Friday, 7 December 2018

जूही बेला मोंगरा की कली


जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती
संवारती घर पिया का
गाती गुनगुनाती
.
पीर न उसकी
जाने कोई
दर्द सबका अपनाती
खुद भूखी रह कर भी
माँ का फ़र्ज़ निभाती
जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती
.
कोई उसको समझे न पर
रोती लुटती बीच बाजार
रौंदी मसली जाती
गंदी नाली में दी जाती फेंक
चाहेकितना करे चीत्कार
तड़पाता उसे ज़ालिम सँसार
खरीदी बेचीं जाती
जूही बेला मोंगरा की कली
झूठी मुस्कान होंठो पर लिये
आखिर मुरझा जाती

जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती

रेखा जोशी..