"किताब के सूखे फूल"
धीमी सी इक आह लिए
महक रहे हैं अभी भी किताब के सूखे पत्ते
इन महकते पत्तों में
है खिलखिलाती तेरी हँसी कभी
दिखती आंसुओं की नमी भी
यह सूखे पत्ते है दिलाते एहसास मुझे
तू कहीं आसपास है मेरे
छूते ही इन सूखे पत्तों को
इक सिहरन सी दौड़ने लगती
है तन बदन में मेरे
बीते लम्हों की यादें और
वह सारे सपनें
संजोये थे जो हम दोनों नें मिलकर
बिखर जाते हैं इधर उधर
इक हूक सी उठती है सीने में मेरे
और वो किताब के सूखे पत्ते
रह रह कर तड़पाने लगते हैं मुझे
रह रह कर तड़पाने लगते हैं मुझे
जैसे बीते लम्हों की कोई धीमी सी आह हो।
हर पन्ना खोलूं तो यादें बिखर जाती हैं,
मानो वक्त ने लिखी कोई अनकही चाह हो।
कभी इन पत्तों में छुपी थी हँसी तेरी,
कभी आंसुओं की नमी भी समाई थी।
छू लूं तो लगता है फिर से जी लूं सब,
हर खुशबू में तेरी ही परछाई थी।
ये सूखे पत्ते नहीं, एहसासों का खजाना हैं,
जो वक्त के साथ और भी गहरा हो गया।
जितना दूर गया हूँ उन लम्हों से मैं,
उतना ही दिल उनके करीब हो गया।
महक रहे हैं अभी भी किताब के सूखे पत्ते,
जैसे तू कहीं पास ही ठहर गया हो…
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