Saturday, 3 February 2018

मुक्तक

1 मुक्तक

 खिले खिले  रंगों ने महकाया उपवन
नन्ही ओस की बूँदों से नहाया उपवन
हरे  भरे पत्तों  पे चमक  रही हरियाली
हर्षाया मन और बहुत लुभाया उपवन

2 मुक्तक

बहती  तरंगिनी  के संग  संग  हम सभी बहे
समय  की  बहती  धारा  हमें सत्य यही कहे
पल पल बदल रही धरा बदलता रहता गगन
बदले नहीं जो समय  के साथ  वो  वहीं  रहे

रेखा जोशी