Thursday, 29 June 2017

बचपन

रखी है सम्भाल कर
बचपन की
कुछ निशानियाँ
छुपी है उन निशानियों में
अनेक कहानियाँ

अकेली है गुड़िया
टूटी फूटी सी
रचाई थी बचपन में
शादी जिसकी
आई थी बारात उसके
दूल्हे की
लौटा दी थी जो
बिन दुल्हन के
नही कर पाई विदा
प्यारी
अपनी गुड़िया को
कैसे कर पाती
जुदा उसे अपने से

था इक प्यारा सा बन्दर
खेलता था एक कुत्ते से
करती थी
बाते अपने दिल की
उनसे
छूट गया बचपन
छोड़ निशानियाँ
छूट गया बचपन
रह गई कहानियाँ

रेखा जोशी