Friday, 1 July 2016

मियाँ मिट्ठू जी हाथ मलते रह गये

दोनों हाथों में लेकर लड्डू
थे खुश बहुत मियां मिट्ठू 
घर में मिलती 
घरवाली 
बाहर मिलती 
बाहरवाली 
कट रहे थे मज़े में दिन 
थी राते भी मदमाती 
घरवाली को बहकाते 
बाहर वो मौज मनाते 
दो नावों में रख कर पैर 
कब तक वो खुश रह पाते 
खिसक गई आगे इक नाव 
पीछे रहा तब दूजा पाँव 
लड़खड़ाये ऐसे वो 
फिरकभी  संभल न पाये 
औंधे मुहँ 
पानी में समाये 
अब  रोते  याद कर
घरवाली की पिटाई
और
बाहरवाली की धुनाई
तौबा तौबा करते रह गये
मियाँ मिट्ठू जी
हाथ मलते रह गये

रेखा जोशी