Friday, 30 August 2013

मंजिल

छोड़ के अपने इस आलस को अब जिंदगी में कुछ काम किया करते है 
पहुंचना  है  हमे  उस  मुकाम  पर  जिसकी  सदा चाह  किया  करते है  
अपनी  चाह को हकीकत में बदलने के लिए मत देखो तुम मंजिल को 
चाह  रखने  वाले  मंजिल  ताकते नहीं  बढ़  कर  थाम  लिया  करते हैं 

सुबह



माना  गहरा  है सागर किनारा दूर नही है
जला ले दीपक  रात इतनी भी काली  नही है
सुख दुःख तो यहाँ नित ही आते जाते है साथी
कट जाए गी रात सुबह होने में देर नही है

रेखा जोशी


Thursday, 29 August 2013

अपने पराये



अपने पराये 

मेरी जानकी मौसी के घर जब तीसरी बेटी ने जन्म लिया था ,तब उस समय अड़ोस पड़ोस,रिश्तेदार सब ने उनके पास आ कर उनके यहाँ तीसरी लडकी केपैदा होने पर अफ़सोस जताया था ,लेकिन जानकी मौसी ने उन सबका यह कह कर मुंह बंद कर दिया था ,”यह मेरी बेटी है मैने इसे पैदा किया है और इसे पालूं गी भी मै ही ,किसी को भी इसकी चिंता करने की कोई जरूरत नही ,”और उन्होंने कर के भी दिखाया ,आज उनकी वही बेटी एक डाक्टर है और अपने मम्मी पापा का नाम रोशन कर रही है ,केवल वही नही उसकी दोनों बड़ी बहने यानि मेरी मौसी की दोनों बड़ी बेटिया कालेज में लेक्चरार है |
बेटी हो या बेटा ,एक माँ को उन्हें पैदा करने में एक जैसा दर्द सहना पड़ता है |माता पिता के लिए बेटा और बेटी दोनों बराबर होते है ,उन दोनों को एक जैसे ही पालते है ,अपने समर्थ में रह कर ऊँची से ऊँची शिक्षा भी देते है ,फिर एक दिन आँखों में आंसू भर कर ,अपनी प्यारी बेटी को ,अपने दिल के टुकड़े को,अपने ही हाथों अपने दिल पर पत्थर रख कर उसे किसी और के साथ विदा कर देते है |इस पुरुष प्रधान समाज ने सदा औरत को दूसरा दर्जा दिया है और हमारे ही समाज ने बेटी को पराया कर दिया ,यह रीत बना ली गई कि बेटी पराया धन है उसे शुरू से ऐसे संस्कार दिए जाते है ,उसे शादी के बाद माता पिता का घर छोड़ अपने पति के घर को अपनाना है और वह उस घर को पूरे तन मन से अपनाती भी है लेकिन अफ़सोस ज्यादातर उसके ससुराल वाले उसे हमेशा बेगानी लड़की ही समझते है ,उसकी नन्द ,उसके पति की बहन उनकी अपनी बेटी और बहू परायी ,इस अपने पराये के चक्कर में पिस कर रह जाती है बेचारी लड़की |कई परिवारों में तो बचपन से ही उसके साथ परायों सा व्यवहार किया जाता है और ससुराल में तो वह है ही परायी ,जबकि हमारी बेटियाँ दोनों ही परिवारों में प्यार ही बांटती है |
समय के चलते जागरूक हुए माँ बाप अपनी बेटियों को शिक्षित कर समाज में कुछ बदलाव तो ला रहें है लेकिन यह अभी भी बहुत कम दिखाई दे रहा है |अक्सर नौकरीपेशा लड़कियों को लडके इस लिए पसंद करते है क्योंकि उनके घर में दहेज के साथ साथ अतिरिक्त आमदनी भी आने लगे गी |आज जब बेटियाँ नौकरी करती है तब भी कई पढ़े लिखे माँ बाप अपनी बेटी के तथाकथित घर यानी कि उसके ससुराल जो उसके पति का घर है ,वहां खाना तो दूर पानी तक नही पीते ,भला उनसे पूछो जब उन्होंने अपनी बेटी को बेटो जैसा पढ़ाया लिखाया तो फिर वह अपनी बेटी के घर को क्यों पराया मान रहें है ,शायद इसलिए की वहां उनकी बेटी के सास ससुर रहते है फिर तो वह सास ससुर का घर हुआ ,उनकी बेटी का कौन सा घर है ?अगर बेटी का एकल परिवार है और वह अपने पति के साथ रहती है तो फिर वह उसके पति का घर है ,ऐसा क्यों है कि लड़की के माँ बाप उस बेटी के यहाँ कुछ भी खा ,पी नही सकते जो उनकी अपनी है ,अगर मजबूरी में कुछ खा भी लेते है तो वह अपनी बेटी के हाथ में पैसे रख कर उसकी कीमत चुका देते है |
हमारे कानून ने तो बेटा बेटी को बराबर का दर्जा दे रखा है ,अगर बेटा किसी कारणवश अपने माँ बाप के साथ नही रह सकता तो बेटी अपने परिवार सहित अपने माँ बाप के पास यां माँ बाप अपनी बेटी के पास क्यों नही रह सकते ?क्यों जकड़े हुए है हम समाज के ऐसे संस्कारों से कि बेटा ही उनकी मुक्ति का दुवार है ? अगर हम और हमारा समाज बेटी को पराया न समझ अपना कहता है तो हमे बेटा और बेटी दोनों के साथ बचपन से ले कर उनकी शादी और उसके के बाद भी एक जैसा व्यवहार करना चाहिए और अगर हम बेटा और बेटी के साथ एक जैसा व्यवहार नही रख सकते तो हमारी बेटियां अब भी परायी है औरआगे भी परायी ही रहें गी |

Wednesday, 28 August 2013

चाहत

मोतियों से आँसू  जब तेरी आँखों से बहते है 
इस दिल में इक टीस सी उठती है जिसे हम सह्ते है 
बहुत रुलाया तुम्हे इस ज़ालिम जमाने के तानो ने 
आ छुपा लूँ मन में दिलोजाँ से हम तुम्हे चाहते है 
रेखा जोशी 

Tuesday, 27 August 2013

जन्माष्टमी पर हाइकु




माखनचोर
गोकुल का दुलारा
नंदकिशोर

सुन्दर मुख
राधिका का कन्हैया
मनमोहन

मोरमुकुट
पीताम्बर धरण
मुरलीधर

 रचाता रास
गोकुल की गोपियाँ
राधिका संग

यशोदा मैया
नटखट गोपाल
लीला दिखाये

रेखा जोशी



श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की सभी मित्रों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 

मुक्तक

कुदरत के खूबसूरत नजारे देख  हम हैरान है 
नीचे ज़मीं सूखी तो उपर सिंधूरी आसमान है 
अपनी आँखो  में बसा ले तू इस  हसीन चित्र को 
हर पल को बदलने के लिये  बैठा उपर भगवान है
 रेखा जोशी 

Saturday, 24 August 2013

मुक्तक

 मुक्तक 

 किसी के काम जो आये उसे इंसान कहते है
 पैगाम ए मुहब्बत फैलाये उसे इंसान कहते है 
दुःख और दर्द के मारे बहुत है इस जहान  में 
आँसू दुखिया के जो पोंछे उसे इंसान कहते है

रेखा जोशी