Monday, 30 October 2017

जय माँ गंगे हर हर गंगे

कल कल शोर मचाती
नाचती इठलाती
उतरी हिमालय की गोद से
आई भारत की धरा पर
जीवन दाती
भागीरथी को करते नमन
है पावन नीर बहती धारा
छलकता अमृत
बूंद बूंद  में इसकी
नदी नहीं यह मैया हमारी
करते माँ  गंगा  को नमन 
इसके लहराते आँचल में
बस रहा हमारा वतन
उगल रही सोना धरती
जाये जहां
निर्मल इसका जल
जय माँ गंगे हर हर गंगे
सदियों तक तुम बहती जाना
जय माँ गंगे हर हर गंगे
देश हमारा समृध्द बनाना
जय माँ गंगे हर हर गंगे
जय माँ गंगे हर हर गंगे

रेखा जोशी

क्या रिश्ता था तुमसे

क्या रिश्ता था तुमसे
एक पड़ोसी ही तो थे तुम
लेकिन
माँ की आवाज़ सुनते ही
भाग आते थे घर हमारे
कभी तरकारी कभी दही
भाग भाग कर लाते थे तुम
और माँ भी न
झट से बुला लेती थी तुम्हें
कोई काम हो
नहीं पूरा होता बिन तुम्हारे
आखिर
क्या रिश्ता था तुमसे
एक बेनाम रिश्ता
फिर भी इतना अपनापन
नहीं नहीं
न होते हुए भी
रिश्ता था तुमसे
आखिर
खून का रिश्ता न होते हुए भी
रक्षाबंधन पर
एक अनमोल रिश्ते में
बाँध लिया तुम्हें
कलाई पर तुम्हारी
नेह की डोर से
एक बेनाम रिश्ते को
नाम दे कर
निभा रहे हो जिसे तुम
अब तक

रेखा जोशी

Sunday, 29 October 2017

अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई
दिल मचलता रहा पर उनसे ना मुलाकात हुई
,
रिमझिम बरसती बूंदों से है नहाया तन बदन
आसमान से आज फिर से जम कर बरसात हुईं
,
काली घनी  घटाओं संग चले शीतल हवाएँ
उड़ने लगा मन मेरा ना  जाने क्या बात हुई
,
झूला झूलती सखियाँ अब पिया आवन की आस
बीता दिन इंतज़ार में अब तो सजन रात हुईं
,
चमकती दामिनी गगन धड़के हैं मोरा जियरा
गर आओ मोरे बलम तो  बरसात सौगात हुईं

रेखा जोशी

बेनाम रिश्ता


रिश्ता तेरा मेरा
है कुछ अजीब सा
अरसा हुआ बिछड़े हुए
लेकिन
रहा आज तक
बेनाम
चाह थी मेरी उसे
इक नाम दूं
प्यार या फिर दोस्ती का
देखो तो विडम्बना
न रहा प्यार न दोस्ती
गुम हो गये कहीं हम
अतीत की गहरे कोहरे में
न कोई अपनापन
न उसका एहसास
सर्द ठंडे बेनाम रिश्ते में
शायद थी कोई चिंगारी
जो तुम याद आये
थी कोई नेह की डोर
बाँध रखा है जिसने
हमारे बेनाम रिश्ते को

रेखा जोशी

बेवफा  प्यार व्यार क्या जाने

2122 1212 22

बेवफा  प्यार व्यार क्या जाने
दर्द दिल का नहीं पिया जाने
,
साथ लेकर हमें चलो साजन
क्या पता कब मिलें खुदा जाने
,
खूबसूरत यहां नज़ारे अब
छा रहा क्यों पिया नशा जाने
,
बात दिल की हमें कहो साजन
कल बहारे न हों  खुदा जाने
,
मुस्कुरा ले यहां घड़ी भर तू
पल मिलें फिर न क्या पता जाने
,
चांदनी है खिली खिली साजन
मुस्कुरा चाँद क्यों रहा जाने

रेखा जोशी

Thursday, 26 October 2017

समझ नहीं पाओ गे तुम


आलीशान बंगलों में बैठ
करते हो बात गरीबों की
नहीं समझ सकते तुम
पेट की आग को
कुलबुलाती है भूख जब
गरीब के पेट में
सु्‍सज्जित मेज़ पर
लज़ीज़  व्यंजन खाते वक्त
नहीं समझ सकते तुम
हालात गरीबों के
क्योंकि तुम्हारी राहों में
बिछे रहते सदा मखमल के कालीन
शान ओ शौकत के
समझ भी नहीं पाओगे तुम
क्योंकि
तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते

रेखा जोशी

Monday, 23 October 2017

करें  हम  याद  तुमको हर घड़ी हर पल

1222 1222 1222

नहीं  कोई   यहां  दीवार  अब साजन
किया हमने  पिया इकरार अब साजन
,
जिया  लागे  न  सजना अब बिना तेरे
चले  आओ  पुकारे  प्यार अब साजन
,
बहारे  है खिला  उपवन  पिया आ जा
नज़ारों  से न कर  इनकार अब साजन
,
किसे साजन सुनाएँ हाल दिल का हम
चलो  लेकर  हमें  उस पार अब साजन
,
करें  हम  याद  तुमको हर घड़ी हर पल
यहां  पर  ज़िंदगी  संवार  अब   साजन

रेखा जोशी

Friday, 20 October 2017

मुक्तक


ज़िन्दगी में बहुत कुछ  है धन माना
सबको   नाच  नचाता  है धन जाना
रिश्तों  के ऊपर  अब है दौलत यहाँ
करे  हर   किसी  को दौलत दीवाना

रेखा जोशी

मुक्तक


कान्हा   के रूप में ईश्वर ने  लिया अवतार
जन्म लिया धरती पर पैदा हुआ तारणहार
वासुदेव ने सर  धर कान्हा  गोकुल पहुँचाया
देवकी ने जाया उसे यशोदा से मिला  दुलार
..
हे माखनचोर नन्दलाला ,मुरली मधुर है बजाये 
धुन सुन  मुरली की गोपाला ,राधिका मन मुस्कुराये 
चंचल नैना चंचल चितवन, गोपाला से प्रीति हुई
कन्हैया से छीनी मुरलिया  , बाँसुरिया अधर लगाये 

रेखा जोशी 

रेखा जोशी

खुशी लाती दिवाली जले नेह का दीप


दीप जलाये सबने रोशन हुआ जहान
सज रही सभी गलियाँ अब सजा हिन्दुस्तान 
,
एक दीपक तो जलाओ अपने अंतस में 
फैैलाओ  उजाला करो दीप्त हर स्थान 
,
घर   घर  हो   उजियारा  दूर  हो अंधेरा
जात पात का भेद मिटे सब जन एक समान
,
जगमग जगमग दीप जले आई दिवाली
खुशियाँ बरसे घर घर ऎसा मिले वरदान
,
खुशी लाती दिवाली जले नेह का दीप
मानवता परम धर्म जगत में बाँट ज्ञान

रेखा जोशी 

मुट्ठी  भर   दाने  अपने  आँगन  में  बिखेरता हूँ

मुट्ठी  भर   दाने  अपने  आँगन  में  बिखेरता हूँ
मैं उन चिड़ियों को अक्सर दाना दुनका  देता हूँ
,
एक से बढ़कर एक लुभाती सुंदर चिड़िया अंगना
चहकती   फुदकती  दाने   चुगते  उन्हें देखता  हूँ
,
चहचहाने  से  उनके  चहक  उठता  आंगन मेरा
वीरान  नैनों   में  भर  खुशियाँ यहां  समेटता  हूँ
,
सुबह शाम  करें कलरव मधुर रस कानों में घोले
मधुर गीतो से  झोली में फिर   जिंदगी  भरता हूँ
,
रिश्ता उनसे अनोखा मेरा है हर रिश्ते से ऊपर
कभी कभी दिल की बातें भी उनसे कर लेता हूँ

रेखा जोशी

Wednesday, 18 October 2017

फुलवारी


अँगना खिली आज फुलवारी है
फ़ूलों  से  महकी अब क्यारी  है
नाचते  झूम  झूम   मोर  बगिया
कुहुके   कोयल   डारी  डारी  है

रेखा जोशी

गणेश वंदना

गणपति बप्पा सुन लो पुकार हमारी 
डोले   नाव   बीच    मझधार  हमारी 
,
हे   गजानन   विघ्नेश्वर  विघ्नहर्ता 
लगा   दीजिये    नैया   पार   हमारी 
,
हे   गौरी  नंदन  सबके   दुःखहर्ता
सुन लो प्रार्थना   इस  बार   हमारी
,
अर्पित करे  हम मोदक  और मेवा
जिंदगी  बप्पा  दो   संवार  हमारी
,
विराजो अब भगवन बुद्धि में सदा तुम
तुम  पर  प्रभु है भक्ति  अपार  हमारी

रेखा जोशी 

Sunday, 15 October 2017

सवाल


आज सालों दिनों बाद प्रिया ने कैफे में कदम रखा, बीस साल पहले उसकी यहां से बदली हो गई थी, फिर वह घर गृहस्थी के चक्कर में ही फंस कर रह गई , टेबल पर बैठते ही बीते दिनों की यादों में खो गई l क्या दिन थे जब वह रवि के साथ यहां अक्सर आया करती था, घंटों दोनों यहां  वक्त गुज़ारा करते थे l प्रिया को रवि पर बहुत गुस्सा था, उसने शादी से इंकार क्यों कर दिया था l तभी उसे एक जानी पहचानी सी आवाज़ सुनाई दी l प्रिया ने घूम कर देखा, उसके सामने रवि था l
" "अरे, तुम यहाँ? क्या इत्तेफ़ाक़ है," कहते हुए उसने हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ाया ।

कैफे में साथ वाली टेबल से जब उसे किसी ने पुकारा तो उसने आवाज़ की दिशा में सिर घुमा कर देखा ।

बीस साल..... एक ही शहर में रहते हुए इतने लंबे अंतराल के पश्चात यह मुलाक़ात....

अपरिचितों से भरे कैफे के शोरो-गुल के बीच दिमाग़ जैसे सुन्न हो गया । अचंभित हो दोनों एक दूसरे को देखते रह गये ।

क्या है ईश्वर की इच्छा, सोचते हुए वो अतीत की यादों में गुम हो गये....."
कभी दोनों ने जीने मरने की कसमें भी खाई थीं, दोनों एक दूसरे को देखते रह गए लेकिन निशब्द, आँखों से आँखे मिली,प्रिया ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा उसकी नज़र रवि के लड़खड़ाते हुए  कदमों  पर रुक गई रवि ने अपनी सीट के पास रखी छड़ी  उठाई और लंगड़ाते हुए धीरे  धीरे दरवाज़े से बाहर चला गया l प्रिया को अपने सवाल का जवाब मिल गया था l

रेखा जोशी

Saturday, 14 October 2017

दोहे


1
मीत प्रीत जाने नहीं, समझे न प्रेम प्यार
मन से जोगी जोगड़ा, सब से प्रीत अपार
2
सूरज निकला है गगन, पंछी करते शोर
जागो तुम अब नींद से, चहक उठी है भोर

रेखा जोशी

Friday, 13 October 2017

काश मिलती तुम हमें जिंदगी

अर्कान= फाइलातुन् फाइलातुन् फाइलुन्
तक्तीअ= (मापनी) 2122 2122 212
.
काश  मिलती तुम हमें ज़िन्दगी
प्यार  तेरे   संग करते  ज़िन्दगी
...
मुस्कुराते संग दोनों फिर सजन
साथ  रोते  साथ हँसते ज़िन्दगी
....
पास  आते तुम हमारे तो कभी
हम दिखाते प्यार से ये जिंदगी
....
जा रहे हम दूर तुमसे अब सजन
अब आखिरी इज़हार ले जिंदगी
....
अब हमारी इल्तिज़ा सुन लो पिया
देख  लो  जी  भर हमें  ए जिंदगी

रेखा जोशी

Thursday, 12 October 2017

काश सच हो पाते

इंद्रधनुषी रंगों से
सजाया था हमने
महकता हुआ गुलशन
ख़्वाबों में अपने
गुलज़ार थी जिसमे
हमारी ज़िंदगी
दुनिया से दूर
मै और तुम
बाते किया करते
थे आँखों से अपनी
सपने ही सपने
कुहकती थी कोयलिया भी
बगिया में हमारी
गाती थी वो भी
प्रेम तराने
टूट गए सब सपने
खुलते ही आँखे
बिखर गए सब रंग
और हम
भरते ही रह गए
ठंडी आहें
काश सच हो पाते
वोह प्यारे
ख़्वाब हमारे

रेखा जोशी

जल रहे दीपक से जगमगाना सीख ले

जो गिर गए हैं उनको उठाना सीख ले
जल रहे दीपक से जगमगाना सीख ले

महकती बगिया खिले रंग बिरंगे फूल
संग संग फूल के मुस्कुराना सीख ले
,
गीत गा रहे आज भँवरे उपवन उपवन
संग संग गीत तुम गुनगुनाना सीख ले
,
मचल रहे आज हमारे दिल के अरमान
हमें आज तुम अपना बनाना सीख ले
,
बांट ले अब खुशियाँ सबको गले लगाकर
मिल सभी अपनों से खिलखिलाना सीख ले

रेखा जोशी

हाले दिल यार को लिखूं कैसे


रहते हो दिल में प्रियतम कहूं कैसे
बात  प्यार  की  आज  करूं  कैसे
उमड़  रहे  जज़्बात दिल में साजन
हाले   दिल   यार   को  लिखूं कैसे

रेखा जोशी

Wednesday, 11 October 2017

तिरा फिर रूठ जाना और ही था


तिरा फिर रूठ जाना और ही था 
न मिलने का बहाना और ही था 
चले तुम छोड़ कर महफ़िल हमारी
वफ़ा हम को दिखाना और ही था 

रेखा जोशी 

Tuesday, 10 October 2017

मंदिर मन

मन मुदित
पर्वत की शृंखला
नीरव घाटी
,
प्रभु दर्शन
शांत वातावरण
मंदिर मन
,
स्नेह निश्छल
दीपक प्रज्ज्वलित
मन उज्ज्वल

रेखा जोशी

मुक्तक

दिल  तुमको अपना बनाना चाहता है
तुम पर  पिया जान लुटाना  चाहता है
रूठे रूठे क्यों  हो तुम  प्रियतम हमसे
दर्द   अब   तेरा  अपनाना  चाहता  है

रेखा जोशी

Monday, 9 October 2017

अब हम जियेंगे और मरेंगे साथ साथ

जीवन की राहों में ले हाथों में हाथ
साजन मेरे अब हम चल रहे साथ साथ

अधूरे  है हम  तुम बिन सुन साथी  मेरे
आओ जीवन का हर पल जिएं साथ साथ

हर्षित हुआ  मन देख  मुस्कुराहट तेरी
दोनों सदा खिलखिलाते रहें साथ साथ

आये कोई मुश्किल कभी जीवन पथ पर
मिल कर दोनों सुलझा लेंगे साथ साथ

तुमसे बंधी हूँ मै  साथी यह मान ले
प्रेम बँधन में बंधे हम चलें साथ साथ

छोड़ न जाना तुम कभी राह में अकेले
आरज़ू है यही जिएं और मरें साथ साथ

रेखा जोशी

Saturday, 7 October 2017

मुक्तक


प्रीत  की लौ जलाने की बात कर
साजन  प्यार निभाने की बात कर
अाई  है  चमन  में  बहार   साजन
अब  गीत  गुनगुनाने की बात कर

रेखा जोशी

Friday, 6 October 2017

मुक्तक


दो दिन की है ज़िन्दगी यहां,दो दिन ही साथ निभाना है
प्रेम  कर ले  सभी है अपने,दुख दर्द सबका  मिटाना है
किस बात का करते हो यहां,तुम अहंकार बता ओ बन्दे
है माटी के पुतले हम  सब ,माटी  में  ही मिल जाना है

रेखा जोशी

Thursday, 5 October 2017

वफ़ा करे पुकार है

1212  1212

खिली खिली बहार है
वफ़ा  करे   पुकार  है
कभी मिले  खुशी हमें
मिला  हमें  न प्यार है

रेखा जोशी

Wednesday, 4 October 2017

टूटते रिश्ते


जीवन की भाग दौड़ में बिखरते  रिश्ते
देखें  भीड़ में भी  यहां सिसकते  रिश्ते
भाषा  प्रेम  की  कोई  नहीं  समझ रहा
पत्थर का दिल हो तो नहीं जुड़ते रिश्ते

रेखा जोशी

चांदनी रात

है याद मिले तुम 
हमें पहले पहल चाँदनी रात में
खामोश लब
बोले नयन
था ह्रदय विहल
चाँदनी रात में थामा था हाथ
इक दूजे का
निभाने के लिये साथ
जगमगा उठा फिर
कल्पनाओं का महल
खूबसूरत
चाँदनी रात में

रेखा जोशी

तेज़ाब (लघु कथा)

तेज़ाब (लघु कथा)

ऋतु की हालत बहुत गम्भीर थी ,उसका सारा बदन बुरी तरह से जल गया था,आफिस से आते समय किसी सिरफिरे ने उस पर तेज़ाब फेंक दिया,उफ़ उसकी तड़प देखी नहीं जा रही थी , ऋतु के मां बाप का रो रो कर बुरा हाल था ,पुलिस में रिपोर्ट की तब तफ्तीश हुई तो पता चला कि यह उसके एक सहयोगी अरुण का किया धरा था  जो एक अमीर आदमी का बिगडै़ल बेटा था और  ऋतु ने उसका प्रणय आग्रह ठुकरा दिया था ।
पुलिस को सबूत दिए गए,कोर्ट में गवाह पेश किए गए और उसे कारावास की सजा भी हुई लेकिन एक महीने के अंदर ही  उसकी जमानत हो गई ।एक बार फिर से पैसा जीत गया और एक अपराधी किसी और पर तेज़ाब फेंकने के लिए आजाद था

रेखा जोशी

Tuesday, 3 October 2017

है खिल खिल गए उपवन कहते संसार


है खिल खिल गये उपवन महकाते संसार
फूलों  से  लदे  गुच्छे   लहराते  डार   डार
सज रही रँग बिरँगी पुष्पित सुंदर  वाटिका
भँवरें  अब   पुष्पों  पर  मंडराते  बार  बार

रेखा जोशी

है बरकत मां के हाथों में


है बरकत मां के हाथों में
भर देती अपने बच्चों की झोली
खुशियों से
रह जाती सिमट कर दुनिया सारी
उसकी अपने बच्चों में
करती व्रत अपने परिवार के
कल्याण के लिए
चाहती सदा उन्नति उनकी
लेकिन अक्सर नहीं समझ पाते
बच्चे मां के प्यार को
जो चाहती सदा भलाई उनकी
नहीं देखा भगवान को कभी
लेकिन रहता
सदा वह संग तुम्हारे
धर कर रूप मां का
मां ही है ईश्वर का रूप
सदा करो सम्मान उसका
सदा करो सम्मान उसका

रेखा जोशी

Monday, 2 October 2017

है औरत तो ईश्वर का वरदान


है औरत तो ईश्वर का वरदान
देती हम सभी को यह जीवन दान
,
चरित्र निर्मात्री संतान की अपनी
शक्ति इसकी को पुरुष अब पहचान
,
हर काम करती ज़िम्मेदारी से यह
अब मान भी लो तुम इसका एहसान
,
है नारी से चलता यहां  संसार
करती राष्ट्र का औरत निर्माण
,
शक्ति दुर्गा के रूप को करें नमन
है  नारी तेरी तो महिमा महान

रेखा जोशी

छंद राधेश्यामी

आधार छंद -  पदपादाकुलक द्विगुणित (राधेश्यामी  )

16 यति 16 =32 मात्रा

कह रही समय की यह धारा,नाम जिंदगी का है चलना
खुशियाँ हज़ार पायें हम सब ,फूलों के समान है खिलना
दुख दर्द सभी के बाँटें हम,सबको समान अधिकार मिले
सपने साकार सभी के हों, मन-भावन,पावन,प्यार मिले

रेखा जोशी

Sunday, 1 October 2017

ज़िन्दगी का खूबसूरत बन्धन

ज़िन्दगी का खूबसूरत  बन्धन"विवाह"

हमारे शास्त्रों में लिखा हुआ है कि शादी के बाद पति और पत्नी का मिलन ऐसे होना चाहिए जैसे दो जगह का पानी मिल कर एक हो जाता है फिर उस पानी को पहले जैसे अलग नही किया जा सकता ,लेकिन ऐसा होना बहुत ही मुश्किल है क्योंकि दो व्यक्ति अलग अलग विचारधारा लिए अलग अलग परिवेश में बड़े हुए जब एक दूसरे के साथ रहने लगते है तो यह सम्भाविक है कि उन दोनों की सोच भी एक दूसरे से भिन्न ही होगी ,उनका खान पान ,रहन सहन, बातचीत करने का ढंग ,कई ऐसी बाते है जो उनके अलग अलग व्यक्तित्व को दर्शाती है | अगर एक को घर का खाना पसंद आता है तो दूसरेको बाहर खाना अच्छा लगता है , अगर एक को घर सजाना अच्छा लगता है तो दूसरे को घर फैलाना ,लेकिन अगर प्रेम ,एक दूसरे के प्रति विश्वास  और मित्रता पर आधारित है,तो यह छोटी छोटी बातें कोई मायने नहीं रखती।

जब वैवाहिक जिंदगी में एक दूसरे के प्रति अविश्वास पनपने लगे या पुरुष प्रधान समाज में पति का अहम आड़े आने लगे तो ऐसे में असली मुद्दा तो बहुत पीछे छूट कर रह जाता है और शुरू हो जाता है उनके बीच न खत्म होने वाली शिकायतों का दौर ,पति पत्नी दोनों को एक दूसरे की हर छोटी बड़ी बात चुभने लगती है ,इसके चलते उन दोनों का बेचारा कोमल दिल शिकवे शिकायतों के बोझ तले दब कर रह जाता है और बढ़ा देता है उनके बीच न खत्म होने वाली दूरियाँ ,जो उन्हें मजबूर कर देती है कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने पर और खत्म होती है उनके वैवाहिक जीवन की कहानी तलाक पर जा कर ,अगर किसी कारणवश वह तलाक नही भी लेते और सारी जिंदगी उस बोझिल शादी से समझौता कर उसे बचाने में ही निकाल देतें है ,पति पत्नी का आपस में सामंजस्य दुनिया के हर रिश्ते से प्यारा हो सकता है ,अगर पति पत्नी दोनों इस समस्या को परिपक्व ढंग से अपने दिल की भावनाओं को एक दूसरे से बातचीत कर सुलझाने की कोशिश करें तो इसमें कोई दो राय नही होगी और  एक दिन वह अपनी शादी की सिल्वर जुबली या गोल्डन जुबली अवश्य मनाएं गे |

रेखा जोशी 

दे दो सहारे उन बेचारों को

दे के आवाज़ गम के मारों को
दे दो  सहारे  उन   बेचारों को
,
जीवन में उन्हें मिले दुख ओ दर्द
बना लो अपना उन बेसहारों को
,
भटक रहे गली गली हो दर बदर
दे  दो  आवास  उन बंजारों को
,
दुनिया ने चुभाए शूल पांव में
निकाल दो आज तुम उन खारों को
,
नहीं मिली खुशियां कभी जीवन में
उनके लिए बुला लो बहारों को

रेखा जोशी