Friday, 9 August 2013

तेरे मेरे सपने

तेरे मेरे सपने

''सपनो की दुनिया भी कितनी अजीब होती है ,सपने में सपना  जैसा कुछ लगता ही नही ,बिलकुल ऐसा महसूस होता है जैसे सब सचमुच में घटित हो रहा हो  ,उफ़ ,कितना भयानक सपना था ,अच्छा हुआ नींद खुल गई ''डरी हुई सीमा बिस्तर छोड़ ,बाथरूम में जा कर मुहं  धोने लगी ,उसके सीने में अभी भी दिल जोर जोर से धडक रहा था और सांस फूली हुई थी |अक्सर हम सब के साथ ऐसा ही कुछ होता है जब भी हम कभी कुछ ऐसा ही भयानक सा सपना देखतें है ,और जब कभी बढ़िया स्वप्न आता है तो नींद से जागने की इच्छा ही नही होती ,हम जाग कर भी आँखे मूंदे उसका आनंद लेते रहते है |सीमा बार बार उसी सपने के बारे में सोचने लगी ,तभी उसे अपनी साइकालोजी की टीचर की क्लास याद आ गई ,जब वह बी .एड कर रही थी ,सपनो पर चर्चा चल रही थी,''हमारी जागृत अवस्था में हमारे मस्तिष्क में लगातार विभिन्न विभिन्न  विचारों का प्रवाह चलता रहता है ,और जब हम निंदिया देवी की गोद में चले जातें तो वह सारे विचार आपस में ठीक  वैसे ही उलझ जाते है जैसे अगर ऊन के बहुत से धागों को हम इकट्ठा कर एक स्थान पर रख दें और बहुत दिनों बाद देखें तो हमें वह सारे धागे आपस में उलझे हुए मिलें गे , ठीक वैसे ही  जब हम सो जाते है हमारे  सुप्त मस्तिष्क के अवचेतन भाग में वह उलझे हुए विचार एक नयी ही रचना  का सृजन कर  स्वप्न  का रूप ले कर हमारे मानस पटल  पर चलचित्र की भांति  दिखाई देते  है | फ्रयूड के अनुसार हम अपनी अतृप्त एवं अधूरी इच्छायों की पूर्ति सपनो के माध्यम से करते है ,लेकिन  दुनियां में कई बड़े बड़े आविष्कारों का  जन्म सपनो में ही हुआ है ,जैसे की साइंसदान कैकुले ने छ सांपो को एक दूसरे की पूंछ अपने मूंह में लिए हुए देखा,और बेन्जीन का फार्मूला पूरी दुनिया को दिया | अनेकों साईकालोजिस्ट्स ने सपनो की इस दुनिया में झाँकने की कोशिश की, लेकिन इस रहस्यमयी  दुनिया को जितना  भी समझने की कोशिश की जाती रही है ,उतनी ही ज्यादा यह उलझाती रही है |हमें सपने क्यों आते है ?कई बार सपने आते है और हम उन्हें भूल जातें है ?हमारी वास्तविक दुनिया में सपनो का कोई योगदान है भी यां नही ,और कई बार तो हमारे सपने सच  भी हो जाते है |अनगिनत सवालों में एक पहलू यह भी है  ,जब हम सो जाते है तब हमारा  जागृत मस्तिष्क आराम की स्थिति में चला जाता है और  उस समय मस्तिष्क तरंगों का कम्पन जिसे फ्रिक्युंसी कहते है ,जागृत अवस्था  की मस्तिष्क  तरंगो की अपेक्षा  घट कर आधी रह  जाती है ,उस समय हमारी बंद आँखों की पुतलिया घूमने लगती है जिसे  आर ई एम्  कहते है ,मस्तिष्क की इसी स्थिति में हमे सपने दिखाई देते है |एक मजेदार बात यह भी उभर के आई कि जब हम ध्यान की अवस्था में होते है तो उस समय भी मस्तिष्क तरंगों की कम्पन कम हो जाती है और हम जागृत अवस्था में भी आर ई एम की अवस्था में पहुंच सकते  है ,अगर उस समय हम जागते हुए भी कोई सपना देखते है तो उसे  हम पूरा कर सकते है |सीमा के मस्तिष्क में भी अनेको विचार घूम रहे थे और वह बिस्तर पर लेट कर ध्यान लगाने की कोशिश कर रही थी ताकि वह भी अपने सपनो को सच होते देख सके |

Wednesday, 7 August 2013

मुक्तक

 मुक्तक
तुम्हारी चाहत लिए  हम पल पल मरते रहे
जीने  की  तमन्ना दिल में लिए तड़पते  रहे
दिन का सुकून और रातों  की नींदे  उड़ गई
अनजान बने  तुम्ही इस दिल में धड़कते रहे
................................................ ………
मुक्तक
हिंदू मुसलमां सिख ईसाई रब तू सब का
पुकार रहे तुझे सभी झुका के अपने शीश
हम सबको मिलजुल कर सिखा दो रहना
दया दृष्टि सभी पर रखना हे करूणाधीश

मुक्तक

छंदमुक्त  रचना
खूबसूरत थी जिन्दगी जब  हाथो में हाथ था  तुम्हारा
खूबसूरत थी जिंदगी  जब प्यार भरा साथ था तुम्हारा
 दे कर दर्द कहाँ चले गए हमे अपनी यादों में छोड़ के
पाते है हम चैन औ सुकून ख्याल आता है जब तुम्हारा
रेखा जोशी 

Monday, 5 August 2013

जागो भारत के वीर सपूतो

जागो भारत के वीर सपूतो 
है डूब  रहा  यह देश हमारा
……………………
है लूट रहे इसे तेरे कई भाई
खनकते पैसों से ये पगलाये 
है भर रहे सब अपना ही घर 
तार तार कर माँ का आंचल 
………………………
धधकती लालच की ज्वाला 
पर पनप  रहा  है भ्रष्टाचार 
माँ के कपूत ही नोच खा रहे
जकड़ के अनेक घोटालों में 
………………………. 
याद करो अमर शहीदों  को 
मर मिटे भारत की खातिर 
दो  बूंद  आँखों  में  भर कर 
मुक्त करो माँ को गद्दारों से
………………………. 
जागो भारत के वीर सपूतो 
है डूब  रहा  यह देश हमारा

रेखा जोशी




Sunday, 4 August 2013

नारी सशक्तिकरण आज़ादी से पहले और बाद

नारी सशक्तिकरण आज़ादी से पहले और बाद

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

सुभद्रा कुमारी चौहान जी की लिखी यह पंक्तियाँ वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को समर्पित है ,आज़ादी की प्रथम लड़ाई में उस मर्दानी ने अंग्रेजो से खिलाफ अपनी वीरता का प्रदर्शन कर पूरी स्त्रीजाति को गौरव प्रदान किया था ,लेकिन ऐसी वीरांगनाएँ तो लाखों में  कोई एक ही होती है l इस पुरुष प्रधान समाज में नारी की शक्ति को सदा दबाया गया है ,आज़ादी से पहले की नारी की छवि का ध्यान आते ही एक ऐसी औरत की तस्वीर आँखों के आगे उतर कर आती है जिसके सिर पर साड़ी का पल्लू ,माथे पर एक बड़ी सी बिंदिया ,शांत चेहरा और हमेशा घर के किसी न किसी कार्य में व्यस्त ,कई बार तो सिर का पल्लू इतना बड़ा हो जाता था कि बेचारी अबला नारी का पूरा चेहरा घूँघट में छिप कर रह जाता था ,उसका समय अक्सर घर की दहलीज के अंदर और पुरुष की छत्रछाया में ही सिमट  कर रह जाया करता  था l  अधिकतर परिवारों में बेटा और बेटी में भेद भाव आम बात थी नारी का पढ़ना लिखना तो बहुत की बात थी ,समाज में ऐसी अनेक कुरीतियाँ,बाल विवाह ,दहेज प्रथा ,सती प्रथा आदि पनप रही थी जिसका सीधा प्रभाव  नारी को भुगतना पड़ता था ,लेकिन समय के चलते मदनमोहन मालवीय जैसे कई समाजसेवी आगे आये और धीरे धीरे ऐसी कुप्रथाओं को समाप्त करने के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ी और कालान्तर समाज का स्वरूप बदलने लगा ,आज इक्सिवीं सदी की महिलायें घूँघट को पीछे छोड़ते हुए बहुत आगे निकल आई है lआज की नारी  घर की दहलीज से बाहर निकल कर शिक्षित हो रही है ,उच्च शिक्षा प्राप्त कर पुरुष के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर सफलता की सीढियां चढ़ती जा रही है l आर्थिक रूप से अब वह पुरुष पर निर्भर नही है बल्कि उसकी सहयोगी बन अपनी गृहस्थी की गाड़ी को सुचारू रूप से चला रही है l बेटा और बेटी में भेद न करते हुए अपने परिवार को न्योजित करना सीख रही है ,लेकिन अभी भी वह समाज में अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघर्षरत है ,दहेज प्रथा ,कन्या भ्रूण हत्या जैसी बुराइयों का उसे सामना करना पड़  रहा है ,भले ही समाज में खुले घूम रहे मनुष्य के रूप में जानवर उसकी प्रगति में रोड़े अटका रहे है ,लेकिन उसके  अडिग आत्मविश्वास को कमजोर नही कर पाए l  हमारे देश को श्रीमती इंदिरा गांधी ,प्रतिभा पाटिल जी  ,कल्पना चावला जैसी भारत की बेटियों पर गर्व है ,ऐसा कौन सा क्षेत्र है जिस में आज की नारी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन न कर पा रही हो | आज नारी बदल रही है और साथ ही समाज का स्वरूप भी बदल रहा है ,वह माँ बेटी ,बहन पत्नी बन कर हर रूप में अपना कर्तव्य बखूबी निभा रही है |

विश्व से पर्वत सी टकरा सकती है महिला
विश्व को फूल सा महका सकती है महिला
विश्व के प्रांगण में वीरांगना लक्ष्मी है महिला
विश्व फिर भी कहता है अबला है महिला 
याद शाम सवेरे ,राधिका को है आये |
मनभावन कान्हा ,धुन मुरली की बजाये |
गोकुल के गोपाल ,सभी के मन को भाये |
चितचोर मनमोहन ,दिल सबका है चुराये|

Thursday, 1 August 2013

न कोई शिकवा है न शिकायत है

न कोई शिकवा है न शिकायत है
जिंदगी के  तरन्नुम पर चलते है
मिले गम हमे याँ फिर आयें बहारें
हर हाल  में सदा खुश रहते है हम
तमन्ना थी कभी छू लें आसमां को
अब  संग हवाओं के चलने पर भी
हँसते हुए ऊँचाइयों सा मजा लेते है

रेखा जोशी