सीटी दी ,''अच्छा चाचाजी मै चलता हूँ ,''अनिल की आवाज़ सुन कर रीमा ने पलकें उपर उठाई तो देखा अनिल हाथ हिलाता हुआ गाडी में चढ़ रहा था , एक क्षण के लिए दोनों की आँखे मिली ,बस उसी एक क्षण ने रीमा की जिंदगी में हलचल मचा दी ,उफ़ क्या जादू कर दिया उन निगाहों ने ,हाथ हिलाते हुए रीमा की नजरें दूर जाती हुई रेलगाड़ी  में ही अटक कर रह गई |देखते ही देखते रेलगाडी उसकी नजरों से ओझल हो गई |रीमा के दिल की धडकने अभी भी तेज़ चल रही थी ,अनिल का मुस्कुराता हुआ चेहरा बार बार उसकी आँखों के सामने आ रहा था ,''अनिल उसका होने वाला पति ''वह कल्पना की दुनिया में उड़ने लगी ,काश वक्त वहीं पर थम जाता और वह उसे देखती ही रहती ''|'चलो बेटा ''चाचा जी की आवाज़ से वह चौंक उठी उनकी आवाज़ उसे कल्पना की दुनिया से वापिस धरती पर ले आई |रीमा एक नई ज़िन्दगी  में जल्दी ही कदम रखने जा रही थी ,उसकी हर सुबह अनिल की मनमोहक तस्वीर को देख कर होती थी और हर रात उसके सपने लेते हुए गुजर जाती थी ,हर वक्त वह अनिल के ख्यालों  में ही खोई रहती थी|कितने प्यारे दिन थे वह ,यह सोचते ही रीमा के गाल गुलाबी हो उठे और आँखों में उन बीते हुए हसीं लम्हों को याद कर ख़ुशी से वही चमक लौट आई थी |
 दिन महीने साल गुजर गए ,समय भी न जाने कितनी जल्दी बीत गया ,मानो  पंख लगा कर उड़ गया हो ,आज शादी के इतने वर्ष  गुजर जाने के बाद भी रीमा उस मधुर क्षण की मिठास को नही भुला पाई ,वह दिल को गुदगुदाने वाला क्षण ही तो उसकी जिंदगी है जिसे महसूस कर आज भी रीमा की आँखे चंचल हो उठती है और उनमें उभरती है एक ऐसी चमक ,जो उसे आज भी याद दिलाती है कि कभी अनिल उसका दीवाना था |रीमा अनिल का नाम हर जान पहचान वालों कि जुबां पर था ''वाह जोड़ी हो तो ऐसी ''अक्सर ऐसे वाक्य रीमा के कानो में इधर उधर किसी से मिलते हुए पड़ ही जाते  थे  |अनिल की दुनिया मंजिल रीमा थी और रीमा की मंजिल अनिल था ,दोनों हमेशा आसमान में ही उड़ा करते थे ,लेकिन समय की उड़ान कोई नही रोक सकता ,बीते हुए दिन आज डायरी के पन्नों कि तरह रीमा की आँखों के सामने गुजरते हुए जा रहे थे  ,टप टप टप रीमा की  ओंखों से अचानक आंसू टपक पड़े और अनिल को देखते हुए उसने पूछा था ,''क्या तुम्हे मुझ पर विश्वास नही है अनिल ''रीमा के भोले से चेहरे को अपने  दोनों हाथो में ले कर अनिल ने बड़े प्यार से कहा था ,''मुझे माफ़ कर दो रीमा ,आगे से ऐसे बात कभी नही करूँगा ,पता नही और लोगों को देख कर मेरा दिमाग क्यों खराब हो जाता है ,प्लीज़ रीमा भूल जाओ जो भी मैने तुमसे कहा है ,देखों ,अब तो मैने अपने कान भी पकड़ लिए ''रीमा के चेहरे को छोड़ अनिल ने अपने कान पकड़ लिए थे और कहा था ,''तुम बहुत भोली हो रीमा ,तुम नही  जानती इस दुनिया में क्या क्या हो रहा है ,अपने पडोस में ही उन दोनों लड़कियों को हो ही देखो ,दोनों का चरित्र ठीक नही है ,,तभी तो यह शक का कीड़ा बार बार मेरे जहन में जन्म  ले लेता है ,बस प्लीज़ अब आंसू पोंछ लो और चुप हो जाओ न ,आगे से यह गलती कभी नही होगी ''अनिल की भोली सूरत देख रीम के होंठों पर मुस्कुराहट तो आ जाती थी लेकिन उसके भीतर ही भीतर ज्वारभाटा सा उठ रहता  था ,काश वह अपना दिल चीर कर उसे दिखा पाती कि उसके दिल में अनिल के लिए बस प्यार ही प्यार था |उसने तडपते हुए रुंधे गले से अनिल से उसके प्यार का सम्मान करने के लिए कहा था |''अब छोड़ो भी रीमा ,प्लीज़ मैने माफ़ी तो मांग ली न ,तुम भी मुझे समझने की कोशिश करो रीमा ,मै भी तुम्हे बहुत चाहता हूँ लेकिन मालूम नही मुझे सदा यह डर क्यों लगा रहता है कि कोई तुम्हे मुझसे छीन न ले ,तभी तो यह शक का कीड़ा बार बार मेरे अंदर जन्म लेता रहता है ,बस अब और आंसू नही ,आगे से ऐसी बात कभी नही करूँगा ,सच्ची मान जाओ न |''अनिल की भोली सूरत देख रीमा के मुख पर हल्की सी मुस्कुराहट आ गई और अनिल ने उसे अपनी बाहों में भर लिया |
दिन गुजरते गए, रीमा कि जिंदगी में कभी धूप कभी छाँव ,कभी ख़ुशी तो कभी गम ,अनिल और रीमा का घर  दो नन्हे मुन्ने बच्चे सोनू और मोनू की किल्ल्कारियों से गूँज उठा ,चार साल हो गए थे उन दोनों को अपनी गृहस्थी बसाये हुए ,लेकिन रीमा के चेहरे पर अभी भी नवविवाहिता सी ताजगी थी |आज निचले फ्लैट वाली मिसेज़ कोहली मिली थी और रीमा को देखते ही बोली ,''रीमा जी आपको देख कर लगता ही नही कि आपके दो बच्चे है ,ऐसे लगता है जैसे अभी हाल ही में आपकी शादी हुई हो ,''हंस पड़ी रीमा उसकी बात सुन कर |शाम को बेसब्री से रीमा अनिल का इंतज़ार किया करती थी और दोनों मिल कर रात्री का भोजन किया करते थे ,आज भोजन करते हुए रीमा ने अनिल को मिसेज़ कोहली की बात बताई ,एकटक अनिल रीमा के खूबसूरत चेहरे को निहारने लगा था ,''सच में रीमा तुम बहुत सुंदर हो ,अनिल का जवाब सुन रीमा के गोरे गाल शर्म से लाल हो गए थे ,''हाँ अनिल मुझसे बहुत प्यार करता है ''मन ही मन सोचने लगी थी रीमा ,''उसकी सुन्दरता का राज़ शायद अनिल का प्यार ही है ''सोचते हुए मुस्कुरा उठी थी रीमा |,उसका अनिल पर अटूट स्नेह और विशवास था ,लेकिन शायद जिस पर पूर्ण विशवास हो,धोखा भी उससे ही मिल सकता है,इस बात से अनजान रीमा कभी अनिल के बारे में ऐसा सोच भी नही सकती थी कि कभी उससे इतना प्यार करने वाले इंसान का कोई और रूप भी उसके सामने आ सकता था ,वह तो सिर्फ अपनी छोटी सी दुनिया में ही खुश थी ,सोनू ,मोनू और अनिल बस यही तो थी उसकी छोटी सी दुनिया |
 सावन का महीना जहां दो प्यार करने वालों के दिलों को और करीब ले कर आता है वही महीना रीमा को जिंदगी भर का दर्द देने जा रहा था, शाम से ही मौसम ने रंग बदल लिया था ,आसमान में काले बादल छा गए थे ,तेज़ आंधी और भयंकर तूफ़ान भरी रात न जाने क्यों रह रह कर रीमा का दिल धड़का रही थी ,उसे कुछ अच्छा नही लग रहा था ,बाहर हल्की हल्की बूंदा बांदी शुरू हो चुकी थी  ,अनिल आराम से बिस्तर पर सोनू के साथ लेट कर सुस्ता रहा था और रीमा मोनू को सुलाने की कोशिश कर रही थी ,तभी ट्रिन ट्रिन ट्रिन दरवाज़े  की घंटी बज उठी ,जिसकी आवाज़ सुन कर पांच साल का छोटा सा  मोनू जोर जोर से रोने लगा था तो रीमा ने उसे कस कर अपने सीने से चिपका  लिया था ,अनिल बिस्तर छोड़ना नही चाह था था पर न चाहते हुए भी उसने  बिस्तर को छोड़ कर दरवाज़ा खोल दिया और मालूम नही वह उसके बाद बाहर क्यूँ चला गया ,रीमा फिर से मोनू को सुलाने में लग गई थी ,बड़ी मुश्किल से निंदिया रानी उस पर मेहरबान हुई ,रीमा ने घडी पर नजर डाली तो रात का साड़े तीन बज रहे थे  ,अनिल अभी भी घर वापिस नही आया था | रीमा ने सो रहे मोनू ,सोनू पर चादर ओढ़ा  दी और दरवाज़ा खोल कर अनिल को ढूँढने लगी ,बारिश की एक तेज़ बौछाड़ ने उसे पूरा भिगो दिया ,उसने चारो तरफ नजर घुमाई लेकिन अनिल का कहीं भी कोई अता पता नही था |उसने दरवाज़ा बंद कर कुंडा लगा दिया ,उसे अनिल की बहुत चिंता हो रही थी ,न जाने किसके साथ वह बाहर निकल गया ,अचानक उसे छत पर से कुछ आहट सुनाई पड़ी और वह तेज़ी से सीड़ियाँ चढ़ती हुई छत पर पहुंच गई ,तेज़ बारिश में उसे भीगते हुए दो साये दिखाई दिए ,सारी दुनिया से से बेखबर दोनों एक दूजे की बाहों में समाये हुए ,वही ठिठक कर रह गई रीमा उन्हें देखते ही  उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया उसे ऐसे लगा जैसे किसी ने उसे आसमान से उठा कर नीचे पटक दिया हो ,उसके दिल और दिमाग सब शून्य हो गए ,तभी जोर से बादलों कि भयानक गर्जन के साथ  बिजली चमकी मानो वह बिजली उसी के ऊपर आ कर गिर गई हो ,सब कुछ खत्म हो चूका था अब उसकी जिंदगी में ,अनिल की बाहों में उनकी ही पड़ोसन मधु थी |काश यह सब देखने से पहले वह मर क्यों नही गई ,इतना बड़ा विश्वासघात ,सारी जिंदगी उस पर शक करता रहा अनिल और खुद किसी और के साथ ...,यह सब सोच कर रीमा का सर घूमने लगा |एक बार तो उसके मन में आया कि अभी के अभी वह छत से छलांग लगा कर नीचे कूद जाए ,लेकिन तभी उसकी आँखों के सामने उसके नन्हे बच्चो के मासूम चेहरे  घूम गए  ,उसके बाद सोनू और मोनू का क्या होगा ?उसका दिल आज फिर तेज़ी से धडकने लगा ,सांस उखड़ रही थी,बड़ी मुश्किल से वह दीवार का सहारा लेते हुए नीचे उतर आई और आ कर धम से बिस्तर पर गिर पड़ी और उसके भीतर सुलगता ज्वालामुखी अविरल अश्रुधारा बन कर बहने लगा ,रोते रोते उसकी हिचकियाँ बंध गई ,पीछे आहट सुनते ही रीम ने घूम कर देखा तो वहां अनिल खड़ा था ,उसे वहां खड़े देख रीमा को यूं लगा  जैसे कोई अनजान सा व्यक्ति उसके सामने खड़ा है ,''क्यों आये हो यहाँ ?''अनान्यास ही उसके मुख से यह शब्द निकल पड़े |''रीमा मुझसे बहुत भारी  गलती हो गई ,मुझे माफ़ कर दो ,''अनिल के बोलने पर बिफर उठी रीमा ,''नही मै तुम्हे कभी माफ़ नही कर सकती ,आज से  तुम्हारा और मेरा रिश्ता हमेशा हमेशा के लिए खत्म ''उसके आंसू थमने का नाम ही नही ले रहे थे ,''तुम झूठे हो जब तुम मधु से प्यार करते थे तो क्यों की मुझ से शादी ,''मै तुम्हे छोड़ कर सदा सदा के लिए जा रही हूँ ,अपने बच्चों को मै खुद पाल लूंगी |''यह कह कर रीमा ने अपना सामान बांधना शुरू कर दिया |अनिल लगातार उससे माफ़ी मांगता जा रहा था ,लेकिन रीमा ने आंसू बहाते हुए वहां से जाने की पूरी तैयारी कर ली थी |
आँखों ही आँखों में पूरी रात कट गई ,बारिश कब की बंद हो चुकी थी तूफ़ान भी थम चूका था ,आसमान हलकी हलकी लालिमा लिए नव भोर का स्वागत करने को तैयार था,लेकिन रीमा भीगी आँखों से अपनी गृहस्थी को विदाई देने जा रही थी ,अपना सामन उठा कर वह बाहर सड़क पर खड़ी ऑटो का इंतज़ार कर रही थी ,तभी अनिल ने पीछे से आ कर उसका हाथ पकड़ लिया ,''नही रीमा  तुम मुझे छोड़ कर ऐसे नही जा सकती ,मै तुम्हे कहीं नहीं जाने दूंगा ,तुम जो चाहो मुझे सजा देदो लेकिन यह घर  सिर्फ तुम्हारा है तुम इसे छोड़ कर मत जाओ  ,मै मानता हूँ मुझ  से गलती नही गुनाह हुआ है ,मत जाओ .,मत जाओ |''रीमा ने उसकी आँखों में देखा ,उसे उनमे आत्मग्लानी  के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे ,इससे पहले  वह कुछ कहती अनिल ने उसका सामान उठा लिया ,रीमा ने आकाश की  तरफ देखा,काले घने बादल छट चुके थे  ,सुनहरी धूप  सतरंगी आसमान पर अपनी छटा बिखेर चुकी थी और उसके घर के सामने आसमान पर सात रंगों से बंधा इन्द्रधनुष उसे नवजीवन का सन्देश दे रहा था , रीमा अपलक उस इन्द्रधनुष को निहारती रही |

Wednesday, 10 July 2013

नभ पर बदरा

सावन आया
नभ पर बदरा
उमंग लाया
.................
चुनरी भीगी
झूले पर सखियाँ
हवाएँ ठंडी
.................
घटाएँ काली
पानी बरसा जाती
बरखा रानी
.................
मयूर नाचे
छा गई हरियाली
पपीहा बोले
..................
जलता दिल
घनघोर घटाएँ
पिया मिलन
...................



Tuesday, 9 July 2013

गुज़रा हुआ वक्त


वक्त जो गुज़र जाता है 
छोड़ जाता पीछे कई यादें 
कुछ खट्टी तो कुछ मीठी 
भर आती है आंखे कभी 
याँ लब पे मुस्कान कभी 
पर गुज़रा हुआ वो वक्त 
नीव बन संवारता है जो 
आने वाले जीवन के पल 
भरता है ज़िन्दगी में रंग 
देकर जाता नई सीख हमे 
भुला कर दर्द जो है छिपे 
अतीत के आंचल के तले 
चलती रहे यूँ ही ज़िन्दगी 
होंठों पर  मुस्कान लिये 

Monday, 8 July 2013

मन में है विश्वास

मन में है विश्वास

चला जा रहा हूँ इस निर्जन पथ पर 
कभी तो मिलेगी  चलते हुए मंजिल 
कहीं तो  जाएगी ये राह जिंदगी की 
यही सोच उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ 
........................................................
अनगिनत कांटे मिले राहों में मुझे 
भयानक नजारों ने भी डराया मुझे 
पर था मन में अटूट विश्वास  कहीं 
यही सोच उस ओर पग बढ़ा रहा हूँ 

Sunday, 7 July 2013

बोझिल न बन जाए प्यार भरी नोक झोक

बोझिल न बन जाए प्यार भरी नोक झोंक

रितु और नीलांश का अभी हाल ही में विवाह हुआ है और वह भी प्रेम विवाह लेकिन माता पिता की मर्ज़ी से ,जहाँ प्यार होता है वहां एक दूसरे से गिले ,शिकवे और शिकायत तो होती ही रहती  है ,आजकल यही कुछ उन दोनों के साथ भी हो रहा है  ,हर सुबह शुरू होती है प्यार की मीठी तकरार से और हर  रात गुजरती है ढेरों गिले, शिकवे और शिकायते लिए हुए ,यही अदायें तो जिंदगी को रंगीन बनाती है पहले रूठना और फिर मनाना ,मान कर फिर रूठ जाना |यह रूठने और मनाने का सिलसिला  जब तक यूं ही चलता रहे तो समझ लो उनकी शादी को ईश्वर का वरदान मिला हुआ है ,ऐसे झगड़े हमेशा उनकी शादी की ताजगी बनाये रखते  है|वैसे तो हमारे शास्त्रों में  लिखा हुआ है कि शादी के बाद पति और पत्नी का मिलन ऐसे होना चाहिए जैसे दो जगह का पानी मिल कर एक हो जाता है फिर उस पानी को पहले जैसे अलग नही किया जा सकता ,लेकिन ऐसा होना बहुत ही मुश्किल है क्योंकि दो व्यक्ति  अलग अलग विचारधारा लिए अलग अलग परिवेश में बड़े  हुए जब एक दूसरे के साथ रहने लगते है तो यह सम्भाविक है कि उन दोनों की सोच भी एक दूसरे से भिन्न ही होगी ,उनका खान पान ,रहन सहन, बातचीत करने का ढंग ,कई ऐसी बाते है जो उनके अलग अलग व्यक्तित्व को दर्शाती है |

पति पत्नी के इस खूबसूरत रिश्ते में और भी निखार लाता है उनकी एक दूसरे के प्रति नाराज़गी का होना और फिर उसकी वह नारजगी को दूर कर एक दूसरे के और करीब आना |रितु को अगर घर का खाना पसंद आता है तो नीलांश को बाहर खाना अच्छा लगता है ,रितु को यदि घर सजाना अच्छा लगता है तो नीलांश को घर फैलाना  ,बस इन छोटी छोटी बातों से वह दोनों एक दूसरे पर खीजते रहते है और शिकवे शिकायतों का यह सिलसिला यूँ ही चलता रहता है  ,कभी रितु नाराज़ ,तो कभी नीलांश लेकिन वह ऐसी नोक झोंक का भी लुत्फ़ लेते हुए आनंदित रहते है ,वह इसलिए कि उनका प्रेम एक दूसरे के प्रति विशवास और मित्रता पर आधारित है,वह दोनों आपस में खुल कर एक दूसरे से अपने विचार अभिव्यक्त करते है |

 जब वैवाहिक जिंदगी में एक दूसरे के प्रति अविश्वास पनपने लगे यां पुरुष प्रधान समाज में पति का अहम आड़े आने लगे तो ऐसे में असली मुद्दा तो बहुत पीछे छूट कर रह जाता है और शुरू हो जाता है उनके बीच न खत्म होने वाली शिकायतों का दौर ,पति पत्नी दोनों को एक दूसरे की  हर छोटी बड़ी बात चुभने लगती है ,इसके चलते  उन दोनों का बेचारा कोमल दिल शिकवे शिकायतों के बोझ तले दब कर रह जाता है और बढ़ा देता है उनके बीच न खत्म होने वाली दूरियाँ ,जो उन्हें मजबूर कर देती  है कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने पर और खत्म होती है उनके वैवाहिक जीवन की कहानी तलाक पर जा कर ,अगर किसी कारणवश वह तलाक नही भी लेते और सारी जिंदगी उस बोझिल शादी से समझौता कर उसे बचाने में ही निकाल देतें है ,पति पत्नी का आपस में सामंजस्य दुनिया के हर रिश्ते से प्यारा हो सकता है ,अगर पति पत्नी दोनों इस समस्या को परिपक्व ढंग से अपने दिल की भावनाओं को एक दूसरे से  बातचीत कर सुलझाने की कोशिश करें तो इसमें कोई दो राय नही होगी कि उनके बीच हो रहे  शिकवे और शिकायतों का सिलसिला  उन्हें भी रितु और नीलांश की तरह आनंद प्रदान करेगा और एक दिन वह अपनी शादी की सिल्वर जुबली याँ गोल्डन जुबली अवश्य मनाएं गे |