Wednesday, 29 July 2015

विडंबना [लघु कथा ]

आलोक की बहन रीमा के पति जगदीश की अचानक अपने घर परिवार से दूर पानीपत में हुए निधन के समाचार ने आलोक और उसकी पत्नी आशा को हिला कर रख दिया |कुछ ही दिन पहले जगदीश की बदली अहमदाबाद से पानीपत में हुई थी और रीमा भी उसके साथ किराये के मकान की तलाश करने के लिए आई हुई थी ,अचानक जगदीश को दिल का दौरा पड़ा और उसकी मौत हो गई | आलोक और उसकी पत्नी आशा ने जल्दी से समान बांधा, आशा ने अपने ऐ टी एम् कार्ड से दस हजार रूपये निकाले और वह दोनों अपनी गाड़ी से पानीपत के लिए रवाना हो गए ,वहाँ पहुँचते ही आशा ने वो रूपये आलोक के हाथ में पकड़ाते हुए कहा ,”दीदी इस बुरे वक्त में अपने घर से बहुत दूर आई हुई है और इस समय इन्हें पैसे की सख्त जरूरत होगी आप उन्हें यह दस हज़ार रूपये अपनी ओर से दे दो और मेरा ज़िक्र भी मत करना कहीं उनके आत्मसम्मान को ठेस न पहुँचे ”|अपनी बहन के विधवा होने पर अशोक बहुत अधिक भावुक हो रहा था ,उसने भरी आँखों से चुपचाप वो रूपये आशा के हाथों से ले कर अपनी बहन रीमा के हाथ में थमा दिए | देर रात को रीमा अपनी बहनों के साथ एक कमरे में सुख दुःख बाँट रही थी तभी आशा ने उस कमरे के सामने से निकलते हुए उनकी बाते सुन ली जिसे सुनते ही उसकी आँखों से आंसू छलक आये ,जब उसकी नन्द रीमा के शब्द पिघलते सीसे से उसके कानो में पड़े ,वह अपनी बहनों से कह रही थी ,”यह मेरा भाई ही है जो मुझसे बहुत प्यार करता है , आज इस मुसीबत की इस घड़ी में पता नही उसे कैसे पता चल गया कि मुझे पैसे की जरूरत है ,यह तो मेरी भाभी है जिसने मेरे भाई को मुझ से से दूर कर रखा है |”
रेखा जोशी