Saturday, 31 August 2013

मुखौटा

हर कदम रखना संभाल के
मतलब की है दुनिया यह
चेहरे पर ओढ़े कई चेहरे
मिल जायेंगे यहाँ कई जन
पहन मुखौटा यह घूम रहे
छुपा अपना असली मन
उलझा कर बातों में तुम्हे
दिखायें गे यह रंगी स्वप्न
रह जाओगे बस तुम देखते
चुपके से जाएँ गे निकल
संभल कर रहना लोगों से
दिखावा करते जो हर पल
रेखा जोशी

Friday, 30 August 2013

मंजिल

छोड़ के अपने इस आलस को अब जिंदगी में कुछ काम किया करते है 
पहुंचना  है  हमे  उस  मुकाम  पर  जिसकी  सदा चाह  किया  करते है  
अपनी  चाह को हकीकत में बदलने के लिए मत देखो तुम मंजिल को 
चाह  रखने  वाले  मंजिल  ताकते नहीं  बढ़  कर  थाम  लिया  करते हैं 

सुबह



माना  गहरा  है सागर किनारा दूर नही है
जला ले दीपक  रात इतनी भी काली  नही है
सुख दुःख तो यहाँ नित ही आते जाते है साथी
कट जाए गी रात सुबह होने में देर नही है

रेखा जोशी


Thursday, 29 August 2013

अपने पराये



अपने पराये 

मेरी जानकी मौसी के घर जब तीसरी बेटी ने जन्म लिया था ,तब उस समय अड़ोस पड़ोस,रिश्तेदार सब ने उनके पास आ कर उनके यहाँ तीसरी लडकी केपैदा होने पर अफ़सोस जताया था ,लेकिन जानकी मौसी ने उन सबका यह कह कर मुंह बंद कर दिया था ,”यह मेरी बेटी है मैने इसे पैदा किया है और इसे पालूं गी भी मै ही ,किसी को भी इसकी चिंता करने की कोई जरूरत नही ,”और उन्होंने कर के भी दिखाया ,आज उनकी वही बेटी एक डाक्टर है और अपने मम्मी पापा का नाम रोशन कर रही है ,केवल वही नही उसकी दोनों बड़ी बहने यानि मेरी मौसी की दोनों बड़ी बेटिया कालेज में लेक्चरार है |
बेटी हो या बेटा ,एक माँ को उन्हें पैदा करने में एक जैसा दर्द सहना पड़ता है |माता पिता के लिए बेटा और बेटी दोनों बराबर होते है ,उन दोनों को एक जैसे ही पालते है ,अपने समर्थ में रह कर ऊँची से ऊँची शिक्षा भी देते है ,फिर एक दिन आँखों में आंसू भर कर ,अपनी प्यारी बेटी को ,अपने दिल के टुकड़े को,अपने ही हाथों अपने दिल पर पत्थर रख कर उसे किसी और के साथ विदा कर देते है |इस पुरुष प्रधान समाज ने सदा औरत को दूसरा दर्जा दिया है और हमारे ही समाज ने बेटी को पराया कर दिया ,यह रीत बना ली गई कि बेटी पराया धन है उसे शुरू से ऐसे संस्कार दिए जाते है ,उसे शादी के बाद माता पिता का घर छोड़ अपने पति के घर को अपनाना है और वह उस घर को पूरे तन मन से अपनाती भी है लेकिन अफ़सोस ज्यादातर उसके ससुराल वाले उसे हमेशा बेगानी लड़की ही समझते है ,उसकी नन्द ,उसके पति की बहन उनकी अपनी बेटी और बहू परायी ,इस अपने पराये के चक्कर में पिस कर रह जाती है बेचारी लड़की |कई परिवारों में तो बचपन से ही उसके साथ परायों सा व्यवहार किया जाता है और ससुराल में तो वह है ही परायी ,जबकि हमारी बेटियाँ दोनों ही परिवारों में प्यार ही बांटती है |
समय के चलते जागरूक हुए माँ बाप अपनी बेटियों को शिक्षित कर समाज में कुछ बदलाव तो ला रहें है लेकिन यह अभी भी बहुत कम दिखाई दे रहा है |अक्सर नौकरीपेशा लड़कियों को लडके इस लिए पसंद करते है क्योंकि उनके घर में दहेज के साथ साथ अतिरिक्त आमदनी भी आने लगे गी |आज जब बेटियाँ नौकरी करती है तब भी कई पढ़े लिखे माँ बाप अपनी बेटी के तथाकथित घर यानी कि उसके ससुराल जो उसके पति का घर है ,वहां खाना तो दूर पानी तक नही पीते ,भला उनसे पूछो जब उन्होंने अपनी बेटी को बेटो जैसा पढ़ाया लिखाया तो फिर वह अपनी बेटी के घर को क्यों पराया मान रहें है ,शायद इसलिए की वहां उनकी बेटी के सास ससुर रहते है फिर तो वह सास ससुर का घर हुआ ,उनकी बेटी का कौन सा घर है ?अगर बेटी का एकल परिवार है और वह अपने पति के साथ रहती है तो फिर वह उसके पति का घर है ,ऐसा क्यों है कि लड़की के माँ बाप उस बेटी के यहाँ कुछ भी खा ,पी नही सकते जो उनकी अपनी है ,अगर मजबूरी में कुछ खा भी लेते है तो वह अपनी बेटी के हाथ में पैसे रख कर उसकी कीमत चुका देते है |
हमारे कानून ने तो बेटा बेटी को बराबर का दर्जा दे रखा है ,अगर बेटा किसी कारणवश अपने माँ बाप के साथ नही रह सकता तो बेटी अपने परिवार सहित अपने माँ बाप के पास यां माँ बाप अपनी बेटी के पास क्यों नही रह सकते ?क्यों जकड़े हुए है हम समाज के ऐसे संस्कारों से कि बेटा ही उनकी मुक्ति का दुवार है ? अगर हम और हमारा समाज बेटी को पराया न समझ अपना कहता है तो हमे बेटा और बेटी दोनों के साथ बचपन से ले कर उनकी शादी और उसके के बाद भी एक जैसा व्यवहार करना चाहिए और अगर हम बेटा और बेटी के साथ एक जैसा व्यवहार नही रख सकते तो हमारी बेटियां अब भी परायी है औरआगे भी परायी ही रहें गी |

Wednesday, 28 August 2013

चाहत

मोतियों से आँसू  जब तेरी आँखों से बहते है 
इस दिल में इक टीस सी उठती है जिसे हम सह्ते है 
बहुत रुलाया तुम्हे इस ज़ालिम जमाने के तानो ने 
आ छुपा लूँ मन में दिलोजाँ से हम तुम्हे चाहते है 
रेखा जोशी 

Tuesday, 27 August 2013

जन्माष्टमी पर हाइकु




माखनचोर
गोकुल का दुलारा
नंदकिशोर

सुन्दर मुख
राधिका का कन्हैया
मनमोहन

मोरमुकुट
पीताम्बर धरण
मुरलीधर

 रचाता रास
गोकुल की गोपियाँ
राधिका संग

यशोदा मैया
नटखट गोपाल
लीला दिखाये

रेखा जोशी



श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की सभी मित्रों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 

मुक्तक

कुदरत के खूबसूरत नजारे देख  हम हैरान है 
नीचे ज़मीं सूखी तो उपर सिंधूरी आसमान है 
अपनी आँखो  में बसा ले तू इस  हसीन चित्र को 
हर पल को बदलने के लिये  बैठा उपर भगवान है
 रेखा जोशी 

Saturday, 24 August 2013

मुक्तक

 मुक्तक 

 किसी के काम जो आये उसे इंसान कहते है
 पैगाम ए मुहब्बत फैलाये उसे इंसान कहते है 
दुःख और दर्द के मारे बहुत है इस जहान  में 
आँसू दुखिया के जो पोंछे उसे इंसान कहते है

रेखा जोशी


Friday, 23 August 2013

जिंदगी के सौ रंग

जिंदगी के सौ  रंग  हर  रंग  में  सौ तराने ,
प्यार हुआ तुमसे औ  तुम ही रहे अनजाने 
कोई नहीं  जाने अब यह हाल ए दिल हमारा 
मुहब्बत दिल में पर बन गये लाखों अफ़साने 

रेखा जोशी 


Thursday, 22 August 2013

मुक्तक

बन सारथी पार्थ का गीत का पाठ पढ़ाया  था
बन कर राधा के साँवरे प्रेमरस छलकाया था   
श्याम तुम्हारे रंग में रंगी गोकुल की गोपियाँ 
चकाचौंध अर्जुन हुआ जब विराट रूप दिखलाया था 

रेखा जोशी 

Wednesday, 21 August 2013

रक्षाबंधन

राखी का त्यौहार प्रेम पूर्वक मानना है 
प्यारे इस बंधन को दिल से लगाना है 
अपनी प्यारी बहना की रक्षा खातिर 
भाई को राखी का ये क़र्ज़ भी चुकाना है 

सभी भाई बहनों को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं 

रेखा जोशी

Tuesday, 20 August 2013

प्यार भरा रिश्ता [रक्षाबंधन ]


प्यार भरा रिश्ता [रक्षाबंधन ]

हर रिश्ते की अपनी ही एक गरिमा होती है ,ऐसे ही एक प्यारा रिश्ता होता है नन्द और भाभी का,बात रक्षाबंधन त्यौहार की है जब शैली की नन्द अपने प्यारे भैया को यानी कि उसके पति को राखी बाँधने उनके घर आई तो उस समय वहां 
बहुत ही खुशनुमा माहौल था और बहुत ही स्नेह से उसकी नन्द ने अपने भैया को तिलक लगा कर राखी बाँधी और ढेरों आशीर्वाद भी दिए उसके पति ने भी बहुत प्रेम से उसे सुंदर उपहार दिए ।काफी दिनों बाद दोनों भाई बहन मिले थे इसलिए वह अपने बचपन और घर परिवार की बाते याद करने लगे ,शैली भी रसोईघर में जा कर दोपहर के भोजन की तैयारी में जुट गई ,तभी उसे दोनों भाई बहन की जोर जोर से बोलने की आवाज़ सुनाई पड़ी ,वह भाग कर वहां पहुंची तो देखा किउसकी ननद अपने सारे उपहार छोड़ कर जा रही थी और उसके पति भी बहुत गुस्से में अपनी नाराज़गी जता रहे थे ,शैली भाग कर अपनी नन्द के पास गई और उसने उसे मनाने और रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वह दरवाज़े से बाहर निकल गई ।पूरे घर का वातावरण गमगीन हो गया था ,यह सब देख कर शैली को बहुत ही दुख हो रहा था कि राखी वाले दिन उनकी बहन रूठ कर बिना कुछ खाये पिये उसके घर से जा रही थी लेकिनवह ठहरी भाभी , नाज़ुक रिश्ता था उसका और उसकी ननद के बीच।उसने जब अपने पति की तरफ देखा, तो उसे अपने पति की आँखों में पश्चाताप के आंसू साफ़ दिखाई दे रहे थे ,उसने झट से देरी न करते हुए अपनी ननद का हाथ पकड़ लिया ,इतने में उसके पति भी वहां आ गए और उन्होंने अपनी प्यारी बहना को गले लगा कर क्षमा मांगी ,दोनों की आँखों में आंसू देख शैली की आँखे भी नम हो गई ।उसने जल्दी से खाने की मेज़ पर उन्हें बिठा कर भोजन परोसा और सब ने मिल कर खाना खाया ।सारे गिले शिकवे दूर हो गए और नाराज़गी से भाई बहन के रिश्ते में पड़ी सिलवटें उनकी आँखों से बहते हुए आंसुओं से दूर हो गई थी। शैली के घर से वापिस जाते समय उसकी ननद ने उसे गले से लगा लिया और इस प्यार भरे रिश्ते की गरिमा बनाये रखने पर अपना आभार प्रकट किया |

रेखा जोशी

Monday, 19 August 2013

सावन


सावन की भीगी रातों  में ठंडी  फुहार रुलाती है 
घनघोर घटा संग दामिनी गगन पर रास रचाती है 
छुप गया चंदा बदरा  संग तारों की बारात लिये 
लगा कर अगन शीतल हवायें बिरहन को सताती  है 

रेखा जोशी 

Sunday, 18 August 2013

हसरत

न चाहते हुये  भी हम तुम  को चाहते है
हँसती  है   आँखे  कभी आंसू बरसते  है
हसरत तुम्हारी ने हमें दीवाना बना दिया
मन ही मन हम तेरे प्यार को तरसते है 

Saturday, 17 August 2013

एक मुक्तक


भीतर मन में बेचैनी है, बाहर बड़े झमेले हैं 
सुलग रहा दीवाना दिल है ,जगत में लगे मेले हैं 
बरसते किसी पर पैसे है , रो रहा कहीं पे फकीर 
दुनिया तो यह रंग बिरंगी है, सब कर्मो के खेले है 


प्रेम ही सत्य है

जीवन दुखों का घर ,हर कोई रोता है
ढाई अक्षर प्रेम के ,जो यहाँ पढ़ लेता है
दुखों को पार करे ,औ तर जाए वह तो,
पूरा संसार मिथ्या ,प्रेम ही सत्य होता है

रेखा जोशी


Friday, 16 August 2013

क्या भारत में फिर से राम राज्य स्थापित हो पाएगा?

क्या भारत में फिर से राम राज्य स्थापित हो पाएगा?

मर्यादा पुरुषोत्तम राम जिसकी गाथा 'रामायण ' भारत के कोने कोने में गाई और सुनी जाती है ,जिसकी हम भारतवासी पूजा करते है ऐसे राजा राम के राज्य की मिसाल भी दी जाती है ,जहां अमीर और गरीब में कोई भेदभाव नही किया जाता था ,जहाँ हर किसी को यथोचित न्याय मिलता था ,उनके राज्य में कोई चोरी डकैती नही हुआ करती थी ,उनके राज्य में प्रजा सुख ,चैन और शांति से रहा करती थी ,ऐसा ही सपना हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस देश के लिए देखा था ,लेकिन अफ़सोस वह पूरा नही हो पाया ,आज हर कोई पैसे के पीछे भाग रहा है ,चाहे वह नेता हो याँ कोई आम आदमी ,चाहे पैसा सफेद हो याँ काला ,बस अपना घर भरते  चले जाओ ,जो गरीब है वह और गरीब होता जा रहा है और जो अमीर है वह और अमीर होते जा रहे है । अमीर और गरीब का फासला दिन प्रतिदिन बढ़ता ही चला जा रहा है ।

रामायण में लिखा गया है कि जब ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में असुरों ने उत्पात मचा रखा था  तब राजा दशरथ  की आज्ञा ऋषि विश्वामित्र दोनों राजकुमारों राम और लक्ष्मण को  अपने आश्रम असुरों का नाश करने के लिए ले गए थे ,तब दोनों भाई गुरु के पीछे पीछे अपने रथ और घोड़े पीछे छोड़ते हुए  पद यात्रा करते हुए उनके आश्रम गए थे और राक्षसों  का संहार कर वहां शांति स्थापित की थी | पद यात्रा का महत्व यह है कि जनसाधारण को करीब से देखना तथा उनकी समस्याओं का समावेश कर राज्य में सुख समृद्धि को स्थापित करना |   महात्मा गांघी जी ने भी पदयात्रा करते हुए रास्ते में जन साधारण को सत्याग्रह का सन्देश देते हुए डांडी मार्च किया था । गांधी जी के अनुसार  राजा को प्रजा के बीच जा कर उनके  दुःख और दर्द को समझना चाहिए। विनोबा भावे  जी ने भी अपनी एक पदयात्रा के दौरान भूदान अभियान चलाया था ,जब कुछ जमीदार अपनी जमीन का कुछ हिस्सा उन लोगो को देने के लिए तैयार हो गए थे जिनके पास जमीन नही थी | कहने का तात्पर्य यह है कि महात्मा गाँधी के सपनो के भारत में राम राज्य की स्थापना तभी संभव हो सकती है जब हमारे नेता आम आदमी और गरीब की जिंदगी को करीब से देखे और उनकी समस्याओं को समझे और उन्हें सुलझा सकें ,लेकिन नही ,यहाँ ऐसा नही हो सकता ,हां हमारे नेताओं को जब वोट भुनाने हो तभी जनता जनार्दन की याद आती है ,कभी रुपयों के बलबूते पर तो कभी चेहरे पर झूठ  का नकाब ओढे,बड़े बड़े वायदे कर ,जनता की आँखों में धूल झोंक कर कुर्सी से चिपक कर बैठ जाते है , जनता और देश जाए भाड़ में ,उनकी बला से | ऐसे परिवेश में राम राज्य की परिकल्पना करना मात्र एक सुखद स्वप्न के अतिरिक्त कोई मायने नही रखता |

आज आज़ादी के छैयासठ वर्ष बाद भी हमारे देश के हालात दिन प्रतिदिन बिगड़ते जा रहे है ,हमारी संस्कृति के मूल्य ,संस्कार सब पीछे छूटते जा रहे है ,लोग संवेदनशून्य होते जा रहे है ,औरतों की अस्मिता खतरे में साँसे ले रही है ,हमारे नेता नित नये विवादों के घेरे में उलझ रहे है ,कमरतोड़ महंगाई आम आदमी को रोटी से उपर कुछ सोचने नही दे रही और इस देश का युवावर्ग भ्रमित सा दिशाविहीन हो रहा है .ऐसे में मेरा आव्हान है भारतीय नारी से की वह देश की भावी पीढ़ी में अच्छे संस्कारों को प्रज्ज्वलित करें ,उन्हें सही और गलत का अंतर बताये ,अपने बच्चो में देश भक्ति की भावना को प्रबल करते हुए राम राज्य के सुखद  सपने को साकार करने की ओर एक छोटा सा कदम उठाये ,मुझे विशवास है नारी शक्ति ऐसा कर सकती है और निश्चित ही  एक दिन ऐसा आयेगा जब भारतीय नारी दुवारा आज का उठाया यह छोटा सा कदम हमारे देश को एक दिन बुलंदियों तक ले जाए गा | | 

Thursday, 15 August 2013

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

करें स्वागत आज़ादी का मिल के हम 
प्रण लें सभी रखें गे मान इस का हम 
निभा के हर धर्म अपना हम आज से
मिल के मनाये जश्न ऐ आज़ादी हम 

सभी मित्रों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

Wednesday, 14 August 2013

सपनों का भारत

ये तो नही है
सपनों का भारत
देश ये मेरा
………………
जलता मन
कश्मीर में आग
सुलगे देश
……………….
आतंकवाद
का भारत देश में
है बोलबाला
………………
भटक रहा
दर दर ईमान
फलता पाप
……………
हुए पराये
हम भारत वासी
देश अपना

Tuesday, 13 August 2013

मुक्त मुक्तक


किसी के काम जो आये उसे इंसान कहते है 
पैगाम ए मुह्हबत फैलाये उसे इंसान कहते है 
दुःख और दर्द के मारे बहुत है इस जहान में 
आंसू दुखिया के जो पोंछे उसे इंसान कहते है 

रेखा जोशी 

Monday, 12 August 2013

स्वतन्त्रता दिवस पर

रख हथेली पर अपनी जान शीश कटाने को तैयार है 
अपने वतन की खातिर वह मर मिटने को तैयार है 
अपने माँ बाप बीवी बच्चों से कोसों दूर सरहद पर 
दिल और जान से मान तिरंगे का रखने को तैयार है 

रेखा जोशी


Sunday, 11 August 2013

इन्द्रधनुष चाहिए [बाल कथा ]

  इन्द्रधनुष चाहिए [बाल कथा ]

रिम झिम बरसात में पिंकी और राजू अपने दोस्तों के संग खूब मस्ती कर रहे थे ,बारिश में भीगते हुए वह सब नाचते  हुए खूब शोर मचा रहे थे ,आज मौसम भी उनके संग अठखेलियाँ कर रहा था ,अभी अभी इतने तेज़ बरसात हो रही थी और साथ ही सूरज देव भी बादलों के संग आँख मिचोली खेलते  हुए बार बार बादलों में से झांक कर मुस्कुराते हुए नजर आ रहे थे ,पिंकी बुरी तरह से भीग चुकी थी ,उसे बूँदा बूंदी के साथ सूरज के संग छुपा छुपी खेलना बहुत अच्छा लग रहा था ,कभी वह आसमान को देखती तो कभी नीचे पानी में छप छप करती ,अचानक आसमान को देखा तो उसे उपर रंग बिरंगा झूला दिखाई दिया ,ख़ुशी के मारे वह जोर से चिल्लाने लगी ,''राजू भैया वो देखो आकाश में कितना सुन्दर रंगों से  सजा झूला है ,राजू ने जब उपर देखा तो उसे आसमान में बहुत सुन्दर इन्द्रधनुष दिखाई दिया । '' आहा कितना सुन्दर है यह ,मेरी प्यारी बहना ,इसे इन्द्रधनुष कहते है ,जब सूरज की किरणे आसमान में लटकी पानी की बूँदों पर पड़ती  है तब उसकी सफेद रौशनी सात रंगों में विभाजित  हो जाती है और हमे  आकाश में रंग बिरंगा सात रंगो से बना इन्द्रधनुष दिखाई देता है ,''राजू ने पिंकी को समझाया ,लेकिन पिंकी ने तो जिद पकड़ ली कि उसे इन्द्रधनुष चाहिए और बेचारा राजू सोचने लगा कि वह कैसे अपनी नन्ही सी बहन को इन्द्रधनुष ला कर दे ।

रेखा जोशी 

Friday, 9 August 2013

तेरे मेरे सपने

तेरे मेरे सपने

''सपनो की दुनिया भी कितनी अजीब होती है ,सपने में सपना  जैसा कुछ लगता ही नही ,बिलकुल ऐसा महसूस होता है जैसे सब सचमुच में घटित हो रहा हो  ,उफ़ ,कितना भयानक सपना था ,अच्छा हुआ नींद खुल गई ''डरी हुई सीमा बिस्तर छोड़ ,बाथरूम में जा कर मुहं  धोने लगी ,उसके सीने में अभी भी दिल जोर जोर से धडक रहा था और सांस फूली हुई थी |अक्सर हम सब के साथ ऐसा ही कुछ होता है जब भी हम कभी कुछ ऐसा ही भयानक सा सपना देखतें है ,और जब कभी बढ़िया स्वप्न आता है तो नींद से जागने की इच्छा ही नही होती ,हम जाग कर भी आँखे मूंदे उसका आनंद लेते रहते है |सीमा बार बार उसी सपने के बारे में सोचने लगी ,तभी उसे अपनी साइकालोजी की टीचर की क्लास याद आ गई ,जब वह बी .एड कर रही थी ,सपनो पर चर्चा चल रही थी,''हमारी जागृत अवस्था में हमारे मस्तिष्क में लगातार विभिन्न विभिन्न  विचारों का प्रवाह चलता रहता है ,और जब हम निंदिया देवी की गोद में चले जातें तो वह सारे विचार आपस में ठीक  वैसे ही उलझ जाते है जैसे अगर ऊन के बहुत से धागों को हम इकट्ठा कर एक स्थान पर रख दें और बहुत दिनों बाद देखें तो हमें वह सारे धागे आपस में उलझे हुए मिलें गे , ठीक वैसे ही  जब हम सो जाते है हमारे  सुप्त मस्तिष्क के अवचेतन भाग में वह उलझे हुए विचार एक नयी ही रचना  का सृजन कर  स्वप्न  का रूप ले कर हमारे मानस पटल  पर चलचित्र की भांति  दिखाई देते  है | फ्रयूड के अनुसार हम अपनी अतृप्त एवं अधूरी इच्छायों की पूर्ति सपनो के माध्यम से करते है ,लेकिन  दुनियां में कई बड़े बड़े आविष्कारों का  जन्म सपनो में ही हुआ है ,जैसे की साइंसदान कैकुले ने छ सांपो को एक दूसरे की पूंछ अपने मूंह में लिए हुए देखा,और बेन्जीन का फार्मूला पूरी दुनिया को दिया | अनेकों साईकालोजिस्ट्स ने सपनो की इस दुनिया में झाँकने की कोशिश की, लेकिन इस रहस्यमयी  दुनिया को जितना  भी समझने की कोशिश की जाती रही है ,उतनी ही ज्यादा यह उलझाती रही है |हमें सपने क्यों आते है ?कई बार सपने आते है और हम उन्हें भूल जातें है ?हमारी वास्तविक दुनिया में सपनो का कोई योगदान है भी यां नही ,और कई बार तो हमारे सपने सच  भी हो जाते है |अनगिनत सवालों में एक पहलू यह भी है  ,जब हम सो जाते है तब हमारा  जागृत मस्तिष्क आराम की स्थिति में चला जाता है और  उस समय मस्तिष्क तरंगों का कम्पन जिसे फ्रिक्युंसी कहते है ,जागृत अवस्था  की मस्तिष्क  तरंगो की अपेक्षा  घट कर आधी रह  जाती है ,उस समय हमारी बंद आँखों की पुतलिया घूमने लगती है जिसे  आर ई एम्  कहते है ,मस्तिष्क की इसी स्थिति में हमे सपने दिखाई देते है |एक मजेदार बात यह भी उभर के आई कि जब हम ध्यान की अवस्था में होते है तो उस समय भी मस्तिष्क तरंगों की कम्पन कम हो जाती है और हम जागृत अवस्था में भी आर ई एम की अवस्था में पहुंच सकते  है ,अगर उस समय हम जागते हुए भी कोई सपना देखते है तो उसे  हम पूरा कर सकते है |सीमा के मस्तिष्क में भी अनेको विचार घूम रहे थे और वह बिस्तर पर लेट कर ध्यान लगाने की कोशिश कर रही थी ताकि वह भी अपने सपनो को सच होते देख सके |

Wednesday, 7 August 2013

मुक्तक

 मुक्तक
तुम्हारी चाहत लिए  हम पल पल मरते रहे
जीने  की  तमन्ना दिल में लिए तड़पते  रहे
दिन का सुकून और रातों  की नींदे  उड़ गई
अनजान बने  तुम्ही इस दिल में धड़कते रहे
................................................ ………
मुक्तक
हिंदू मुसलमां सिख ईसाई रब तू सब का
पुकार रहे तुझे सभी झुका के अपने शीश
हम सबको मिलजुल कर सिखा दो रहना
दया दृष्टि सभी पर रखना हे करूणाधीश

मुक्तक

छंदमुक्त  रचना
खूबसूरत थी जिन्दगी जब  हाथो में हाथ था  तुम्हारा
खूबसूरत थी जिंदगी  जब प्यार भरा साथ था तुम्हारा
 दे कर दर्द कहाँ चले गए हमे अपनी यादों में छोड़ के
पाते है हम चैन औ सुकून ख्याल आता है जब तुम्हारा
रेखा जोशी 

Monday, 5 August 2013

जागो भारत के वीर सपूतो

जागो भारत के वीर सपूतो 
है डूब  रहा  यह देश हमारा
……………………
है लूट रहे इसे तेरे कई भाई
खनकते पैसों से ये पगलाये 
है भर रहे सब अपना ही घर 
तार तार कर माँ का आंचल 
………………………
धधकती लालच की ज्वाला 
पर पनप  रहा  है भ्रष्टाचार 
माँ के कपूत ही नोच खा रहे
जकड़ के अनेक घोटालों में 
………………………. 
याद करो अमर शहीदों  को 
मर मिटे भारत की खातिर 
दो  बूंद  आँखों  में  भर कर 
मुक्त करो माँ को गद्दारों से
………………………. 
जागो भारत के वीर सपूतो 
है डूब  रहा  यह देश हमारा

रेखा जोशी




Sunday, 4 August 2013

नारी सशक्तिकरण आज़ादी से पहले और बाद

नारी सशक्तिकरण आज़ादी से पहले और बाद

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

सुभद्रा कुमारी चौहान जी की लिखी यह पंक्तियाँ वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को समर्पित है ,आज़ादी की प्रथम लड़ाई में उस मर्दानी ने अंग्रेजो से खिलाफ अपनी वीरता का प्रदर्शन कर पूरी स्त्रीजाति को गौरव प्रदान किया था ,लेकिन ऐसी वीरांगनाएँ तो लाखों में  कोई एक ही होती है l इस पुरुष प्रधान समाज में नारी की शक्ति को सदा दबाया गया है ,आज़ादी से पहले की नारी की छवि का ध्यान आते ही एक ऐसी औरत की तस्वीर आँखों के आगे उतर कर आती है जिसके सिर पर साड़ी का पल्लू ,माथे पर एक बड़ी सी बिंदिया ,शांत चेहरा और हमेशा घर के किसी न किसी कार्य में व्यस्त ,कई बार तो सिर का पल्लू इतना बड़ा हो जाता था कि बेचारी अबला नारी का पूरा चेहरा घूँघट में छिप कर रह जाता था ,उसका समय अक्सर घर की दहलीज के अंदर और पुरुष की छत्रछाया में ही सिमट  कर रह जाया करता  था l  अधिकतर परिवारों में बेटा और बेटी में भेद भाव आम बात थी नारी का पढ़ना लिखना तो बहुत की बात थी ,समाज में ऐसी अनेक कुरीतियाँ,बाल विवाह ,दहेज प्रथा ,सती प्रथा आदि पनप रही थी जिसका सीधा प्रभाव  नारी को भुगतना पड़ता था ,लेकिन समय के चलते मदनमोहन मालवीय जैसे कई समाजसेवी आगे आये और धीरे धीरे ऐसी कुप्रथाओं को समाप्त करने के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ी और कालान्तर समाज का स्वरूप बदलने लगा ,आज इक्सिवीं सदी की महिलायें घूँघट को पीछे छोड़ते हुए बहुत आगे निकल आई है lआज की नारी  घर की दहलीज से बाहर निकल कर शिक्षित हो रही है ,उच्च शिक्षा प्राप्त कर पुरुष के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर सफलता की सीढियां चढ़ती जा रही है l आर्थिक रूप से अब वह पुरुष पर निर्भर नही है बल्कि उसकी सहयोगी बन अपनी गृहस्थी की गाड़ी को सुचारू रूप से चला रही है l बेटा और बेटी में भेद न करते हुए अपने परिवार को न्योजित करना सीख रही है ,लेकिन अभी भी वह समाज में अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघर्षरत है ,दहेज प्रथा ,कन्या भ्रूण हत्या जैसी बुराइयों का उसे सामना करना पड़  रहा है ,भले ही समाज में खुले घूम रहे मनुष्य के रूप में जानवर उसकी प्रगति में रोड़े अटका रहे है ,लेकिन उसके  अडिग आत्मविश्वास को कमजोर नही कर पाए l  हमारे देश को श्रीमती इंदिरा गांधी ,प्रतिभा पाटिल जी  ,कल्पना चावला जैसी भारत की बेटियों पर गर्व है ,ऐसा कौन सा क्षेत्र है जिस में आज की नारी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन न कर पा रही हो | आज नारी बदल रही है और साथ ही समाज का स्वरूप भी बदल रहा है ,वह माँ बेटी ,बहन पत्नी बन कर हर रूप में अपना कर्तव्य बखूबी निभा रही है |

विश्व से पर्वत सी टकरा सकती है महिला
विश्व को फूल सा महका सकती है महिला
विश्व के प्रांगण में वीरांगना लक्ष्मी है महिला
विश्व फिर भी कहता है अबला है महिला 
याद शाम सवेरे ,राधिका को है आये |
मनभावन कान्हा ,धुन मुरली की बजाये |
गोकुल के गोपाल ,सभी के मन को भाये |
चितचोर मनमोहन ,दिल सबका है चुराये|

Thursday, 1 August 2013

न कोई शिकवा है न शिकायत है

न कोई शिकवा है न शिकायत है
जिंदगी के  तरन्नुम पर चलते है
मिले गम हमे याँ फिर आयें बहारें
हर हाल  में सदा खुश रहते है हम
तमन्ना थी कभी छू लें आसमां को
अब  संग हवाओं के चलने पर भी
हँसते हुए ऊँचाइयों सा मजा लेते है

रेखा जोशी