Sunday, 7 December 2014

जीवन के दिन चार है दुनिया एक छलावा

जीवन  के  दिन  चार है दुनिया एक छलावा
करनी  अपनी छुपा मत करना तुम दिखावा
जो   जैसा   करे गा  वह   वैसा   ही   भरे गा
पाये   कर्मो   का  फल  काहे  करे  पछतावा

रेखा जोशी 

गा रहे गीत शाखाओं पर रंग बिरंगे फूल

झूम रहे
पेड़ों की
शाखाओं पर
रंग बिरंगे फूल

हौले हौले
बह रही
संगीतमय लहर
दे रही हिलोरे
मदमस्त पवन
गा रहे गीत
शाखाओं पर
रंग बिरंगे फूल

मुस्कुराते हुए
खिलखिला रहे है
शाखाओं पर
रंग बिरंगे फूल

खिल कर बिखरना
नियति है इनकी
बिखरने दो इन्हे
धरा के आँचल में
सृजन होगा
महकेगे फिर से
शाखाओं पर
रंग बिरंगे फूल

रेखा जोशी

कुछ सपने बंद पलकों से

देखे
कुछ सपने
बंद पलकों से कभी
बह गए
अचानक
आँखों से हमारी
ठुकरा दिया
तुमने
चाहत को
हमारी
धड़कता था जिया
तेरे लिये
टुकड़े हुए उसके
दिल  क्या टूटा
बिखर गई उम्मीदे
इधर उधर
हमारी
और हम नादान
संजोते रहे
पलके बंद कर के
अभी भी
वही सपने

रेखा जोशी

महका जाते तन्हाईयाँ हमारी

ख्यालों में मेरे
तुम
आते हो अक्सर
आते है याद
हमे
वो लम्हे मुहब्बत के
जब
मै और तुम
हाथो में लिए हाथ
खो जाते
इक दूजे में
होती थी बातें
निगाहों से हमारी
मचल उठते है अरमान
आज भी
महका जाते 
तन्हाईयाँ हमारी
जब आते हो तुम
ख्यालों में मेरे

रेखा जोशी

सजन धागे मुहब्बत के सुलझ गये

जब से ज़ुल्फ़ों की छाँव में उलझ गये

सजन  धागे  मुहब्बत के सुलझ गये 

खुशनसीब  है हम  मिली जो मुहब्बत 

अब से  ज़िन्दगी  हसीँ  है समझ गये 

रेखा जोशी

Saturday, 6 December 2014

जूही चमेली से उपवन में महकते सुन्दर फूल

हौले  से पवन  के झोंकों  ने फूलों को सहलाया 
गुनगुना रहे भौरों ने भी मधुर गीत गुनगुनाया 
जूही  चमेली से उपवन में  महकते सुन्दर फूल 
फूलों पर नाच रही तितली ने भी उत्सव मनाया 

रेखा जोशी 

चारो ओर बहार ही बहार सी छा जाती है

तुम्हारी चाहत इस कदर मुझ में समा जाती है
जैसे  महक  फूलों   की  हवा  में  समा  जाती है
जब  भी आते  हो  मेरी  नजरों  के  सामने तुम
चारो  ओर   बहार  ही  बहार  सी  छा  जाती  है

रेखा जोशी