Thursday, 16 June 2016

है विश्वास तुम्हे खुद पर

ओ साथी मेरे 
क्यों बैठे हो तुम
चुपचाप 
कब तक रहोगे 
गुमसुम
तोड़ दो तुम अब
बंधन सब
भर लो उड़ान
फैला कर अपने पँख
उन्मुक्त
दूर ऊपर नभ पर
है विश्वास तुम्हे खुद पर
जानते हो तुम
मंज़िल तुम्हारी है उड़ान
उठो है उड़ना तुम्हे
फैलाओं अपने पँख
और
निकल पड़ो फिर से
ज़िंदगी की इक
लम्बी उड़ान भरने

रेखा जोशी