Tuesday, 26 April 2016

रक्षिता

रक्षिता 

देखती हूँ हर रोज़
अपनी बगिया के पेड़ पर
नीड़ इक झूलता हुआ
महफूज़ थे जिसमें
वो नन्हे से चिड़िया के बच्चे
चोंच खोले आस में
माँ के इंतज़ार में
पाते ही आहट माँ की
चहचहाते उमंग से
उन नन्ही सी चोंचों को
भर देती वह दानों से
जो लाई थी वह दूर से
अपने नन्हों के लिए
दिन पर दिन गुजरते गए
घोंसला छोटा हुआ
और बच्चे बढ़ते गए
देखा इक दिन नीड़ को
बैठी चुपचाप रक्षिता वो
भर ली उड़ान बच्चों ने
रह गई अब अकेली वो
सार यही हर जीवन का
सार यही है जीवन का

रेखा जोशी