Saturday, 25 April 2026

शक्ति की आराधना

शक्ति की आराधना का पर्व

शक्ति की आराधना का पर्व आया है,
मन में विश्वास का अब दीपक जलाया है।
भय संशय सभी दूर हो गए आज तो 
नवरात्रि पर मैया नें हाथ बढ़ाया है।

सांस सांस में तेरी शक्ति बहने लगी 
मेरे  दिल में मैया भक्ति रहनें लगी 
चीर अँधेरा उजियारा फैला दो माँ 
तुमसे ही प्रकाशित राहें रहनें लगी 

जीवन का आधार तुम्हीं तो हो मैया 
हाथ जोड़ करें हम नमन तुम्हीं को मैया 
कण-कण में तेरी ज्योति  हरदम जले
आओ मिलकर वंदन तेरा करें मैया 

इक पावन शक्ति का माँ स्वरूप तुम हो
करे जो उजाला अंतस का रूप तुम हो 
मिल  जाए जीवन में  इक तेरा सहारा 
वंदन करें मैया सृष्टि में अनूप तुम हो 

रेखा जोशी 
स्वरचित एवं मौलिक 

मुक्तक

आधार छंद भुजंगप्रयात
मुक्तक
122 122 122 122
कहानी हमारी रही अनकही है 
किसी को हमारी खबर ही नहीं है 
अधूरे रहे आज सपने हमारे 
किनारे लगी आज नैया नहीं है 
रेखा जोशी 

चाँदनी रात में प्रियतम साथ चलें


गीत 

चाँदनी रात में प्रियतम साथ चलें 
आओ दूर हाथ में ले हाथ चलें 

करें आज बातें रही अधूरी सी 
चलें जहाँ ख़ामोशी हो पूरी सी
देखे जहाँ चाँद भी हमको झुक कर 
आँखों आँखों में सुहानी रात ढले
चाँदनी रात में प्रियतम साथ चलें 
आओ दूर हाथ में ले हाथ चलें 

ठहर जाए पल भी हमारी राहों में
डूब जाएँ हम तेरी निगाहों में 
हवा भी कहे कुछ मीठी सी कहानी
चलें कहीं दूर चाँदनी रात तले 
चाँदनी रात में प्रियतम साथ चलें 
आओ दूर हाथ में ले हाथ चलें 

रेखा जोशी 

बचपन

शीर्ष पोस्ट-मुक्तक लोक-5
चित्र मंथन समारोह-616 
बुधवार-08/04/026
समारोह अध्यक्ष-आद सुश्री रजनी रामदेव जी 
संयोजक- आद.श्री

छंदमुक्त रचना 

'मिट्टी की खुशबू में पलता बचपन
फटे हुए कपड़ों में था अपनापन
न खिलौनों की ज़िद,न कोई अरमान
बस इक दूजे से था जहान
भाई के प्यार में बहन था का सुकून 
छोटी-सी दुनिया,हर पल था जुनून 
नंगे पाँव , धूल भरी राह
हाथों में हाथ बस प्रेम की चाह
ज़माने ने उनसे छीना बहुत कुछ
भाई-बहन का प्यार कभी न हुआ कम 
सच तो ये है,चाहे वक्त कितना भी बदल जाए
बचपन की यादें कभी दिल से नहीं मिट पाए 

रेखा जोशी 

साँझ सवेरे प्रियतम मेरे(गीत )

गीत 

साँझ सवेरे प्रियतम मेरे
है यादें रहीं मुझे घेरें 
..
रात दिन तेरी करूँ पूजा
तेरे सिवा न कोई दूजा 
संग तेरे ले लिए फेरे 
है यादें रहीं मुझे घेरें 
..
जानू न यहाँ प्रेम की रीत 
भई जोगन तू मेरा मीत 
मुझे बुला लो अपने डेरे 
है यादें रहीं मुझे घेरें 
..
साँझ सवेरे प्रियतम मेरे
है यादें रहीं मुझे घेरें 

रेखा जोशी 



"समय की धीमी चाल"

"समय की धीमी चाल" 

धीमा-धीमा चल रहा समय, तेरे चले जाने के बाद
कुछ ऐसा जैसे रूक गई ज़िन्दगी भी आज  के बाद 

सूना-सूना हर एक लम्हा, तड़पाती मुझे तन्हाई है 
कभी हँसी थी जो इन लबों पर, अब खामोशी छाई है,
तेरी यादों की चादर ओढ़े, है गुजर जाती हर रात 
धीमा-धीमा चल रहा समय, तेरे चले जाने के बाद
कुछ ऐसा जैसे रूक गई ज़िन्दगी भी आज  के बाद 
..
लौट आओ किसी बहाने, ये दिल बस तुम्हें ही पुकारे,
तेरे  बिना अधूरी दुनिया, बिन तेरे जीवन  से हारे
अधूरी लगती हर खुशी भी,है  टूट गए सपनें तमाम 
धीमा-धीमा चल रहा समय, तेरे चले जाने के बाद
कुछ ऐसा जैसे रूक गई ज़िन्दगी भी आज  के बाद 
रेखा जोशी 

साया मेरा सच मेरा

साया मेरा सच मेरा 

है  साया  मेरा सच  मेरा, साया मेरा  साथ निभाए,
रहता  सदा ये संग  मेरे, धूप या अंधियारा  छाए 

 मुँह मोड़े जब दुनिया मुझसे,हो जाएँ सभी दूर अपने 
है चुपचाप यह साथ चलता,बिन बोले सब कुछ कह जाए

आईने सा साफ़ है यह ,झूठ की इसमें जगह नहीं,
तब मेरा साया साथ मेरे , मुझको खुद से यह मिलवाए

जैसा मैं हूँ  वैसा दिखता ,है इसमें  नहीं कोई  दगा 
भीड़ में जब खो जाता मैं, खुद से यह पहचान  कराए 

यही  असली  चेहरा मेरा, ना इससे पर्दा  है कोई 
मेरा साया हाथ पकड़ कर,मुझको मुझसे ही मिलवाये 

रेखा जोशी 


दोहा मुक्तक:

दोहा मुक्तक: 
ध्रुव शब्द: निवास 

सुमिरन तेरा प्रभु करूँ, ह्रदय तेरा निवास 
जप तप भगवन का करें, बनते तेरे खास 
थामें मुझको प्रभु सदा,लगाते नाव पार 
वंदन करती सर झुका, करती सदा विश्वास

रेखा जोशी 


परछाइयों का शहर" गीत

"परछाइयों का शहर" 
गीत 
परछाइयों का शहर,पुकारे रात भर
है मिटने लगे निशां, निकलने को सहर 

रात चाँद भी धुएँ में, छुपकर रो रहा है,
टूटा यहाँ मनुआ अब, दर्द हो रहा है 
थामी थी जो कलाई,है छूट अब गई 
हर रोज़ मुझको ये फिर,क्यों बुला रहा है 

परछाइयों का शहर,पुकारे रात भर
है मिटने लगे निशां, निकलने को सहर 

दीवारों की आहट,अब भी कह रही है,
तन्हाईयां मेरी अब, तुमको ढूँढ रही है 
मैं लौटना भी चाहूँ, तो रास्ता नहीं,
बाहर है जाना मगर, द्वार भी नहीं है 

परछाइयों का शहर,पुकारे रात भर
हमें ढूंढते हैं निशां,लगी छुपने सहर

रेखा जोशी 

"किताब के सूखे फूल"


"किताब के सूखे फूल" 

धीमी सी इक आह लिए 
महक रहे हैं अभी भी किताब के सूखे पत्ते
इन महकते पत्तों में 
है खिलखिलाती तेरी हँसी कभी 
दिखती आंसुओं की नमी भी 
यह सूखे पत्ते है दिलाते एहसास मुझे 
तू कहीं आसपास है मेरे 
छूते ही इन सूखे पत्तों को 
इक सिहरन सी दौड़ने लगती 
है तन बदन में मेरे 
बीते लम्हों की यादें और 
वह सारे सपनें 
संजोये थे जो हम दोनों नें मिलकर 
बिखर जाते हैं इधर उधर 
इक हूक सी उठती है सीने में मेरे 
और वो किताब के सूखे पत्ते 
रह रह कर तड़पाने लगते हैं मुझे
रह रह कर तड़पाने लगते हैं मुझे




जैसे बीते लम्हों की कोई धीमी सी आह हो।
हर पन्ना खोलूं तो यादें बिखर जाती हैं,
मानो वक्त ने लिखी कोई अनकही चाह हो।
कभी इन पत्तों में छुपी थी हँसी तेरी,
कभी आंसुओं की नमी भी समाई थी।
छू लूं तो लगता है फिर से जी लूं सब,
हर खुशबू में तेरी ही परछाई थी।
ये सूखे पत्ते नहीं, एहसासों का खजाना हैं,
जो वक्त के साथ और भी गहरा हो गया।
जितना दूर गया हूँ उन लम्हों से मैं,
उतना ही दिल उनके करीब हो गया।
महक रहे हैं अभी भी किताब के सूखे पत्ते,
जैसे तू कहीं पास ही ठहर गया हो…