खेल रहे है मिलजुल कर इस बगिया में नन्हे मुन्ने फूल मेरे आंगन के मस्त मस्त झूल रहें डाली डाली पे हर्षित हो रहा है मन देख कर उन्हें भाग रहे उड़ती तितलियों को पकड़ने फूलों के संग संग कभी मुस्कुराते मेरे घर आंगन में खेलते बच्चे चम्पा चमेली गुलाब सा महका रहे
सुबह सुबह
ठिठुरती
सर्दी
कूड़े का
ढेर
बीनता
सपने
टुकड़ों में
फलों के
रोटी के
नही सोऊँगा
खाली पेट
सिर पर
होगी छत
कह रहा वो
मांगता वोट
दे दूँगा
जीते हारे
बला से
सपना
सच हो
मेरा
ढूँढ रहीं
इक मंदिर
होती है
पूजा जहाँ
तुम्हारी
वह स्थान
जो जोड़े
इक दूजे को
धर्म हो
जहाँ
मानवता
जहाँ
मानव का
मानव से
हो प्यार
न हो
टकराव
उत्थान
हो जहाँ
मानवता का
ढूँढ रहीं
वह मंदिर