Wednesday, 21 October 2015

कहानी घर घर की[पूर्व प्रकाशित रचना ]

कहानी घर घर की

मीनू रसोई में दोपहर के खाने की तैयारी  में अभी जुटी ही थी कि उसके मोबाईल की  घंटी बज उठी ,कानो पर मोबाईल रख वह सब्जी काटने लगी ,''हाँ मम्मी  बोलो'' ,''क्या कर रही हो ''दूसरी तरफ से आवाज़ आई,'कुछ ख़ास नही ,'बस मम्मी खाना बना रही हूँ ''मीनू ने जवाब दिया |यह सुनते ही मीनू की  माँ वहीं फोन पर शुरू हो गई ,''कैसे है तेरे ससुराल वाले सारा वक्त तुम्हे ही किचेन में झोंके रखते है और वह दोनों माँ बेटी पलंग तोडती रहती है ,तेरी सास याँ तेरी लाडली  नन्द कोई काम धाम नही करती क्या ? |''मोबाईल फोन जी हाँ विज्ञानं की इस देन ने कई घरों को तोड़ कर रख दिया , अपने ससुराल की हर छोटी बड़ी बात बेटी के मायके तक झट से पहुंच जाती है और शुरू हो जाती है बेटी के घर में मायकेवालों की दखल अंदाजी जो ससुराल में आपसी रिश्तों  में कड़वाहट  भर देती है , .वो तो मीनू समझदार थी ,उसने अपनी माँ को समझा दिया और स्थिति को बिगड़ने नही दिया लेकिन सभी लडकियाँ मीनू जैसी समझदार तो नही होती ,कई बार तो ऐसी छोटी छोटी बाते इतनी बड़ी बन जाती है और अंजाम होता है तलाक ,यही तो हुआ मीनू की सखी रीना के साथ ,माँ बाप की  लाडली संतान ,शादी हो गई एक भरे पूरे परिवार में ,हर समय रीना की मम्मी उसे हिदायते देती रहती और आज यह हाल है कि रीना का तो तलाक हो गया लेकिन उसकी माँ का अपने घर में रोक टोक के कारण उसके भैया और भाभी ने उनसे  अलग हो कर अपनी गृहस्थी बसा ली |अब रीना की माँ को कौन समझाये कि जब बच्चे बड़े हो जाते है तो उन्हें स्वतंत्र रूप में अपनी जिंदगी की निर्णय और जिम्मेदारियां उठाने देना चाहिए , उसके लिए माँ बाप को ही अपने बच्चों को भावी जिंदगी के लिए तैयार करना चाहिए |

रेखा जोशी