Sunday, 23 March 2014

मूक पुकार [लघु कथा ]


वह नन्ही सी चिड़िया गला फाड़ कर जार जार  रो रही थी , उसका जीवन साथी ज़मीन पर औंधा गिरा हुआ अपनी  ज़िंदगी की अंतिम सांसे जो ले रहा था | अपने प्रिय साथी की ऐसी हालत देख वह  दुःख से पुकार उठी ,वह मूक थी लेकिन उसकी आँखे उसका बदन चीख चीख कर पुकार रहा था  ,''क्यों खेल रहे हो  मानव तुम  प्रकृति से, क्यों नही तुम  प्रकृति के साथ संतुलन बना कर चलते  ,जगह जगह गगनचुम्बी  मोबाईल फोन के टावर लगा कर हमारे  अस्तित्व को ही मिटा रहे हो  ,आखिर कब तक तुम  प्रकृति से खिलवाड़  करते रहो गे,क्यों नही समझते कि हम भी इस सृष्टि का एक हिस्सा है,लेकिन याद रखो यदि  प्रकृति का संतुलन बिगड़ा तो एक दिन तुम्हारा अस्तित्व भी खतरे  में पड़  जाएगा ,संभल जाओ ,''लेकिन 'उस निरीह प्राणी की मूक पुकार उसकी दिल दहला देने वाली चीखों में ही दब कर रह गई |

रेखा जोशी