Monday, 26 September 2016

न जाने कब ज़िन्दगी की शाम हो जाये

ज़िन्दगी अपनी यूँही तमाम हो जाये
ख़्वाब न कहीं तेरे नाकाम हो जायें
कर ले यहाँ पूरी सभी हसरते अपनी
न जाने कब ज़िन्दगी की शाम हो जाये
,
चलो ज़िंदगी का अब कर लें दीदार
जी लें हर लम्हा  जीत मिले या हार
आगे आगे हम  पीछे चलती मौत
न जाने कब छोड़ कर चल दें संसार

रेखा जोशी

महालक्ष्मी 'मापनीयुक्त वर्णिक छंद

महालक्ष्मी 'मापनीयुक्त वर्णिक छंद
212 212 212
साथ तेरा मिला जो पिया
आज लागे नहीं  है जिया
पास  आओ  हमारे अभी
काश आ के न जाओ कभी
....
देख के रूप तेरा पिया
चाँद भी आज शर्मा गया
रात को रौशनी है मिली
मीत मै  संग तेरे चली
....
है ख़ुशी आज गाते  रहें
ज़िन्दगी जाम पीते रहें
प्रीत को  तोड़ जाना नही
छोड़ना साथ आता नही

रेखा जोशी

Sunday, 25 September 2016

भूख


एक सुसज्जित भव्य पंडाल में शहर के मशहूर सेठ धनीराम के बेटे की शादी हो रही थी |लड़कियाँ और महिलायें सुन्दर सुन्दर वस्त्रों से सजी और आभूषणों से लदी हुई इधर उधर टहलते हुए एक दूसरे से हंसी मज़ाक कर रही थी | कुछ मनचले लड़के और लडकियाँ फ़िल्मी गानो की धुन पर झूम झूम कर थिरक रहे थे | अपने बेटे की शादी में सेठ जी ने खूब अच्छे से इंतज़ाम कर रखा था ताकि उनके मेहमानों को किसी भी तरह की कोई असुविधा न होने पाये | पंडाल का माहौल बहुत ही दिलकश और खुशनुमा था | नाच गानों की महफ़िल के साथ साथ पंडाल के भीतर अनेकानेक देशी और विदेशी स्वादिष्ट व्यंजनों की महक सब को लुभा रही थी | कहीं शराब का दौर चल रहा था तो कहीं लोग तरह तरह की ड्रिंक्स और गर्मागर्म सूप पी कर लुत्फ़ उठा रहे थे | हर कोई खुश और आनन्दित दिखाई दे रहा था | अपनी अपनी प्लेट में विभिन्न विभिन्न व्यंजन परोस कर शहर के जाने माने लोग उस लज़ीज़ भोजन का आनंद उठा रहे थे |खाना खाने के उपरान्त वहां अलग अलग स्थानों पर रखे बड़े बड़े टबों में वह लोग अपना बचा खुचा जूठा भोजन प्लेट सहित रख रहे थे ,जिसे वहां से सफाई कर्मचारी उठा कर पंडाल के बाहर रख देते थे |पंडाल के बाहर न जाने कहाँ से एक मैले कुचैले फटे हुए चीथड़ों में लिपटी औरत अपनी गोदी में भूख से रोते बिलखते नंग धडंग बच्चे को लेकर एक बड़े से टब के पास आ गई और उस टब में से लोगों की बची खुची जूठन से खाना निकाल कर जल्दी जल्दी खाने लगी और साथ ही साथ अपने भूख से रोते बिलखते हुए बच्चे के मुहं में भी डालने लगी |उसके पास खड़ा एक कुत्ता भी टब में मुहं डाल कर जूठी प्लेटे चाट रहा था |

रेखा जोशी 

मातृ भूमि पर मर मिटे देकर जान


हुये जननी जन्म भूमि पर कुर्बान
भारत पर कर दिये  नौछावर प्राण
भाव विभोर हो शत शत करते नमन
मातृ भूमि पर मर मिटे  देकर जान

रेखा जोशी 

Friday, 23 September 2016

भूल जाओ आज परेशानियाँ तुम


बन के रह गई ज़िन्दगी अफ़साना
न आया तुमको कभी प्यार निभाना
.. 
आया नहीं करना तुम्हे प्यार सजन 
बना दिया तुमने हमको  दीवाना 
... 
देती खामोशियाँ  आवाज़  तुमको 
सुन आवाज़ मेरी  तुम  चले आना 
... 
भूल जाओ आज  परेशानियाँ तुम 
काँधे पे रख सर अपना  सो जाना 
... 
गैर नही हम तो तुम्हारे है सनम 
पराया समझ हमको न भूल जाना

रेखा जोशी  

Thursday, 22 September 2016

नहीं अब जहां में खुशी आज क्यूं है


 नहीं अब जहां में खुशी आज क्यूँ है 
जहर   जिंदगी  ये  बनी आज क्यूँ है 
....
हमे  ज़िन्दगी से गिला है न शिकवा 
मगर  दर्द से यह  भरी आज क्यूँ है 
.... 
बिखर टूट जाये न सोचा न चाहा  
यहाँ ज़िन्दगी रो रही आज क्यूँ है  
... 
पुकारे किसे हम बुलायें किसे अब 
यहाँ रो रही हर कली आज क्यूँ है 
.... 
पिया घूँट हमने ज़हर से भरा अब 
यहाँ  मौत आती नहीं  आज क्यूँ  है 

रेखा जोशी 





क्यों किया हमसे किनारा चल दिए



था  हमे  तेरा  सहारा चल दिए  
तोड़ कर दिल वो हमारा चल दिए 
... 
रूठ  कर हमसे चले हो तुम कहाँ
बहुत हमने तो पुकारा  चल दिए
....
छोड़ तुमको जी न पायें हम कभी
क्यों किया हमसे किनारा चल दिए 
... 
प्यार हमने है किया तुमसे सजन
कर हमें वो बेसहारा चल दिए
....
दर्द तुमसे है मिला हमको सजन
साथ प्यारा था तुम्हारा चल दिए 

रेखा जोशी