Friday, 22 March 2013

अंदाज़ अपना अपना

यादों के पिटारे में झांक के देखा तो मानस पटल पर कुछ वर्ष पहले की तस्वीरें उभरने लगी | मौसम करवट बदल रहा था ,सुहावनी सुबह थी और हल्की ठंडी हवा तन मन को गुदगुदा रही थी | गरमागर्म चाय की चुस्कियों के साथ हाथ में अखबार लिए मै उसे  बरामदे में बैठ कर पढने लगी | मौसम इतना बढ़िया था कि वहां से उठने का मन ही नहीं हो रहा था ,घडी पर नज़र डाली तो चौंक पड़ी ,आठ बज चुके थे ,''अरे बाबा नौ बजे तो मेरा पीरियड है ''मन ही मन बुदबुदाई ''|जल्दी से उठी और कालेज जाने कि तैयारी में जुट गई | प्रध्यापिका होने के नाते हमे कालेज पहुंच कर सब से पहले प्रिंसिपल आफिस में हाजिरी लगानी पडती थी ,जैसे ही मै वहां पहुंची तो प्रिंसिपल के आफिस के बाहर काला बुरका पहने एक महिला खड़ी थी | एक सरसरी सी नजर उस पर डाल मै आफिस के भीतर जाने लगी ,तभी उसने पीछे से मेरे कन्धे को थपथपाया | मैने मुड कर उसकी ओर देखा ,उसने अपना सिर्फ एक हाथ जिसमे एक पुराना सा कागज़ का टुकड़ा था मेरी ओर बढाया,मैने उससे वह कागज़ पकड़ा ,उसमे टूटी फूटी हिंदी में लिखा हुआ था ,''मै  बहुत ही गरीब हूँ ,मुझे पति ने घर से निकल दिया है ,मेरी मदद करो '' मैने वह कागज़ का टुकड़ा उसे लौटाते हुए उसे उपर से नीचे तक देखा ,वह ,पूरी की पूरी काले लबादे में ढकी हुई थी ,उसके पैरों में टूटी हुई चप्पल थी ,जिस हाथ में कागज़ था ,उसी हाथ की कलाई में हरी कांच की चूड़िया झाँक रही थी |मै उसे बाहर कुर्सी पर बिठा कर ,आफिस के अंदर चली आई| आफिस के अंदर लगभग सभी स्टाफ मेमबर्ज़ मौजूद थे | वहां खूब जोर शोर से चर्चा चल रही थी ,विषय था वही पर्दानशीं औरत ,हर कोई अपने अपने अंदाज़ में उसकी समीक्षा कर रहा था | किसी की नजर में वह असहाय थी ,किसी की नजर में शातिर ठग,कोई उसे कालेज से बाहर निकालने की बात कर रहा था तो कोई उसकी मदद करने की राय दे रहा था | अंत में फैसला हो गया ,उसे स्टाफ रूम में ले जाया गया और उसके लिए चाय नाश्ता मंगवाया गया ,पता नहीं बेचारी कितने दिनों की भूखी हो ,सभी स्टाफ मेमबर्ज़ से बीस बीस रूपये इकट्ठे किये गए और उन्हें एक लिफ़ाफ़े में डाल उसके हाथ में थमा दिया गया |तभी एक प्रध्यापिका ने उनके चेहरे से  पर्दे को उठा दिया ,यह कहते हुए ,''हम लेडीज़ के सामने यह पर्दा कैसा ''| उनका चेहरा देखते ही सब अवाक रह गये ,''अरे यह तो डा: मसेज़ शुक्ला है |पूरे स्टाफ की नजरें उनके चेहरे पर थी ,उनकी आँखों में थी  शरारत और होंठो पर हसीं,''हैपी अप्रैल फूल ,कहो कैसा रहा मेरा तुम सबको फूल बनाने का अंदाज़ | उन्होंने बुरका उतार कर एक ओर रख कर दिया और वो   खिलखिला के हंस पड़ी और उनके साथ साथ हम सब भी खिसियाए हुए हंसने लगे | डा मिसेज़ शुक्ला हमारी सहयोगी और अंग्रेजी विभाग की एक सीनियर प्रध्यापिका थी | उन्होंने उसी लिफ़ाफ़े में से बीस बीस के कई नोट निकाले और कंटीन में चाय पकौड़ों की पार्टी के आयोजन के लिए फोन कर दिया| वो सारा दिन हमने खूब मौज -मस्ती में गुज़ारा ,गीत संगीत के साथ गर्मागर्म चाय और पकौड़ों ने हम सब को अप्रैल फूल बना कर के भी आनंदित किया |डा मिसेज़ शुक्ला भले ही कुछ वर्ष पूर्व रिटायर हो चुकी है लेकिन उनका पूरे स्टाफ को ,''फूल'' बनाना हम सब को हमेशा याद रहे गा खासतौर पर अप्रैल की पहली तारीख को |   

होली


दिलों में प्यार लिए आज आई होली
मस्ती चहुं और आज लायी होली
रंगों में उमंग औ उमंगो में है रंग
लाल,गुलाल ,नीले ,पीले रंगों से रंगे
लुभा रहें है सब आज हो के बदरंग
बगिया सूनी बिन फूलों के जैसे
अधूरी है होली बिन गाली के वैसे
प्यार भरी गाली से हुआ वो कमाल
हुए गाल गोरी के लाल बिन गुलाल
गुलाबों का मौसम है बगिया बहार पे
कुहक रही कोयलिया ,अंबुआ की डाल पे
थिरक रहें आज सब हर्षौल्लास में
झूम रहें सब आज फागुन की बयार में  

Tuesday, 19 March 2013

इक कसक


बीत गए थे
प्यार भरे वो दिन
बेताब दिल
...................
सिंधूरी रात
हसीन सपनों की
इक कसक
.................
घड़ी दो घड़ी
साथ तुम्हारा चाहा
हूँ बेकरार
...............
तलाश रहा
वो चाहत अपनी
राहें पुरानी
................
इस दिल में
बसेरा तुम्हारा है
तुम ही तुम





डूबता सूरज ढलती शाम


गोवा का डोना पोला टूरिस्ट स्थल ,चारों ओर मौज मस्ती का आलम और टूरिस्ट सेनानियों का जमघट ,ऐसा लग रहा था मानो पूरी दुनियां यहाँ इकट्ठी हो गई हो \सबको इंतजार था सूरज के डूबने का ,बेहद आकर्षक नजारा था \अपने चारों ओर लालिमा लिए सूरज धीरे धीरे क्षतिज की ओर बढ रहा था और सबकी आखें दूर आकाश पर टिकी हुई थी \समुद्र इस रंगीन स्थल को अपने में लपेट कर लहरों की धुन पर ठंडी हवा के तेज़ झोंकों से सबके दिलों को झूले सा हिला रहा था \कई देसी, विदेशी सेनानी ओर भीड़ में कई नवविवाहित जोड़े रंग बिरंगी ड्रेसिज़ और सिर पर अजीबोगरीब हैट पहने ,हाथों में हाथ लिए रोमांस कर रहे थे \कुछ मनचले युवक टोली बना कर घूम रहे थे और कई दम्पति अपने बच्चों सहित छुट्टियाँ मना रहे थे \ आकाश में सूरज तेज़ी से धरती के दूसरे छोर जहाँ दूर दूर तक पानी ही पानी दिखाई दे रहा था छूने को बेताब हो रहा था ,उसकी लालिमा समुद्र में बिखरने लगीं थी और धीरे धीरे लाल होता समुद्र सूरज को अपने आगोश में लेने को बैचेन हो रहा था\ अब कई लोग हाथों में कैमरे लिए उस अद्धभुत नजारे को कैद करने जा रहे थे\ तभी मेरी नजर दूर बेंच पर पड़ी ,एक बुजुर्ग जोड़े पर पड़ी जो आसमान की ओर टकटकी लगाये उस डूबते सूरज को देख रहा था ,उनके चेहरे पर खिंची अनेकों रेखाए जीवन में उनके अनगिनत संघषों को दर्शा रही थी,तभी वह दोनों धीरे से बेंच से उठे ,एक दूसरे का हाथ थामा और धीमी चाल से रेलिंग की ओर बढने लगे \हिलोरें मारती हुई समुद्र की विशाल लहरों का शोर उस ढलती शाम की शांति को भंग कर रहीं था\ लाल सूरज ने समुद्र के पानी की सतह को लगभग छू लिया था ,ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे एक विशालकाय आग का गोला पानी के उपर पड़ा हो \ भीड़ में से अनेकों हाथ कैमरा लिए उपर उठ चुके और अनेकों फलैश की रोशनियाँ इधर उधर से चमकने लगी,परन्तु मेरी नजरें उसी बुज़ुर्ग दम्पति पर टिकी हुई थी \ अचानक उस बुज़ुर्ग महिला ने अपना संतुलन खो दिया और वह गिरने को हुई ,जब तक कोई उन्हें संभालता उनके पति कि बूढी बाँहों ने उन्हें थाम लिया \उन दोनों ने आँखों ही आँखों में इक दूसरे को देखा और उनके चेहरे हलकी सी मुस्कराहट के साथ खिल गए \तभीमै वहां पहुंच चुकी थी ,”’आंटी ,आप ठीक तो हैं ,” अचानक ही मै बोल पड़ी\ लेकिन उतर दिया उनके पति ने ,”बेटा पचपन साल का साथ है ,ऐसे कैसे गिरने देता”\मैंने अपना कैमरा उनकी ओर करते हुए पूछा ,”एक फोटो प्लीज़ और उनको डूबते सूरज के साथ अपने कैमरे में कैद कर लिया\सूरज अब जल समाधि ले चुका था \भीड़ भी अब तितर बितर होने लगी थी, लालिमा कि जगह कालिमा ने लेना शुरू कर दिया ,सुमुद्र की लहरें चट्टानों से टकरा कर शोर मचाती वापिस समुद्र में लीन हो रही थी परन्तु मेरी निगाहें उसी दम्पति का पीछा कर रही थी ,हाथों में हाथ लिए वह दोनों दूर बाहर की ओर धीरे धीरे चल रहे थे \जिंदगी की ढलती शाम में उनका प्यार सागर से भी गहरा था \ परछाइयां लम्बी होती जा रही थी और मै उसी रेलिंग पर खड़ी सुमुद्र की आती जाती लहरों को निहार रही थी ,मन व्याकुल सा हो रहा था ,कल फिर सूरज उदय होगा ,शाम ढलते ही डूब जाये गा परन्तु पचपन साल का प्यार और साथ, उनकी ढलती जिंदगी की शाम का एक मात्र सहारा |

Saturday, 16 March 2013

आये जो तुम संग आई बहारें


पल पल हम तुमको है निहारें
आये जो  तुम संग आई बहारें
..........................................
महकती चांदनी ने चूमा आंगन
बहने लगी सुहानी शीतल पवन
सुरमई शाम का स्नेहिल स्पर्श
थिरकने लगा ये मन भर उमंग
...........................................
पल दो पल जो तुम हमसे मिले
वीरान राहों में गुलाब खिल गए
बिखर गई महक  इन हवाओं में
गुनगुनाने लगी बहारें सब ओर
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बजने लगी शहनाई मन में मेरे
नाच उठा झंकृत मेरा तन बदन
लब पर आ गए तराने प्यार भरे
गाने लगी फिजायें संग संग मेरे
..........................................
पल पल हम तुमको है निहारें
आये जो  तुम संग आई बहारें


Thursday, 14 March 2013

तार तार हुआ माँ का आंचल


इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा ,नई दिल्ली , यात्रियों की भीड़  अमरीका जाने वाले यात्री गण सिक्योरिटी चेकिंग पर खड़े अपनी बारी आने का इंतज़ार कर रहे थे| उन यात्रियों की  भीड़ में एक बूढी महिला अपना  घर बाहर सब कुछ  बेच कर हिन्दुस्तान से सदा के लिए अपने लाडले बेटो के साथ अमरीका जा रही थी |उसके दोनों बेटों ने अपनी बूढी माँ को वेटिंग हाल की एक सीट पर बिठा दिया और अपना सामान ले कर सिक्योरिटी चेकिंग के लिए चले गए |बूढी अम्मा ,आँखों में हजारों सपने लिए अपने परिवार के साथ रहने जा रही थी ,अपने वाहे गुरु का धन्यवाद कर रही थी ,जो उसने उसे इतने अच्छे आज्ञाकारी पुत्र दिए ,बहुये दी ,पोते पोतियाँ दी ,भरा पूरा परिवार है उसका अमरीका में ,वहां उसका बुढापा अब चैन से कटे गा |यह बुढ़ापा भी कितना बेबस और लाचार कर देता है इंसान को ,एक एक करके शरीर का हर अंग शिथिल पड़ने लगता है ,आँखें धुंधला जाती है ,दांत कब का साथ छोड़ चुके होते है , कमर जिंदगी का बोझ ढोते ढोते  झुक जाती है ,घुटने  बेबस और टाँगे आगे चलने से इनकार करने लगती है ,ऐसे में अकेले जिन्दगी काटना नामुमकिन सा हो जाता है और वो भी पति के गुजर जाने के बाद | उसने अपने बैग से  जपजी साहब की छोटी सी पुस्तिका निकाली और उस वाहेगुरु का जप करने लगी ,कब बैठे बैठे उसकी आँख लग गयी ,उसे पता ही नहीं चला |''अम्मा उठो ,कहाँ जाना है आपको ?,''आंखे खोलते ही  अम्मा ने एक अजनबी को अपने सामने खड़े पाया |''बेटा ,मुझे तो अमरीका  वाले जहाज में  जाना है ,मेरे बेटे बस आते ही होंगे''|''किस फलाईट की बात कर रही हो अम्मा ,अमरीका जाने वाला जहाज तो  कल रात को ही चला गया और अब तो सुबह हो गई है ''|''नहीं नहीं बेटा तुम्हे कोई गलतफहमी हुई है ,मेरे हरदयाल और मुखतयार बस आते ही होंगे ''|यह कहते ही अम्मा ने अपना बैग उठाया और चलने को तैयार हो गई |वह अजनबी अवाक खड़ा उस बुढ़िया को देख रहा था ,एयर इण्डिया का वो कर्मचारी समझ चुका था कि इस लाचार अम्मा के नालायक बेटे इसे यहीं छोड़ अमरीका जा चुके है |अम्मा से उसका बैग पकड़ते हुए ,उसे अपने साथ चलने को कहा,''अम्मा तुम कहाँ रहती हो ,चलो मै आपको आपके घर छोड़ आता हूँ ''|अम्मा थोड़ी ऊँची आवाज़ में बोली ,''तुम यह क्या अनाप शनाप  बोले जा रहे हो ,कितनी बार कहा है कि मुझे अमरीका ही जाना है ,मैने अपना दिल्ली वाला मकान  बेच कर सारे रूपये अपने बेटों को दे दिए है और अब मुझे उनके साथ अमरीका में ही रहना है ''|एयर इण्डिया का वो कर्मचारी उस भोली माँ को उसके कपूतों कि काली करतूत बताने में अपने आप को असमर्थ पा रहा था ,उस बुढ़िया का रुपया पैसा ,घर सब कुछ छीन कर उसके कपूत उसे अकेला बेसहारा भगवान भरोसे छोड़ कर दूर चले गए ,जीते जी अपनी माँ को मार दिया उन्होंने , आज उस ममतामयी माँ का आंचल तार तार हो चुका था ,वही आंचल जिसकी छाँव में उन कपूतों का बचपन बीता था ,वह आंचल जिससे उन्हें जिंदगी मिली थी| बड़ी मुश्किल से उस कर्मचारी ने अम्मा को उस  कड़वी सच्चाई से अवगत कराया,तो मानो उसके पाँव तले धरती खिसक गई  चलते चलते लड़खड़ा गए उस बुढ़िया के पाँव ,वज्रपात हुआ उस माँ के ममतामयी सींने पर ,इतना बड़ा धोखा ,वो भी अपने पेट जाए बच्चों से ,धम से वह वहीं  बैठ गई आक्रोश और गुस्से से उसके भीतर का ज्वालामुखी फूट पड़ा  और वह जोर जोर से विलाप करने लगी ,''ओये हरद्याले ,ओये मुख्त्यारे ,की कीता तुसां ,मैनू ,अपनी माँ नू इ लुट लया,मै एथे किवें रवां गी .किथे रवां गी ,''बोलते बोलते अचानक वह चुप हो  गई ,उसके आस पास भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी |उसने अपने आप को सम्भाला और खड़ी हो कर उस एयर इण्डिया के कर्मचारी की तरफ असहाय नजरों से देखा और वह उसे भीड़ से निकाल बाहर ले आया और पूछा ,''अम्मा अब कहाँ जाओ गी ''?कुछ भी सूझ नही रहा था उसे ,उसके अंदर के ज्वालामुखी का लावा , उसकी आँखों से लगातार अश्रुधारा के रूप में बहता ही जा रहा था |उस कर्मचारी ने मानवता के नाते उसे पानी पिला कर एक कमरे में बिठा दिया |रोते रोते बूढी अम्मा ने बोलना शुरू किया ,''मै,गीले में सोती थी ,इन्हें सूखे में डालकर ,इन्हें अमरीका भेजने के लिए मैने अपने सारे गहने भी बेच दिए ,इन निक्ख्तो की खातिर सबसे लड़ पडती थी मै ,इनके दार जी से भी ,अच्छा हुआ वो यह सब देखने से पहले ही इस दुनिया से चले गए ,उसके आंसू थमने का नाम ही नही ले रहे थे|लम्बी चुप्पी के बाद वह बोली ,''बेटा फगवाड़े में मेरे दूर के रिश्तेदार रहते है ,तुम्हारा भला होगा तुम मुझे वहां छोड़ आओ ,जैसे तैसे होगा अपना पेट तो भर ही लुंगी |वह एयर इण्डिया का कर्मचारी उसे ले कर फगवाड़े जाने की तैयारी में जुट गया  और बूढ़ी अम्मा ने अपने तार तार हुए आंचल से अपने आंसू पोंछ लिए ,लेकिन उसका  ममतामयी मन अंदर ही अंदर  जल रहा था ,सुलग रहा था ,काश उसके बेटों ने उसकी ममता का यूँ गला न घोटा होता |काश वह उसे अपने साथ अमरीका  ले जाते |वह एयर इण्डिया का कर्मचारी अम्मा को फगवाडे छोड़ कर आ गया था| उसके बाद पता नही ,वह वहां कैसे रही ,किसके पास रही ,शायद अब वह इस दुनियां में है भी याँ नही |

कपूतों की माताओं के दिल की आवाज़ :
यूं सुलगता है दिल ,जैसे सुलगती चिता ,
सब खत्म होने के बाद फिर धुंआ क्यों?
अंगारे तो सब जल कर राख हुए ,
फिर यह धधकती ज्वाला क्यों ?







Wednesday, 13 March 2013

कब तक अग्नि परीक्षा दोगी सीता मैया ?


वो रो रही थी ,चिल्ला रही थी लेकिन उन वहशी दरिंदों के चुंगल से निकलना उसके लिए असंभव था ,वह छ पुरुष थे और वह अकेली लड़की ,वो बलशाली और वह निर्बल अबला नारी ,सिर्फ शारीरिक रूप से अबला लेकिन मन शक्तिशाली ,वह उनके बाल नोच रही थी ,उन भेड़ियों को अपने दांतों से काट रही थी परन्तु उन जंगलियों से अपने तन को बचाने में वह नाकायाब रही ,बुरी तरह से घायल उस लड़की को उसके जख्मी पुरुष मित्र सहित उन भेड़ियों  ने उन्हें  चलती बस से बाहर फेंक दिया था,दामिनी के साथ घटी इस अमानवीय घटना से पूरे देश में आक्रोश की लहर दौड़ उठी ,नारी की सुरक्षा को लेकर हर कोई चिंतित हो उठा ,बलात्कार हो याँ यौन शोषण इससे पीड़ित न जाने कितनी युवतियां आये दिन आत्महत्या कर लेती है और मालूम नही कितनी महिलायें अपने तन ,मन और आत्मा की पीड़ा को अपने अंदर समेटे सारी जिंदगी अपमानित सी  घुट घुट कर काट लेती है क्या सिर्फ इसलिए कि ईश्वर ने उसे पुरुष से कम शारीरिक बल प्रदान किया है |यह तो जंगल राज हो गया जिसकी लाठी उसकी भैंस ,जो अधिक बलशाली है  वह निर्बल को तंग कर सकता है यातनाएं दे सकता है ,धिक्कार है ऐसी मानसिकता लिए हुए पुरुषों पर ,धिक्कार है ऐसे समाज पर जहां मनुष्य नही जंगली जानवर रहतें है |जब भी कोई बच्चा चाहे लड़की हो याँ लड़का इस धरती पर जन्म लेता है तब उनकी  माँ को उन्हें जन्म देते समय एक सी पीड़ा होती है ,लेकिन ईश्वर ने जहां औरत को माँ बनने का अधिकार दिया है वहीं पुरुष को शारीरिक बल प्रदान किया ,हम सब इस बात  को स्वीकारते हैं कि महिला और पुरुष इस समाज के समान रूप से जरूरी अंग हैं परन्तु  हमे यह भी स्वीकारना पड़ेगा चाहे नर हो याँ नारी दोनों का अपना भी स्वतंत्र अस्तित्व है और उन्हें अपने अधिकारों, स्वतंत्रता और समानता या फिर अपनी सुरक्षा के लिए मांग करना किसी भी प्रकार से अनुचित नही है क्योंकि सच तो यही है ,महिला-पुरुष दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं कम या अधिक नहीं। अब समय आ गया है सदियों से चली आ रही मानसिकता को बदलने का,  नारी को शोषण से मुक्त कर उसे पूरा सम्मान और समानता का अधिकार  दिलाने का ,ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहां नारी पुरुष से पीछे रही हो एक अच्छी गृहिणी का कर्तव्य निभाते हुए वह पुरुष के समान आज दुनिया के हर क्षेत्र में ऊँचाइयों को छू रही है ,क्या वह पुरुष के समान सम्मान की  हकदार नही है ?तब क्यूँ उसे समाज में दूसरा दर्जा दिया जाता है ?केवल इसलिए कि पुरुष अपने  शरीरिक बल के कारण बलशाली हो गया और नारी निर्बल | अगर नारी अपनी  सुरक्षा की मांग कर रही है तो सबसे पहले यह सोचना चाहिए ''सुरक्षा किससे मिलनी चाहिए ?''सुरक्षा हमारे समाज के उन  जंगली भेड़ियों से मिलनी चाहिए जो दिखते तो मनुष्य जैसे है लेकिन अंदर से विक्षिप्त मानसिकता लिए हुए जंगली जानवर है जो मौका मिलते ही नारी को नोच खाने के लिए टूट पड़ते है |जब भी कोई जगली जानवर पागल हो जाता है तो उसे गोली मार दी जाती है ताकि वह कभी भी किसी को कोई  नुक्सान न पहुंचा  सके,लेकिन हमारे देश में  तो यहाँ वहां ऐसे जानवर सरेआम घूमते हुए मिल जाएँ गे, न जाने  कब और किस नारी को दबोच लें , चाहे वह दो तीन साल की अबोध बालिका हो याँ फिर सत्तर साल की माँ समान नारी हो  | इतिहास साक्षी  है कि इस देश की धरती पर लक्ष्मीबाई जैसी कई वीरांगनाओं ने जन्म लिया है ,वक्त आने पर जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति भी दी है और जीजाबाई जैसी कई माताएं भी हुई है जिन्होंने कई जाबाजों को जन्म दे कर देश पर मर मिटने की शिक्षा भी दी है ,नारी  की सुरक्षा ही एक स्वस्थ समाज  और मजबूत राष्ट्र का निर्माण कर सकती है ,जब भी कोई बच्चा जन्म लेता है तो वह माँ ही है जो उसका प्रथम गुरु बनती है ,अगर माँ ही असुरक्षित होगी तो हमारी आने वाली पीढियां भी सदा असुरक्षा के घेरे में रहें गी और राष्ट्र का तो भगवान् ही मालिक होगा | |बहुत ही दुःख होता है ऐसे पुरुषों की सोच पर जो यह समझते हैं कि महिलाएं शोषित, कमजोर और लाचार हैं तभी तो वह आन्दोलन कर अपनी सुरक्षा की मांग कर रही है | |शर्म आती है मुझे जब आज भी नारी को ही कठघड़े में खड़ा कर उसकी अग्निपरीक्षा ली जाती है और बलात्कारी सलाखों के पीछे कैद न हो कर खुलेआम सडकों पर घूमता है |अपने तन मन और आत्मा से घायल पीड़ित नारी को इन्साफ मिलना तो दूर उसके अपने सगे सम्बंधी,यहाँ तक कि उसके अपने  माँ बाप तक उसे अपनाने से इनकार कर देते है और वह जाए तो कहाँ जाए |समाज दुवारा पीड़ित ,अपमानित ,बेबस नारी अपनी आँखों में आंसू भर कर ईश्वर से प्रार्थना ही कर सकती  है ,''काश यह धरती फट जाए और मै उसमे समा जाऊं |''  अपनों दुवारा ठुकराए जाने पर वह और कर भी क्या सकती है ,मै समाज से आज पूछती हूँ कि नारी को कब तक ,आखिर कब तक सीता मैया की तरह अग्निपरीक्षा दे कर अपने आपको सदा प्रमाणित करते रहना होगा ? बस बहुत सह लिया ,और नही ,अब और नही ,नारियों को जागना होगा ,हमारी सरकार और समाज को महिलाओं के प्रति सम्मान ,पुरुष के साथ समानता और सुरक्षा का अधिकार तो देना ही होगा |