Thursday, 20 October 2016

बीत गई सुबह ज़िन्दगी की ,सन्ध्या को ढलना होगा


अब हमें अपनी चाहतों का ,दमन यहाँ करना होगा 
अब तोड़ कर सब बंधन यहाँ ,तन्हा ही चलना होगा 
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मिले हमें जीवन के पथ पर, साथी भी चलते चलते 
है गये  छोड़ बीच राह में  ,जाने कब  मिलना होगा 
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आई खुशियाँ हमारी गली ,हम थे कभी  मुस्कुराये  
ऐसी लगी हमें नज़र सजन ,जीवन भर जलना होगा 
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टूट  गई माला प्यार भरी  ,छूटे  सभी   रिश्ते  नाते
पिरो के धागों में इन्हें फिर , फूलों को खिलना होगा 
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जी लिये हम बहुत दुनिया में ,छोड़ दो आस भी हमने 
बीत गई सुबह ज़िन्दगी की ,सन्ध्या को ढलना होगा 

रेखा जोशी