Thursday, 31 July 2014

चोका

चोका [सावन ]

घटायें काली
पानी बरसा जाती
बरखा आई
झूले पर सखियाँ
बोले पपीहा
छा गई हरियाली
मोर नाचता
भीगती चुनरिया
उमंग लाया
नभ पर बदरा
नाचता तन
मदमस्त हवायें
याद आये पिया की

रेखा जोशी

वीर (आल्हा) छंद

वीर (आल्हा) छंद 

जागो माँ के वीर सपूतो ,डूब रहा है भारत आज ।

इसे लूटते तेरे भाई  , क्यों न गिरायें उन पर गाज || 

धधक रही लालच की ज्वाला ,पनप रहा है भ्रष्टाचार।

नोच खा रहे कपूत माँ के ,बंद करो ये अत्याचार ॥ 

रेखा जोशी 

खत्म सब कुछ हो जायेगा जब न रहेगी ज़िंदगी

गीतिका

अधूरी चाहतें अधूरे ख़्वाब  अधूरी  ज़िंदगी
इंतज़ार है  न जाने  कब होगी पूरी ज़िंदगी

डोल रही देख मंझधार में यह कश्ती  हमारी
गिरा दिये तुमने  हाथों से पतवार भी  ज़िंदगी

थक गये  नैन मेरे यहाँ राह तकते तुम्हारा
बेचैन आँखों को है  इंतज़ार अब भी ज़िंदगी

राह ज़िंदगी की मुश्किल होंगी इस कदर हमारी
सोचा न था यह हमने  ख़्वाब में भी कभी ज़िंदगी

उखड़ रही यहाँ साँसे  भी लम्हा लम्हा हमारी
खत्म सब कुछ हो जायेगा जब न रहेगी ज़िंदगी

रेखा जोशी





Wednesday, 30 July 2014

जा रहा तोड़ सभी रिश्ते नाते मोह माया के


ढल गया दिन अन्धेरा शाम का बढ़ा जा रहा है
रात के आगोश में सूरज  अब  छुपा जा रहा है
जा  रहा  तोड़ सभी  रिश्ते  नाते  मोह माया के
बंधन मुक्त वह  राही  अकेला  चला जा रहा है

रेखा जोशी 

Tuesday, 29 July 2014

Sometimes life smiles and sometimes it weeps


Very often
I see dreams
With my eyes open
Feeling good
When my heart
Flies in the sky 
With golden wings
And my mind starts
Dancing
With the divine music emitted
By the strings of
Rainbow
And all my imaginations
Become reality
Where sometimes life
Smiles or laughs
And sometimes
It weeps in pain 

Rekha Joshi


जो अवतरित हुआ इस धरती पर

है सुरक्षा कवच
ज़िंदगी का
साया सिर पर
जो है
माँ बाप का
हूँ निर्भय मै
जो है आपार स्नेह
मुझ पर
माँ बाप का
मिलता  बल मुझे
जब हाथों ने उनके
है थामा मेरा हाथ
शत  शत नमन
उस  ईश्वर का
जो अवतरित हुआ
इस धरती पर
दिखाया जिसने
अपना रूप
बन कर मेरे
माँ बाप

रेखा जोशी



सौरी ,विद लव'

मीना की अपनी अंतरंग सखी दीपा से किसी बात को लेकर अनबन हो गई  |दोनों बचपन की सखियाँ जब भी एक दूसरे को देखती तो मुहं मोड़ लेती ,मन आक्रोश से भर जाता ,महीने बीत गए एक दूसरे से बात किये ,मीना अंदर ही अंदर बहुत  दुखी थी और वह अपनी प्यारी बचपन की सहेली से बात करना चाहते हुए भी नही कर पाती थी बल्कि उसे दीपा पर और भी अधिक गुस्सा आता ,''आखिर वह अपनी गलती मान क्यों नही लेती'' ,दीपा भी मीना से बहुत प्यार करती थी लेकिन वह भी उसके आगे झुकना नही चाहती थी ,नतीजा क्या हुआ दोनों सहेलियाँ अपने दिलों में एक दूसरे के प्रति क्रोध लिए भीतर ही  भीतर सुलगती रही और उन दोनों ने  सदा के लिए एक दूसरे को खो दिया |

अगर दोनों ने आपसी मनमुटाव  को समाप्त करने के लिए एक दूसरे से क्षमा मांग ली होती या किसी एक सखी ने पहल कर दूसरी से  क्षमा मांग ली होती और उसने भी उसे दिल से माफ़ कर दिया होता तो दोनों बचपन की सखियाँ यूँ  एक दूसरे से नही बिछुड्ती बल्कि वह दोनों एक दूसरे के और अधिक करीब आजाती |मीना की मौसी ने उसे दुखी देख कर उसका कारण पूछा और सारी घटना जानने पर उसे समझाया कि बहुत ही  खुशनसीब होते है वह लोग जो रिश्तों की  गरिमा को पहचान कर उसे सजों कर रखना जानते है | अपने से हुई गलती पर क्षमा मांग लेने से कोई छोटा नही हो जाता और किसी को उसकी गलती पर माफ़ कर देना तो बड्पन की निशानी है हम अंपने जीवन में जाने अनजाने कितनी ही गलतियां करतें है ,कितनो का दिल दुखातें है लेकिन किसी से हुई कोई गलती को हम अनदेखा नही कर सकते बस क्रोधित हो कर उस पर बरस पडतें है  ,कई बार तो किसी की क्षमा याचना करने पर भी  ताउम्र  हम उसे क्षमा नही कर पाते और मन ही मन सदा के लिए बैर भाव की गाँठ बाँध कर रख लेते है |जब कभी भी उस के बारे में मन में विचार आता है , तब एक अजीब सी कडवाहट भर जाती है हमारे दिल में जो हमे बेचैन कर देती है और न जाने हमारे भीतर उठ रही वह क्रोधाग्नि अनगिनत रोगों को निमन्त्रण दे देती है |

असल में जब हम किसी से क्षमा मांगते है या किसी को क्षमा करते है तो किसी दूसरे  से अधिक हम अपने उपर उपकार करते है |क्षमा हमारे भीतर उठ रही क्रोधाग्नि के ज्वालामुखी को शांत कर हमारे अंतर्मन को ठंडक प्रदान कर उसे शुद्ध बना देती है |क्षमा का अर्थ है किसी की गलती को दिल से माफ़ कर दो और उसके बाद उसकी उस गलती को सदा के लिए भूल जाना |सभी धर्मो ने क्षमा के महत्व को पहचाना है ,जिन्होंने ईसामसीह को सूली पर चढाया उनके लिए ईसामसीह ने परमात्मा से क्षमा करने के लिए प्रार्थना की |स्वामी दयानंद जी ने उस पुरुष जगन्नाथ को क्षमा कर वहां से भागने के लिए पैसे थमा दिए,जिसने उन्हें दूध में  संखिया घोल कर पिलाया था |अपनी मौसी की बातों को सुनाने के बाद  मीना ने  दीपा को मनाने का फैसला लिया ,उसने एक सुंदर सा कार्ड बनाया और उस पर बड़े बड़े अक्षरों से लिखा ''सौरी ,विद लव''और उस कार्ड को दीपा के पास जा कर उसके हाथ में थमा दिया |

रेखा जोशी 

सभी मित्रों को हरियाली तीज की हार्दिक शुभकामनायें

सभी मित्रों को हरियाली तीज की हार्दिक शुभकामनायें

हरे कांच की चूड़ियाँ पहन कर
गोरे हाथों में मेहँदी  लगा  कर
चारो ओर यहाँ  हरियाली छाई
झूला झूलें  सखी तीज है आई

रेखा जोशी

Sunday, 27 July 2014

फिर से महकने लगी चांदनी

सुरमई रात
पेड़ों के पत्तों से
छन कर
गुनगुनाती हुई
गीत मधुर गाती
खिलखिलाने लगी
चांदनी

आहट  सुनते ही
उसकी
बिछ गये मखमली फूल
राहों में
पाते ही कोमल
स्पर्श उनका
मुस्कुराने लगी
चांदनी

लबों पर मेरे
मचलने लगे तराने
उड़ने लगी तितलियाँ
दिल की बगिया में
छा गई बहारे
फ़िज़ाओं में
अंगना में मेरे
फिर से
महकने लगी
चांदनी

रेखा जोशी





सुख दुख की लहरों में डोले नौका मेरी

ईश्वर के द्वार ले जाओ मुझे माझी
करती उनसे प्यार ले जाओ मुझे माझी 
सुख दुख की लहरों में डोले नौका मेरी
नदिया के उस पार ले जाओ मुझे माझी
रेखा जोशी

Money money and Only money

Heading
Where we are 
Following whom
With closed eyes
Leaving behind our culture
And breaking cognations
Knocking away honesty
And apostatizing
Blood flowing in our  bodies
Changes into water
Blood feud increases
Gone the fragnance
Of love
Between brothers
And Parents
Being heard only
The sound of money
Relations and love
Based on money
Existing everywhere
Is
Money money and
Only money

Rekha Joshi 

Saturday, 26 July 2014

All my dreams washed out

Changing into
Various figures
Clouds
Floating in the blue sky
My  dreams
Along with raving mind
Moves on with breeze
With rising figures
Alas  all my dreams washed out
With the tricking of rain drops
From the clouds
On the ground
Along with the smelting of
Various figures
In the sky

Rekha Joshi




Friday, 25 July 2014

दूधो नहाओ और पूतो फलो ''

जब मै बचपन में अपनी माँ की उंगली पकड़ कर चला करती थी ,बात तब की है ,हमारे पडोस में एक बूढी अम्मा रहा करती थी ,उन्हें हम सब नानी बुलाते थे | जब भी मेरी माँ उनसे मिलती ,वो उनके पाँव छुआ करती थी और नानी उन्हें बड़े प्यार से आशीर्वाद देती और सदा यही कहती ,''दूधो नहाओ और पूतो फलो ''|उस समय मेरे बचपन  का भोला मन इस का अर्थ नहीं समझ पाया था ,लेकिन धीरे धीरे इस वाक्य से मै परिचित होती  चली गई, ''पूतो फलो '' के  आशीर्वाद को भली भाँती समझने लगी |  क्यों देते है ,पुत्रवती भव का आशीर्वाद ,जब की एक ही माँ की कोख से पैदा होते है पुत्र और पुत्री ,क्या किसी को पुत्री की कोई चाह नहीं ? मैने अक्सर देखा है बेटियां ,बेटों से ज्यादा भावनात्क रूप से अपने माता पिता से जुडी होती है |

एक दिन अपनी माँ के साथ मुझे अपने पडोस में एक लडकी की शादी के सगीत में जाने का अवसर प्राप्त हुआ ,वहां कुछ महिलायें 'सुहाग 'के गीत गा रही थी ,''साडा चिड़ियाँ दा चम्बा वे ,बाबल असां उड़ जाना |''जब मैने माँ से इस गीत का अर्थ पूछा तो आंसुओं से उसकी आखे भीग गई | यही तो दुःख है बेटियों को पाल पोस कर बड़ा करो और एक दिन उसकी शादी करके किसी अजनबी को सोंप दो ,बेटी तो पराया धन है , उसका कन्यादान भी करो,साथ मोटा दहेज भी दो उसके बाद उसे उसके ससुराल वालों के भरोसे छोड़ दो,माँ बाप का फर्ज़ पूरा हो गया ,अच्छे लोग मिले या बुरे यह उसका भाग्य ,बेटी चाहे वहा कितनी भी दुखी हो ,माँ बाप उसे  वहीं रहने की सलाह देते रहेगे ,उसे सभी ससुराल के सदस्यों से मिलजुलकर रहने की नसीहत देते रहे गे|

 माना की हालात पहले से काफी सुधर गये है लेकिन अभी भी समाज के क्रूर एवं वीभत्स  रूप ने बेटी के माँ बाप को डरा कर रखा हुआ है | बलात्कार ,दहेज़ की आड़ में बहुओं को जलती आग ने झोंक देना ,घरेलू हिंसा ,मानसिक तनाव इतना कि कोई आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाए ,इस सब के चलते  समाज के इस कुरूप चेहरे ने बेटियों के माँ बाप के दिलों को हिला कर रख दिया है ,उनकी मानसिकता को ही बदल दिया है,विक्षिप्त   कर दिया है |तभी तो समाज और परिवार के दबाव से दबी,आँखों में आंसू लिए एक माँ अपनी नन्ही सी जान को कभी  कूड़े के ढेर पर तो कभी गंदी नाली में फेंक कर,याँ पैदा होने से पहले ही उसे मौत की नीद सुलाकर सदा के लिए अपनी ही नजर में अपराधिन बना दी  जाती है |

ठीक ही  सोचते है वो लोग '',ना रहे गा बांस और ना बजे गी बासुरी ''उनके विक्षिप्त मन   को क्या अंतर पड़ता है ,अगर लडकों की तुलना में लडकियां कम भी रह जाएँ ,उन्हें तो बस बेटा ही चाहिए ,चाहे वह बड़ा हो कर कुपूत ही निकले ,उनके  बुढापे की लाठी बनना तो दूर ,लेकिन उनकी चिता को अग्नि देने वाला होना चाहिए |जब तक सिर्फ बेटों की इच्छा और  कन्याओं की हत्या करने वाले माँ बाप के विक्षिप्त मानसिकता का सम्पूर्ण बदलाव नहीं होता तब तक बेचारी कन्याओं की इस सामाजिक परिवेश में बलि चढती ही रहे गी |

नारी सशक्तिकरण के लिए कितने ही कानून बने ,जो अपराधियों को उनके किये की सजा देते रहते है,भले ही  आँखों पर पट्टी बंधी होने के कारण कभी कभी  कानून भी उन्हें अनदेखा कर देता है |  समाज की विक्षिप्त  मानसिकता में बदलाव लाना हमारी ज़िम्मेदारी है  ,जागरूकता हमे ही लानी है ,लेकिन कब होगा यह ? हमारे समाज में बेटी जब मायके से विदा हो कर ससुराल में बहू के रूप में कदम रखती है तो उसका एक नया जन्म होता है ,रातों रात  एक चुलबुली ,चंचल लड़की ,ससुराल की एक ज़िम्मेदार बहू बन जाती है ,और वो पूरी निष्ठां से उसे निभाती भी है ,क्यों की बचपन से ही उसे यह बताया जाता है की ससुराल ही उसका असली घर है ,वहीउसका परिवार है ,लेकिन क्या ससुराल वाले उसे बेटी के रूप में अपनाते है ? बेटी तो दूर की बात है ,जब तक वो बेटे की माँ नहीं बनती उसे बहू  का दर्जा भी नहीं मिलता |  अभी हाल ही में हमारे पड़ोसी के बेटे की शादी हुयी ,नयी नवेली दुल्हन की मुख दिखाई में मै भी  उसे आशीर्वाद देने पहुंची ,जैसे ही उसने मेरे पाँव छुए ,मेरे मुख से भी यही निकला ,''दूधो नहाओ और पूतो फलो ''| 

It spelt continuously


Today again 
In my heart
Felt writhing
Turbulence of
Stormy emotions
Today unable to control
And
Breaking all 
Tempestuous feelings
Madly
Like nebulous
It spelt continuously
Trickling down
From
My eyes


Rekha joshi

Wednesday, 23 July 2014

मन में हो विश्वास फूल राहों में खिलें

चलता चल तू  अकेला साथी मिले  न मिले 
मत  देखना पीछे  तुम राह  कठिन  हो भले 
थक हार कर कहीं बैठ न जाना तुम कभी भी 
अगर मन में हो विश्वास  फूल राहों में खिलें 

रेखा जोशी 

साज़ पर बजती नज़्म काहे बदल दी

ज़िन्दगी की धुन सनम चाहे बदल दी 
साज़  पर  बजती नज़्म काहे बदल दी 
छोड़ कर तन्हा  कहाँ पर खो गये तुम 
प्यार  की तुमने  सजन  राहें बदल दी 

रेखा जोशी 

Tuesday, 22 July 2014

चलना ही नाम ज़िंदगी का

बहते पानी संग बहता चल 
संग  हवा के तू उड़ता चल  
चलना ही नाम ज़िंदगी का 
रुकना नही अब चलता चल 

रेखा जोशी 

Monday, 21 July 2014

unsuccessful


His heritage
Truth honesty and service
And courageous too
Integrity hardwork and zeal too
But remained unsuccessful
Not able to reach on the top
Couldn't bribe 
And not able to do buttering
Unable to talk sweet on the face
Niether any hand 
On his head of an
Authoritative entity

Rekha Joshi







सत्य ही सुन्दर है

सत्य दर्पण 
सत्य ही सुन्दर है 
पूजा अर्पण 
……… … 
प्रेम ही पूजा 
केवल प्रेम सत्य 
सत्य की पूजा 
...............
सत्य की पूजा 
खुशियाँ जीवन में 
निर्मल मन 
…………। 
साथ तुम्हारा 
ईश्वर ने मिलाया 
लगता प्यारा 
…………। 
राह सत्य की 
कठिन है डगर 
तुष्टि मन की 

 
रेखा जोशी 

ज़िंदगी कुछ नही तेरी मुहब्बत के सिवा



हम अब दिल ओ जान से तुम्हारे हो गये 
मिले  तुम  तो  यह  नज़ारे हमारे हो गये 
ज़िंदगी  कुछ नही  तेरी मुहब्बत के सिवा 
जब  से हम  एक  दूजे  के  सहारे हो गये 

रेखा जोशी 

Sunday, 20 July 2014

फैलते कंक्रीट के जंगल


ढलती शाम में  जब सूर्य देवता धीरे धीरे पश्चिम की ओर प्रस्थान किया करते  थे  तब नीतू का मन अपने फ्लैट में घबराने लगता । वह अपने बेटे के साथ अपने फ्लैट के सामने वाले पार्क में टहलने आ जाया करती थी । वहाँ खुली हवा में घूमना उसे बहुत अच्छा लगता था ,और वह ठीक भी था उसके घर में एक नन्हे नए मेहमान के लिए । टहलते हुए उसकी नज़र बेंच पर बैठे एक बुज़ुर्ग जोड़े पर पड़ी ,वह भी खुली जगह पर बैठ शीतल हवा का आनंद उठा रहे थे । एकाएक उसकी नज़र ऊँची ऊँची इमारतों पर पड़ी ,उसे ऐसा लगा जैसे वह इमारते बढ़ती जा रही है और वह फैलता कंक्रीट का जंगल उस पार्क की ओर बढ़ता जा रहा है ,हाँ उसके चारो ओर जैसे घुटन ही घुटन बढ़ने लगी है ,सांस रुकने लगी नीतू की । ''नही ,ऐसा नही हो सकता ''वह मन ही मन बुदबुदाने लगी । तभी वह तंद्रा  जाग गई ,सोच में पड़ गई ,''अगर यह कंक्रीट के जंगल बढ़ते गए तब क्या होगा हमारे बच्चों का और उस समय  हमारे जैसे बुज़ुर्ग स्वच्छ हवा के लिए कहाँ जायें गे ???

रेखा जोशी 

Saturday, 19 July 2014

अर्धनारीश्वर महाशक्ति हो तुम

शंकर  महादेव  की  शक्ति  हो   तुम 
हम सब की यहाँ परम भक्ति हो तुम 
दुनिया   में   सब   ध्याय   नाम  तेरा 
अर्धनारीश्वर   महाशक्ति   हो   तुम 

रेखा जोशी 

आओ गर तुम यहाँ ज़िंदगी गुलज़ार है

भीगे  हुये फूल की  महक बरकरार है 
चारो  ओर   छाई  बहार  ही  बहार है
काश तुम भी चले आओ इन बहारों में 
आओ गर तुम यहाँ ज़िंदगी गुलज़ार है 

रेखा जोशी 

Life and death


Life and death
Two faces of same coin
Life today
And
Death tomorrow
Donot know wtere
The consciousness
Vanishes
Leaving behind
The dead matter
But the memories
Of those lovely moments
Which
We spent together
Remain forever
Fragnant as ever
Along with
Pain in our heart
For  the whole
Life

Rekha Joshi

जन्मों का नाता है तुम से



 तेरे हैं हम सजना मेरे
 तेरा है दिल सजना मेरे

 खोई मै ख्यालों में तेरे 
 तुम  सपनो में सजना मेरे

आँखे तकती राहें तेरी
सजते  सपने सजना मेरे

पागल करती यादें तेरी
रोती आँखे   सजना मेरे

जन्मों का नाता है तुम से
टूटे ना यह सजना मेरे


रेखा जोशी

Thursday, 17 July 2014

अपने दिल का हाल उसे मीत बन बताया


अपने दिल का हाल उसे मीत बन बताया 
देख  चेहरा   भोला  नही   पहचान  पाया 
भुजंग  बन  उसने  चली  ऐसी  टेढ़ी चाल 
सामने   वो  मेरे   काटने   दुश्मन   आया 

रेखा जोशी 

In the golden palace of dreams



In the golden palace
Of dreams
Capturing Sunlight
Illuminating there
Every nook and corner
Of the palace
Of walls with lusturous
Colours of rainbow
Where happiness
Dances and laughs
Know that one day
My golden dream palace
Embellished
And my everlasting thirst
Quenched
Not with dew drops
The urn of my innerself
Then filled up
With drops and drops of
Nectar

Rekha Joshi







चारों ओर छाया खुमार ही खुमार है

गीतिका
बिन तुम्हारे हमारा दिल बेकरार  है
न जाने क्यूँ  फिर भी तेरा  इंतज़ार है

गुनगुना रहे गीत अब  होंठों पे मेरे
गुनगुना रही शब् का हमें  इंतज़ार है 

खुश्बू तेरी महका रही हसीन लम्हे 
इन लम्हों से हमें अब भी बहुत प्यार है 

उतर के आया अब चाँद भी अंगना में
चारों ओर छाया खुमार ही खुमार है 

भीगी आँखें भी तलाश रही है तुम्हें
नैनो को अब  दीदार का इंतज़ार है 

रेखा जोशी 




हौंसले से मिले दम बहुत है सनम




ज़िन्दगी ने  दिये गम  बहुत है सनम 
पर  खुदा ने दिये  कम बहुत है सनम 
प्यार उसका  मिले  ज़िन्दगी में जिसे
हौंसले  से  मिले  दम बहुत  है  सनम  

रेखा जोशी 

Wednesday, 16 July 2014

Moaning alone


Adhering reminiscence
Of that creaky house
To the walls
Slowly and slowly
Being ruined
Once was a home
Smiling and laughing where
Many lives
Generations after generations
Red pink
Specks on walls
Remindes festival of colours
Where echoed
Children gigling
Sadness and
Tears of many
Also
Filled with emptiness
Colourless
Today
Moaning alone

Rekha joshi

खिलने लगे कमल ही कमल मेरे भीतर

युद्ध का शँखनाद
बज उठा मेरे अंतर्मन में
भीतर की दलदल
और
खिलते  कमल के बीच
न जाने क्यों
धंसती गई गहराई में मै
जितनी भी कोशिश करती
फंसती गई उतनी ही
विषय विकारों के
कीचड़ में
खाती रही चोट
अपनों से
अश्रु धारा बहती रही 
नैनो से
बुरी तरह से लथपथ
बंधी हुई
मोहपाश के बंधन में
मुरझाते  रहे कमल
और
अंतर्द्व्न्द के महाभारत से
स्फुटित हुई
आत्मसात की शाखा
छोड़ पीछे दलदल
बन विजेता खिलने लगे
कमल ही कमल मेरे भीतर
और
लौट आई फिर से
मुस्कुराहट
मेरे
चेहरे पर

रेखा जोशी





घनघोर घटाएँ

सावन आया
नभ पर बदरा
उमंग लाया
.................
भीगी चुनरी
झूले पर सखियाँ
हवाएँ ठंडी
.................
घटाएँ काली
पानी बरसा जाती
बरखा रानी
.................
मयूर नाचे
छा गई हरियाली
पपीहा बोले
..................
जलता दिल
घनघोर घटाएँ
पिया मिलन

Tuesday, 15 July 2014

Colorful flowers

Ostentatiously
Trees and branches
Hanging
Colorful flowers

Slowly and slowly
Moving and emitting
Musical waves
Vibrating
Soft and fresh breeze
Singing songs
Ostentatiously
Trees and branches
Hanging
Colorful flowers

Smiling and laughing
On the branches
There are
Colorful flowers

Booming and then
Shreding
Of flowers
Is
Their destiny

Let them scatter
In the lap of Eaeth
Would create
Fragnance again
Blooming
On their branches
Again
Hanging
Colorful flowers

Rekha Joshi


Monday, 14 July 2014

हूँ मै बहती नदिया

लहरें गुनगुनाती
किनारों के बीच
हूँ मै बहती नदिया

गोद में मेरी
खेलती मछलियाँ
बह रही निरंतर
मौन नीरव घाटियों में
झंकृत स्वर मेरे
मधुर धुन पर
लहरे गुनगुनाती
किनारों के बीच
हूँ मै बहती नदिया

सीने में उमंग
नवयौवना सी
लहराती
अठखेलियां करती
बलखाती धारा मेरी
मचलती
लहरें गुनगुनाती
किनारों के बीच
हूँ मै बहती नदिया

 रेखा जोशी 

Sunday, 13 July 2014

रूठने और मनाने का यह दौर यूँही चलता रहे

शिकवे और शिकायतों का यह दौर यूँही चलता रहे 

रूठने और मनाने का यह दौर यूँही चलता रहे 

ज़िन्दगी और कुछ भी नही है तेरी मुहब्बत के सिवा 

हम दोनों के बीच का यह सिलसिला यूँही चलता रहे 


रेखा जोशी

अगन बरस रही अब आसमान से देखो धरती पर



एक बूँद न  बरसी पानी  की  व्योम  से पड़ा सूखा 
खेत खलिहान चहुँ ओर यहाँ   दिख रहा रूखा रूखा 
अगन बरस  रही अब आसमान से देखो धरती पर  
बरसा  पानी  मेघ  नही  तो  किसान  रहेगा  भूखा 

रेखा जोशी 

Friday, 11 July 2014

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें 

चीर घोर अन्धकार को वह रोशनी दिखाता है
अँधेरे से उजाले में वह बाहँ पकड़ लाता है
करते है नमन ऐसे महान गुरू को हम सब मिल
ज़िंदगी जीने के लिए नव राह जो दिखलाता है

रेखा जोशी

चौपाईयाँ


नभ पर किसने रंग भरें है  ,आसमान में दीप जड़ें है
भानु चाँद  सब घूम  रहें है ,किरणे यहाँ बिखेर रहें है

सुमन उपवन महका रहे है भंवरे गुंजन कर रहे है
बगिया  में छाई बहार है दिल में भी छाया खुमार है

है रंगीन छटायें छाये  मन को यह बहुत लुभायें
मोह लेते दिलकश नज़ारे खिली यहाँ मदमस्त बहारें

रेखा जोशी

साथ तुम्हारा मिले हमको तो जन्नत ठोकर में

ज़िंदगी तुमसे बहुत गम पायें है अब प्यार करें 
भूल कर सब गम वफ़ा का जानम अब इकरार करें 
साथ तुम्हारा मिले हमको तो जन्नत ठोकर में 
पास हो गर तुम सजन हरदम तेरा दीदार करें
रेखा जोशी

Thursday, 10 July 2014

Let life moves on With a smile on the lips

While
Time flies
Leaves behind many memories 
Some sweet, some sour 
Filled up with tears
or 
Smile ever on lips
That  past time was spent on 
flourishing our present life 
By being 
The solid foundation 
and will
Make our life colourful
For the moments to come
Teaches us new learning 
The pain of past is forgotten 
And hidden 
Under the veil of the past 
Let life moves on
With a smile on the lips 

Rekha Joshi 

Oh Life You gave me Pain again

Whom
To tell my
Sad story
Life was not so cruel
Ever before 
Never had  wounds
In my Life
Ever before
tolrated
Everything
With a smile
Oh Life
You gave me
Pain again
Why did you
Open them up
Again
The same 

Rekha Joshi

Spread all around Only Love and love

Much sadness in life
Nevertheless
It looks lovely
some sad moments
Then
Some moments are happy
All seasons smile
And
Say it with us
To
 Forget all the grief
If possible
Change saddness
Into
Moment of happiness
And
If possible
Spread all around
Only
Love and love

Rekha Joshi

Anuj Sharma

what is the purpose of this life,

From where we came 
in this world 
and 
will go where 
we 
do not know 
what is the purpose 
of this life, 
food, drink and sleep 
and 
Nurturing family 
the animals birds also do this

we are here
for something else 

we
came into the world 
to uplift ourselves

to uplift our souls
doing some good deeds
and 
move  continuously

towards
perfection 


Rekha Joshi

Tuesday, 8 July 2014

बढ़ता चल निरंतर पूर्णता की और




आये कहाँ से 

हम 

इस दुनिया में 

जाएँ गे कहाँ 

हम 

नही जानते 

क्या है मकसद 

इस जीवन का 

खाना पीना और सोना 

याँ 

पोषण परिवार  का

करते यह तो पशु पक्षी भी 

ध्येय मानव का 

है कुछ और 

जगत में आया 

उत्थान कर अपना 

कुछ कर कर्म ऐसा 

और 

बढ़ता चल निरंतर 

पूर्णता की और



रेखा जोशी 



बहती जा रही मिलने प्रियतम से [क्षणिका ]

 [क्षणिका ]

मदमस्त 
स्वच्छ निर्मल धारा 
उतरी धरा पर 
पर्वत से 
लहराती बलखाती 
रवानी जवानी सी 
उफनती जोशीली 
बहती जा रही 
मिलने प्रियतम से 
एकरस  होती 
विशाल सागर से 
सदा के लिये 

रेखा जोशी 


आयें हम दूर से जब तेरे शहर में

आयें हम दूर से जब तेरे शहर में
भूले हमे  अपने  अब तेरे शहर में
कौन देखता किसे मुड़ कर पीछे यहाँ
भाग रहे है लोग सब तेरे शहर में

रेखा जोशी     

Sunday, 6 July 2014

नवगीत

नवगीत

पतंग सी
उड़ती आकाश में
पल में कटी 
धरा पे आन गिरी
.
बंद कमरों  में
दीवारों से टकराती
सिसकियाँ सुलग रही
.
अंगना में
बरस रही बदरी
भीतर
उठती ज्वाला सी
रोते रहे नयन 
सीने में बुझाती रही
अश्रुधारा से चिंगारी
.
बाहर
फूल खिले गुलशन  में
मुस्कान ओढे
लब पे
हँसती गुनगुनाती रही
.
पतंग सी
उड़ती आकाश में
पल में कटी 
धरा पे आन गिरी

रेखा जोशी

ग़ज़ल 

मापनी 

1222 1222 1222

तुझे चाहें सदा अब ज़िंदगी में  
न हो हमसे  खफा अब ज़िंदगी में

रहे तन्हा बिना तेरे सहारे 
सताये गी वफ़ा अब ज़िंदगी में 

बहुत रोये सनम तेरे लिये हम 
नही कुछ भी कहा अब ज़िंदगी में 

तड़प तुम यह हमारी देख लो अब 
मिले जो इस दफा अब  ज़िंदगी में 

न कर शिकवा बहारों से सनम तू  
नही वह  बेवफा अब ज़िंदगी में


रेखा जोशी 




सुन्दर सलोनी काया

लुभा रही  हम सब को यह सुन्दर सलोनी  काया 

लेकिन  देख वक्त  की यह कैसी  अनोखी  माया 

सुन्दर से सुन्दर   देह  भी आखिर जाती है   ढल 

चार   दिन  की  चांदनी  फिर   आये काली  छाया  

रेखा जोशी 

Saturday, 5 July 2014

चंदामामा दूर के [बाल कथा ]

चंदामामा दूर के [बाल कथा ]


पूर्णिमा के चाँद को देखते ही आज पिंकी फिर मचल उठी,''मुझे चंदा मामा के पास जाना है ,मुझे वहां ले चलो न ,''और इतना कहते ही उसने जोर जोर से रोना शुरू कर दिया । उसके भाई राजू ने हँसते  हुए उससे पूछा ,''तुम चाँद पर जा कर क्या करोगी ?''मै वहां बूढी नानी से चरखा चलाना सीखूँ गी ,मुझे बस उनके पास जाना है ,जाना है ।''झट से पिंकी ने जवाब दे दिया । राजू ने लाख समझाया कि वहां कोई नानी नही रहती ,पर वह मानने को तैयार ही नही थी| अपनी नन्ही सी बहन को कैसे समझाये राजू ,''अरे मेरी प्यारी बहना जिसे तुम नानी कहती हो वह तो दरअसल चाँद पर  बहुत बड़े बड़े गड्डे है ,तुम्हारे चन्दा मामा हमारी धरती से बहुत बहुत दूर है इसलिए वह गड्डे तुम्हे बूढ़ी औरत जैसे दिखाई देते है , वहां तुम्हे सांस लेने के लिए हवा भी नही मिले गी और वहां  चलना भी आसान नही है तुम तो बहुत हलकी हो जाओ गी ,चलने पर ऐसे लगे गा जैसे तुम छलांगे लगा रही हो ,राजू उसका मजाक उड़ा कर जोर जोर से हंसने लगा, ''कितनी अजीब लगोगी तुम मुहं पर आक्सीजन का मास्क ,हवा में उडती हुई ,हा हा हा ,''राजू की बाते सुनते ही पिंकी ने और जोर जोर से रोना शुरू कर दिया  और रोते रोते निंदिया देवी की गोद में चली गई ,पहुँच गई स्वप्नलोक में चंदामामा के दुवारे ,दूर से बूढ़ी नानी दिखने वाली के पास ,पर यह क्या वह धरती से सुंदर दिखने वाले चंदामामा को क्या हो गया ,उनकी चमक गायब हो गई ,वहां पर वह ढूँढती रही बूढ़ी नानी को लेकिन वहां सिवा बड़े बड़े खड्डों के कुछ भी तो नही था ,उसे उसका प्यार भैया राजू दूर खड़ा नजर आया ,उसने अजीब से कपड़े पहन रखे थे मुहं भी अजीब सा लग रहा था और एक लम्बी से नली  उसकी पीठ पर रखे सिलेंडर से उसकी नाक पर आ रही थी ।राजू को देखते ही पिंकी उसकी ओर भागी ,अरे यह क्या हुआ ,उसकी इतनी ऊंची छलांग ,डर के मारे जोर से चीख उठी ,'' बचाओ भैया ,मुझे बचाओ ,मै गिर रही  हूँ । ''धड़ाम की आवाज़ सुन कर राजू भागा भागा कमरे में आया ,''अरे पिंकी तुम सोये सोये बिस्तर से नीचे कैसे गिर गई ?लगता है तुमने चाँद से धरती पर छलांग लगा दी है ।'' हा हां हां राजू जोर से हंसने लगा ।

रेखा जोशी

खुशनसीब हूँ मिली जो मुहब्बत

ज़ुल्फ़ों की छाँव में उलझ गए जब 

धागे मुहब्बत के सुलझ गए सब 

खुशनसीब हूँ मिली जो मुहब्बत 

ज़िन्दगी हसीन है समझ गए अब

रेखा जोशी

Friday, 4 July 2014

ख्वाबो के महल में

क्षितिज
के उस पार
देख रहे वो बच्चे
कुछ अर्द्धनग्न
कुछ मैले  कुचैले कपड़ों में
लिपटे हुए
टकटकी बांधे
निहार रहे शून्य में
एक आस लिए
कभी तो मुस्कुराये गी
धूप वहाँ भी
कभी तो जगमगाएँ गी
वह काली दीवारें
कभी तो खिलें गे
उम्मीदों के फूल
हसें गे तब वह भी
सुन कर लोरियाँ
ख्वाबो के महल में
माँ की
सो गये उम्मीद की
आस लिए

रेखा जोशी




प्यार में हम तुम जी लें सँग मरते जायें


राह  में  हम तुम  दोनों  अब  चलते जायें  
साथ   तेरा  मिल  पाया   अब  बढ़ते जायें 

कैसे  कहें  अब  सजन  ज़िंदगी  है  तुमसे 

प्यार में हम तुम जी  लें  सँग  मरते जायें 

रेखा जोशी