Friday, 31 January 2014

चार दिन की चांदनी


लुभाती हम सभी को सुन्दर सलोनी है काया 
लेकिन  देखो तो वक्त की यह कैसी है माया 
सुन्दर से सुन्दर देह भी आखिर जाती है ढल 
चार  दिन की चांदनी  फिर  अन्धेरा  है छाया 

रेखा जोशी 

Wednesday, 29 January 2014

वृक्ष हूँ मै

बहुत बड़ा
वृक्ष हूँ मै
खड़ा हूँ
सदियों से
यहाँ
बन द्रष्टा
देख रहा हूँ
हर आते जाते
मुसाफिर को
करते है विश्राम
कुछ पल यहाँ
और फिर
चल पड़तें है
अपनी मंज़िल
की ओर
अक्सर यहाँ
आते है
प्रेमी जोड़े
पलों में गुज़र
जाते है घण्टे
संग उनके
हाथों में लिए
पूजा की थाली
कुमकुम लगा
माथे पर मेरे
मंगल कामना
करती है अपने
सुहाग की
और मै
बन द्रष्टा
मूक खड़ा
मन ही मन
प्रार्थना
करता हूँ
परमपिता से
पूर्ण हो
कामनाएँ
उनकी

रेखा जोशी





कौन समय के आगे टिक पाया

यह   संसार   बनाने    वाले  हे
कैसा   है   यह   संसार  बनाया
फूलों   के   संग    उगाये   कांटे
औ  धूप  के  साथ  बनाई छाया
है प्यार  बनाया  और  घृणा भी
निर्माण  के संग विनाश बनाया
मानव  के उर में करुणा भर दी
और   उसे   ही   शैतान  बनाया
बलरूप दिया यौवन को कितना
है  देख  जिसे  यौवन  भरमाया
पर क्षण भंगुर सब यह कितना
कौन  समय के आगे टिक पाया
बात समय की ही तो यह सब है
नर  जिसके आगे नतमस्तक है

प्रो महेन्द्र  जोशी







Tuesday, 28 January 2014

ठान ली है ज़िद इस दिल ने भी

पत्थर के 
सनम से 
जोड़ा रिश्ता 
चकनाचूर हुआ
शीशे सा
दिल अपना
पर
नही मानता
यह दिल
जानता
है वह
खिला देगा
इक दिन
फूल भी
पत्थरों में
महका सकता
है वह
पाषाण
हृदय भी
ठान ली
है ज़िद
इस दिल
ने भी

रेखा जोशी

पाषाण चट्टानों में खिला सकते है फूल

दिल लगा कर पत्थर से हम जाते है भूल 
खाते  अक्सर  चोट   जैसे  चुभते   है शूल 
लेकिन हमारे  मन में है  विशवास इतना 
पाषाण  चट्टानों  में  खिला  सकते  है फूल 

 रेखा जोशी 

Monday, 27 January 2014

मान और शान तिरंगे की


जान  हथेली पर  रख सर कटाने को तैयार है 
देश अपने की खातिर मर  मिटने को तैयार है 
परिवार अपने से मीलों  दूर तैनात  सीमा पर 
मान और शान  तिरंगे  की रखने को तैयार है 

रेखा जोशी 

ओम की गूँज

ओम की गूँज 
भंग होती नीरवता
गुंजित हुआ ब्रह्मांड
आँखे मूंदे धरा पर
समाधिस्थ योगी
विलीन ओम में
विचर रहा दूर कहीं
एकरस उसमे
झांक रहा उस पार
आभामंडल
चहुँ ओर
दृष्टि अलौकिक
चुपचाप रहा देख
बन द्रष्टा
माया उसकी
अपरम्पार

रेखा जोशी

Saturday, 25 January 2014

सभी मित्रों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

सभी  मित्रों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 

आओ  हम  सब  गणतंत्र दिवस  मनायें 
गरीबी   और   भुखमरी   यहाँ    मिटायें 
लेतें है शपथ इस दिन मिल कर हम सब 
भारत   को   भ्रष्टाचार    मुक्त   करायें 

रेखा जोशी 

Friday, 24 January 2014

लब पर है मुस्कान

किस्मत 
ने दिये 
गम ही 
गम 
अब तो 
आदत 
हो गई है 
खाने की
 गम 
दिल टूट 
चुका है 
मगर 
लब पर 
है मुस्कान 

रेखा जोशी 

Thursday, 23 January 2014

बेचैन निगाहें [लघु कथा ]


जनवरी का सर्द महीना था ,सुबह के दस बज रहे थे और रेलगाड़ी तीव्र गति से चल रही थी वातानुकूल  कम्पार्टमेंट होने के कारण ठण्ड का भी कुछ ख़ास असर नही हो रहा था ,दूसरे केबिन से एक करीब दो साल का छोटा सा बच्चा बार बार मेरे पास आ रहा था ,कल रात मुम्बई सेन्ट्रल से हमने हज़रात निजामुदीन के लिए गोलडन टेम्पल मेल गाडी पकड़ी थी  ''मै तुम्हे सुबह से फोन लगा  रही हूँ तुम उठा क्यों नही रहे ''साथ वाले केबिन से किसी युवती की आवाज़ ,अनान्यास  ही मेरे कानो से टकराई,शायद वह उस बच्चे की माँ की आवाज़ थी ,''समझ रहे हो न चार बजे गाडी मथुरा पहुँचे गी ,हाँ पूरे चार बजे तुम स्टेशन पहुँच जाना ,मुझे पता है तुम अभी तक रजाई में ही दुबके बैठे होगे , एक नंबर के आलसी हो तुम इसलिए ही तो फोन नही उठा रहे,बहुत ठण्ड लग रही है तुम्हे '' |  वह औरत बार बार अपने पति को उसे मथुरा के स्टेशन पर पूरे चार बजे आने की याद दिला रही थी ,उसकी बातों से ऐसा ही कुछ प्रतीत हो रहा था मुझे | ''हाँ हाँ मुझे पता है तुम्हारा ,पिछली बार तुम चार बजे की जगह पाँच बजे पहुँचे थे ,पूरा एक घंटा इंतज़ार करवाया था मुझे ,इस बार मै तुम्हारा इंतज़ार बिलकुल नही करूँगी   , अगर तुम ठीक चार बजे नही पहुँचे तो मै वहाँ से चली जाऊँ गी बस ,फिर ढूँढ़ते रहना मुझे , कहीं भी जाऊँ  परन्तु तुम्हे  नही मिलूँगी  अरे मै  अकेली कैसे आऊँ गी ,सामान है मेरे साथ ,गोद में छोटा बच्चा भी है ,आप कैसी बात कर रहे हो | ''ऐसा लग रहा था जैसे उसका पति उसकी बात समझ नही पा रहा हो i उसकी बाते सुनते सुनते और गाड़ी के तेज़ झटकों से कब मेरी आँख लग गई मुझे पता ही नही चला ,आँख खुली तो मथुरा स्टेशन के प्लेटफार्म पर गाड़ी रूकी हुई थी ,घड़ी में समय देखा तो ठीक चार बज रहे थे ,मैने प्लेटफार्म पर नज़र दौड़ाई तो देखा वह औरत बेंच की एक सीट पर गोद में बच्चा लिए बैठी हुई थी और उसकी बगल में दो बड़े बड़े अटैची रखे हुए थे ,लेकिन उसकी बेचैन निगाहें अपने पति को खोज रही थी ,पांच मिनट तक मै उसकी भटकती निगाहों को ही देखती रही ,तभी गाड़ी चल पड़ी और वह औरत धीरे धीरे मेरी नज़रों से ओझल हो गई | मालूम नही उसकी बेचैन निगाहों को चैन मिला याँ नही , उसका  पति उसे लेने पहुँचा याँ नही ,लेकिन इतना तो मुझे उसकी बाते सुन कर विशवास हो गया था कि वह अपने पति का इंतज़ार अवश्य करे गी,जो कुछ भी वह फोन पर अपने पति से कह रही थी वह तो सिर्फ कहने भर के लिए था |

रेखा जोशी

Wednesday, 22 January 2014

दूर करें सिहरन

सर्द हवा के झोंकों से कांपता है तन बदन 
छाये बदरा आसमान पर बढ़ गई है ठिठुरन 
आओ अब मिल बैठ कर सेक तो ले आग हम सब 
प्यार से मिलें इक दूजे से दूर करें सिहरन 


रेखा जोशी 

Tuesday, 21 January 2014

वफ़ा की गलियों में


प्रेम का
दीपक जलाये
वफ़ा की गलियों में
हम गुज़रते रहे

सजाये
सतरंगी सपने
अपने नयनों में
तुम संग
दिल ओ जान से
प्रेम की गलियों में
हम गुज़रते रहे

बेखबर दुनिया से
हाथो में थामे हाथ
तुम्हारा मदहोश से
वफ़ा की राह पे
हम गुज़रते रहे

अचानक लौ
प्रेम के दीपक की
थरथराने लगी
चलने लगी जब
फ़रेब की तेज़ आँधी
लाख बचाया
बुझने से
दीपक को मैने
पर तहस नहस
हो गई वह
प्रेम की गलिया
जहाँ पर कभी
हम गुज़रते रहे

भटक रहे है
तन्हा हम
हाथों में ले कर
वही दीपक
उन्ही गलियों में
जहाँ तुम संग
हम गुज़रते रहे

रेखा जोशी









अपनापन [लघु कथा ]


”सूअर के बच्चे ,कितना बड़ा पेट है तुम्हारा ,अभी अभी तो खाना खाया था तुमने ,फिर से भूख लग गई तुम्हे ,पेट है याँ कुँआ , कभी भरता ही नही और यह क्या ,कितना गंद फैला रखा है तुमने पूरे घर में ,कौन साफ़ करेगा इसे , मै क्या सारा दिन घर में बस पोछा ही लगाती रहूँ गी ,और कोई कामधाम नही करना है मुझे,जब देखो भूख ही लगी रहती है |”एक ही सांस में सुमि ने अपने बेटे आदि को न जाने क्या क्या सुना दिया | आँखों में आँसू लिए डरते डरते आदि ने फिर से एक बार हिम्मत करके कहा ,”माँ सच में बहुत भूख लगी है ,कुछ खाने को दे दो न |” आदि की ओर देखते ही सुमि का गुस्सा तो बस सातवें आसमान पर पहुंच गया ,उसने आव देखा न ताव ,गुस्से में अपने दांत भीचते हुए, ,झूट से अपने पैर से चप्पल उतारी ओर आदि को जोर से दो चार लगा दी और वह बेचारा रोता हुआ सोफे के एक कोने में दुबक कर बैठ गया | ट्रिन ट्रिन ट्रिन तभी दरवाज़े की घंटी जोर से बज उठी ,सुमि ने दरवाज़ा खोला तो सामने उसकी सखी मीता खड़ी थी | मीता को देखते ही सुमि के चेहरे के भाव बदल गए ,बड़े प्यार से उसने मीता को सोफे पर बिठाया और वहाँ कोने में बैठे आदि की तरफ देख कर वह पुचकारते हुए आदि से बोली ,”अरे अरे मेरे प्यारे बेटे को भूख लगी है बताओ बच्चे तुम क्या खाओ गे ,मैगी बनाऊँ याँ सैंडविच खाओगे ,जो मेरा राजा बेटा खायेगा मै अपने बेटे के लिए वही बनाती हूँ ‘यह कहते हुए सुमि रसोईघर में चलने को हुई | उसके पीछे पीछे उसकी सहेली मीता भी चल दी ,”सुमि तुमने पराये बच्चे को कितनी जल्दी अपना लिया है ,सौतेला बेटा होते हुए भी तुम्हारे प्यार में कितना अपनापन है |”

रेखा जोशी 


Sunday, 19 January 2014

न शिकवा न शिकायत

कर लो चाहे तुम जितने भी सितम
सब सह लेंगे उसे ज़िंदगी भर  हम 
न करेंगे शिकवा न कभी शिकायत 
तकदीर  से  ही  बाज़ी  हारे  है  हम 

रेखा जोशी 

Saturday, 18 January 2014

कण कण में तू

पिघल
जाता है
लोहा भी
इक दिन
चूरा हो
जाता है
पर्वत भी
ले बहा
जाता है
समय
संग अपने
रह
जाती है
बस माटी
पर समाया
बस तू
कण कण में
छू नही
सकता जिसे
समय कभी

रेखा जोशी 

Thursday, 16 January 2014

सुहागन


कुछ दिन पहले मै घर का कुछ सामान खरीदने  मार्किट जा रही थी ,तभी सामने से भागते हुए लोगों की  भीड़ पर मेरी नजर पड़ी ,पलक झपकते ही अपने साथ धूल उडाती हुई उस भीड़ का मै  हिस्सा बन गयी और एक युवती से जा टकराई ,सामने देखा तो उस युवती का चेहरा हल्दी सा पीला था ,घबराहट और डर के मारे वह  कांप रही थी ,उसकी  सांस फूल रही थी और आँखे जैसे  कुछ कहना चाह रही थी ,उसने पीछे मुड़ कर भीड़ को  देखा और भाग कर एक दुकान की ओट में दुबक कर बैठ गई |इतने में चार पांच आवारा किस्म के लड़के .भागते हुए ,आँखे मानो,  किसी को खोजती हुई मेरे आगे से निकल गए |उनके जाते ही ,मैने अपनी नजरें उस दुबकी हुई युवती की ओर घुमाई ,वो अभी भी उसी मुद्रा में बैठी हुई थी | मै भी सतर्कता से धीरे धीरे उसकी ओर बढ़ी और अपना हाथ उसके काँधे पर रखा ,मेरे हल्के से स्पर्श से ही वह चौंक उठी ,उसके भयभीत चेहरे की रंगत अभी भी उड़ी हुई थी ,होंठ कांपते हुए कुछ कहना चाह रहे थे ,अपने हाथ का सहारा दे कर मैने उसे उपर उठाया |पता नहीं उस युवती से मेरा क्या रिश्ता था ,मैने सान्त्वना देते  हुए उसे गले से लगा लिया ,मेरे गले लगाते ही वह मुझसे लिपट कर जोर जोर रोने लगी ,रोते रोते उसकी हिचकी बंध गई ,वह कुछ बोलना चाहती थी लेकिन उसके रुंद्धे गले से आवाज नहीं निकल रही थी ,उसे जोर से अपने सीने से लिपटा लिया ,उसे इस तरह रोते देख मै भी भावुक हो उठी और नम आँखों से उसे प्यार किया |उसे मै अपने घर ले आई ,पानी पिलाया और मैने उसका  ढांढस बंधाया और धीरे धीरे जब वह  सामान्य हुई ,तो उसने अपनी कहानी बताई |

 वह एक विधवा औरत थी ,हाल ही में हुए एक कार एक्सीडेट में उसके पति की मौत हो गई ,इस हादसे के बाद उसकी पूरी दुनिया उजड़ चुकी थी |जिसको वह अपना कह सके ऐसा इस दुनिया में कोई नहीं था,ससुराल वालों ने मनहूस कह घर से निकाल दिया ,हाँ एक भाई है जिसने उसे सहारा  तो दिया,लेकिन भाभी के तानो ने वहां उसका जीना दुर्भर कर दिया |एक दिन सबको छोड़ वह अपनी एक सहेली के संग रहने लगी और एक आफिस में छोटी मोटी नौकरी कर अपना पेट पालने लगी ,लेकिन हमारे ही समाज के कुछ तथाकथित सभ्य लोगों की भूखी नजरें उस पर पड़ गई |वह जहां भी जाती उसके जिस्म को नोचने वाली निगाहें उसका पीछा नहीं छोडती ,हर कोई ऐरा गेरा ,उसके करीब आने की कोशिश करता और उस दिन तो हद पार हो गई जब भरे बाज़ार में भूखे भेड़ियों की तरह चार बदमाश उसके पीछे हाथ धो कर पड़ गए थे |

उसकी दर्द भरी कहानी सुन मै दुखी और परेशान हो गई और उस रात उसे अपने घर रुकने को कहा.मेरे सहानुभूति भरे दो शब्द सुन वह उस रात मेरे घर रुक गई |मै उस रात ठीक से  सो नहीं पाई ,बार बार उसका चेहरा मेरी बंद पलकों में आ कर मुझे बेचैन करता रहा ,कब सुबह हो गई ,पता ही नहीं चला |जागते ही मै उसके कमरे में गई जहां वो रात भर सोई थी ,लेकिन मुझे मिला एक छोटा  सा कागज़ का टुकड़ा ,जिस पर लिखा था 'धन्यवाद' ,बिन बताये वो कहाँ चली गई .पता नहीं ?

दिन महीने गुजर गये ,धीरे धीरे मै भी उसे भूल गई और अपनी रोज़ मर्रा की जिंदगी में व्यस्त हो गई कि अचानक एक दिन बाज़ार में ही उससे  सामना हो गया उसका वो बदला हुआ रूप देख मे सकते में आ गई,मांग में सिंधूर,माथे पर लाल रंग की एक बड़ी सी बिंदिया , गले में मंगल सूत्र ,कलाईयों  में हरे रंग की कांच की चूड़ियाँ,और मैने उससे कहा,''अच्छा किया जो तुमने शादी कर ली ''|मेरी बात सुन वह मुस्करा दी ,''नहीं दीदी ,मैने शादी नहीं की ,यह सब सुहाग के प्रतीक चिन्ह पहन कर मैने अपने आप को लोगो की कामुक नजरों से बचाया है ,यह सिंधूर आज भी मैने अपने पति के नाम का लगाया है ,यह मेरे माथे की बिंदिया,यह मंगलसूत्र ,यह चूड़ियाँ,पाँव में बिछुयें ,सब उनके ही नाम के है  मैने उनसे सिर्फ उनसे ही प्यार किया है ,भले ही वह शारीरिक रूप से आज मेरे साथ नहीं है लेकिन वो जिंदा है मेरे मन में ,मेरी यादों में ,वह न होते हुए भी हर पल मेरे साथ है |आज भी मेरा प्यार उनको सिर्फ उनको ही समर्पित है|यह मंगल सूत्र मेरे  सुहाग का प्रतीक है   मेरा अपने पति की ओर भावनात्मक समर्पण को दर्शाता  है क्योंकि मै भावनात्मक रूप से आज भी उनसे उतनी ही जुडी हुई हूँ जितनी पहले थी  |उनके जाने के बाद जब मैने इस मंगल सूत्र को पहनना छोड़ दिया था तब मेरी जिंदगी में एक सूनापन सा  आ गया था ,लेकिन आज इन्हें फिर से धारण कर मुझे  एक बार फिर यह एहसास होने लगा है कि'मै आज भी सुहागन हूँ',अपने पति की हसीन यादों के साथ मे आज भी पूर्ण रूप से बंधी हुई हूँ ।

Wednesday, 15 January 2014

कब तक रूठो गे सनम मान जाओ न

प्यार  है  तुम्ही से  यह  जान जाओ न
दुखती रग पर अब तुम बाण चलाओ न 
सताओ न  हो  कर  नाराज़  तुम हमसे 
कब  तक रूठो गे  सनम मान जाओ न 

रेखा जोशी 

भावनात्मक रूप से कमज़ोर है महिला

शिखा और समीर इक्सिवीं सदी के युवा दोनों अपने अपने घर से दूर दिल्ली में नौकरी कर रहे  थे ,पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित ,लगभग चार वर्ष से दिल्ली की एक पौश कालोनी में किराए पर जगह ले कर लिव इन रिलेशनशिप में रहना शुरू कर दिया था  ,बिना शादी के इस तरह रहना आजकल फैशन बनता जा रहा है ,न जाने कितने युवक ,युवतियां शादी जैसा अपनी जिंदगी का अहम फैसला लेना ही नही चाहते ,वह इसलिए क्योकि आजकल जब बिना शादी के वह एक दूसरे से अपने सम्बन्ध स्थापित कर सकते है तो शादी कर उन्हें जिम्मेदारियां उठा कर कष्ट करने की क्या जरूरत ,अब आधुनिकता के नाम पर पुरुष और स्त्री के  बीच किसी भी प्रकार के शारीरिक संबंध जब विकसित होते  हैं तो उन्हें मात्र नैसर्गिक संबंधों की ही तरह देखा जाने लगा है ,लेकिन समाज इसे व्यक्तिगत मामला  कह कर नही टाल सकता ,वह इसलिए कि आज भी हम  अपनी संस्कृति ,परम्पराओं और नैतिक  समाजिक मान्यता  को प्राथमिकता देते है |

आज की महिला भले ही पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर जीवन के हर क्षेत्र में प्रगति कर रही है लेकिन महिला का पुरुष से शारीरिक रूप से कमज़ोर होने के साथ साथ  उनकी सोच में भी बहुत अंतर है ,वह कई फैसले विवेक से नही बल्कि भावना में बह कर ले लेती है चाहे बाद में उसे पछताना ही पड़े ,ऐसा ही फैसला भावना में बह कर शिखा ने भी ले लिया था ,इसी आशा में कि समीर उसके साथ शादी कर लेगा ,लेकिन ऐसा हो नही पाया ,इसके लिए उसने कोर्ट का दरवाज़ा भी खटखटाया परन्तु उसके हाथ निराशा ही लगी |आज जब कभी महिला और पुरुष विवाह से पूर्व सेक्स करते है तो उसे हमारा समाज कभी भी मान्यता नही दे पाता ,उसे सदा अनैतिक ही समझा जाता है | हमारे समाज में कोई भी पुरुष  ऐसी महिला को कभी भी अपनीजीवनसंगिनी नहीं बनाना चाहे गा जिसने विवाह से पहले किसी अन्य पुरुष के साथ सेक्स किया हो यां उसका कौमार्य भंग हो चुका हो,ऐसे में वर्जिनिटी की अवधारणा को समाप्त करना यां युवाओं को सेक्स की खुली छूट देने का कोई औचित्य ही नही रहता |

भगवान् राम की इस पावन भूमि पर तो सीता माँ को भी अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा था ,आज भी उसी धरती पर मैला आँचल लिए उस स्त्री के लिए हमारे इस समाजिक परिवेश में  कोई भी स्थान नही है ,और न ही उसे कभी स्वीकारा जाए गा  | हमारे समाज में विवाह को एक पवित्र बंधन माना जाता है ,जिसका मूल आधार आपसी  प्रेम और विशवास है ,ऐसे में कैजुअल सेक्स आदि जैसे संबंधो को कभी भी मान्यता नही मिल सकती वह इसलिए कि यह सरासर प्रहार है हमारी संस्कृति पर ,सामजिक और पारिवारिक मूल्यों पर | इस पर कोई दो राय नही है  कि विवाह से पहले यां बाद में  पुरुष चाहे कितने भी अनैतिक संबंध बना ले लेकिन वह किसी का भी जवाबदेह नहीं होता वहीं पर  अगर किसी महिला का आंचल जाने अनजाने  किसी भी कारणवश चाहे उसकी सहमती से मैला हुआ हो यां फिर वह बलात्कार की पीड़िता हो ,उसका तो पूरा जीवन एक अभिशाप बन कर रह जाता है ,उसके सारे सपने टूट कर बिखर जाते है ,और तो और समाज के कई जाने माने एवं अनजाने लोगों दुवारा उसका यौन शौषण भी होने लगता है |

 हमारे समाज में  माता पिता बचपन से ही सदा लड़कियों और औरतों को अपनी मर्यादा में रहने शिक्षा देते  है ,परन्तु शिखा जैसी लड़किया आधुनिकता का जामा ओढ़े यां कैजुअल सेक्स में लिप्त स्त्रियाँ अनैतिक रिश्ते बना तो लेती है लेकिन इस दल दल में फंसने के बाद उनके पास  में सिर्फ हाथ मलने के सिवाय  और कोई विकल्प नही बचता , |ऐसे में अपना परिवार बनाना तो बहुत दूर कि बात है ,वह समाज से भी कटी कटी सी रहती है  और वह अपनी सारी जिंदगी पछतावे के साथ घुट घुट कर गुज़ार देती है |आज जब पूरी दुनिया सिमटती जा रही है ,हमारे देश में भी पाश्चात्य सभ्यता धीरे धीरे अपने पाँव जमा रही है ऐसे में हम सबका यह  कर्तव्य है कि हम अपनी मर्यादा की  सीमा को ध्यान में रखते हुए, अपने मूल्यों एवं संस्कारों को दुनिया में हो रही प्रगति के साथ साथ जीवित रख सके न कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी जिंदगी ही बर्बाद कर लें |

 रेखा जोशी








Tuesday, 14 January 2014

प्यारा सा सुंदर सपना


भर कर
प्यार का रंग 
मिल कर 
सजाया था 
हम दोनों ने 
 सपना 
सुन्दर इक 
छोटे से 
घर का 
लेकिन 
थम गया 
वक्त वही 
खो गये 
जब तुम 
कहीं 
जाने के 
बाद 
तुम्हारे 
खड़े है 
हम वहीँ 
इंतज़ार है 
तुम्हारा 
हमे 
पूरा करना 
है अपना 
वही 
प्यारा  सा 
सुंदर सपना 

रेखा जोशी 

हाल ऐ दिल अपना

 दिल  के  जज़्बात  अपनी  भीगी  पलकें  कैसे  छिपायें 
हाल ऐ दिल अपना अब हम किस किस को कैसे बतायें 
समझ  न  पाये  जब वह जिसे हमने सदा अपना माना 
गैर  तो  गैर   है  यहाँ   तो   अपने   भी  हुए  है  पराये 

रेखा जोशी 

Monday, 13 January 2014

भीगी आँखें



वीरान दिल 
बिन तुम्हारे 
उतर आये 
हसीन लम्हे 
मेरे अंगना 
संग चाँद के 
बुला रही 
तुम्हे 
गुनगुनाती 
चांदनी 
कसक भरा 
दर्द सीने में 
लगा सिसकने 
तलाश रही तुम्हे 
मेरी 
भीगी आँखें 

रेखा जोशी 

सिलसिला यूँही चलता रहे


शिकवे और शिकायतों का यह दौर यूँही चलता रहे 
रूठने और मनाने का यह दौर यूँही चलता रहे 
ज़िन्दगी और कुछ भी नही है तेरी मुहब्बत के सिवा 
हम दोनों के बीच का यह सिलसिला यूँही चलता रहे 

रेखा जोशी









Sunday, 12 January 2014

पल दो पल की ख़ुशी


लम्हा लम्हा यह  जिंदगी  गुज़र  जाती है 
जुदाई   में   अक्सर   याद  तेरी  आती है 
न   जाने  अंजाम  ऐ  मुहब्बत क्या होगा 
पल दो पल हमें ख़ुशी तो मिल ही जाती है 

रेखा जोशी

Friday, 10 January 2014

पिछले जन्म का नाता

आज मीता बहुत दुखी और उदास थी ,उसकी प्यारी भाभी को अचानक दिल का दौरा पड़ा और उसके हृदय गति रुक गई,देखते ही देखते वह यह दुनिया छोड़ कर चली गई |,कितना प्यार था उन दोनों में ,सगी बहनों से भी ज्यादा ,मीता को वह दिन अच्छी तरह याद था जब उसके भैया की बारात उसकी भाभी के पीहर के घर के द्वार पर पहुंची थी |कितनी सुंदर लग रही थी वह दुलहन बनी हुई ,ऐसे लग रहा था मानो चाँद सज कर धरती पर उतर आया हो और आज तीस साल बाद वह अर्थी पर वैसी  ही सुन्दरता लिए दुल्हन बनी निर्जीव सी पड़ी हुई थी |उसे इस रूप में देखते ही मीता का दिल भर आया और उसकी आँखें छलक उठी ,यही हाल उसके भैया का और उसके भतीजे भतीजियों का था ,सभी की आखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी .उसके साथ बिताये वह सारे पल मीता के मानस पटल पर उभर आये ,वह भाभी तो थी ही लेकिन उसने अपने प्यार से मीता का दिल जीत लिया था ,मीता को पता ही नही चला कब वह भाभी से उसकी अंतरंग सखी बन गई थी |मीता अपनी सारी बातें उसके साथ बांटती थी ,जब तक वह अपनी प्यारी भाभी को अपने दिल की हर बात बता नही देती थी उसे रात को नींद ही नही आती थी |आज यह कैसे हो गया वह उसे सदा के लिए अकेली छोड़ कर क्यों चली गई  ,कहाँ चली गई ?उसे ऐसे लग रहा था जैसे किसी ने उसके भीतर से कुछ खींच लिया हो |

 ,यह जिंदगी भी कितनी अजीब है,यहाँ  किसी को भी मालूम नही कि हम कौन है ?कहाँ से इस दुनिया में आये है ? इस दुनिया में जन्म लेने  के उपरांत हम सब कितने ही रिश्ते नातों  में एक दूसरे के साथ बंध जाते है और फिर एक दिन सब रिश्तों को तोड़ कर न जाने हमेशा के लिए सब को रोता बिलखता छोड़ कर कहाँ चले जाते है ,विज्ञान ने भले ही धरती और आकाश के अनगिनत रहस्यों पर से पर्दा उठाया है लेकिन  इस बारे में वह आज भी खामोश है ,हमारा हिन्दू धर्म पुनर्जन्म में विशवास रखता है ,गीता में भी भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है कि आत्मा अमर है ,न तो वह जन्म लेती है और न ही मरती है ,मरता है तो यह शरीर ,नाशवान है तो यह शरीर ,जिस प्रकार मनुष्य अपने वस्त्र  बदलता है ठीक उसी प्रकार आत्मा अपना पुराना शरीर त्याग कर नया शरीर धारण करती है ,लेकिन वैज्ञानिक अभी तक इसे सिद्ध नही कर पायें है ,तो क्या यह जिंदगी मात्र एक पानी के बुलबले जैसी है ,जब तक दिखाई देता है तब तक बुलबुला है ,फट गया तो सब खत्म ,क्या  मरने पर सब कुछ समाप्त हो जाता है ,एक दूसरे के प्रति प्यार भरी भावनाएं ,इच्छाएँ ,आक्रोश ,जज़्बात क्या  मृत्यु के बाद उन सब का अस्तित्व यहीं इसी दुनिया में समाप्त हो जाता है ?

इस बारे में कोई कुछ भी नही बता पाता  कि मृत्यु के उस पार क्या है ,हाँ कभी कभार पुनर्जन्म की घटनाएँ अवश्य सुनने को मिल जाती है ,लेकिन यथार्थ तक शायद ही कोई पहुंच पाया हो,कितनी रहस्यमयी है हमारी यह जिंदगी | अभी कुछ दिन पहले मीता ने  मियामी के एक मनोवैज्ञानिक डा बराईन वीस दुवारा लिखी एक पुस्तक पढ़ी थी ,जिसमे उसने पुनर्जन्म के कई सच्चे किस्सों का जिक्र किया था ,मेडिकल साइंस भले इसे नही मानती लेकिन वह मेडिकल साइंस का विधार्थी रहा था और वह खुद भी हैरान था क्योकि अपने पेशे के दौरान कई ऐसे मनोवैज्ञानिक रोगी उसकी नजर में आये जिनके तार उनके पिछले जन्म से जुड़े हुए थे | मीता सोच में डूब गई ,क्या उसकी भाभी से भी उसका कोई पिछले जन्म का नाता था  याँ शायद अगले जन्म में भी वह उसे मिलेगी क्योंकि प्यार तो आत्मा से आत्मा का होता है यह शरीर तो नाशवान है |अपनी आँखों में आंसू लिए मीता और उसके घरवाले सभी मीता की प्यारी भाभी के  पार्थिव शरीर की अंतिम यात्रा में उसे अंतिम श्रधांजलि देने के लिए  निकल पड़े |

तुम ही तुम

खिल उठते
तन्हाई के लम्हे
गुज़रते जब मेरी
यादों में तुम
ख्यालों में मेरे
आते तुम जब
महका जाते
बगिया दिल की
सहेज रखी जहाँ
यादें तुम्हारी
समाये जहाँ
तुम ही तुम
रेखा जोशी
हाँ मै चोर हूँ [लघु कथा ]

फैक्ट्री के आफिस के सामने एक लम्बी सी कार  आ कर रुकी और भुवेश बाबू आँखों पर काला चश्मा चढ़ा कर आफिस में अपना काला बैग ले कर चले गये ,अपना बैग आफिस में रख कर वह अपनी किसी मीटिग के लिए चले गए  ,जब वह वापिस आये तो उनके बैग में से किसी ने पचास हजार रूपये निकाल लिए थे । आफिस के सारे कर्मचारियों को पूछताछ के लिए बुलाया गया ,सबकी नजरें सफाई कर्मचारी राजू पर टिक गई क्योकि उसे ही भुवेश बाबू के कमरे से बाहर आते हुए देखा गया था । अपनी निगाहें नीची किये हुए राजू के अपना गुनाह कबूल कर लिया और मान लिया कि  वह ही चोर है ,पुलिस आई और राजू को पकड़ कर जेल ले गई । पास ही के एक अस्पताल में राजू  के बीमार कैंसर से पीड़ित  बेटे का ईलाज चल रहा था ।

रेखा जोशी


Wednesday, 8 January 2014

संहार राक्षसों का

जब जब हाथों की चूड़ीयाँ आग उगलें गी
तब तब अंगारों से ये धरा झुलस जाएगी 
लेगी जन्म हरेक घर में चंडी तब फिर से 
संहार राक्षसों  का कर सर्वनाश कर देगी
रेखा जोशी

Tuesday, 7 January 2014

समय का फेर

न जाने यह ज़िन्दगी की राह कब कहाँ ले जाये गी
आज गम है तो कल इस जीवन में खुशी भी आये गी 
इस ज़िन्दगी में सुख और दुख तो सब समय का फेर है
न हो उदास रात के बाद सुबह भी जरूर आये गी 

रेखा जोशी

Monday, 6 January 2014

बाँवरे दो नैन

 नयन   मेरे  थामे  दिल  तेरी  राहें  निहारा  करते  है
सब की निगाहों से छिपा कर तुम्हे इस दिल में रखते है 
कुछ भी करें हम पर  बाँवरे  दो नैन यह जो  है हमारे
हर  घड़ी  हर पल यादों में तेरी  तुझको  पुकारा करते  है

रेखा जोशी 

ईमानदारी और नैतिकता

कितने ईमानदार है हम ?इस प्रश्न से मै दुविधा में पड़ गई ,वह इसलिए क्योकि अब ईमानदार शब्द पूर्ण तत्त्व न हो कर तुलनात्मक हो चुका है कुछ दिन पहले मेरी एक सहेली वंदना के पति का बैग आफिस से घर आते समय कहीं खो गया ,उसमे कुछ जरूरी कागज़ात ,लाइसेंस और करीब दो हजार रूपये थे ,बेचारे अपने जरूरी कागज़ात के लिए बहुत परेशान थे |दो दिन बाद उनके  घर के बाहर बाग़ में उन्हें अपना बैग दिखाई पड़ा ,उन्होंने उसे जल्दी से उठाया और खोल कर देखा तो केवल रूपये गायब थे बाकी सब कुछ यथावत उस  बैग में वैसा ही था ,उनकी नजर में चोर तुलनात्मक रूप से ईमानदार था ,रूपये गए तो गए कम से कम बाकी सब कुछ तो उन्हें मिल ही गया ,नही तो उन्हें उन कागज़ात की वजह से काफी परेशानी उठानी पड़ती|वह दिन दूर नही जब हमारा देश चोरों का देश बन कर रह जाए गा ,कोई छोटा चोर तो कोई बड़ा चोर ,कोई अधिक ईमानदार तो कोई कम ईमानदार ,लेकिन अभी भी हमारे भारत में ईमानदारी पूरी तरह मरी नही ,आज भी समाज में ऐसे लोगों की कमी नही है जिसके दम पर सच्चाई टिकी हुई है | वंदना अपनी नन्ही सी बेटी रीमा की ऊँगली थामे जब बाज़ार जा रही थी तभी उसे रास्ते में चलते चलते एक रूपये का सिक्का जमीन पर पड़ा हुआ मिल गया,उसकी बेटी रीमा ने  झट से उसे उठा कर ख़ुशी से उछलते हुए  वंदना से कहा ,''अहा,मम्मी मै तो इस रूपये से टाफी लूंगी,आज तो मज़ा ही आ गया ''| अपनी बेटी के हाथ में सिक्का देख वंदना उसे समझाते हुए बोली  ,''लेकिन बेटा यह सिक्का तो तुम्हारा नही है,किसी का इस रास्ते पर चलते हुए गिर गया होगा  ,ऐसा करते है हम  मंदिर चलते है और इसे भगवान जी के चरणों में चढ़ा देते है ,यही ठीक रहे गा ,है न मेरी प्यारी बिटिया |''वंदना ने अपनी बेटी को  ईमानदारी का पाठ तो पढ़ा दिया लेकिन आज अनेक घोटालों के पर्दाफाश हो रहे इस देश में ईमानदारी और नैतिकता जैसे शब्द खोखले,  निरर्थक और अर्थहीन हो चुके है,एक तरफ तो हम अपने बच्चों से  ईमानदारी ,सदाचार और नैतिक मूल्यों की बाते करते है और दूसरी तरफ जब उन्हें समाज में पनप रही अनैतिकता और भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ता है तब  हमारे बच्चे ,इस देश के भविष्य निर्माता टूट कर बिखर जाते है ,अपने परिवार  से मिले आदर्श संस्कार उन्हें अपनी ही जिंदगी में आगे बढ़ कर समाज एवं राष्ट्र हित के लिए कार्य करने में मुश्किलें पैदा कर देते है ,उनकी अंतरात्मा उन्हें बेईमानी और अनैतिकता के रास्ते पर चलने नही देती और घूसखोरी ,भ्रष्टाचार जैसे भयानक राक्षस मुहं फाड़े  इस देश के भविष्य का निर्माण करने वाले नौजवानों को या तो निगल जाते है या उनके रास्ते में अवरोध पैदा कर  उनकी और देश की प्रगति पर रोक लगा देते है ,कुछ लोग इन बुराइयों के साथ समझौता कर ऐसे भ्रष्ट समाज का एक हिस्सा बन कर रह जाते है और जो लोग समझौता नही कर पाते वह सारी जिंदगी घुट घुट कर जीते है | रीमा की ही एक सहेली के भाई ने सिविल इंजिनीयरिंग की डिग्री प्राप्त कर बहुत उत्साह से कुछ कर दिखाने का जनून लिए पूरी लग्न और निष्ठां से  एक सरकारी कार्यालय में नौकरी से अपनी नई जिंदगी की शुरुआत की ,लेकिन उसकी वही निष्ठां और लग्न सरकारी कार्यालयों के  भ्रष्ट तंत्र में उसकी एक स्थान से दूसरे स्थान पर हो रही तबादलों का कारण बन गई ,उसे एक जगह पर टिक कर कुछ करने का मौका ही नही मिल पाया और आज यह हाल है की बेचारा अवसाद की स्थिति में पहुंच चुका  है |एक होनहार युवक का अपने माँ बाप दुवारा दी गई नैतिकता और ईमानदारी की शिक्षा के कारण उसका ऐसे भ्रष्ट वातावरण में  दम घुट गया |यह केवल एक युवक का किस्सा नही है ,हमारे देश में हजारों , लाखों युवक और युवतिया बेईमानी ,अनैतिकता ,घूसखोरी के चलते क्रुद्ध ,दुखी और अवसादग्रस्त हो रहे है ,लेकिन क्या नैतिकता के रास्ते पर चल ईमानदारी से जीवन यापन करना पाप है ?,याँ फिर हम इंतज़ार करें उस दिन का जब सच्चाई की राह पर चलने वाले इस भ्रष्ट वातावरण के चलते हमेशा हमेशा  के लिए खामोश हो जाएँ और यह  देश चोरों का देश कहलाने लगे|

  रेखा जोशी

Saturday, 4 January 2014

ख़ुशी और भी है

खिले फूल बगिया में और भी है
 न हो  उदास मंज़िलें और भी है
माना   राहे   है  काँटों   से  भरी
ज़िंदगी  है तो  ख़ुशी  और भी है

रेखा जोशी

Thursday, 2 January 2014

तुम ही संवारते ज़िंदगी मेरी

तुम मेरे
मनमंदिर में
आन बसे
हर पल
साथ हो
मेरे तुम
निराशा
मेरी को
बदल
देते हो
आशा में
होती जब
उदास
ले आते हो
मुस्कान
होंठों पर
मेरे तुम
तुम ही
संवारते
ज़िंदगी मेरी
मेरे ईश
सिर्फ तुम

सुर हो मेरे गीतों के तुम

सुर हो मेरे गीतों के तुम 
गुणगान करते आपका हम 
पालनहार हो इस सृष्टि के 
हर तरफ समाये तुम ही तुम

रेखा जोशी