Tuesday, 30 January 2018

बेबसी  देख  उनकी  निहारता  रह गया

मौन देखा उनको दिल तड़पता रह गया
बेबसी  देख  उनकी  निहारता  रह गया
चले  गये  वोह  तो  काल के आगोश में
मै बस यहाँ अपना हाथ मलता रह गया

रेखा जोशी

Monday, 29 January 2018

प्रदत्त छंद:-मानव (मात्रिक)


प्रदत्त छंद:-मानव (मात्रिक)

नहीं कोई  ठिकाना  है
जीवन  आना  जाना है
,
धारा वक्त की बह रही
साथ  इसका निभाना है
,
यादों के  ही  सागर में
हमको  गोते  खाना है
,
दो दिन के हम जीवन में
बुनते   ताना   बाना   है
,
जन्‍म मरण का बंधन जग
मौत  को  यहाँ  आना है

रेखा जोशी

Monday, 22 January 2018

संस्मरण

संस्मरण

हर रिश्ते की अपनी ही एक गरिमा होती  है ,ऐसे ही एक प्यारा रिश्ता होता है नन्द और भाभी का,बात रक्षाबंधन त्यौहार की है जब मेरी नन्द अपने प्यारे भैया को यानी कि मेरे पति को राखी बाँधने हमारे घर आई ।बहुत ही खुशनुमा माहौल था और बहुत  ही स्नेह से मेरी नन्द ने अपने भैया को तिलक लगा कर राखी बाँधी और ढेरों आशीर्वाद भी दिए ,मेरे पति ने भी उसे सुंदर उपहार दिएl

काफी दिनों बाद दोनों भाई बहन मिले थे इसलिए वह अपने बचपन और घर परिवार की बाते याद करने लगे ।मै भी रसोईघर  में जा कर दोपहर के भोजन की तैयारी में जुट गई ,तभी मुझे दोनों भाई बहन की जोर जोर से बोलने की आवाज़ सुनाई पड़ी ,मै भाग कर वहां पहुंची तो देखा कि मेरी ननद अपने सारे उपहार छोड़ कर जा रही थी और मेरे पति भी बहुत गुस्से में अपनी नाराज़गी  जता रहे थे ,मैने  अपनी नन्द को मनाने और रोकने की भी बहुत कोशिश की लेकिन वह दरवाज़े से बाहर निकल गई ।पूरे घर का वातावरण गमगीन हो गया था ,मुझे यह सब देख कर बहुत ही दुख हो रहा था कि राखी वाले दिन उनकी बहन रूठ कर बिना कुछ खाये पिये हमारे घर से जा रही थी लेकिन मै ठहरी भाभी , नाज़ुक रिश्ता था मेरा और मेरी ननद के बीच।मैने अपने पति की तरफ देखा, उनकी आँखों में पश्चाताप के आंसू साफ़ झलक रहे थे ,मैने झट से देरी न करते हुए अपनी ननद का हाथ पकड़ लिया ,इतने में मेरे पति भी वहां आ गए और उन्होंने अपनी प्यारी बहना को गले लगा कर क्षमा मांगी ,दोनों की आँखों में आंसू देख मेरी आँखे भी नम हो गई ।

मैने जल्दी से  खाने की मेज़ पर उन्हें बिठा कर भोजन परोसा और हम सब ने मिल कर खाना खाया ।सारे गिले शिकवे दूर हो गए और नाराज़गी से भाई बहन के रिश्ते में पड़ी सिलवटें उनकी आँखों से बहते हुए आंसुओं से दूर हो गई थी ।हमारे यहाँ से जाते हुए मेरी ननद ने मुझ से गले मिल कर इस प्यार के रिश्ते की गरिमा बनाये रखने पर अपना आभार प्रकट किया |

रेखा जोशी

Monday, 15 January 2018

दिखावे की जिंदगी (लघु कथा)

सुमी अपनी ज़िन्दगी में सब कुछ जल्दी जल्दी हासिल कर लेना चाहती थी ,एक सुंदर सा सब सुख सुविधाओं से भरपूर बढ़िया आरामदायक घर ,खूबसूरत फर्नीचर और एक महंगी लम्बी सी कार ,जिसमें बैठ कर वह साहिल के साथ दूर लम्बी सैर पर जा सके ,वहीं साहिल के अपने भी कुछ सपने थे ,इस तकनीकी युग में एक से एक बढ़ कर मोबाईल फोन,लैपटॉप आदि l दोनों पति पत्नी जिंदगी का भरपूर लुत्फ़ उठाना चाहते थे|अन्य लोगों की देखा देखी उपरी चमक धमक से चकाचौंध करने वाली रंग बिरंगी दुनिया उन्हें अपनी ओर ऐसे आकर्षित कर रही थी जैसे लोहे को चुम्बक अपनी तरफ खींच लेती है |

एक अच्छी सी सोसाईटी देख कर साहिल ने बैंक से लोन ले कर फ्लैट खरीद लिया,उसके बाद तो दोनों ने आव देखा न ताव धड़ाधड़ खरीदारी करनी शुरू कर दी ,क्रेडिट कार्ड पर  पैसा खर्च करना कितना आसान था ,कार्ड न हुआ जैसे कोई जादू की छड़ी उनके हाथ लग गई ,एक के बाद एक नई नई वस्तुओं से उनका घर भरने लगा l
जब पूरा विवरण पत्र हाथ में आया तो दोनों के होश उड़ गए ,कैसे चुका पायें गे, उधर क्रेडिट कार्ड चलाने वाली कम्पनी मूल धनराशी के साथ साथ ब्याज पर ब्याज की भी मांग करने लगी और अंत में  पैसा चुकता करने के चक्कर में उनका घर बाहर सब कुछ  बिक गया l

रेखा जोशी

Sunday, 14 January 2018

कलरव

कलरव

सुबह सुबह रीमा की नींद सदा पंछियों की चहचहाहट के साथ खुला करती थी, लेकिन आज उसे उनका कलरव सुनाई नहीं दिया, अलसाई सी रीमा नें आंखें खोली, समय देखते ही चौंक गई वह, इतनी देर तक वह कैसे सोती रह गई, आज वह पंछियों का चहचहाना  कैसे नहीं सुन पाई l जल्दी से बिस्तर छोड़ रीमा घर के बाहर लगे शहतूत के पेड़ की ओर गई,जो अनेक प्रकार के पंछियों का रैन बसेरा था, जहाँ सब पंछी सुबह शाम कलरव किया करते थे, उसकी जिंदगी भी उन पंछियों की चहचहाहट के साथ जुड़ी थी l भोर और संध्या को पंछियों का कलरव उसकी दिनचर्या का अटूट हिस्सा बन चुके थे l
बाहर निकलते ही रीमा को कुल्हाड़ी से लकड़ी काटने की आवाज़ सुनाई दी, बाहर का दृश्य देखते ही रीमा चौंक गई, शहतूत का वह बढ़ा सा पेड़ ज़मीन पर गिरा पड़ा था और सभी पंछी अपना बसेरा छोड़ कर जा चुके थे, भारी मन से रीमा घर के भीतर आ गई, उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था, वह ऐसा महसूस कर रही थी जैसे पंछियों की चहचहाहट के साथ उसकी ज़िन्दगी ही चली गई l

रेखा जोशी

नव बहार


सूनी  शाखाओं को नव कोपलों का इंतज़ार
आयेगी सूखी डालियों पर फिर से नव बहार
नाचेंगी अरूण की रश्मियाँ फूलों पर फिर से
गाती  मुस्कुराती  रहेगी ज़िंदगी    बार   बार 

रेखा जोशी 

नव बहार


सूनी  शाखाओं को नव कोपलों का इंतज़ार
आयेगी सूखी डालियों पर फिर से नव बहार
नाचेंगी अरूण की रश्मियाँ फूलों पर फिर से
गाती  मुस्कुराती  रहेगी ज़िंदगी    बार   बार 

रेखा जोशी