Wednesday, 20 September 2017

मत खेलो अब प्रकृति से मानव तुम


नीला   आसमान   मैला   हुआ   है
प्रदूषण   चहुं  ओर  फैला  हुआ  है
मत खेलो अब प्रकृति से मानव तुम
जल भी अब  यहां  कसैला हुआ है

रेखा जोशी

Sunday, 17 September 2017

जादुई कलम

जादुई कलम ने
मेरी
कर दिया कमाल
लिखते ही
पूरे होने लगे
मेरे ख्वाब
रंगीन तितलियों सी
उड़ती रंग बिरंगी
अनेक ख्वाहिशें
मंडरा कर
सिमटती गई
कलम में मेरी
और
धीरे धीरे
महकाने लगी मेरा आंगन
पुष्पित उपवन
नभ पर विचरते पंछी
गाने लगे नवगीत
संग संग
और
खिल उठी मै भी
लिए हाथ में 
अपनी जादुई कलम

रेखा जोशी

प्रीत के घेरे में बन्ध गए हम और तुम


इंद्रधनुष के रंग
चुरा कर
कल्पनाओं की
कलम से
लिख दी
हसरतें अपनी
उड़ने लगी
आसमान में
फूलों सी लगी
महकने
परिंदों सी लगी
चहकने
आस की डोरी से
छलकने
लगी खुशबू
खुशियां अब
होने लगी
रू ब रू
प्रीत के घेरे में
बन्ध गए
हम और तुम
खो गए
रंगीन जहां में
हम और तुम

रेखा जोशी

Thursday, 14 September 2017

मुक्तक


बीती रात कब  यह  खबर न हुई
तुम  न आये तो क्या सहर  न हुई
मिला न  साथ  तेरा  ज़िन्दगी   में
आओ तुम पास  वो पहर  न  हुई

रेखा जोशी

                                  

Wednesday, 13 September 2017

ख्वाबों में तेरे सो गई आंखें


ख्वाबों में तेरे सो गई आँखे
तुझको सोचा तो खो गई आँखे
,
पाया जो तुमको जहान पा लिया
सपनो  में देखो खो गई आँखे
,
समाया  तेरी  निगाहों में प्यार
प्यार में पिया लो खो गई आँखे
,
सताती हमे अब  यादें तुम्हारी
यादों में अब तो खो गई आँखे
,
बिठाया तुमको पलकों पे  हमने
चाहत में अब जो खो गई आँखे

रेखा जोशी

Tuesday, 12 September 2017

गीतिका

मापनी - 122  122  122  122
समांत - अलो,  पदान्त - तुम

खुशी ज़िन्दगी में मिले गर चलो  तुम
मिले ज़िन्दगी में सभी कुछ फलो तुम
,
हमें तो मिली मंज़िलें ज़िन्दगी में
नही ज़िन्दगी अब कभी फिर छलो तुम
,
रहो आसमाँ में हमेशा चमकते
कभी शाम बन कर न साजन दलो तुम
,
हमेशा  करो  रोशनी ज़िन्दगी में
सदा दीप बन  ज़िन्दगी में  जलो तुम
,
कभी ,जिंदगी में न  छाये अँधेरे
न अपने कभी हाथ साजन मलो तुम

रेखा जोशी

रूप मां का धर आये भगवान धरा पर

मां की आंखों में छिपा असीम प्यार पढ़ो
ममता  स्नेह   अनुराग  का  भंडार   पढ़ो
रूप मां  का  धर  आये भगवान धरा पर
समाया  हृदय   में   सारा    संसार   पढ़ो

रेखा जोशी