Saturday, 25 April 2026

परछाइयों का शहर" गीत

"परछाइयों का शहर" 
गीत 
परछाइयों का शहर,पुकारे रात भर
है मिटने लगे निशां, निकलने को सहर 

रात चाँद भी धुएँ में, छुपकर रो रहा है,
टूटा यहाँ मनुआ अब, दर्द हो रहा है 
थामी थी जो कलाई,है छूट अब गई 
हर रोज़ मुझको ये फिर,क्यों बुला रहा है 

परछाइयों का शहर,पुकारे रात भर
है मिटने लगे निशां, निकलने को सहर 

दीवारों की आहट,अब भी कह रही है,
तन्हाईयां मेरी अब, तुमको ढूँढ रही है 
मैं लौटना भी चाहूँ, तो रास्ता नहीं,
बाहर है जाना मगर, द्वार भी नहीं है 

परछाइयों का शहर,पुकारे रात भर
हमें ढूंढते हैं निशां,लगी छुपने सहर

रेखा जोशी 

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