Tuesday, 12 November 2019

आवारा हूँ मै बादल

आवारा हूँ मै बादल

हवा के संग संग घूमता रहता हूँ मैं

आज यहां कल कहीं और

चला जाता हूँ मैं

नहीं कोई मंजिल नहीं कोई राह

मन हुआ जहां

बरस जाता हूँ वहाँ

लेकिन

खत्म हो जाता है अस्तित्व मेरा

जल की धारा बन कर

आवारा हूँ तो क्या हुआ

भिगोकर आँचल अवनी का

हरियाली चहुँ ओर

फैलाता हूँ मैं 

खेत खलियान, पेड़ पौधे

आशीष सबका पाता हूँ मैं

आवारा हूँ मै बादल

खुशियां धरा पर

बरसाता हूँ मैं

रेखा जोशी 

2 comments:

  1. मेरी खुशियां सब इस आवारगी से
    मेरा मान सम्मान सब इस आवारगी के नाम।
    बहुत ही सुंदर रचना।

    कुछ पंक्तियां आपकी नज़र 👉👉 ख़ाका 

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  2. सुन्दर रचना

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