Monday, 20 February 2017


प्रदत्त मापनी - 2212 2212 2212 2212 

गाये बहुत है गीत मिलकर  प्यार में चहके सजन 
आओ चलें दोनों सफर यह प्यार का महके  सजन 
... 
हसरत  रही  है  प्यार  में  हम  तुम  रहें साथी सदा 
मुश्किल बहुत है यह डगर इस पर रहें मिलके सजन 
..... 
खिलते  रहें अब फूल बगिया मुस्कुराती ज़िन्दगी 
मधुमास आया ज़िंदगी खिलने लगी अबके सजन
....
मिलते रहें हम तुम भरी  हो प्यार से यह ज़िन्दगी
देखो न हमको यूँ   हमारा अब  जिया धड़के सजन
.....
दिन रात करके  याद हम तुमको यहाँ खोये रहें
आ साथ मिलकर हम चलें न'फिर कदम बहके सजन
.....

Friday, 17 February 2017

पुकार

एकांकी
पुकार
पात्र ,प्रकृति,
जानवर(शेर,खरगोश,भालू आदि)
तीन मानव

स्टेज  ,पहाड़ों पर बहती हुई नदी,पीछे चमकता सूरज,स्टेज के दोनों तरफ हरे भरे पेड़ पौधे
(स्टेज पर सफेद साड़ी पहने हुए ,बालों में फूल सजे हुए ,नाचती ,गाती एक औरत का प्रवेश)

गाना। " यह कौन चित्रकार है ,यह कौन चित्रकार ""

औरत (हंसते हुए) मै प्रकृति हूँ,मेरी गोद में हरे भरे पेड़ पौधे लहराते है,यह नदियाँ, नाले मेरी गोद में अठखेलियाँ क्र नाचती हैं,सर पर पर्वतों का मुकुट और तन पर फूलों के आभूषण हैं,सूरज की सुनहरी धूप जब मेरे आँचल पर पड़ती है तो उसकी चमक से मेरा सौंदर्य खिल खिल उठता है।
(नाचते गाते हुए)

"मैने कहा फूलों से हंसो तो वो खिलखिला के हंस दिए"

मेरे लहराते आँचल में अनेक जीव जंतु पनाह लिये हुए है,देखो देखो वः किस कदर ख़ुशी के रंग में डूबे हुये है
(नाचते हुए पेड़ की ओट में छुप जाना)

गाना "चुन चुन करती आई  चिड़िया ,दाल का दाना लाइ चिड़िया"

मोर ,खरगोश,भालू,अन्य जीव जंतु (मुखौटे पहने हुए पात्र)  सब नाचते हैं
फिर स्टेज के पीछे चले जाते हैं
(स्टेज पर शेर का मुखौटा पहने पात्र का प्रवेश)

गाना "याहूँ ,चाहे कोई मुझे जंगली कहें ,याहूँ "

शेर  हा हा हा , मुझे तो ज़ोरों की भूख लगी है ,कहां  भाग गए सब डर के मारे

गाना " ज़रा  सामने तो आओ छलिये ,छुप छुप छलने में क्या राज़ है हिम्मत है तो कर ले मुकाबला इस जंगल में मेरा ही राज है"

खरगोश की ओर झपटते हुए स्टेज से प्रस्थान
प्रकृति  देखा आपने,जंगल के राजा का रोआब ,जी हा राजासे तो सब दरें गे ही "" जिसकी लाठी उसकी भैंस" यही तो मेरा कानून है,और इसी से मेरा संतुलन बना रहता है

(स्टेज पर सभी जानवरों का आना और नाचना गाना)

गाना, हे नीले गगन के तले धरती का प्यार पले
दूर से गोली चलने की आवाज़,सब रुक गए

प्रकृति (डरी हुई)  यह आवाज़ तो  किसी शिकारी की बंदूक से निकली गोली की आवाज़ है ,पता नही किस निरीह प्राणी को इसने फिर मर गिराया है
( तीन मनुष्यों का प्रवेश)
पहला, मै मनुष्य हूँ,क्या धरती ,आकाश,सागर ,सब जगह मेरा अधिपत्य है,और यह प्रकृति ,यह तो मेरी दासी है

दूसरा, सब ओर मै ही मैं हूँ ,मै नदियों की धारा मोड़ सकता हूँ,,पर्वत काट सकता हूँ,सागर चीर सकता हूँ,अंतरिक्ष में हलचल मचा सकता हूँ

तीसरा ,धन अर्जित करने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ,अरे वाह, आम तो आम गुठलियों के दाम ,पेड़ों से लकड़ी और जानवरों की खाल बेच कर में खूब पैसा कमाऊंगा ,पैसा यह पैसा,हाय पैसा पैसा पैसा

प्रकृति ,"क्रोधित',मुर्ख मानव पर्यावरण मेरा संगीत है,मत बिगाड़ो मेरा रूप, चारो ओर प्रदूषित हवा है,कैसे सांस लोगे जब पेड़ पौधे ही काट दोगे, पानी ज़हरीला हो गया है,आज हर ओर शोर ही शोर है,मुझे क्रोधित मत करो,पेड़ काट डोज तो पानी के बहाव को कौन रोक पायेगा

सभी पात्र स्टेज पर आते है
प्रकृति ,ओ मानव होश में आओ
सभी, होश में आओ होश में आओ
प्रकृति, आज मेरी पुकार सुनो
सभी,पुकार सुनो पुकार सुनो
प्रकृति ,वनों को मत काटो
सभी ,मत काटो मत काटो
सभी ,पेड़ लगाओ पेड़ लगाओ
प्रकृति, जीव जंतुओं को जीने दो जीने दो
सभी ,जीने दो जीने दो
प्रकति ,नही तो तुम बर्बाद हो जाओ गे
सभी ,बर्बाद हो जाओगे  बर्बाद हो जाओगे
प्रकृति आओ मिलकर पेड़ लगायें
जन जन का कल्याण करें

रेखा जोशी

Thursday, 16 February 2017

चाहत थी उसकी
ज़िन्दगी में
सफलता
है उसकी धरोहर
सत्य ईमानदारी और सेवा भाव
है उसमें साहस भी
लगन मेहनत और उमंग से भरा
लेकिन न हो सका सफल
ज़िन्दगी में
रहा असफल
नही पहुंच सका वह बुलंदियों पर
नहीं कर सका वह
जी हजूरी और रिश्वतखोरी
नही बना सकता था वह
मीठी मीठी बातें
न ही था उसके
सिर पर किसी सत्ता का हाथ

रेखा जोशी

Wednesday, 15 February 2017

न याद आना न हमें सताना

121. 221. 121. 22

न याद आना न हमें सताना
न याद करना तुम भूल जाना
,
रहे न तुम पास कभी हमारे
न ज़िन्दगी में तुम पास आना
,
मिली हमे थी न ख़ुशी जहां में
न ज़िन्दगी फिर तुम मुस्कुराना
,
चले सफर में हम साथ तेरे
न सोचना साथ सजन  निभाना
,
कभी मिले थे  हम इस जहाँ में
न सोचना तुम न हमें बुलाना

रेखा जोशी

बिन तेरे चांदनी भी वीरान है

रात कुछ देर की अब मेहमान है
बिन तेरे चांदनी भी वीरान है
,
है शीतल पवन आज लगाये अग्न
जाग उठे अब हमारे  अरमान है
,
है सूने नज़ारे सूनी यह डगर
रास्ते भी यहाँ पर तो अंजान है
,
धड़क रहा दिल हमारा तन्हाई में
जीने का नही कोई सामान है
,
चले आओ राह निहारते तेरी
नही कोई भी अपनी पहचान है

रेखा जोशी

आँचल फूलों से रहा महकता

है हमने प्रेम किया ज़िन्दगी से
नहीं हमें अब गिला  ज़िन्दगी से
आँचल फूलों से रहा महकता
है बहुत  हमें मिला ज़िन्दगी से

रेखा जोशी

है प्रेम में श्याम के डूबी राधिका

है   प्रेम में  श्याम  के  डूबी   राधिका
मुरली की तान सुन झूम उठी राधिका
कान्हा  समाया  राधा  के   अंग अंग
रंग  के कृष्णा  के रंग   गई राधिका

रेखा जोशी 

Tuesday, 14 February 2017

मानवता ह्रदय रहे वह नेता महान


देना जिसको वोट कर उसकी पहचान
आओ चलो करते हम अपना मतदान
...
भारत  की  सेवा में जो  दिन रात लगा
वोट उसको  देना रखना उसका ध्यान
...
जात पात औ धर्म  पीछे सब को छोड़
व्यक्ति हो विशेष गुणों की देखना खान
....
भांति भांति के लोग विविधा अनेक यहां
मानवता  ह्रदय रहे वह नेता  महान
.....
भेदभाव जो ना करे सबके हो साथ
गरीब के दुख दर्द से हो ना अंजान

रेखा जोशी

मिलन/विरह

मिलन

खिला आज मौसम रँगी है बहारे 
चलो दूर अब प्यार साजन पुकारे
जहाँ हो रहा मिलन धरती गगन का
बुलायें हमें आज दिलकश नज़ारे

विरह

जिंन्दगी के हर मोड़ पर हम चले थे हमसफर
छोड़ कर तुम हमें अकेला अब चले गये किधर
विरह की यह पीर अब साजन किसे हम बताये
कोई नही अब संगी साथी सूनी  ये डगर

रेखा  जोशी


Monday, 13 February 2017

इक हवा का झोंका सा था सजन प्यार हमारा

जिंन्दगी के हर मोड़ पर हम चले थे हमसफर
छोड़ कर तुम हमें अकेला अब चले गये किधर
विरह की यह पीर अब साजन किसे हम बताये
कोई नही अब संगी साथी सूनी  ये डगर

रेखा  जोशी

Sunday, 12 February 2017

दो मिनट में टिफ़िन पैक

सुबह सवेरे बच्चों को स्कूल भेजने  की जल्दी होती है इसलिए उनके टिफ़िन बॉक्स में कुछ बढ़िया स्वादिष्ट और जो  फटाफट बन जाये,इस ही कोई व्यंजन रखना चाहिए,हमें इस  बात का ख़ास ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों के लंच में अधिक से अधिक पौष्टिक तत्व हों और लंच उनकी पसंद का भी हो

पनीर टमाटर ग्रिल्ड सैंडविच

सामग्री
1दो ब्रेड स्लाइस
2थोड़ा सा कटा हुआ पनीर
3टमाटर के स्लाइस
4हरी चटनी/टोमैटो सौस
5स्वाद के अनुसार नमक
6 इच्छा अनुसार काली मिर्च,चाट मसाला

विधि

ब्रेड  स्लाइस पर कुछ हरी चटनी या सौस लगाएं और कटा हुआ पनीर और टमाटर के साथ उन्हें भरें उसके बाद अपने स्वाद के अनुसार काली मिर्च, नमक और चाट मसाला छिड़कें। अब इस सैंडविच को कुरकुरा होने तक ग्रिल करें और खाने के लिए  तैयार है चटपटा सैंडविच ,इसे फॉयल में लपेट कर  टिफ़िन में पैक कर दीजिए

रेखा जोशी

Saturday, 11 February 2017

पर्यावरण


रंगीन धरती का गीत  पर्यावरण
प्रकृति का मधुर संगीत पर्यावरण
..
टूट रहे तार सूना पर्यावरण
बचाना हमें धरती का आवरण
..
कोयल की कूक,पंछी की चहक,
फूलो की महक,झरनों की छलक
..
प्रदूष्ण ने फैलाया कैसा  जाल
लिपटी  हुई धरती  उसमें आज
..
कटे पेड़ों से बिगड़ा आकार
चहुँ ओर अब फैला हाहाकार
..
आओ  लगायें नये पेड़ पौधे ,
सूनी धरा में खुशियाँ हम बो दे
..
नये गीत गाये हसीं पर्यावरण
वनसम्पदा का प्रतीक पर्यावरण

रेखा जोशी

Friday, 10 February 2017

साडा चिड़ियाँ दा चम्बा वे

जब मै बचपन में अपनी माँ की उंगली पकड़ कर चला करती थी ,बात तब की है ,हमारे पडोस में एक बूढी अम्मा रहा करती थी ,उन्हें हम सब नानी बुलाते थे | जब भी मेरी माँ उनसे मिलती ,वो उनके पाँव छुआ करती थी और नानी उन्हें बड़े प्यार से आशीर्वाद देती और सदा यही कहती ,''दूधो नहाओ और पूतो फलो ''|उस समय मेरे बचपन  का भोला मन इस का अर्थ नहीं समझ पाया था ,लेकिन धीरे धीरे इस वाक्य से मै परिचित होती  चली गई, ''पूतो फलो '' के  आशीर्वाद को भली भाँती समझने लगी |  क्यों देते है ,पुत्रवती भव का आशीर्वाद ,जब की एक ही माँ की कोख से पैदा होते है पुत्र और पुत्री ,क्या किसी को पुत्री की कोई चाह नहीं ? 

मैने अक्सर देखा है बेटियां ,बेटों से ज्यादा भावनात्क रूप से अपने माता पिता से जुडी होती है |एक दिन अपनी माँ के साथ मुझे अपने पडोस में एक लडकी की शादी के सगीत में जाने का अवसर प्राप्त हुआ ,वहां कुछ महिलायें 'सुहाग 'के गीत गा रही थी ,''साडा चिड़ियाँ दा चम्बा वे ,बाबल असां उड़ जाना |''जब मैने माँ से इस गीत का अर्थ पूछा तो आंसुओं से उसकी आखे भीग गई | यही तो दुःख है बेटियों को पाल पोस कर बड़ा करो और एक दिन उसकी शादी करके किसी अजनबी को सोंप दो ,बेटी तो पराया धन है , उसका कन्यादान भी करो,साथ मोटा दहेज भी दो उसके बाद उसे उसके ससुराल वालों के भरोसे छोड़ दो,माँ बाप का फर्ज़ पूरा हो गया ,अच्छे लोग मिले या बुरे यह उसका भाग्य ,बेटी चाहे वहा कितनी भी दुखी हो ,माँ बाप उसे  वहीं रहने की सलाह देते रहेगे ,उसे सभी ससुराल के सदस्यों से मिलजुलकर रहने की नसीहत देते रहे गे

 |माना की हालात पहले से काफी सुधर गये है लेकिन अभी भी समाज के क्रूर एवं वीभत्स  रूप ने बेटी के माँ बाप को डरा कर रखा हुआ है | बलात्कार ,दहेज़ की आड़ में बहुओं को जलती आग ने झोंक देना ,घरेलू हिंसा ,मानसिक तनाव इतना कि कोई आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाए ,इस सब के चलते  समाज के इस कुरूप चेहरे ने बेटियों के माँ बाप के दिलों को हिला कर रख दिया है ,उनकी मानसिकता को ही बदल दिया है,विक्षिप्त   कर दिया है |तभी तो समाज और परिवार के दबाव से दबी,आँखों में आंसू लिए एक माँ अपनी नन्ही सी जान को कभी  कूड़े के ढेर पर तो कभी गंदी नाली में फेंक कर,याँ पैदा होने से पहले ही उसे मौत की नीद सुलाकर सदा के लिए अपनी ही नजर में अपराधिन बना दी  जाती है |ठीक ही तो सोचते है वो लोग '',ना रहे गा बांस और ना बजे गी बासुरी ''उनके विक्षिप्त मन   को क्या अंतर पड़ता है ,अगर लडकों की तुलना में लडकियां कम भी रह जाएँ ,उन्हें तो बस बेटा ही चाहिए ,चाहे वह बड़ा हो कर कुपूत ही निकले ,उनके  बुढापे की लाठी बनना तो दूर ,लेकिन उनकी चिता को अग्नि देने वाला होना चाहिए |जब तक सिर्फ बेटों की इच्छा और  कन्याओं की हत्या करने वाले माँ बाप के विक्षिप्त मानसिकता का सम्पूर्ण बदलाव नहीं होता तब तक बेचारी कन्याओं की इस सामाजिक परिवेश में बलि चढती ही रहे गी |

नारी सशक्तिकरण के लिए कितने ही कानून बने ,जो अपराधियों को उनके किये की सजा देते रहते है,भले ही  आँखों पर पट्टी बंधी होने के कारण कभी कभी  कानून भी उन्हें अनदेखा कर देता है |  समाज की विक्षिप्त  मानसिकता में बदलाव लाना हमारी ज़िम्मेदारी है  ,जागरूकता हमे ही लानी है ,लेकिन कब होगा यह ? हमारे समाज में बेटी जब मायके से विदा हो कर ससुराल में बहू के रूप में कदम रखती है तो उसका एक नया जन्म होता है ,रातों रात  एक चुलबुली ,चंचल लड़की ,ससुराल की एक ज़िम्मेदार बहू बन जाती है ,और वो पूरी निष्ठां से उसे निभाती भी है ,क्यों की बचपन से ही उसे यह बताया जाता है की ससुराल ही उसका असली घर है ,वहीउसका परिवार है ,लेकिन क्या ससुराल वाले उसे बेटी के रूप में अपनाते है ? बेटी तो दूर की बात है ,जब तक वो बेटे की माँ नहीं बनती उसे बहू  का दर्जा भी नहीं मिलता |  अभी हाल ही में हमारे पड़ोसी के बेटे की शादी हुयी ,नयी नवेली दुल्हन की मुख दिखाई में मै भी  उसे आशीर्वाद देने पहुंची ,जैसे ही उसने मेरे पाँव छुए ,मेरे मुख से भी यही निकला ,''पुत्रवती भव '' |

रेखा जोशी 

काम कोध मद लोभ छोड़ बन्दे

न कर प्रेम अभिमान से अगाध
अपने जीवन  को अब ले साध
काम क्रोध मद लोभ छोड़ बन्दे
यह  करवाते  जघन्य   अपराध

रेखा जोशी

Thursday, 9 February 2017

नारी सशक्तिकरण


नारी सशक्तिकरण

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी

सुभद्रा कुमारी चौहान जी की लिखी यह पंक्तियाँ वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को समर्पित है ,आज़ादी की प्रथम लड़ाई में उस मर्दानी ने अंग्रेजो से खिलाफ अपनी वीरता का प्रदर्शन कर पूरी स्त्रीजाति को गौरव प्रदान किया था ,लेकिन ऐसी वीरांगनाएँ तो लाखों में कोई एक ही होती है l इस पुरुष प्रधान समाज में नारी की शक्ति को सदा दबाया गया है ,आज़ादी से पहले की नारी की छवि का ध्यान आते ही एक ऐसी औरत की तस्वीर आँखों के आगे उतर कर आती है जिसके सिर पर साड़ी का पल्लू ,माथे पर एक बड़ी सी बिंदिया ,शांत चेहरा और हमेशा घर के किसी न किसी कार्य में व्यस्त ,कई बार तो सिर का पल्लू इतना बड़ा हो जाता था कि बेचारी अबला नारी का पूरा चेहरा घूँघट में छिप कर रह जाता था ,उसका समय अक्सर घर की दहलीज के अंदर और पुरुष की छत्रछाया में ही सिमट कर रह जाया करता था l अधिकतर परिवारों में बेटा और बेटी में भेद भाव आम बात थी नारी का पढ़ना लिखना तो बहुत की बात थी ,समाज में ऐसी अनेक कुरीतियाँ,बाल विवाह ,दहेज प्रथा ,सती प्रथा आदि पनप रही थी जिसका सीधा प्रभाव नारी को भुगतना पड़ता था ,लेकिन समय के चलते मदनमोहन मालवीय जैसे कई समाजसेवी आगे आये और धीरे धीरे ऐसी कुप्रथाओं को समाप्त करने के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ी और कालान्तर समाज का स्वरूप बदलने लगा l

आज इक्सिवीं सदी की महिलायें घूँघट को पीछे छोड़ते हुए बहुत आगे निकल आई है lआज की नारी घर की दहलीज से बाहर निकल कर शिक्षित हो रही है ,उच्च शिक्षा प्राप्त कर पुरुष के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर सफलता की सीढियां चढ़ती जा रही है l आर्थिक रूप से अब वह पुरुष पर निर्भर नही है बल्कि उसकी सहयोगी बन अपनी गृहस्थी की गाड़ी को सुचारू रूप से चला रही है l बेटा और बेटी में भेद न करते हुए अपने परिवार को न्योजित करना सीख रही है ,लेकिन अभी भी वह समाज में अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघर्षरत है ,दहेज प्रथा ,कन्या भ्रूण हत्या जैसी बुराइयों का उसे सामना करना पड़ रहा है ,भले ही समाज में खुले घूम रहे मनुष्य के रूप में जानवर उसकी प्रगति में रोड़े अटका रहे है ,लेकिन उसके अडिग आत्मविश्वास को कमजोर नही कर पाए l हमारे देश को श्रीमती इंदिरा गांधी ,प्रतिभा पाटिल जी ,कल्पना चावला जैसी भारत की बेटियों पर गर्व है ,ऐसा कौन सा क्षेत्र है जिस में आज की नारी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन न कर पा रही हो | आज नारी बदल रही है और साथ ही समाज का स्वरूप भी बदल रहा है ,वह माँ बेटी ,बहन पत्नी बन कर हर रूप में अपना कर्तव्य बखूबी निभा रही है |

आज की  भारतीय नारी स मेरा अनुरोध है कि वह देश की भावी पीढ़ी में अच्छे संस्कारों को प्रज्ज्वलित करें ,उन्हें सही और गलत का अंतर बताये ,अपने बच्चो में देश भक्ति की भावना को प्रबल करते हुए एक सशक्त समाज का निर्माण करने की ओर एक छोटा सा कदम उठाये ,मुझे विश्वास है नारी शक्ति ऐसा कर सकती है और निश्चित ही एक दिन ऐसा आयेगा जब भारतीय नारी द्वारा आज का उठाया यह छोटा सा कदम हमारे देश को एक दिन बुलंदियों तक ले जायेगा  |

रेखा जोशी

है आस लगाये बैठे हम


किया  इंतज़ार  पिया  बरसों ,नहीं  तुमको अब खोना  है
जीवन  बसन्ती  पीली  सरसों, बीज खुशियों का बोना है
है   आस   लगाये  बैठे  हम ,  फूल   बिछा  तेरी  राह  में
आज नहीं तो कल या परसों, मिलन तो इक दिन होना है
         
रेखा जोशी

Wednesday, 8 February 2017

कवि रामधारी सिहं दिनकर

कहते है "जहाँ न पहुचे रवि , वहाँ पहुंचे कवि "अर्थात कवि की असीम कल्पना शक्ति  सूर्य की किरणों से भी प्रखर होती है ,कवि द्वारा रची गई रचना एक क्रांति को जन्म दे सकती है ,एक आंदोलन पैदा कर सकती है ,जन जन में जोश भर सकती है।ऐसे ही एक जनकवि का जन्म 23 सितम्बर 1908 में बिहार राज्य के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था "नाम था रामधारी सिंह दिनकर"।

दिनकर जी की कविताएं  जोश और ओज से परिपूर्ण है ,भले ही समय बदल गया है लेकिन वह आज भी उतनी प्रासंगिक है जितनी कि वह पहले थी,उनकी कविताएं सामाजिक परिस्थितियों पर लिखी गई है ,उनकी प्रसिद्ध रचनाएं,उर्वशी,कुरुक्षेत्र,रेणुका,,रश्मिरथी,द्वन्दगीत,बापू ,धूप छाँव,मिर्च का मज़ा ,सूरज का ब्याह,आदि है। 1972 में उन्हें उर्वशी के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया ,अपने जीवन काल में उन्होंने अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया । जहां उन्हें राष्ट्रकवि का दर्जा मिला था वहीं वह जनकवि भी थे ,चाहे अनपढ़ हो या पढा लिखा उनकी कविताएं हर किसी को भाति थी। दिनकर जी की  कविताओं की एक खास विशेषता थी ,अनुभूति एवं  अभिव्यक्ति की तीव्रता ।
24 अप्रैल 1974  हमने उस अनमोल रत्न को खो दिया ।
 
उनकी लिखी हुई कुछ पंक्तिया "कुरुक्षेत्र" से

“निभाना पार्थ-वध का चाहता था राधेय प्रण.

द्रुपद था चाहता गुरु द्रोण से निज वैर का शोधन.

शकुनि को चाह थी, कैसे चुकाए ऋण पिता का,

मिला दे किस भांति धूल में किस भांति कुरु-कुल की पताका.

सुयोधन पर न उसका प्रेम था, वह घोर छल था.

हितु बनकर रखना ज्वलित केवल अनल था.

जहाँ भी आग थी जैसी, सुलगती जा रही थी

समर में फूट पड़ने के लिए अकुला रही ठी.

सुधारों से स्वयं भगवान के जो-जो चिढ़े थे,

नृपति वे क्रुद्ध होकर एक डाल में जा मिले थे

नहीं शिशुपाल के वध से मिटा था मान उनका.

दुबककर रहा था धुंधुँआ द्विगुण अभिमान उनका.”

"अगले छंद में उन्होंने  युधिष्ठिर को भी कठघरे में खड़ा कर दिया "

जब युद्ध में फुट पड़ी थी आग,

तो कौन सा पाप नहीं किया तूने?

गुरु के वध के हित झूठ कहा,

सर समाधि में ही काट लिया तूने;

छल से कुरुराज की जांघ तोड़,

नया रण-धर्म चला दिया तूने;

अरे पापी, मुमूर्षु मनुष्य के वक्ष को ,

चीर सहास लहू पिया तूने !

रेखा जोशी

Tuesday, 7 February 2017

जियेंगे मरेंगे हम देश की खातिर


बहुत देखे हमने परिधान विदेशी
है  पहनते  हम  पहनावा स्वदेशी
,
दूर देश समुन्दर पार घूम आये
है  ह्रदय  हमारे समाया स्वदेशी
,
भांति भांति के हमने खाये व्यंजन
भोजन हमें घर का भाया स्वदेशी
,
जियेंगे  मरेंगे हम देश की खातिर
गगन  में तिरंगा लहराया स्वदेशी
,
करें हम सलाम उन वीर जवानों को
है खून  जिन्होंने  बहाया  स्वदेशी

रेखा जोशी

प्रीत का सजन इज़हार है


212 212 212
ज़िन्दगी से हमें प्यार है
प्यार से आज इकरार है
पास हैं जो हमारे पिया 
प्रीत का सजन इज़हार है

महालक्ष्मी 'मापनीयुक्त वर्णिक छंद
212 212 212

साथ तेरा मिला जो पिया
आज लागे नहीं  है जिया
पास  आओ  हमारे अभी
काश आ के न जाओ कभी
....
देख के रूप तेरा पिया
चाँद भी आज शर्मा गया
रात को रौशनी है मिली
मीत मै  संग तेरे चली
....
है ख़ुशी आज गाते  रहें
ज़िन्दगी जाम पीते रहें
प्रीत को  तोड़ जाना नही
छोड़ना साथ आता नही

रेखा जोशी

Monday, 6 February 2017

गर्मी के मौसम में घर की सजावट

आजकल मौसम बदल रहा है ,जाड़ा जाने को है और होली आने को है,जैसे जैसे मौसम बदलता है वैसे ही हमारा मूड भी बदलता है  ।ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो रहा है गर्मी के मौसम में घर की सजावट के लिए कुछ टिप्स

1 इस मौसम में हल्के रंग आँखों को ठंडक देते है ,अपने घर की दीवारों पर सफेद या हल्के रंग का पेंट करवाना चाहिए । हल्के रंगों से घर में रौशनी फैलती है और घर का माहौल भी खुशनुमा रहता है।

2 अपने घर को अनावश्यक सामान से मत भरिये , केवल आवश्यक वस्तुएँ ही रखे,ऐसा करने  से घर में खुलापन रहता है।

3अपने घर के विभिन्न कमरों के लिए फर्नीचर खरीदते समय इस बात का ध्यान रखें कि फर्नीचर कमरे के हिसाब से बड़ा न हो ।

4 अपने घर के कमरों के खिड़की दरवाजों के पर्दों के लिए भी हल्के और दीवारों के पेंट से कंट्रास्ट रंग कमरे की सजावट में निखार लाते हैं।

5  अपने घर में लाइट्स का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए।

6अपने घर के कमरों के कोनो की सजावट का भी ध्यान रखना चाहिए जैसे कि घर के ड्राईंग रूम के कोने में कोई आकर्षक डेकोरेटिव पौधा या कोई आर्टिफिशियल पौधा भी  ड्राईंग रूम की सजावट में चार चाँद लगा सकता है ।

सजावट के साथ साथ सबसे महत्वपूर्ण है घर की सफाई ,साफ़ सुथरा घर  देखने में सुंदर  लगता है और शांति भी प्रदान करता है

रेखा जोशी

Saturday, 4 February 2017

मुक्तक

उड़ायें गे पतंग लिये हाथ में डोर
मुस्कुराया बसन्त गली गली में शोर
उड़ें गी उमंगे  छू लेंगी आसमान 
लहरायें गगन में चले न कोई ज़ोर
,
गुलाबों  का  मौसम आया बगिया में बहार 
है  कुहकती कोयलिया  अब अंबुआ की डार 
हर्षौल्लास  से  थिरकते झूम रहे आज सब 
है  मदमस्त चल रही यहाँ फागुन की बयार 

रेखा जोशी 

चक दे इंडिया

एकांकी

""चक दे इंडिया",
कलाकार
सूत्रधार(पहला,दूसरा)
लक्ष्मी (पत्नी)
रमेश(पति)
दादी
गुड्डी
लाडू

दो व्यक्तियों का प्रवेश
पहला ,आज हम आपको सुनाते हैं
दूसरा ,एक नारी की कहानी
पहला,समाज की बेड़ियों को तोड़ कर आज की नारी
दूसरा ,पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर
पहला ,जीवन के संघर्ष की रणभूमि में उतर आई है
दूसरा,आज वह डॉक्टर है,वकील है,जज है,प्रिंसिपल है,टीचर है
पहला,और वह नेता भी है
दूसरा ,आज 21वीं सदी में भी हमें यह कहना पड़ रहा है
पहला,नारी तेरी  यही कहानी
दूसरा,आँचल में ममता आँखों में पानी

एक औरत का प्रवेश ,गोद में बच्ची,आँखों मेआँसू

पहला ,क्या हुआ बहन?तुम रो क्यों रही हो?
दूसरा,अरे अरे अरे ,तुम्हारी बच्ची तो बहुत सुंदर है,इसके पैदा होने पर आँसू मत बहाओ
औरत( लक्ष्मी) ,आप ही बताओ आँसू न बहाऊँ तो क्या करूँ,इसकी किस्मत भी तो मेरे जैसी ही होगी
पहला ,नारी की दुर्दशा की तो अनेक कहानियाँ है
दूसरा, कभी उसे कोख में ही तो कभी पैदा होते ही मार दिया जाता है
पहला ,कहीं  पर उसकी आबरू लूटी जाती है  और कहीं उसे ज़िंदा जला दिया जाता है
दूसरा ,इस तरह दिन महीने साल गुज़रते रहे और लक्ष्मी तिल तिल करके मरती रही
लक्ष्मी के पति रमेश का प्रवेश(शराब के नशे में चूर)
रमेश,,अरे लक्ष्मी कहाँ हो, बहरी  हो गई हो क्या,सुनाई नही देता ,जल्दी खाना लाओ बहुत जोरों की भूख लगी है
(झूमता हुआ गाता है,मै शराबी नही,मै शराबी नही....) लक्ष्मी का प्रवेश
(गोद में बेटा लाडू और बिटिया गुड्डी का हाथ थाम हुये
लक्ष्मी ,सारी तनखाह तो शराब में उड़ा देते हो ,कैसे जलेगा घर का चूल्हा
रमेश,खबरदार जो शराब के बारे में कुछ बोला
पहला ,यही तो है कहानी
दूसरा शराबी पति
पहला ,घर में गरीबी
दूसरा, खाने के लाले,सुनने को ताने
पहला,और औरत बेबस लाचार ,अपने टूटे हुए घर को सँवारती रही

गुड्डी को लाडू मारता है आवर उसकी किताबें फाड़ देता है
गुड्डी(रोती हुई),माँ माँ देखो लाडू ने मेरी किताबें फाड़ दी है
लाडू (नाचता हुआ) फाडूं गा, फाडूं गा ,ले यह ले ,(किताबें फाड़ताहै)
लक्ष्मी (गुस्से में)ठहर जा ,उसे थप्पड़ दिखारी है
(लाडू भाग कर दादी की गोद में छुप जाता है )
दादी,(पुचकारते हुए) क्या हुआ मेरे राजा बेटे क़ो किसने मारा
(लक्ष्मी को डांटते हुए) भगवान का शुक्र मना जोतुझे बेटे का सुख मिला है
खबरदार जो उसे कुछ कहा (लाडू के सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए)
गुड्डी से,तू टुकर टुकर क्या देख रही है,जा रसोई से भाई के लिए मलाई वाला ढूध ले कर आ,देख तो कितना कमजोर हो गया है
(लाडू गुड्डी को जीभ निकाल कर चिढाता है)
पहला,बीता बचपन ,आई जवानी
दूसरा ,है  घर घर में गुड्डी की कहानी
पहला,पर कुछ कर दिखाने की
दूसरा,थी गुड्डी ने ठानी
पहला,रंग लाई गुड्डी की मेहनत
दूसरा ,सभी बाधाएं झेलती हुई गुड्डी आगे बढ़ती गई और एक दिन वह डाक्टर बन गई
लाडू काप्रवेश
लाडू (ज़ोर से)माँ ,माँ (वह नीचे गिर जाता है और बेहोश हो जाता है,लक्ष्मी दौड़ कर उसे पकड़ती है)
लक्ष्मी (घबराते हुए) गुड्डी देख तो ज़रा इसे क्या हो गया
गुड्डी(जांचते हुए) माँ  यह तो नशे में है ,शराब का नही ययः तो ड्रग्स ले रहा है,शराब से भी ज्यादा खतरनाक
(लक्ष्मी के पति रमेश का प्रवेश)
रमेश,क्या हुआ मेरे लाडले को
गुड्डी,फुर्सत मिल गई बापू,कहाँ थे तुम जब यह आवारागर्दी करता था,कस के दो थप्पड़ लगाये होते तो आज  यह सब नही होता
(रोते हुए दादी का प्रवेश) अरे किसकी नज़र लग गई मेरे लाडू को
गुड्डी ,माँ बापू और दादी ,हमे इसका इलाज करवाना होगा,तभी इसे नशे की लत से छुटकारा मिलेगा
मैने फैसला किया है कि में इसी गाँव में अपना अस्पताल खोलूंगी,मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि में अपने गांववासियों की सेवा कर सकूं,
दादी,हाँ बेटी तू ठीक कह रही है ,तूने हमरी आँखें खोल दी है
रमेश ,मुझे अपनी बेटी पर गर्व है,में भारत की सभी बेटियों कोगुड्डी की तरह बनने की राय देता हूँ,तभी तो हम शान से कह सकेंगे
"चक दे इंडिया"
सभीगाते हैं "चक दे  चक दे इंडिया""