Monday, 12 February 2018

मुक्तक


रोशन करता सदियों से धरा को प्रभाकर
सात घोड़ों का रथ ले हुआ उदय दिवाकर
नीले  गगन  पर  बिखेरता स्‍वर्णिम आभा
हर्षित उड़े  पंछी  नभ नमन तुम्हें भास्कर
,

बीज  आलस के बोता नहीं है
अस्त वसुधा पर  होता नहीं है
रोशन  है  सारी  दुनिया उससे
सूरज  कभी  भी सोता नहीं है

रेखा जोशी

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