Saturday, 4 October 2014

आई है बिटिया अँगना में मेरे



आई   है   बिटिया   अँगना   में   मेरे
घर   की  दीवारें    लगी   है   महकने

देखती  हूँ  नन्ही  परी  को   मै   जब
तैरता   है  नयन    में   मेरा   बचपन
पापा  का  प्यार  और  माँ  का  दुलार
लौट आये फिर वही प्यारे  पल  छिन

सुबह  और शाम  वह  सबको  नचाये
माँ   के  दुपट्टे   से   खुद   को    सँवारे
साड़ी  पहन  कर  वह   चोटी  लहराये
चहकती  मटकती  खेले   अँगना   में

भरी  दोपहर   में  छुपना   अँगना   में
वो  घर  घर  खेलना  संग  गुडिया  के
चहकने   लगा  है   मेरा   घर  आँगन
मधुर हसी से जब  वोह खिलखिलाये

आई   है   बिटिया   अँगना   में   मेरे
घर   की  दीवारें    लगी   है   महकने

रेखा जोशी