Wednesday, 10 June 2015

मुसाफिर हूँ इक मै

मुसाफिर हूँ इक मै
चलता जा रहा यह ज़िंदगी
थक चुका अब चलते चलते
कुछ पल ठहर कर
देखा जो पीछे
नीले अंबर ने बदल ली
चादर अपनी
काली स्याह धुआं धुआं सी
थी छत अपनी
हँसी के गलियारे भी
चुपचाप खामोश से
थे देख रहे
धीमी हो गयी
अब कदमों की आहट
साँझ थी अब सामने
खड़ी बाहें पसारे
चलने लगा मै उस ओर
ज़िंदगी का दीपक लिये
धीरे धीरे

रेखा जोशी