Friday, 17 February 2017

पुकार

एकांकी
पुकार
पात्र ,प्रकृति,
जानवर(शेर,खरगोश,भालू आदि)
तीन मानव

स्टेज  ,पहाड़ों पर बहती हुई नदी,पीछे चमकता सूरज,स्टेज के दोनों तरफ हरे भरे पेड़ पौधे
(स्टेज पर सफेद साड़ी पहने हुए ,बालों में फूल सजे हुए ,नाचती ,गाती एक औरत का प्रवेश)

गाना। " यह कौन चित्रकार है ,यह कौन चित्रकार ""

औरत (हंसते हुए) मै प्रकृति हूँ,मेरी गोद में हरे भरे पेड़ पौधे लहराते है,यह नदियाँ, नाले मेरी गोद में अठखेलियाँ क्र नाचती हैं,सर पर पर्वतों का मुकुट और तन पर फूलों के आभूषण हैं,सूरज की सुनहरी धूप जब मेरे आँचल पर पड़ती है तो उसकी चमक से मेरा सौंदर्य खिल खिल उठता है।
(नाचते गाते हुए)

"मैने कहा फूलों से हंसो तो वो खिलखिला के हंस दिए"

मेरे लहराते आँचल में अनेक जीव जंतु पनाह लिये हुए है,देखो देखो वः किस कदर ख़ुशी के रंग में डूबे हुये है
(नाचते हुए पेड़ की ओट में छुप जाना)

गाना "चुन चुन करती आई  चिड़िया ,दाल का दाना लाइ चिड़िया"

मोर ,खरगोश,भालू,अन्य जीव जंतु (मुखौटे पहने हुए पात्र)  सब नाचते हैं
फिर स्टेज के पीछे चले जाते हैं
(स्टेज पर शेर का मुखौटा पहने पात्र का प्रवेश)

गाना "याहूँ ,चाहे कोई मुझे जंगली कहें ,याहूँ "

शेर  हा हा हा , मुझे तो ज़ोरों की भूख लगी है ,कहां  भाग गए सब डर के मारे

गाना " ज़रा  सामने तो आओ छलिये ,छुप छुप छलने में क्या राज़ है हिम्मत है तो कर ले मुकाबला इस जंगल में मेरा ही राज है"

खरगोश की ओर झपटते हुए स्टेज से प्रस्थान
प्रकृति  देखा आपने,जंगल के राजा का रोआब ,जी हा राजासे तो सब दरें गे ही "" जिसकी लाठी उसकी भैंस" यही तो मेरा कानून है,और इसी से मेरा संतुलन बना रहता है

(स्टेज पर सभी जानवरों का आना और नाचना गाना)

गाना, हे नीले गगन के तले धरती का प्यार पले
दूर से गोली चलने की आवाज़,सब रुक गए

प्रकृति (डरी हुई)  यह आवाज़ तो  किसी शिकारी की बंदूक से निकली गोली की आवाज़ है ,पता नही किस निरीह प्राणी को इसने फिर मर गिराया है
( तीन मनुष्यों का प्रवेश)
पहला, मै मनुष्य हूँ,क्या धरती ,आकाश,सागर ,सब जगह मेरा अधिपत्य है,और यह प्रकृति ,यह तो मेरी दासी है

दूसरा, सब ओर मै ही मैं हूँ ,मै नदियों की धारा मोड़ सकता हूँ,,पर्वत काट सकता हूँ,सागर चीर सकता हूँ,अंतरिक्ष में हलचल मचा सकता हूँ

तीसरा ,धन अर्जित करने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ,अरे वाह, आम तो आम गुठलियों के दाम ,पेड़ों से लकड़ी और जानवरों की खाल बेच कर में खूब पैसा कमाऊंगा ,पैसा यह पैसा,हाय पैसा पैसा पैसा

प्रकृति ,"क्रोधित',मुर्ख मानव पर्यावरण मेरा संगीत है,मत बिगाड़ो मेरा रूप, चारो ओर प्रदूषित हवा है,कैसे सांस लोगे जब पेड़ पौधे ही काट दोगे, पानी ज़हरीला हो गया है,आज हर ओर शोर ही शोर है,मुझे क्रोधित मत करो,पेड़ काट डोज तो पानी के बहाव को कौन रोक पायेगा

सभी पात्र स्टेज पर आते है
प्रकृति ,ओ मानव होश में आओ
सभी, होश में आओ होश में आओ
प्रकृति, आज मेरी पुकार सुनो
सभी,पुकार सुनो पुकार सुनो
प्रकृति ,वनों को मत काटो
सभी ,मत काटो मत काटो
सभी ,पेड़ लगाओ पेड़ लगाओ
प्रकृति, जीव जंतुओं को जीने दो जीने दो
सभी ,जीने दो जीने दो
प्रकति ,नही तो तुम बर्बाद हो जाओ गे
सभी ,बर्बाद हो जाओगे  बर्बाद हो जाओगे
प्रकृति आओ मिलकर पेड़ लगायें
जन जन का कल्याण करें

रेखा जोशी