Saturday, 28 October 2023

न जाने कहाँ चली गई ज़िंदगी

न जाने कहाँ चली गई ज़िंदगी

मेरे घर के पिछवाड़े आँगन में 
सुबह शाम  पंछियों का चहचहाना
शहतूत के घने पेड़ पर 
जो था रैन बसेरा 
अनेक जीवों का 
दूर करता था जो सूनापन 
बस्ती थी जहाँ अनेक ज़िंदगियाँ 
है आज वीरान  सुनसान 
लेकिन आता याद वही कलरव 
चहचहाना उनका 
न जाने कहाँ चली गई ज़िंदगी 
उनके साथ 

रेखा जोशी

Thursday, 19 October 2023

प्रियतम मेरे

प्रियतम मेरे 
फिर वही शाम वही तन्हाई 
दिल में मेरे वही दर्द ले कर आई 
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प्रियतम मेरे 
ढूँढ़ रही है बेचैन निगाहें 
कहाँ खो गये दुनिया की भीड़ में
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प्रियतम मेरे
मजनू बना प्यार में तेरे 
आईना भी नही पहचानता मुझे
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प्रियतम मेरे 
दर्देदिल ने कुछ ऐसा किया 
हो गया मै तुम्हारा उम्र भर के लिए
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प्रियतम मेरे
हो न जाऊं कहीं पागल मै 
स्वाती अमृत की बूंद मुझे दे 

रेखा जोशी

Sunday, 15 October 2023

उलझन ही उलझन

अनभिज्ञ
दिल और दिमाग
नही पहचानते
अलग अलग दोनों
इक दूजे से 
.
दिल और दिमाग में 
शुरू हुई तकरार
खींच रहे मानव को
सोचना काम दिमाग का
लेकिन
दिल है कि मानता नही
खेलअपना दिखाता
डाल पर्दा सोच पर
भावना में बहा ले जाता 
अपनी बात मनवाता
अनजान रहा दिमाग
बेबस हुई सोच
दिल और दिमाग
अलग अलग दोनों
इक दूजे से
.
उलझन ही उलझन
सुलझती नहीं
किया वार फिर दिल ने
घेर लिया सोच को
जज़्बातों ने
धुंधुला गये नयन
बेबस हुई सोच
सुन्न हुआ दिमाग
न जाने रहेगी कब तक
तकरार जारी दोनों में
दिल और दिमाग
अलग अलग दोनों
इक दूजे से
.
रेखा जोशी