Thursday, 14 August 2014

अक्स तुम्हारा

देखा आईना
था चेहरा तुम्हारा 
सूरत भोली
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न पहचाना
था अनजान वह 
अक्स तुम्हारा 
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बुत तुम्हारा 
दर्पण में झाँकता
है परेशान 
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वोह खोया था
अपनी ही धुन में
किसे ढूँढ़ता
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साफ़ दिखती
चेहरे की रेखाएं
चिन्तित मुख

रेखा जोशी