Friday, 22 April 2016

अमृत बन जल जब टपकेगा नभ से

धरा यह हमारी रही है पुकार 
रहा बरसता आसमाँ से अँगार 
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गया सूख जीवन पानी की आस 
हुआ क्षीण सबका रुक गया श्वास 
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गई खिच लकीरें तन पर धरा के 
बुरा हाल सबका नीर  को तरसें 
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उमड़ घुमड़ बदरा बरसेंगे नभ से 
चहुँ ओर होगा तब जलथल फिर से 
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सृजन नव होगा अवनी पर फिर से 
अमृत बन जल जब टपकेगा नभ से 
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रेखा जोशी