Monday, 11 July 2016

प्रियतम के नाम एक पाती

प्रियतम के नाम एक पाती 

प्रियतम मेरे
आज बरसों बाद तुम्हे खत लिख रही हूँ ,क्यों लिख रही हूँ ?,नही जानती , बस मन कर रहा है तुमसे बातें करने का और तुम आज मुझसे बहुत दूर हो ,जानती हूँ तुम्हारा जाना मजबूरी थी परन्तु दिल है कि मानता ही नहीं ,आज भी मेरे दिल की धड़कन वैसी ही तेज़ हो रही है जब पहली बार तुम्हे देख कर मेरा दिल धड़का था ,याद है मुझे मैने तुम्हे जब पहली बार देखा था, कमबख्त इस पागल दिल ने ऐसा शोर मचाया था जैसे जिस्म से निकल बाहर ही आ जायेगा ,इतना जोर जोर से धड़क रहा था कि काबू में ही नहीं आ रहा था और नज़र थी कि तुम्हारे चेहरे से हटना ही नहीं चाहती थी , पलके शर्म के मारे ऊपर उठ ही नहीं रही थी, क्या ज़माना था वह जब जुड़े थे हमारे दिल के तार,उस वक्त न कोई फोन था और न कोई और बातचीत का साधन,तब इस धड़कते दिल को रहता था इंतज़ार तेरे खत का,हर शाम आँखे टिक जाती दरवाज़े पर| जब तुम हमसे दूर थे सीमा पर तब तुम्हारी चिट्ठी हमें महीनों भर इंतज़ार करवाती थी और तुम्हारा खत पाते ही दिल की धड़कन तेज़ हो जाती थी ,कांपते थे मेरे हाथ पढ़ते हुए खत तेरे और मेरे सजल नैनो से बह जाते थे जज़्बात अश्रुधारा बन पाती पर तुम्हारी ,मैने आज भी सहेजा हुआ है उन्हें जो फिर से उमड़ आते है ,जब भी मै वह खत पढ़ती हूँ | आज फिर से वह गुज़रा वक्त याद आ गया ,वैसी ही तन्हाई वही भीगी आँखे तुम्हे बुला रही है|
तस्वीर तेरी अपने दिल में बसा कर
नैनो में अपने लौ दिये की जला कर
इंतज़ार में बैठे हम तुम्हारे लिये
राह में तेरी अपनी पलके बिछा कर
तुम कब वापिस आ रहे हो ?तुम्हारी यादों में डूबी हुई 

तुम्हारी सिर्फ तुम्हारी अपनी 

रेखा जोशी