Tuesday, 1 November 2016

खिला उपवन बहारे मुस्कुराई अब

छंद सिन्धु – (21 मात्रा )

मापनी – १२२२ १२२२ १२२२

नहीं  चाहा कभी  तुम  दूर  हों  हमसे
बहाना  कर सजन  क्यों  रूठ  जाना है  
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खिली है धूप आंगन में हमारे अब 
सुमन उपवन यहाँ पर अब खिलाना है 
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चलो साजन चलें उस पार हम दोनों 
सजन  दिल  आज दीवाना  हमारा है 
... 
मिली है ज़िन्दगी अब मुस्कुराओ तुम 
हमे तो अब ख़ुशी से खिलखिलाना है 
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खिला उपवन बहारे मुस्कुराई  अब 
ख़ुशी में गीत साजन गुनगुनाना है 

रेखा जोशी