Saturday, 8 November 2014

अनबुझी प्यास

है देखते अक्सर 
कुछ ख़्वाब सुनहरे 
परियों के देश के 
हाथों में हमारे 
लहराती 
इक जादू की छड़ी 
घुमाते ही जिसे 
होती  
हमारी कामनायें पूरी 
भर जाती 
जहाँ सौगातों से 
झोली हमारी 
पर ख़्वाब
टूट जाते अक्सर 
रह जाती बस 
अनबुझी  प्यास 
जो तड़पाती हमें 
जीवन भर 

रेखा जोशी