Thursday, 19 November 2020

जिंदगी है खेल, कोई पास कोई फेल 

इम्तिहान का रिज़ल्ट आते ही विद्यार्थियों की धड़कने बढ़ जाती है, कई लोग अपने पास होने का जश्न मनाते हैं तो कुछ लोग फेल होने के कारण मायूस हो जाते हैं और कई तो अपनी पढ़ाई भी बीच में ही छोड़ देते हैं l

 ऐसा किसी एक के साथ नही है ऐसे हजारों लाखों बच्चे हैं जो अपनी शिक्षा पूरी नही कर पाते लेकिन उनमें से कई लोग अपनी जिंदगी में सफल हुए है, सफलता के लिए डिग्री का होना आवश्यक नही है, सफल होने के सबसे जरूरी है आत्म विश्वास का होना l सबसे पहले तो खुद पर विश्वास करना होगा, अगर जिंदगी में एक बार फेल हो. गए तो आत्म निरीक्षण कर यह जानना होगा कि कहां पर गलती हुई है फिर अपने को सुधार कर नए सिरे से पढ़ाई शुरू करनी चाहिए,, अगर किसी विषय में आपकी रुचि नही है तो उन विषयों का चुनाव कर सकते हैं जिसमें आपकी रुचि हो l

अपने बुरे वक्त में अगर इंसान विवेक से काम ले तो वह अपनी किस्मत को खुद बदलने में कामयाब हो सकता है ,आत्म विश्वास,,दृढ़ इच्छा शक्ति ,लगन और सकारात्मक सोच किसी भी इंसान को सफलता प्रदान कर आकाश की बुलंदियों तक पहुंचा सकती है ।

रेखा जोशी

Thursday, 12 November 2020

तेरे बिना हर खुशी रही अधूरी

सब कुछ है दिया जिंदगी नें हमको

बिन मांगे हैं खुशियां मिली हज़ारों

..

तरस रहे मगर हम प्यार को तेरे

वो जिंदगी ही क्या जिसमें तुम न हो

..

तेरे बिना हर खुशी रही अधूरी

क्या करें हर खुशी में हूक उठे तो

..

याद करें हर पल हम तुम्हें हमेशा

बन मोती छलकते नयन से तुम हो

..

मिला न चैन इक पल भी तेरे बिना

न जाने फिर कब मिलोगे तुम हमको

रेखा जोशी

Sunday, 25 October 2020

अवचेतन मन की अदृश्य शक्ति

अवचेतन मन की अदृश्य शक्ति

अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझा जाए तो हमारी नींद की विभिन्न अवस्थाएं होती है और विभिन्न अवस्थाओं के समय दिमाग में उत्पन्न हो रही तरंगों की आवृत्ति को नापा जा सकता हैl जब हम सो रहे होते हैं तब आवृति कम हो जाती है और सुप्त अवस्था में किसी खास आवृत्ति पर हमें सपने दिखाई देते हैं l सुप्त अवस्था में हमारा अवचेतन मन जागृत होता है, यहां पर मैं एक सत्य घटना का उल्लेख करना चाहूँ गी l

एक औरत को उसका पति बहुत परेशान करता था, वह हर रोज़ शराब पी कर उसे मारता था और वह अबला नारी उस समय तो कुछ कर नहीं पाती थी लेकिन उसके भीतर क्रोध का ज्वालामुखी सुलगता रहता था l जब वह व्यक्ति सो जाता था तो वह औरत हर रोज़ उसके कान में बुदबुदाने लगती थी कि वह शराब के नशे में सड़क पर चल रहा है और सामने से ट्रक ने आ कर उसे टक्कर मार कर उसकी जान ले ली l न जाने कितने दिन यह क्रम यूँही चलता रहा और वह औरत उस व्यक्ति के कान में वही शब्द बार बार दोहराती रहीl उस औरत ने अनजाने में ही उस व्यक्ति के अवचेतन मन को आदेश दे कर उस घटना के अंजाम तक पहुंचा दिया, एक दिन सच में बिलकुल वैसा ही हुआ जैसा वह औरत अपने पति के कान में कहा करती थी, वह व्यक्ति शराब के नशे में सड़क पर जा रहा था और एक ट्रक ने उसे मार गिराया और उस व्यक्ति की घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गई l इस घटना के बाद उस औरत को बहुत पछतावा हुआ और उसकी मौत का कारण स्वयं को समझने लगी l दरअसल उस महिला ने अपने पति के अवचेतन मन का वशीकरण कर उसे आदेश दे कर उस दुर्घटना को अंजाम दे दिया था l

रेखा जोशी 

Friday, 16 October 2020

मुक्तक



जिंदगी है इक प्यारा सफर 
जी लो इसे तुम होकर निडर 
राह   में    होगी  गंदगी  भी 
साफ भी करना  होगा गटर

रेखा जोशी 

Monday, 12 October 2020

बिटिया

आई है बिटिया अँगना में मेरे
घर की दीवारें लगी है महकने
देखती हूँ नन्ही परी को मै जब
तैरता नयन में मेरा  वो बचपन
पापा का प्यार और माँ का दुलार
वही प्यारे पल छिन फिर लौट आए 
चहकती मटकती अँगना में खेले 
सुबह और शाम वह सबको नचाये
माँ के दुपट्टे से संवारे खुद को 
साड़ी पहन कर वह चोटी लहराये 
भरी दोपहर में छुपना अँगना में
वो घर घर  खेलना   संग गुडिया के
घर आँगन मेरा लगा है चहकने
जब मधुर हसी से वोह खिलखिलाये
आई है बिटिया अँगना में मेरे
घर की दीवारें लगी है महकने

रेखा जोशी

शीश अपना ईश के आगे झुकाना चाहिए


शीश अपना ईश के आगे झुकाना चाहिए
नाम मिलकर हर किसी को साथ गाना चाहिए
....
पीर हरता हर किसी की ज़िंदगी में वह सदा
नाम सुख में भी हमें तो याद आना चाहिए
.....
पा लिया संसार सारा नाम जिसने भी जपा
दीप भगवन नेह का मन में जलाना चाहिए
.....
गीत गायें प्रेम से दिन रात भगवन हम यहाँ
प्रीत भगवन आप को भी तो निभाना चाहिए
....
हाथ अपने जोड़ कर हम माँगते तुमसे दया
प्रभु कृपा करना हमें अपना बनाना चाहिए
रेखा जोशी

माँ शारदे का पुजारी

माँ शारदे का पुजारी 

साहित्य समाज का आईना होता है और साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से सामाजिक गतिविधियों का आईना समाज को दिखाना चाहता है। वह अपने विचारों को कलम से बांधकर दूर दूर तक पहुंचाना चाहता है, लेकिन कहते हैं कि जहां मां सरस्वती का वास होता है, वहां माता लक्ष्मी का पदार्पण नहीं होता। मां शारदे का पुजारी लेखक, नई-नई रचनाओं का सृजन करने वाला, समाज को आईना दिखाकर उसमे निरंतर बदलाव लाने की कोशिश में रत, ज़िन्दगी भर आर्थिक कठिनाइयों से जूझता रहता है।

इसी आर्थिक मजबूरी के चलते कई कलमकार अपने विचारों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित नहीं कर पाते। उनके लिए अपनी अभिव्यक्ति को प्रकाशित करने के लिए साझा संकलन या अपने साथी रचनाकारों की रचनाओं के साथ पुस्तक का प्रकाशन एक सुखद विकल्प है, जिसके लिए उन्हें थोड़ी बहुत सहयोग राशि व्यय करनी पड़ती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर कोई उच्च कोटि की रचना का रचनाकार है, तो वह सम्मान पाने का हकदार है, चाहे उसकी रचनाएं सहयोग राशी लेकर प्रकाशित हुई हों, लेकिन उनकी उत्कृष्ट रचनाएं समाज के उत्थान या समाज को नई दिशा की ओर लेकर जाने वाली होनी चाहिए।

रचनाकार द्वारा सृजन की गई शक्तिशाली रचना समाज एवं देश में क्रान्ति तक ला सकती है। गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर, शरतचंद्र जी, मुंशी प्रेमचंद जी जैसे अनेक लेखक हिंदी साहित्य में जीती जागती मिसाल हैं, जिन्होंने समाज में अपनी लेखनी के माध्यम से जागृति पैदा की थी। समय बदला, समाज का स्वरूप बदला और अब तो नये लेखकों की बाढ़ सी आ गई है। साहित्य लेखन में भी बदलाव आने लगा और हर कोई अपनी रचनाओं को सहयोग राशि द्वारा प्रकाशित करवाने की होड़ में जुट गया। अक्सर सहयोग राशि देकर ऐसी अनेक रचनाएं प्रकाशित होने लगी हैं, जो साहित्य के मापदण्ड के पैमाने पर सही नहीं उतरतीं और साहित्य का मानक स्तर गिर रहा है।

ऐसे निम्नस्तरीय साहित्य और उनके रचनाकारों को सम्मानित करने का और उनका सम्मान पाने का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता। यह तो सम्मान खरीदने जैसा हो गया। सहयोग राशि दो, रचना प्रकाशित करवाओ और सम्मान पाओ, जैसा कि अक्सर देखने में आ रहा है, जो नहीं होना चाहिए।

रेखा जोशी 

Sunday, 27 September 2020

संस्मरण

संस्मरण 
करीब बीस वर्ष पहले की बात है जब मैं अपने कार्यकाल के दौरान महाविद्यालय की छात्राओं का एक ट्रिप लेकर शिमला गई थी, मेरे साथ तीन और प्राध्यापिकायें भी थी, हम ल़डकियों के सथ कालका से शिमला टोय ट्रेन से जा रहे थे, गाड़ी खचाखच भरी हुई थी हमारी सीट के सामने एक युवा दंपति आ कर खड़ा हो गया, युवती की गोद में एक गोल मटोल सुन्दर सा बच्चा था जिसे चलती गाड़ी में बच्चे के साथ खड़े रहने में उस युवती को बहुत असुविधा हो रही थी चूंकि मैं सीट पर बैठी हुई थी मैंने उस युवती से कहा जब तक आपको सीट नहीं मिलती आप बच्चे को मुझे पकडा दें, तो उसने अपने बच्चे को मुझे पकडा दिया और उस बच्चे के साथ छात्राएँ खेलने लगी, वह दंपति भी हम सबके साथ घुलमिल गया, बातों ही बातों में उनका स्टेशन आ गया और वह दोनों झटपट गाड़ी से उतर गए और हमें बाय बाय करने लगे, गाड़ी वहाँ बहुत ही कम समय के लिए रुकती है मैंने जोर से चिल्ला कर कहा, "अरे अपना बच्चा तो लेते जाओ" किसी तरह जल्दी जल्दी बच्चे को उन्हें सौंपा की गाड़ी चल पडी, गाड़ी में बैठे सभी लोग हँस रहे थे और उनके साथ हम सब भी हँसने लगे l
रेखा जोशी 

Wednesday, 16 September 2020

हिन्दी दिवस पर


सभी मित्रों को हिन्दी दिवस की हार्दिक बधाई

अपनी हिंदी से हमें, मिलती है पहचान 
भाषा है यह देश की, है हमें अभिमान
.. 
खाएँ कसम आज सभी, सब दें इसे सम्मान
अपनाएँ इसको सभी, भारत की है शान
.. 
पावन धरती देश की, हिन्दी सब की जान 
गंगा जमुना सी बहे, देश का स्वाभिमान 
हिन्दी से हैं सब जुड़े, जाति धर्म सब भिन्न 
एक सूत में पिरो दिया , भाषा का यही गुण 
.. 
समृद्ध लेखन है यहाँ, भरा भंडार ज्ञान 
हिन्दी दिल के पास है, भारत का है मान 

रेखा जोशी 




नाचती गाती गुनगुनाती यह जिंदगी

अक्सर
मै देखा करती हूँ
ख़्वाब खुली आँखों से
अच्छा लगता है
लगा कर सुनहरे पँख
जब आकाश में पंछियों सा 
उड़ता है मेरा मन

छिड़ जाते है जब तार
इंद्रधनुष के
और
बज उठता है
अनुपम संगीत
थिरकने लगता है
मेरा मन
होता है सृजन मेरी
कल्पनाओं का
जहां मुस्कुराती है 
यह ज़िन्दगी
जहां नाचती गाती और गुनगुनाती है 
यह जिंदगी 

रेखा जोशी

शून्य है मानव

पूछा मैने
सूरज और
चाँद सितारों से
हस्ती क्या तुम्हारी
विस्तृत ब्रह्मांड के
विशाल महासागर में
जिसमे है समाये
असंख्य तुम जैसे
सूरज आग उगलते
साथ लिए अपने
अनेक चाँद
टिमटिमा रहे जिसमे
अनेकानेक तारे
निरंतर घूम रही जिसमे
असंख्य आकाशगंगाएँ
देख पाती नही जिसे
आाँखे हमारी
रहस्यमय अनगिनत जिसमे
विचर रहे पिंड
और
इस घरती पर
मूर्ख मानव
झूठे गरूर में लिप्त 
अभिमान में डूबा हुआ
कर रहा प्रदर्शन
अपनी शक्ति का
अपने अहम का
अपनी सत्ता का
कर रहा पाप अनगिनत
देखता है आकाश रोज़
नही समझ पाया
अपनी हस्ती
शून्य है मानव
विशाल महासागर में

रेखा जोशी

Monday, 7 September 2020

संस्मरण

बात जून 1980 की है जब मेरे पति की श्रीनगर में नई नई बदली हुई थी, उनका आफिस एक बहुत ही पुरानी ईमारत में था और वहाँ उन्हें आफिस के साथ रहने के लिए ऊपर की मंजिल पर दो कमरे मिले हुए थे बाकी सारी बिल्डिंग वीरान और बंद पड़ी हुई थी, नीचे की मंजिल पर चौकीदार रहता थाl गर्मी की छुट्टियों में मैं भी अपने छोटे छोटे दो बेटों को लेकर वहाँ पहुंच गई l मेरे पति ने वहां नया नया चार्ज लिया था इसलिए वह देर रात तक फाइलें चेक कर रहे थे रात के 12 बज रहे कि अचानक ऊपर से किसी उतरने की आवाज सुनाई दी, लकड़ी की सीढ़ियां होने के कारण ठक ठक पांवों की आवाज ने मुझे जगा दिया, आवाज सुन कर मेरे पति भी आफिस से बाहर आ गए और उन्होंने सीढियों पर जा कर देख कि एक बहुत बड़ी काले रंग की बिल्ली सीढियों पर खड़ी थी, मेरे पति हंसते हुए कमरे में आ गए और बोले, "अरे रेखा वह तो एक बिल्ली थी, तुम आराम से सो जाओ" l उनकी बात सुन मैं भी सो गई, और बात खत्म हो गई l

कई सालों बाद हम दोनों उस किस्से को याद कर रहे थे कि अचानक मैं डर गई क्योंकि बिल्लियों के चलने की तो आवाज ही नहीं होती उनके पंजों के नीचे तो पैड होते हैं यानि कि उनके पंजे गद्देदार होते हैं तो फिर वह ठक ठक करके कौन सीढ़ियां उतर रहा था l

रेखा जोशी

Sunday, 6 September 2020

मत खेलो कुदरत से खेल

काटो पेड़
जंगल जंगल
मत खेलो
कुदरत से खेल
कर देगी अदिति
सर्वनाश जगत का
हो जायेगा
धरा पर
सब कुछ फिर मटियामेल
कुपित हो कर
प्रकृति भी तब
रौद्र रूप दिखलाएगी
बहा ले जायेगी सब कुछ
संग अपने जलधारा में
समा जायेगा
जीवन भी उसमे
कुछ नही 
बच पायेगा शेष 
फिर
कुछ नही
बच पायेगा शेष
रेखा जोशी

Friday, 4 September 2020

शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

पूजें माँ को हम सभी, माँ से मिलता ज्ञान
प्रथम गुरु माँ है बनी, माँ का करें सम्मान
मार्ग दर्शक वो बने,  उसका करें  सम्मान 
राह दिखाये जो हमें, गुरु उसे ही मान
शिक्षा दे कर गुरु हमें, कर राष्ट्र निर्माण 
सही गलत के भेद से, करवाता पहचान 
. . 
नमन करते शीश झुका, गुरु ज्ञान भंडार 
पहचान जगत से करा, करता  बेड़ा पार 
कृपा गुरु की जब मिले , मिलते चारो धाम 
अज्ञानता को जो हरे, करते उसे प्रणाम 

रेखा जोशी 






Sunday, 30 August 2020

गरजता बरसता सखी है आया सावन

मौसम हुआ है आज री सखी मनभावन 
लिपट  रहा  है बदरा  से गगन का दामन 
शीतल  हवाओं  से झूमता आज तन मन
गरजता  बरसता  सखी   है आया सावन

रेखा जोशी 

दर्द दिल का दिल में ही छिपाना होगा


दर्द  दिल  का  दिल  में  ही  छिपाना  होगा 
दिल  अपने  को  खुद  ही  समझाना  होगा 
दिखा नहीं सकते जख्में दिल हम किसी को 
रोग  लगा  दिल   का  उसे  मिटाना   होगा 

रेखा जोशी 


Wednesday, 26 August 2020

डूबता सूरज ढलती शाम

गोवा का डोना पोला टूरिस्ट स्थल ,चारों ओर मौज मस्ती का आलम और टूरिस्ट सेनानियों का जमघट ,ऐसा लग रहा था मानो पूरी दुनियां यहाँ इकट्ठी हो गई हो \सबको इंतजार था सूरज के डूबने का ,बेहद आकर्षक नजारा था \अपने चारों ओर लालिमा लिए सूरज धीरे धीरे क्षतिज की ओर बढ रहा था और सबकी आखें दूर आकाश पर टिकी हुई थी \समुद्र इस रंगीन स्थल को अपने में लपेट कर लहरों की धुन पर ठंडी हवा के तेज़ झोंकों से सबके दिलों को झूले सा हिला रहा था \कई देसी, विदेशी सेनानी ओर भीड़ में कई नवविवाहित जोड़े रंग बिरंगी ड्रेसिज़ और सिर पर अजीबोगरीब हैट पहने ,हाथों में हाथ लिए रोमांस कर रहे थे \कुछ मनचले युवक टोली बना कर घूम रहे थे और कई दम्पति अपने बच्चों सहित छुट्टियाँ मना रहे थे \ आकाश में सूरज तेज़ी से धरती के दूसरे छोर जहाँ दूर दूर तक पानी ही पानी दिखाई दे रहा था छूने को बेताब हो रहा था ,उसकी लालिमा समुद्र में बिखरने लगीं थी और धीरे धीरे लाल होता समुद्र सूरज को अपने आगोश में लेने को बैचेन हो रहा था\ अब कई लोग हाथों में कैमरे लिए उस अद्धभुत नजारे को कैद करने जा रहे थे\ तभी मेरी नजर दूर बेंच पर पड़ी ,एक बुजुर्ग जोड़े पर पड़ी जो आसमान की ओर टकटकी लगाये उस डूबते सूरज को देख रहा था ,उनके चेहरे पर खिंची अनेकों रेखाए जीवन में उनके अनगिनत संघषों को दर्शा रही थी,तभी वह दोनों धीरे से बेंच से उठे ,एक दूसरे का हाथ थामा और धीमी चाल से रेलिंग की ओर बढने लगे \हिलोरें मारती हुई समुद्र की विशाल लहरों का शोर उस ढलती शाम की शांति को भंग कर रहीं था\ लाल सूरज ने समुद्र के पानी की सतह को लगभग छू लिया था ,ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे एक विशालकाय आग का गोला पानी के उपर पड़ा हो \ भीड़ में से अनेकों हाथ कैमरा लिए उपर उठ चुके और अनेक फलैश की रोशनियाँ इधर उधर से चमकने लगी,परन्तु मेरी नजरें उसी बुज़ुर्ग दम्पति पर टिकी हुई थी \ अचानक उस बुज़ुर्ग महिला ने अपना संतुलन खो दिया और वह गिरने को हुई ,जब तक कोई उन्हें संभालता उनके पति कि बूढी बाँहों ने उन्हें थाम लिया \उन दोनों ने आँखों ही आँखों में इक दूसरे को देखा और उनके चेहरे हलकी सी मुस्कराहट के साथ खिल गए \तभीमै वहां पहुंच चुकी थी ,”’आंटी ,आप ठीक तो हैं ,” अचानक ही मै बोल पड़ी\ लेकिन उतर दिया उनके पति ने ,”बेटा पचपन साल का साथ है ,ऐसे कैसे गिरने देता”\मैंने अपना कैमरा उनकी ओर करते हुए पूछा ,”एक फोटो प्लीज़ और उनको डूबते सूरज के साथ अपने कैमरे में कैद कर लिया\सूरज अब जल समाधि ले चुका था \भीड़ भी अब तितर बितर होने लगी थी, लालिमा कि जगह कालिमा ने लेना शुरू कर दिया ,सुमुद्र की लहरें चट्टानों से टकरा कर शोर मचाती वापिस समुद्र में लीन हो रही थी परन्तु मेरी निगाहें उसी दम्पति का पीछा कर रही थी ,हाथों में हाथ लिए वह दोनों दूर बाहर की ओर धीरे धीरे चल रहे थे \जिंदगी की ढलती शाम में उनका प्यार सागर से भी गहरा था \ परछाइयां लम्बी होती जा रही थी और मै उसी रेलिंग पर खड़ी सुमुद्र की आती जाती लहरों को निहार रही थी ,मन व्याकुल सा हो रहा था ,कल फिर सूरज उदय होगा ,शाम ढलते ही डूब जाये गा परन्तु पचपन साल का प्यार और साथ, उनकी ढलती जिंदगी की शाम का एक मात्र सहारा \

रेखा जोशी 

Monday, 10 August 2020

ज़िंदगी की नई सुबह


पल पल यूँ ही हमारी गुज़रती ज़िंदगी
हर पल यहाँ नये पल में ढलती ज़िंदगी
हर दिन सूरज लाये आशा की नवकिरण
रोशनी दामन हमारे भरती ज़िंदगी

अगर सुबह की रौशनी को अपने दामन में भरना चाहते हो तो मायूसियों से दामन छुड़ाना पड़ेगा | हार और जीत ज़िंदगी के दो पहलू है लेकिन हार को जीत में बदलना ही ज़िंदगी है ,जीत के लिए संघर्षरत इंसान अपनी गलतियों से सीखता हुआ ,चाहे देर से ही अंतः अपनी मंज़िल पा ही लेता है ,बस सिर्फ ज़िंदगी की नई सुबह को ओर कदम बढ़ाने का जज़्बा होना चाहिए | अक्सर लोग ज़िंदगी की परेशनियों से घबरा जाते है और उन से बचने के लिए नए नए रास्ते खोजना शुरू कर देते और कई बार तो वह खुद को कई चक्करों में बुरी तरह से फंसा लेते है जहां से उनका निकलना बहुत कठिन हो जाता है ,कभी ज्योतिषों ,तांत्रिकों के चक्कर में तो कभी उधारी की दलदल में फंस कर रह जाते है , यहां तक कि कई लोग अवसाद की स्थिति में पहुंच जाते है ,कभी कभी तो लोग अपनी नाकामियों से परेशान हो कर आत्महत्या कर लेते है |
.
इस संसार में हर इंसान की जिंदगी में अच्छा और बुरा समय आता है ,लेकिन जब वह उन परस्थितियों का सामना करने में अपने आप को असुरक्षित एवं असमर्थ पाता है तो उस समय उसे किसी न किसी के सहारे या संबल की आवश्यकता महसूस होती है ,जिसे पाने के लिए वह इधर उधर भटक जाता है ,जिसका भरपूर फायदा उठाते है यह पाखंडी पोंगे पंडित |अपने बुरे वक्त में अगर इंसान विवेक से काम ले तो वह अपनी किस्मत को खुद बदलने में कामयाब हो सकता है ,आत्म विश्वास ,दृढ़ इच्छा शक्ति, लगन और सकारात्मक सोच किसी भी इंसान को सफलता प्रदान कर आकाश की बुलंदियों तक पहुंचा सकती है ,हम जिस नजरिये से जिंदगी को देखते है जिंदगी हमे वैसी ही दिखाई देती है लेकिन केवल ख्याली पुलाव पकाने से कुछ नही होता ,जो भी हम सोचते है उस पर पूरी निष्ठां और लगन से कर्म करने पर हम वो सब कुछ पा सकते है जो हम चाहते है,हम अपने भीतर की छुपी हुई ऊर्जा को पहचान नही पाते | ईश्वर ने हमे बुद्धि के साथ साथ असीम ऊर्जा भी प्रदान की है ,अक्सर मानव भूल जाता है कि अगर वह किसी भी कार्य को पूरे मन ,उत्साह और जी जान से करे तो उसमे ईश्वर भी उसकी सहायता करता है |
.
कहते है ”बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध ले ,हम सब जानते है हर रात के बाद एक नई सुबह आती है ,शाम का सूरज रात में ढल जाता है और फिर सुबह का सूरज एक नई आशा की किरण लेकर आता है ,कहते है उम्मीद पर दुनिया कायम है, अपनी नाकामियों पर निराश न हो कर अगर नए सिरे से पूरे जोश के साथ ज़िंदगी की शुरुआत करे तो हमे सफल होने से कोई रोक नहीं सकता |

रेखा जोशी 

Wednesday, 5 August 2020

तिरंगे का करें सम्मान आँखों पे

रहेगी देश की अब शान आँखों पे
तिरंगे का करें सम्मान आँखों पे
जहाँ में देश चमकेगा सदा भारत
ज़ुबा पर अब रहेगा नाम आँखों पे
करें हम नमन भारत के जवानों को
शहीदों का रखेंगे मान आँखों पे
….
करेंगे खत्म घोटाले सभी मिल कर
रखेंगे देश का अभिमान आँखों पे
मिला कर कदम चलते ही रहेंगे हम
रखेंगे देश की अब आन आँखों पे
रेखा जोशी

Friday, 31 July 2020

भारत के वीर जवान

तैनात हैं सीमा पर
कर रहे वोह देश की रक्षा 
भारत के वीर जवान 
निभा रहे वो धर्म अपना 
निछावर  हो कर देश अपने पर
.. 
बरस पड़ना बन कहर दुश्मन पर 
गोली  सीने पर ही  खाना  मगर 
मत दिखलाना पीठ कभी तुम 
शहीद जो होते हैं वतन पर 
रहते हैं  वोह सदा अमर 
... 
रखना तुम तिरंगे का मान 
तेरे हाथों में है भैया 
माँ भारती का सम्मान 
देश की माटी सर आँखों पर 
माँ के लिए होना कुर्बान
... 
माथे टीका,  राखी कलाई पर 
विजयी भव की देती बहना दुआएँ  
आरती तेरी उतारेंगी  फिर 
लौट के जब आओगे अपने घर
लौट के जब आओगे अपने घर 

रेखा जोशी 
 

Friday, 10 July 2020

बाल कविता


बाल कविता 

चलो आज आसमाँ की 
करते हैं सैर 
बादलों के रथ पर 
हो के सवार
निकल पड़े नन्हें मिया 
थाम किताबें 
सीढ़ी से पहुँचे
चंदा के द्वार
देख अद्भूत  नजारा 
गगन का 
हुआ दिल बाग बाग 
क्या सुहाना था मौसम 
मुस्करा रहा था चांद 
चाँदनी रात और शीतल हवा 
कितना सुन्दर था सपना सुहाना 
खुल गई नींद लेकिन 
आँखों में अभी भी थे वो 
सुन्दर नजारे 
वो बादल, आसमाँ 
और 
मुस्कराता चांद 

रेखा जोशी 


Saturday, 20 June 2020

पापा जैसा कोई नही --फादर्स डे पर [मेरी पुरानी पोस्ट ]

आज मेरे पापा हमारे साथ नहीं है वह हमें छोड़ कर परमात्मा में लीन हो चुके हैं l बस अब तो हमारी यादो में ही रह गए l वो जहां कहीं भी हो खुश रहें और अपना आशिर्वाद हमें देते रहें l. 
           
अमृतसर के रेलवे स्टेशन पर गाड़ी से उतरते ही मेरा दिल खुशियों से भर उठा ,झट से ऑटो रिक्शा पकड़ मै अपने मायके पहुंच गई,अपने बुज़ुर्ग माँ और पापा को देखते ही न जाने क्यों मेरी आँखों से आंसू छलक आये , बचपन से ले कर अब तक मैने अपने पापा के घर में सदा सकारात्मक उर्जा को महसूस किया है ,घर के अन्दर कदम रखते ही मै शुरू हो गई ढेरों सवाल लिए ,कैसो हो?,आजकल नया क्या लिख रहे हो ?और भी न जाने क्या क्या ,माँ ने हंस कर कहा ,”थोड़ी देर बैठ कर साँस तो ले लो फिर बातें कर लेना ”| अपनी चार बहनों और एक भाई में से मै सबसे बड़ी और सदा अपने पापा की लाडली बेटी रही हूँ ,शादी से पहले कालेज से आते ही घर में जहाँ मेरे पापा होते थे मै वहीं पहुंच जाती थी और जब तक पूरे दिन का लेखा जोखा उन्हें बता नही देती थी तब तक मुझे चैन ही नही पड़ता था | मै और मेरे पापा न जाने कितने घंटे बातचीत करते हुए गुज़ार दिया करते थे ,समय का पता ही नहीं चलता था और मेरी यह आदत शादी के बाद भी वैसे ही बरकरार रही ,ससुराल से आते ही उनके पास बैठ जाती थी लेकिन मेरी मम्मी हमारी इस आदत से बहुत परेशान हो जाती थी ,वह बेचारी किचेन में व्यस्त रहती और मै उनके साथ घर के काम में हाथ न बंटा कर अपने पापा के साथ गप्प लगाने में व्यस्त हो जाती थी ,लेकिन आज अपने पापा के बारे में लिखते हुए मुझे बहुत गर्व हो रहा है कि मै एक ऐसे व्यक्ति की बेटी हूँ जिसने जिंदगी की चुनौतियों को अपने आत्मविश्वास और मनोबल से परास्त कर सफलता की ओर अपने कदम बढ़ाते चले गए |

मात्र पांच वर्ष की आयु में उनके पिता का साया उनके सर के ऊपर से उठ गया था और मेरी दादी को अपने दूधमुहें बच्चे ,मेरे चाचा जी के साथ अपने मायके जा कर जिंदगी की नईशुरुआत करनी पड़ी थी जहां उन्होंने अपनी अधूरी शिक्षा को पूरा कर एक विद्धालय में प्रचार्या की नौकरी की थी और मेरे पापा अपने दादा जी की छत्रछाया में अपने गाँव जन्डियाला गुरु ,जो अमृतसर के पास है ,में रहने लगे | उस छोटे से गाँव की छोटी छोटी पगडण्डीयों पर शुरू हुआ उनकी जिंदगी का सफर ,मीलों चलते हुए उनकी सुबह शुरू होती थी ,वह इसलिए कि उनका स्कूल गाँव से काफी दूर था ,पढ़ने में वह सदा मेधावी छात्र रहे थे और इस क्षेत्र में उनके मार्गदर्शक रहे उनके चाचाजी जी जो उस समय एक स्कूल में अध्यापक थे | दसवी कक्षा से ले कर बी ए की परीक्षा तक उनका नाम मेरिट लिस्ट में आता रहा था ,बी ए की परीक्षा में उन्होंने पूरी पंजाब यूनिवर्सिटी में तृतीय स्थान प्राप्त कर अपने अपने गाँव का नाम रौशन किया था |धन के अभाव के कारण,पढ़ने के साथ साथ वह ट्यूशन भी किया करते थे ताकि मेरी दादी और चाचा जी की जिंदगी में कभी कोई मुश्किलें न आने पाए | दो वर्ष उन्होंने अमृतसर के हिन्दू कालेज में भौतिक विज्ञान की प्रयोगशाला में सहायक के पद पर कार्य किया और आगे पढ़ाईज़ारी रखने के लिए धन इकट्ठा कर अपने एक प्राध्यापक प्रो आर के कपूर जी की मदद से आदरणीय श्री हरिवंशराय बच्चन के दुवारा इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के भौतिकी विभाग में एम् एस सी पढ़ाई के लिए प्रवेश लिया |

अपने घर से दूर एम् एस सी की पढ़ाई उनके लिए एक कठिन चुनौती थी,यहा आ कर मेरे पापा का स्वास्थ्य बिगड़ गया ,किसी इन्फेक्शन के कारण वह ज्वर से पीड़ित रहने लगे और उप्पर से धन का आभाव तो सदा से रहता रहा था ,इसलिए यहाँ पर भी वह पढ़ने के साथ साथ ट्यूशन भी करते रहे जिसका सीधा असर उनकी पढ़ाई पर पड़ा ,जैसे तैसे कर के वह प्रथम वर्ष के पेपर दे कर वापिस अमृतसर आगये |इसी समय मेरी मम्मी इनकी जिंदगी सौभाग्य ले कर आई .मेरे चाचा जी बैंक में नौकरी लगने के कारण पापा घर परिवार कि ज़िम्मेदारी माँ पर छोड़ कर अपनी पढ़ाई का द्वितीय वर्ष पूरा करने वापिस इलाहाबाद चले गए,उसके बाद अमृतसर के हिन्दू कालेज में लेक्चरार के पद पर आसीत हुए ,उसी कालेज में हेड आफ फिजिक्स डिपार्टमेंट बने ओए वाइस प्रिंसिपल के पद से रिटायर्ड हुए |उसके बाद वह लेखन कार्य से जुड़ गए ,हिंदी साहित्य में उनकी सदा से ही रूचि रही है ,उन्होंने श्रीमद्भागवत गीताका पद्धयानुवाद किया,उनके दुवारा लिखी गई पुस्तके , मै तुम और वह ,तुम ही तुम ,आनंद धाम काफी प्रचलित हुई और उन्हें कई पुरुस्कारों से भी सम्मानित किया गया |

पापा हम सभी बहनों और भाई के गुरु ,पथप्रदर्शक और मित्र रहें है ,उन्ही की दी हुई शिक्षा ,प्रेरणा और संस्कार है जिसके चलते हम सभी ने नौकरी के साथ साथ बहुत सी उपल्ब्दियाँ भी हासिल की है |इस वृद्धावस्था में भी उनका मनोबल बहुत ऊंचा है ,आज भी अपने कार्य वह स्वयम करना पसंद करते है ,मेरी ईश्वर प्रार्थना है वह सदा स्वस्थ रहे और अपना लेखन कार्य करते रहे |

रेखा जोशी
फरीदाबाद

Friday, 19 June 2020

मुक्तक

पहले पूरे जगत में फैलाई कोरोना महामारी
है भारत से ले लिया अब पंगा पड़ेगा तुमको भारी
अपनी औकात में रह बहुत कर ली तूने चालबाजियां
बन कर दोस्त घोंपता छुरा पीठ में करे सदा गद्दारी 

रेखा जोशी 
फरीदाबाद 




Friday, 12 June 2020

मुक्तक प्यार का बंधन

प्यार का बंधन संग संग हम निभाया करेंगे 
बच्चों को गोदी में हम  झूला झुलाया करेंगे 
जियेंगे  उनके संग संग फिर बचपन दोबारा 
अपने  बचपन  की बातें  उन्हें बताया करेंगे

रेखा जोशी 

Thursday, 11 June 2020

छोड़ के मोह माया को यहाँ से जाना इक दिन

अपने प्यारे रिश्तों का साथ हमने निभाना है 
जब तक तन में जान कर्म अच्छे करते जाना है
छोड़ के मोह माया को यहाँ से जाना इक दिन 
जीवन सफर में जो मिले प्यार से अपनाना है 
..
परिंदे  कब तलक रहते  कैद बंद पिंजरों  में 
उड़ान भरना फितरत ना कोई आशियाना है 
..
चार दिन की चाँदनी है जी भर के जी ले यहाँ 
सब छूट जायेगा बन्दे, दो दिन का ठिकाना है 
अकेले आए दुनिया में जाना हमें अकेले  
है झूठे सब बंधन मौत को गले लगाना है 

रेखा जोशी 









किस मोड़ पर जिंदगी ले आई

कैसी मैंने किस्मत है पाई

मेरी वफा तुझे रास न आई

.

सिवाय दर्द के मिला कुछ नहीं

तू तो बालम निकला हरजाई.

.

तूने बेदर्दी प्यार न जाना

फ़ितरत तेरी मैं न समझ पाई

.

काश न मिलते मुझे जिंदगी में

दिल लगा कर सजन मैं पछताई

..

जाओ तुमको माफ किया मैंने

किस मोड़ पर जिंदगी ले आई

रेखा जोशी

Tuesday, 9 June 2020

सुबह लाती फिर खुशियों की माला सजन

जब  रात में सिमट जाता उजाला सजन
सुबह लाती फिर खुशियों की माला सजन
,
देख   तेरे   नैन  हम  देखते  रह गये
भूल गये फिर सदा  मधुशाला  सजन
,
हर कर्म हम करेंगे साजन साथ साथ
रंग में अपने हमें  रंग डाला सजन
,
सुन्दर सलोना  बनायेंगे घर अपना
संग संग खायेंगे फिर निवाला सजन
,
साथी हाथ बढ़ा कर देना साथ सदा
संग जो तुम हो बना घर शिवाला सजन

रेखा जोशी

Monday, 8 June 2020

गीतिका

गीतिका 

तड़पते  रहे  लेने  को साँस ज़िन्दगी में
जी रहे  जीने के लिये आस ज़िन्दगी में
....
बुझ गये दिये जले थे जो पलकों में कभी
टूटते रहे   मेरे   एहसास  ज़िन्दगी में
...
उड़ गये पत्ते शाख से टूट कर यहाँ वहाँ
ठूठ  खड़ा  निहार रहा उदास ज़िन्दगी में
...
खो गये जज़्बात है  जीवन आधा अधूरा
जी रहे लेकर अनबुझी प्यास ज़िन्दगी में
....
रुकने को है साँस देख ली दुनिया यहाँ
नैन बिछाये मौत खड़ी पास ज़िन्दगी में
...

रेखा जोशी

Monday, 1 June 2020

है जीवन यहाँ बस दो दिन का मेला

है जीवन यहाँ बस दो दिन का मेला
रहता सुलझता झमेले पे झमेला
न दिन को चैन न रात को ही आराम 
पंछी आता अकेला जाता अकेला 
रेखा जोशी 

Wednesday, 27 May 2020

डोलती रहेगी जीवन नैया


समुद्र तट के बैठ किनारे 
सुन रहीं हूँ शोर 
आती जाती, उठती गिरती
लहरों का 
डोलती रहेगी जीवन नैया भी 
सुख दुख की लहरों पर 

आगे पीछे, झूम रही 
मदमस्त लहरे 
जैसे झूले पवन संग झूले 
आगे पीछे 
क्या है जीवन हमारा 
झूलता ही रहता है सदा 
सुख और दुख की लहरों पर 

सूरज चूम रहा
सागर का आंचल 
रंग सिंदूरी चमक रहा 
आसमां भरा गुलाल 
ढलती है शाम 
फिर होगी सुबह होगा नव नाम 
और जीवन  ऐसे ही 
चलता  रहेगा 
सुख दुख की लहरों पर 

रेखा जोशी 

Monday, 25 May 2020

मुक्तक

दिल को कलाकार की कलाकारी लुभाती 
भर  देता  जीवन  पत्थर   मूरत  भी भाती 
रेतीले  मरूस्थल  में  खिल  उठता  जीवन 
लगे   ऐसे   मूरत   पत्थर   की  मुस्कराती 

रेखा जोशी 

Friday, 22 May 2020

मुक्तक

आसमान  में चाँद तारे जगमगायेंगे 
खिले फूल बगिया भंवरे गुनगुनायेंगे
गीत गाये मधुर कुहूक कुहूक कोयलिया 
आपस में प्यार भरे जब दिल मिल जायेंगे 

रेखा जोशी 

Thursday, 21 May 2020

हे श्याम साँवरे

हे श्याम साँवरे गौ मात के रखवाले तुम ।
गौ रक्षा कर गोवर्धन पर्वत उठाने वाले तुम ।
दया करो दया करो सुनो फिर मूक पुकार तुम ।
कटती बुचड़खाने में आ कर उद्धार करो तुम ।।

हे श्याम साँवरे खाने को मिले घास नही ।
खा रही कूड़ा करकट कोई उसके पास नही ।
डोलती है लावारिस कोई उनका वास नही।
दीनदयाला अब तेरे सिवा कोई आस नही ।।

हे श्याम साँवरे सुनो पुकार कामधेनु की।
संवारों तुम ज़िन्दगी माँ तुल्य कामधेनु की।
जर्जर काया बह रहे आँसू तुम्हे पुकारें ।
याद आयें धुन मधुर बंसी की तुम्हे पुकारें

रेखा जोशी 

Sunday, 17 May 2020

लॉक डाउन 4.0

कोरोना वायरस का कहर पूरे विश्व में व्याप्त है, सारी दुनिया इससे लड़ रही है, भारत में लॉक डाउन 4.0 शुरू होने जा रहा है लेकिन कुछ शर्तों के साथ, धीरे धीरे कई जगह छूट भी दी जा रही हैl धीरे धीरे जिंदगी को ढर्रे पर लाने की कोशिश भी है, जैसे आंशिक रूप से रेल सेवा शुरू हो गई है ग्रीन जोन में काफी हद तक जिंदगी समान्य होती जा रही है, ऑरेंज जोन में भी कुछ छूट दी गई है l कोरोना का कहर जल्दी खत्म होने वाला नहीं और यह अब सब जान गए है कि हमें अब कोरो ना के साथ ही रहना पड़ेगा क्योंकि अब घर में लॉक डाउन होने के कारण लोगों को परेशानी होने लगी है, कई लोगों के काम धंधे बंद पड़े हैं, बच्चों की पढ़ाई चाहे ऑन लाइन हो रही है लेकिन सारा दिन मोबाइल और कंप्युटर पर बैठे रहने से एक तो उनके सिर में दर्द रहने लगा है दूसरे कोई शारीरिक व्यायाम न होने के कारण कई प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोगों का खतरा बढ़ रहा है l लॉक डाउन के चलते देश की आर्थिक स्थिति भी गिर रही है l लॉक डाउन 4.0 में सारी स्थिति को ध्यान में रखते हुए आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने राज्यों को अपने स्तर पर स्थिति से निपटने को कहा है और आर्थिक सहायता भी प्रदान करने की बात की है l

कोरोना की जंग से जीतने के लिए हम सबको सुरक्षा नियमों के पालन के साथ साथ अपने इम्यून तंत्र को भी शक्तिशाली बनाना होगा ताकि हर कार्य करते हुए हम इससे अपना बचाव कर सकें l

रेखा जोशी

है ह्रदय हमारे समाया स्वदेशी

बहुत देखे हमने परिधान विदेशी
है  पहनते  हम  पहनावा स्वदेशी 
,
दूर देश समुन्दर पार घूम आये
है  ह्रदय  हमारे समाया स्वदेशी
,
भांति भांति के हमने खाये व्यंजन
भोजन हमें घर का भाया स्वदेशी
,
जियेंगे  मरेंगे हम देश की खातिर 
गगन  में तिरंगा लहराया स्वदेशी
,
करें हम सलाम उन वीर जवानों को 
है खून  जिन्होंने  बहाया  स्वदेशी

रेखा जोशी

Thursday, 14 May 2020

बुझ गई प्यास जन्म जन्म की

अनुपम सौंदर्य 
अलौकिक छटा देख 
खुल गए द्वार अंतर्मन के 
झंकृत हुआ मन 
रूप नया देख 
मै इस पार तुम उस पार 
हो गए अब आर पार 
मिलन नही यह धरा गगन का 
आगोश में अब मै तेरे 
पा लिया अमृत घट 
सुधापान कर लिया मैने 
एकरस होकर  प्रभु अब 
समाया रोम रोम मेरा तुझमे 
बुझ गई प्यास जन्म जन्म की 
नेह तेरा पा के 
सम्पूर्ण हुआ जीवन मेरा 
द्वार आ के तेरे

रेखा जोशी

Monday, 27 April 2020

आह

दिल में यह हसरत थी कि कांधे पे उनके
रख के मै सर ,ढेर सी बाते करूँ ,बाते
जिसे सुन कर वह गायें,गुनगुनायें
बाते जिसे सुन वह हसें ,खिलखिलायें
बाते जिसे सुन प्यार से मुझे सह्लायें
तभी उन्होंने कहना शुरू किया और
मै मदहोश सी उन्हें सुनती रही
वह कहते रहे ,कहते रहे और मै
सुनती रही ,सुनती रही सुनती रही
दिन महीने साल गुजरते गए
अचानक मेरी नींद खुली और मेरी
वह ढेर सी बातें शूल सी चुभने लगी
उमड़ उमड़ कर लब पर मचलने लगी
समय ने दफना दिया जिन्हें सीने में ही
हूक सी उठती अब इक कसक औ तडप भी
लाख कोशिश की होंठो ने भी खुलने की
जुबाँ तक ,वो ढ़ेर सी बाते आते आते थम गयी
होंठ हिले ,लब खुले ,लकिन मुहँ से निकली
सिर्फ इक आह ,हाँ ,सिर्फ इक आह

Friday, 24 April 2020

जीवन तो चलता रहता है

जीवन तो चलता रहता है 

गुज़र जाती
है सारी जिंदगी
पूरा करने 
अपने सपनों को 
लेकिन सपने तो सपने हैं 
कब  होते  वोह अपने  हैं 

टूट जाते हैं अक्सर 
जीवन में कुछ सपने अपने 
हासिल न कर पाने का 
दुख होता है बहुत 
लेकिन 
कुछ सपनों के टूट जाने से 
रुकता नहीं 
जीवन तो चलता रहता है 

रुकता नहीं वक्त 
कभी किसी के लिए 
जीवन चलने का नाम है 
जो छूट गया सो छूट गया 
संजो  कर सपने नए 
चलता चल बढ़ता चल 
करने नए सपने साकार 
लेकिन रख याद 
कुछ सपनों के टूट जाने से 
रुकता नहीं 
जीवन तो चलता रहता है 

रेखा जोशी 


Sunday, 19 April 2020

रेलगाड़ी

चलती ही जा रही रेलगाड़ी
जीवन के सफर की 
उतर जाते सभी अपने अपने 
पड़ाव  के आने पर 
आ जाते मुसाफिर भी नए नए 
और फिर 
चलती ही जा रही रेलगाड़ी 
हो जाते हैं झगडे भी कभी कभी 
मिलजुल कर रहते हैं कभी कभी 
लेकिन रुकती नही रेलगाड़ी 
पहुँचा ही देती है हर किसी को 
उसके पड़ाव पर 

रेखा जोशी 


Saturday, 18 April 2020

मुक्तक कोरोना पर

छूओ  ना छूओ  ना छूओ  ना 
कुछ भी ना तुम अब  तो छूओ  ना
साबुन से  धों   हाथों को अपने 
भागेगा  फिर जालिम कोरोना 
.. 
कोरोना  ने  ढाया  कैसा अत्याचार है
आज  मंदिरों  के  भी बंद  हुए द्वार है 
ईश्वर तो सदा  रहता  ह्रदय  में   हमारे 
सुन लेता हमारे मौन दिल की पुकार है 

रेखा जोशी 



Tuesday, 14 April 2020

जो न समझे दर्द उसको आदमी कैसे कहूँ (ग़ज़ल)


जो न  समझे दर्द उसको आदमी कैसे कहूँ 
जी सके हम जो नही वह ज़िंदगी कैसे कहूँ 
…… 
आसमाँ पर चाँद निकला हर तरफ बिखरी किरण 
जो   न  उतरे   घर   हमारे   चाँदनी    कैसे   कहूँ 
...... 
मुस्कुराती हर अदा तेरी सनम जीने न दे 
हाल  अपने  की  हमारे   बेबसी कैसे कहूँ 
…… 
राह मिल कर हम चले थे ज़िंदगी भर के लिये 
मिल सके जो तुम न हम को वह कमी कैसे कहूँ 
…… 
हो  गया रोशन जहाँ जब प्यार मिलता है यहाँ 
जो न आई घर हमारे रौशनी कैसे कहूँ 

रेखा जोशी 

Wednesday, 8 April 2020

जिंदगी

माना दर्द भरा संसार यह ज़िंदगी
लेकिन फिर भी है दमदार यह ज़िंदगी
,
आंसू  बहते  कहीं  मनाते जश्न  यहां
सुख दुख देती हमें अपार यह ज़िंदगी
,
रूप जीवन का बदल रहा पल पल यहां 
लेकर नव रूप करे सिंगार यह जिंदगी 

ढलती शाम डूबे सूरज नित धरा पर 
आगमन भोर का आधार यह ज़िंदगी
,
चाहे मिले ग़म खुशियां मिली है हज़ार 
हर्ष में खिलता हुआ प्यार यह ज़िंदगी

रेखा जोशी

Tuesday, 7 April 2020

प्रार्थना (शीश अपना ईश के आगे झुकाना चाहिए)

शीश अपना ईश के आगे झुकाना चाहिए
नाम मिलकर हर किसी को साथ गाना चाहिए
….
पीर हरता हर किसी की ज़िंदगी में वह सदा
नाम सुख में भी हमें तो याद आना चाहिए
…..
पा लिया संसार सारा नाम जिसने भी जपा
दीप भगवन नेह का मन में जलाना चाहिए
…..
गीत गायें प्रेम से दिन रात भगवन हम यहाँ
प्रीत भगवन आप को भी तो निभाना चाहिए
….
हाथ अपने जोड़ कर हम माँगते तुमसे दया
प्रभु कृपा करना हमें अपना बनाना चाहिए

रेखा जोशी

Friday, 3 April 2020

फैलते कंक्रीट के जंगल

ढलती शाम में जब सूर्य देवता  ने धीरे धीरे पश्चिम की ओर प्रस्थान किया, तब नीतू का मन अपने फ्लैट में घबराने लगा । वह अपने बेटे के साथ अपने फ्लैट के सामने वाले पार्क में टहलने चली गई । वहाँ खुली हवा में घूमना उसे बहुत अच्छा लग रहा था, और वह ठीक भी था उसके और उसके बेटे के लिए, तभी टहलते हुए उसकी नज़र बेंच पर बैठे एक बुज़ुर्ग जोड़े पर पड़ी ,वह भी खुली जगह पर बैठ शीतल हवा का आनंद उठा रहे थे । एकाएक उसकी नज़र ऊँची ऊँची इमारतों पर पड़ी ,उसे ऐसा लगा जैसे वह इमारते उसकी ओर बढ़ती आ रही है और वह  कंक्रीट का जंगल  फैलता हुआ उस पार्क की ओर बढ़ता आ रहा है ,हाँ उसके चारो ओर जैसे घुटन ही घुटन बढ़ने लगी और नीतू की सांस रुकने लगी  । ”नही ,ऐसा नही हो सकता ”वह मन ही मन बुदबुदाने लगी । तभी वह तंद्रा से जाग गई ,सोच में पड़ गई ,”अगर यह कंक्रीट के जंगल बढ़ते गए तब क्या होगा हमारे बच्चों का और उस समय हमारे जैसे बुज़ुर्ग स्वच्छ हवा के लिए कहाँ जायें गे ???

रेखा जोशी

घर घर की कहानी

अमित अपने पर झल्ला उठा ,”मालूम नहीं मै अपना सामान खुद ही रख कर क्यों भूल जाता हूँ ,पता नही इस घर के लोग भी कैसे कैसे है ,मेरा सारा सामान उठा कर इधर उधर पटक देते है ,बौखला कर उसने अपनी धर्मपत्नी को आवाज़ दी ,”मीता सुनती हो ,मैने अपनी एक ज़रूरी फाईल यहाँ मेज़ पर रखी थी ,एक घंटे से ढूँढ रहा हूँ ,कहाँ उठा कर रख दी तुमने ?गुस्से में दांत भींच कर अमित चिल्ला कर बोला ,”प्लीज़ मेरी चीज़ों को मत छेड़ा करो ,कितनी बार कहा है तुम्हे ,”अमित के ऊँचे स्वर सुनते ही मीता के दिल की धड़कने तेज़ हो गई ,कहीं इसी बात को ले कर गर्मागर्मी न हो जाये इसलिए वह भागी भागी आई और मेज़ पर रखे सामान को उलट पुलट कर अमित की फाईल खोजने लगी ,जैसे ही उसने मेज़ पर रखा अमित का ब्रीफकेस उठाया उसके नीचे रखी हुई फाईल झाँकने लगी ,मीता ने मेज़ से फाईल उठाते हुए अमित की तरफ देखा ,चुपचाप मीता के हाथ से फाईल ली और दूसरे कमरे में चला गया ।
अक्सर ऐसा देखा गया है कि जब हमारी इच्छानुसार कोई कार्य नही हो पाता तब क्रोध एवं आक्रोश का पैदा होंना सम्भाविक है ,याँ छोटी छोटी बातों याँ विचारों में मतभेद होने से भी क्रोध आ ही जाता है |यह केवल अमित के साथ ही नही हम सभी के साथ आये दिन होता रहता है | ऐसा भी देखा गया है जो व्यक्ति हमारे बहुत करीब होते है अक्सर वही लोग अत्यधिक हमारे क्रोध का निशाना बनते है और क्रोध के चलते सबसे अधिक दुःख भी हम उन्ही को पहुँचाते है ,अगर हम अपने क्रोध पर काबू नही कर पाते तब रिश्तों में कड़वाहट तो आयेगी ही लेकिन यह हमारी मानसिक और शारीरिक सेहत को भी क्षतिगरस्त करता है ,अगर विज्ञान की भाषा में कहें तो इलेक्ट्रोइंसेफलीजिया [ई ई जी] द्वारा दिमाग की इलेक्ट्रल एक्टिविटी यानिकि मस्तिष्क में उठ रही तरंगों को मापा जा सकता है ,क्रोध की स्थिति में यह तरंगे अधिक मात्रा में बढ़ जाती है | जब कोई व्यक्ति पूरी तरह से अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है तब मस्तिष्क तरंगे बहुत ही अधिक मात्रा में बढ़ जाती है और चिकित्सक उसे पागल करार कर देते है | क्रोध भी क्षणिक पागलपन की स्थिति जैसा है जिसमे व्यक्ति अपने होश खो बैठता है और अपने ही हाथों से जुर्म तक कर बैठता है और वह व्यक्ति अपनी बाक़ी सारी उम्र पछतावे की अग्नि में जलता रहता है ,तभी तो कहते है कि क्रोध मूर्खता से शुरू हो कर पश्चाताप पर खत्म होता है |
मीता की समझ में आ गया कि क्रोध करने से कुछ भी हासिल नही होता उलटा नुक्सान ही होता है , उसने कुर्सी पर बैठ कर लम्बी लम्बी साँसे ली और एक गिलास पानी पिया और फिर आँखे बंद कर अपने मस्तिष्क में उठ रहे तनाव को दूर करने की कोशिश करने लगी ,कुछ देर बाद वह उठी और एक गिलास पानी का भरकर मुस्कुराते हुए अमित के हाथ में थमा दिया ,दोनों की आँखों से आँखे मिली और होंठ मुस्कुरा उठे |

मुक्तक

नहीं देखे करोंना कोई जाति पाती 
बात यह लोगों को क्यों समझ नहीं आती 
थूक रहे उन पर जो देते जीवन दान 
कब सुधरेंगे लोग कहते जिन्हें जमाती 

रेखा जोशी 



Wednesday, 25 March 2020

हसीन लम्हे

सौगात में तुमने जो हमको दिये 

वोह हसीन लम्हे
जिनकी  खामोशी  से मिले हमें
अजब से सिलसिले
है आस दिल में अब  यही  बस
गुफ्तगू हो उनसे हमारी कभी
प्यार भरी शाम में  यूंहीं सदा
गुज़र  जाये ज़िन्दगी हमारी
पूरे हो जाए अरमान दिल के सारे
तेरी यादों के हसीन लम्हों में
जी लें हम यह ज़िन्दगी सारी
इन्हीं खूबसूरत पलों में
है पा ली जन्नत हमनें
इन्हीं खूबसूरत पलों में
काश ठहर जाए वक्त यहीं
और हम खोये रहें इन्हीं खूबसूरत पलों में
ज़िन्दगी भर के लिए

रेखा जोशी

ये जो है जिंदगी

वक्त कब गुज़र जाता है

 पता ही नहीं चलता, कैसे बंधी है

 हमारी ज़िन्दगी

 घड़ी की टिक टिक के साथ 

सुबह से शाम , रात से दिन

बस घड़ी की टिक टिक के संग

हम सब चलते जा रहे हैं 

समय को तो आगे ही 

चलते जाना है, 

जिंदगी का हर पल अनमोल है 

क्यों न फ़िर जियें इसे ज़िंदादिली से हम

रेखा जोशी

Monday, 23 March 2020

गीतिका

मापनी
2122 2122 2122 212 

रात काली यह सुबह में आज ढलनी चाहिए
ज़िंदगी की शाम भी साजन सँभलनी चाहिए
….
राह में मिलते बहुत से लोग अपनी ही कहें
सोच अपनी भी यहाँ अब तो बदलनी चाहिए
इस जहाँ में प्यार की कीमत को’ई समझे नहीं
साज पर इक प्यार की धुन भी मचलनी चाहिए
….
बाँह मेरी थाम साजन ले चलो अब उस जहां,
चाह इक दूजे की ‘ भी तो आज फलनी चाहिए
जोश भर कर ज़िंदगी का अब मज़ा ले लो सजन
साथ लहरें भी नदी की अब उछलनी चाहिए

रेखा जोशी

Saturday, 21 March 2020

करोना वायरस का भारत में निकलेगा दम


करोना  वायरस  का  भारत में  निकलेगा  दम 
चौदह घण्टों की अवधि में ही हो जाएगा खत्म 
.. 
करोना  कर  रहा  है तांडव  धरा पर खौफ का 
रहो अपने घर में कुछ दिन रखो न बाहर कदम 

अपने   बचाव  के  लिए  करो  यत्न हर सम्भव  
हाथ धों  के बार  बार  करो  उत्पात इसका कम 
.. 
हाथ मिलाना न  कभी तुम भूल से भी किसी से 
दूर  से  ही  नमस्ते  कर अभिवादन  करें हरदम 
.. 
रहेंगे  घर   रविवार   संग    अपने  परिवार  के 
टूटे गी  फिर समय शृंखला जनता कर्फ्यू उत्तम 

रेखा जोशी

Friday, 20 March 2020

जनता कर्फ्यू उत्तम

करोना  वायरस  का  भारत में  निकलेगा  दम 
चौदह घण्टों की अवधि में ही हो जाएगा खत्म 
रहेंगे  घर   रविवार   संग    अपने  परिवार  के 
टूटे गी  फिर समय शृंखला जनता कर्फ्यू उत्तम 

रेखा जोशी 

Wednesday, 18 March 2020

खुशी के दो चार पल

कितने सुहावने 
होते हैं खुशी के दो चार पल
महक उठता है जीवन का हर पल
इन्हीं दो चार पलों में 
मिलता है 
जब अपनों का साथ 
खिल उठता है 
तन मन अपना देख उनके  
लबों पर खिली खिली सी मुस्कान 
आओ करें कुछ 
ऐसा काम 
गम  के मारे लोगों को 
दे सकें थोड़ी सी खुशी 
लाएँ उनके 
होंठो पर भी  
इक प्यारी सी मुस्कान 

रेखा जोशी 



Tuesday, 17 March 2020

सतरंगी आसमान

कल्पना की सीढ़ी पर
हो कर सवार
छू लिया आज सतरंगी
आसमान
खेलता छुपा छुपी
बादलों से कभी
बन मेघ कभी भिगो देता
आँचल धरा का
चुरा कर इन्द्रधनुष के
रँग कभी
सजाता मांग
अवनी की अपनी
कल्पना के सागर में
गोते लगाता
जमीं आसमान को
रंगीन बनाता
बरसाता ख़ुशी आसमान से
लहराती धरा पर
अमृत ले आता

रेखा जोशी

Monday, 16 March 2020

क्रोध पर नियंत्रण

क्रोध पर नियंत्रण 

क्रोध सबको आता है लेकिन बात यह है कि क्रोध पर नियंत्रण कैसे पाया जाए भले ही क्रोध करना पूरी तरह सामान्य बात है लेकिन क्रोध ऐसी नकारात्मक शक्ति है, जो सारी अच्छाई को कुछ ही पल में खत्म कर देतीं है, क्रोध उस दोस्ती और भरोसे को तोड़ सकता है जिसे बनाने में हमें कई वर्ष लग जाते हैं l

हम सबके जीवन में असंतोष है, दुख है पीड़ा है, हम सब जानते हैं कि हमारा जन्म होता है, मृत्यु होती है और इस जीवन में कुछ अच्छा समय बीतेगा, कुछ बुरा भी बीतेगा,। जब हम इस संसार में पैदा हुए तो हमें किसी ने नहीं कहा था कि जीवन बहुत अच्छा और सरल होगा और लगातार हँसी-खुशी से भरा रहेगा, और सब कुछ ठीक वैसे ही होता जाएगा जैसा हम चाहेंगे।

इस संसार में लोगों या फिर अपने आप पर क्रोध करने से स्थिति में कोई सुधार नहीं होने वाला है। दूसरे लोग ऐसी बातें कह सकते हैं या ऐसे काम कर सकते हैं जो हमें पसंद न हो, यह जरूरी नहीं कि सब कुछ ठीक हमारी इच्छा के ही मुताबिक हो l

जब हम परेशान होते हैं तो हमारे लिए चीखना-चिल्लाना कितना आसान होता है? उस समय हमें क्रोध बहादुर और मज़बूत नहीं बनाता है – वह तो हमें कमज़ोर ही बनाता है । उस वक्त हमें धैर्य से काम लेना चाहिए और इस के लिए जब हमें लगे कि हम तनावग्रस्त हो रहे हैं, तो हम गहरे श्वास लेने चाहिए, यह तनावमुक्ति का सीधा सा उपाय है क्योंकि जब हम क्रोधित होते हैं तब हम जल्दी-जल्दी और छोटे श्वास लेते हैं। हम धीरे-धीरे 100 तक गिनती गिन सकते हैं, ऐसा करके हम अपने आप को ऐसा कुछ कहने से रोक सकते हैं जिसका हमें बाद में अफसोस करना पड़े। या, यदि हम ऐसी स्थिति में हों जहाँ सीधे झगड़ा होने वाला हो, तो हम बात के बिगड़ने से पहले अपने आप को वहाँ से अलग कर सकते हैं।

हर स्थिति दूसरी स्थितियों से अलग होती है, इसलिए आपको अपने विवेक से काम लेना चाहिए कि किस स्थिति में क्या करना सबसे अच्छा रहेगा।

क्रोध हमें तनाव और दुख देता है, हमारी नींद और हमारी भूख को हर लेता है। यदि हम किसी व्यक्ति के प्रति क्रोधित ही बने रहें, तो इससे हमारे बारे में उसके मन में एक गुस्सैल व्यक्ति की स्थाई छवि बन जाती है, और सच्चाई तो यह है: क्रोधी स्वभाव वाले किसी व्यक्ति के साथ कौन रहना पसंद करता है?

ध्यान और योग का अभ्यास हमें क्रोध से छुटकारा दिला कर हमें शांति और विनम्रता प्रदान कर सकता हैl

जिस भी व्यक्ति से हम नाराज़ होते हैं वह हमारे लिए बहुत मूल्यवान है क्योंकि वह हमें धैर्य का अभ्यास करने का अवसर प्रदान करता धैर्य से क्रोधाग्नि को शांत किया जा सकता है l

जब हम क्रोधित होते हैं, उस समय हमारे अंदर “मैं की भावना आती है, इसका अर्थ यह नहीं कि हमारा कोई अस्तित्व नहीं है, हमारा अस्तित्व है लेकिन अहम नहीं होना चाहिए, इससे हमें यह ज्ञान हो जाता है कि ऐसा कुछ था ही नहीं जिसके लिए इतना क्रोध करना चाहिए l

रेखा जोशी

Friday, 13 March 2020

मुक्तक

रखो  स्वच्छ  घर  का अपने हरेक कोना 
सम्भल  के रहना  लेकिन  इससे डरो ना
हाथ मिलाना छोड़ करो सभी को नमस्ते
फैला  हुआ  है  जग  में  वायरस  करोना 

करोना  वायरस  का  भारत में  निकलेगा  दम 
चौदह घण्टों की अवधि में ही हो जाएगा खत्म 
.. 
करोना  कर  रहा  है तांडव  धरा पर खौफ का 
रहो अपने घर में कुछ दिन रखो न बाहर कदम 

अपने   बचाव  के  लिए  करो  यत्न हर सम्भव  
हाथ धों  के बार  बार  करो  उत्पात इसका कम 
.. 
हाथ मिलाना न  कभी तुम भूल से भी किसी से 
दूर  से  ही  नमस्ते  कर अभिवादन  करें हरदम 
.. 
रहेंगे  घर   रविवार   संग    अपने  परिवार  के 
टूटे गी  फिर समय शृंखला जनता कर्फ्यू उत्तम 

रेखा जोशी
रेखा जोशी 

Monday, 9 March 2020

होली की हार्दिक शुभकामनाएं

होली की हार्दिक शुभकामनाएं 

उपवन सजा हुआ है अब फूल मुस्कुराएं 

हम  आज  गीत  गाएँ  होली मिल मनाएं 

छाई  बहार मौसम भी है खिला खिला सा

है  रंग छलकते भूलें शिकवे गले लगाएं 

रेखा जोशी


 


Tuesday, 3 March 2020

मुक्तक

अपनी   अपनी  बोल  रहे  होकर  सब   बेहाल
आओ मिलकर हम सभी बदले वतन का हाल
बन   आग  टूट  पड़े  करें  बरबाद  दुश्मन  को
है   काफी   इक   चिंगारी  जलाने  को  मशाल

रेखा जोशी

Wednesday, 26 February 2020

मुक्तक

भारत का उनको नहीं है ख्याल 

अपनी  झोली  की   मालामाल
बैठे   लगा  कर   धमा  चौकड़ी
देश   का   करने   हाल   बेहाल

रेखा जोशी

Saturday, 22 February 2020

विडंबना

विडंबना

रमेश  के बहनोई का अचानक अपने घर परिवार से दूर निधन के समाचार ने रमेश और उसकी पत्नी आशा को हिला कर रख दिया। दोनों ने जल्दी से समान बांधा, आशा ने अपने ऐ टी म कार्ड से दस हजार रूपये निकाले और वह दोनों अपने घर से बहनोई  के अंतिम संस्कार  के लिए रवाना हो गए, वहां पहुंचते ही आशा ने वो रूपये रमेश के हाथ में पकड़ाते हुए कहा, ''दीदी अपने घर से बहुत दूर है और इस समय इन्हें पैसे की सख्त जरूरत होगी आप यह उन्हें अपनी ओर से दे दो और मेरा ज़िक्र भी मत करना कहीं उनके आत्मसम्मान को ठेस न पहुंचे''।

अपनी बहन के विधवा होने पर रमेश  बहुत भावुक हो रहा था, उसने भरी आँखों से चुपचाप वो रूपये अपनी बहन रीमा  के हाथ में थमा दिए। देर रात को रमेश की सभी बहनें एक साथ एक कमरे में बैठ कर सुख दुःख बाँट रही थी तभी आशा ने उस कमरे के सामने से निकलते हुए उनकी बातें सुन ली, उसकी आँखों से आंसू छलक गए, जब उसकी नन्द रीमा के शब्द पिघलते सीसे से उसके कानो में पड़े, वह अपनी बहनों से कह रही थी, ''मेरा भाई तो मुझसे बहुत प्यार करता है,  आज मुसीबत की इस घड़ी में पता नहीं उसे कैसे पता चल गया कि मुझे पैसे कि जरूरत है, यह तो मेरी भाभी है जिसने मेरे भाई को मुझ से से दूर कर रखा है।

 रेखा जोशी 

Friday, 21 February 2020

महा शिवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएं

वंदन  करें  तेरा सुन  प्रभु  पुकार हमारी
जयजयकार  करें हम सब   भोले भंडारी
दीन हीन दुखियों  के तुम ही हो रखवाले
भोले  भाले  बाबा  शिव  शंकर  त्रिपुरारी

 रेखा जोशी 

Thursday, 13 February 2020

अनकहा सा इश्क सुन लो

चाहते हैं हम तुम्हें

सदियों से

देखते ही तुम्हें, बज उठते हैं

तार दिल के

उठता है प्यार का सैलाब

सीने में हमारे

लेकिन न जाने क्यों

दिल की बात

रह जाती है दिल ही में

रुक जाती है लब तक आते ही

हमारा यह

अनकहा सा इश्क सुन लो

और कर दो पूर्ण

हमारा अधूरा सा प्यार

रेखा जोशी

Thursday, 6 February 2020

लम्हा लम्हा जिंदगी का

छोटा सा जीवन मेरा
क्षण क्षण
फिसलता हाथों से
धीरे धीरे
हो रही खत्म कहानी
तेरे  मेरे प्यार  की
आज हूँ पास तेरे
न जाने कल क्या होगा
कहीं दूर सो जाऊँगा
आगोश में मौत के
या डूब जाऊँगा
यादों के समुंदर में
जब तुम न होगे पास मेरे
इससे पहले कि
बिछुड़ जाएँ हम दोनों
हर पल जी लें ज़िंदगी
जी भर के
लम्हा लम्हा
ज़िंदगी का पी लें
जी भर के

रेखा जोशी

Sunday, 2 February 2020

लिखे जो खत तुझे

लिखे जो खत तुझे 

”सौ बार झूठ बोलने से झूठ सच नही हो जाता ”आँखों में आंसू लिए गीतू को अपने घर से बाहर जाते देख रीमा के होश उड़ गए ,भागी भागी वह अपनी नन्द गीतू के पीछे गई लेकिन वह जा चुकी थी ,तभी उसके कानों से राजू की कड़कती हुई आवाज़ टकराई ,”यह सब तुमारे कारण ही हुआ है जो मेरी बहन आज नाराज़ हो कर मेरे घर से चली गई ,मैने तुम्हे अपने माता पिता और गीतू के पास उसकी परीक्षा के कारण छोड़ा था ,ताकि तुम घर का काम काज संभाल लो और गीतू अपनी परीक्षा की तैयारी अच्छी तरह से कर सके , लेकिन तुम तो वहाँ रही ही नही ,अपने मायके जा कर बैठ गई ,यह सब मुझे आज गीतू से पता चला है |
रीमा की आँखों से आंसू बहने लगे ,उसने तो अपने ससुराल में पूरा काम सभाल लिया था और गीतू को उसकी परीक्षा की तैयारी करने के लिए पूरा समय दिया था ,फिर उसने यह सब ड्रामा क्यों किया ?”रीमा दुखी और अनमने मन से अपने घर की सफाई में जुट गई ताकि उसका ध्यान दूसरी तरफ हो जाए ,अलमारी साफ़ करते हुए चिठ्ठियों का एक बड़ा पैकेट उसके हाथों में आ गया ,यह वह खत थे जो उसने कभी राजू को लिखे थे वह उसे खोल कर अपने लिखे हुए राजू के नाम उन प्रेम पत्रों को पढ़ने लगी ,जो उसने उन दिनों लिखे थे जब वह ससुराल में गीतू की परीक्षा के दौरान रही थी ,अचानक उसकी नज़र उन पत्रों पर लिखी तारीख़ और उसके ऊपर लिखे ससुराल के पते पर पड़ी ,उसकी आँखे एक बार फिर से गीली हो गई ,उसने अपने सामने खड़े राजू के हाथ में वह सारी चिठ्ठिया थमा दी ,जो खामोशी से उसकी बेगुनाही ब्यान कर रही थी l

रेखा जोशी
फरीदाबाद 

Saturday, 1 February 2020

आया बसंत

खिला खिला उपवन ,पवन चले शीतल
भँवरे करें गुँजन ,  बगिया  बहार पे
फूलों पर मंडराये तितली चुराये  रँग
कुहुकती कोयलिया ,अम्बुआ  डार  पे
गीत मधुर गा  रही  ,डाली डाली झूम रही 
हौले हौले से चलती मदमस्त   हवा
चूम रही  फूल फूल ,लहर लहर  जाये
है रँगीन छटा छाई ,नज़ारे निखार पे

रेखा जोशी 

उड़ें गी उमंगे छू लेंगी आसमान

उड़ायें गे पतंग लिये हाथ में डोर
मुस्कुराया बसन्त गली गली में शोर
उड़ें गी उमंगे  छू लेंगी आसमान 
लहरायें गगन में बंधन सारे तोड़ 

रेखा जोशी

खिले जीवन यहां जैसे बगिया में बहार

 
फूलों  से  लदे  गुच्छे   लहराते  डार   डार
है खिल खिल गए उपवन  महकाते संसार
,
सज रही रँग बिरँगी पुष्पित सुंदर  वाटिका
है  भँवरें   पुष्पों  पर   मंडराते    बार  बार
,
सुन्दर गुलाब खिले महकती है खुशी यहां
संग  संग  फूलों  के  यहां  मिलते  है खार
,
है   मनाती   उत्सव  रंग  बिरंगी  तितलियां
चुरा  कर रंग   फूलों  का  कर  रही  सिंगार
,
अंबुआ  की  डाली  पे  कुहुकती कोयलिया
खिले  जीवन  यहां जैसे  बगिया  में  बहार

रेखा जोशी

जागो भारत के वीर सपूतो

जागो भारत के वीर सपूतो
है डूब रहा यह देश हमारा
……………………
है लूट रहे इसे तेरे कई भाई
खनकते पैसों से ये पगलाये
है भर रहे सब अपना ही घर
तार तार कर माँ का आंचल
………………………
धधकती लालच की ज्वाला
पर पनप रहा है भ्रष्टाचार
माँ के कपूत ही नोच खा रहे
जकड़ के अनेक घोटालों में
……………………….
याद करो अमर शहीदों को
मर मिटे भारत की खातिर
दो बूंद आँखों में भर कर
मुक्त करो माँ को गद्दारों से
……………………….
जागो भारत के वीर सपूतो
है डूब रहा यह देश हमारा

रेखा जोशी

तिरंगे का करें सम्मान आँखों

रहेगी देश की अब शान आँखों पे
तिरंगे का करें सम्मान आँखों पे
जहाँ में देश चमकेगा सदा भारत
ज़ुबा पर अब रहेगा नाम आँखों पे
करें हम नमन भारत के जवानों को
शहीदों का रखेंगे मान आँखों पे
….
करेंगे खत्म घोटाले सभी मिल कर
रखेंगे देश का अभिमान आँखों पे
मिला कर कदम चलते ही रहेंगे हम
रखेंगे देश की अब आन आँखों पे
रेखा जोशी

Friday, 31 January 2020

धरतीपुत्र


धरती से सोना उगाता
धरतीपुत्र कहलाता
.
मेहनत करता  जी तोड़ 
दो बैलों की जोड़ी ही 
संगी साथी उसके 
कड़ी धूप या हो फिर सर्द हवायें 
धरती से सोना उगाता 
धरतीपुत्र कहलाता
.. 
भर कर वह पेट सबका
खुद भूखा सो जाता
फिर भी नहीं घबराता
देख फसल खड़ी खलिहान में
मन ही मन हर्षाता
धरती से सोना उगाता 
धरतीपुत्र कहलाता
... 
लेकिन नही सह पाता
गरीबी सूखा और क़र्ज़ की मार
लाचार असहाय दुखी
आखिर थक हार कर
जीवन से वह छोड़
सबका साथ थाम लेता
अंत में फिर  मौत का हाथ
धरती से सोना उगाता 
धरतीपुत्र कहलाता

रेखा जोशी

Wednesday, 29 January 2020

स्पर्श

शीर्षक. स्पर्श 

सात दिन बीत चुके थे ,माला अभी तक कोमा में थी ,अस्पताल में जहाँ डाक्टर जी जान से उसे होश में लाने की कोशिश कर रहे थे वहीँ माला का पति राजेश अपने एक साल के बेटे अंकुर के साथ ईश्वर से माला की सलामती की दुआ कर रहा था । नन्हा अंकुर अपनी माँ का सानिध्य पाने को बेचैन था ,लेकिन उस नन्हे के आँसू राजेश के नयन भी सजल कर देते थे ,आखिर हार कर राजेश उसे अस्पताल में माला के पास ले गया और रोते हुये अंकुर को माला के सीने पर रख दिया ,”लो अब तुम्ही सम्भालो इसे ,इस नन्हे से बच्चे का रोना मुझसे और नहीं देखा जाता ,”यह कहते ही वह फूट फूट कर रोने लगा । इधर रोता हुआ अंकुर माँ का स्नेहिल स्पर्श पाते ही चुप हो गया और उधर अपने लाडले के मात्र स्पर्श ने माँ की ममता को झकझोर कर उसे मौत के मुहँ से खींच लिया ,माला कौमा से बाहर आ चुकी थी ।

रेखा जोशी


Monday, 27 January 2020

रिश्ते

रिश्ते 
रिश्ते जी हाँ रिश्ते, इस धरती पर जन्म लेते ही हम कई रिश्तों में बंध जाते हैं माँ बाप, भाई, बहन, दादा दादी, चाचा चाची, जैसे अनगिनत रिश्ते हमारे अपने हो जाते हैं, एक दूसरे के प्रति प्यार प्रेम, स्नेह के अटूट बंधन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन जाते हैं, जैसे जैसे हम बड़े होते हैं तो दोस्ती, ससुराल के रिश्ते, जीवन साथी, औलाद अनेक व्यक्तियों के साथ रिश्ते जुड़ जाते हैं, लेकिन यह भी देखा गया है कि जीवन के इस सफर में कई रिश्ते पीछे रह जाते और कई नए रिश्ते भी जुड़ते रहते हैंl समय परिवर्तनशील है और समय के साथ साथ रिश्तों में भी बदलाव आता है l छोटे बच्चे को माँ बाप की आवश्यता होती है परंतु धीरे धीरे जब व्यक्ति स्वावलंबी हो जाता है और माता पिता पर निर्भर नहीं रहता तो रिश्तों में बदलाव आना स्वाभाविक है, ऐसा नहीं कि प्रेम या स्नेह में कमी होती है उस व्यक्ति की प्रथमिकतायें बदल जाती हैं, यही कारण है कि समय के साथ रिश्तों में भी बदलाव आ जाता है l
रेखा जोशी 

Sunday, 26 January 2020

मुश्किलें होंगी आसां गीत गुनगुनाया कर

माना कठिन जिंदगी फिर भी मुस्कुराया कर

कर सामना, खुद को इतना भी मत बचाया कर

..

लाख गम खड़े हैं जीवन सफर की राहों पे

न हो उदास हँस कर उन्हें तू अपनाया कर

रु कना नहीं, झुकना नहीं जीवन के पथ पे

चलता चल मुसाफिर पथ पर न डगमगाया कर

रख विश्वास खुद पर अपना और बढ़ता चल

मुश्किलें होंगी आसां गीत गुनगुनाया कर

उपवन. में खिलें गे फूल भी तो इक दिन सजन

कर इंतजार पिया, यूँही मत घबराया कर

.रेखा जोशी

Friday, 24 January 2020

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

सभी मित्रों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

वन्देमातरम
भारत माता की जय

आँचल में बीता बचपन जननी जन्म भूमि 
लुटा दूँगा जान तुझ पर जननी जन्म भूमि 
तिलक इस पावन माटी का  माथे सजा  लूँ 
है  माटी बहुत अनमोल जननी  जन्मभूमि 
जयहिन्द

रेखा जोशी

Thursday, 16 January 2020

शुक्रिया जो तुम आए

काट ली थी जिंदगी हमने तो

तन्हा तन्हा

मुद्दतों बाद अब जा कर कहीं

दिल की दहलीज़ पर वक़्त ने दस्तक दी है

मेहरबान हुआ अब जा कर कहीं

खुदा हम पर

आने से तेरे हुआ है असर कुछ ऐसा

जगमगाने लगी है अब तकदीर मेरी

पाने की तुम्हें हमने सदा हसरत की है

दिल की दहलीज पर वक़्त ने दस्तक दी है

शुक्रिया तुम्हारा जो तुम आए

महफिल में हमारी

रौशन हुआ सारा जहां हमारा

अंगना में खुशी अब खिलखिलाने लगी है

दिल की दहलीज़ पर वक़्त ने दस्तक दी है

रेखा जोशी

Wednesday, 15 January 2020

धूप

ठंड के मौसम में भाती धूप

गुम हुई आज खिलखिलाती धूप

.
छिप गई है सफेद आँचल तले

धरा पर जो थी इठलाती धूप

..

है ठण्डी बर्फ सी चली हवाएं

अच्छा लगे है. पीना गर्म सूप

..

सर्दी से ठिठुरता रहता है तन

अच्छा लगता जब मुस्काती धूप

.

सूरज देव जब देते है. दर्शन

खिलती धरती गुनगुनाती धूप

रेखा जोशी

Saturday, 11 January 2020

जीवन में आ जाती बहार, तुम जो आ जाते इक बार

जीवन में आ जाती बहार, तुम जो आ जाते इक बार

आसां होती जीवन की राह, मिलता ग़र हमें तेरा प्यार

..

जी लेते हम और कुछ देर, संग जो मिलता हमें तेरा

सँवर जाती मेरी तकदीर, खुशियाँ गुनगुनाती मेरे द्वार,

..

हमने तो चाहा था दिल से, समझा न तुमने कभी हमें

रूठी है किस्मत हमसे आज, जीते तुम औ हम गए हार

बहुत हुआ अब आओ सनम, न लो अब इम्तिहान साजन

मर जायेगे बिन तेरे हम कर दो पिया बगिया गुलजार

..

पूछे हैं हम से तन्हाईयाँ, जीते रहे हैं किसके लिए

आने से तेरे फिर से सजन, लौटें गी घर खुशियाँ हजार

रेखा जोशी

Friday, 10 January 2020

मुक्तक

मुक्तक 
मापनी - 212 212 212 212

लाख हों मुश्किलें मान मत हार तुम 
जिंदगी  में  करो  प्यार स्वीकार तुम 
थामना  हाथ  उनका  सदा  जो गिरें 
जिंदगी  में  सभी  से  करो प्यार तुम

रेखा जोशी 

Monday, 6 January 2020

विवाह एक उत्सव

विवाह एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रथा है, हिन्दू धर्म के अनुसार विवाह गृहस्थ आश्रम की नीव है जिसमें स्त्री पुरुष मिल कर परिवार का निर्माण करते हैं l पति और पत्नी के इस नव जीवन को सामाजिक मान्यता देने के लिए विवाह को एक उत्सव की तरह मनाया जाता है और इस समारोह को मनाने के लिए दोनों ओर के माता पिता यथा अनुसार पैसा भी खर्च करते हैं, लेकिन देखने में आता है कि कई लोग इस समारोह में अनावश्यक धन लुटाते हैं, अब हर कोई मुकेश अंबानी की तरह आमिर तो है नहीं जो शाही शादी कर सके लेकिन इस खुशी के समारोह में लोग अपनी हैसियत से ऊपर खर्च कर देते हैं, चाहे इसके उन्हें कर्ज ही क्यों न लेना पड़े l

विवाह में बजट बना कर खर्च को कई प्रकार से कम किया जा सकता है जैसे शादी की पोशाक, मंडप की सजावट, खान-पान , उपहार और कई अन्य वस्तुएँ पर अपने बजट को देखते हुए काफी पैसे बचाये जा सकते हैं। एक इवेंट मैनेजर के अनुसार शादी के खर्चों में कटौती हर तरह से जरूरी है। उनका मानना है कि इन खर्चों का कोई अंत नहीं होता। और पैसे चाहे जिसके लग रहे हों, इसका लगभग पच्चीस से तीस प्रतिशत फिजूलखर्च ही होता है। शादी में पैसे को सोच-समझ कर खर्च किया जाए, तो इन्हीं बचे हुए पैसों का इस्तेमाल बाद में कई उपयोगी चीजों पर किया जा सकता है। नई जिंदगी शुरू करने के लिए कई चीजों की जरूरत होती है, अगर आपको पैसा खर्च ही करना है, तो उसे आवश्यकता अनुसार ही खर्च करना चाहिए और फिजूलखर्ची करने से बचना चाहिए l