Saturday, 10 February 2018

महकती यादें

महकती यादें

माँ के घर के आगे रिक्शा रुक गई, रिक्शा से उतरते ही मीनू दरवाज़े की और मुड़ी लेकिन उसके कदम वहीं रुक गए और आँखे भीग गई, वही उसकी माँ का घर जहां कभी उसका अपना बचपन बीता था सामने था, दरवाज़ा खोल मीनू ने भीतर पांव रखा, "अरे तुम आ गई, क्या बात हो गई, गाड़ी लेट हो गई थी क्या" माँ की आवाज़ उसके कानों में गूँज रही थी, "कब से तेरा इंतज़ार  कर रही थी, अच्छा चल हाथ मुँह धो ले, तेरे पापा भी तेरा इंतज़ार कर रहे हैं, तू उनके पास बैठ, मै अभी खाना परोसती हूँ l"

अपने ही ख्यालों में गुम मीनू चौंक उठी, घर के भीतर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी, सूना आंगन उसके मन को कचोट रहा था, मिट्टी के मटके तो कब के फूट चुके थे, लेकिन दरवाज़े की बगल में लगी मोतीये की बेल की महक माँ पापा की यादों की तरह अभी भी बरकरार थी l

रेखा जोशी