Sunday, 13 August 2017

हिंडोले

हिंडोले
संस्मरण ( कृष्ण जन्माष्टमी पर)

मै और मेरी दादी दोनों हर त्यौहार मिल कर अलग ही अंदाज में मनाया करते थे ।मै बहुत ही भाग्यशाली हूं कि मुझे अपनी दादी का भरपूर स्नेह मिला।बात  कृष्ण जन्माष्टमी की है ।अमृतसर का एक बजार जिसके कोने में एक कुआं है ,जो " सुनियारा वाला खुह" के नाम से जाना जाता है,उसी बाज़ार में हम किराए के मकान में रहा करते थे ,मै बहुत छोटी थी लेकिन उस घर की और बजार की अमिट  यादें अभी भी मेरे  मानस पटल पर अंकित है।हमारे घर के आस पास बहुत से मंदिर हुए करते थे , कृष्ण जन्माष्टमी पर सांझ ढलते ही  सभी मंदिर खूबसूरत लाइट्स से जगमगाने लगते थे, औरमै अपनी दादी की ऊंगली थाम कर एक मन्दिर से दूसरे ,और दूसरे से तीसरे ,घर के आस पास कितने भी मन्दिर हुआ करते थे, सभी मंदिरों में हिंडोले(झांकियां) देखने जाया करती थी

हिंडोले देख कर बहुत अच्छा लगता था,लेकिन उससे भी अच्छा लगता था हर झांकी में छुपी कृष्ण की लीलाओं की  कहानी ,जिसे मेरी दादी बहुत खूबसूरत अंदाज में सुनाया  करती थी  । जैसे ,कान्हा का जन्म ,माखन चुराना ,गोपियों को सताना,कलिया नाग मर्दन,जितनी झांकियां देखती उतनी ही कहानियां । मेरी दादी रात को कृष्ण के जन्म लेने के बाद ही प्रसाद ग्रहण करती थी,और तब तक उनकी कहानियों का सिलसिला चलता रहता था। देर रात को हम घर आते थे और मै कृष्ण की कहानियों में डूबी कब सो जाती थी पता ही नहीं चलता  था ।

रेखा जोशी