Friday, 8 December 2017

प्रेम होना चाहिए


वक्त के
आँचल तले
बीत रही है जिंदगी
चार दिन की चांदनी
है यहाँ
लम्हा लम्हा, हर पल
रेत सी हाथों से
फिसल रही है ज़िन्दगी
बीते लम्हे
लौट कर न आए फिर दुबारा
कभी ज़िंदगी में
आओ जी ले यहां 
हर पल
कर के प्यार सभी से
संवार दें जीवन यहां
दुख और गम से
भरी जिंदगी में सबकी
प्रेम  होना चाहिए

रेखा जोशी

Thursday, 7 December 2017

कालचक्र

कालचक्र

सागर किनारे डूबते सूरज का नज़ारा देख कर वहां जुटी भीड़ तितर बितर हो गई थी, लोग धीरे धीरे वहां से चले गए, गरजते सुमुद्र की लहरें चट्टानों से टकरा कर शोर मचाती वापिस समुद्र में लीन हो रही थी lढलती शाम में परछाइयां लम्बी होती जा रही थी, सूरज के ढलते ही लालिमा कालिमा में बदल गई और रवि सुमुद्र की आती जाती लहरों को निहार रहा था ,मन व्याकुल सा हो रहा था ,"कल फिर सूरज उदय होगा और शाम ढलते ही डूब जायेगा" बिलकुल जीवन के कालचक्र की तरह, 'जीवन और मृत्यु', हम सब भी तो इसी कालचक्र का एक हिस्सा है, आज जीवन जी रहे हैं तो कल हमें मौत अपने आगोश में ले लेगीl
रवि अतीत के उन लम्हों में खो गया जब उसकी जान से भी प्यारी मीना उसे तन्हा छोड़ कालरूपी  सागर में लीन हो गई थी, उसे जब भी अपनी मीना की याद आती है तो वह सागर किनारे सिली सिली रेत पर वक्त के उन हसीन लम्हों में उसे ढूँढता रहता है, संग चलती अपनी परछाई से उसे मीना के होने का एहसास होता है, डूबते सूरज को देख उम्मीद की इक किरण जाग जाती है कि कल फिर सागर से सूर्योदय होगा l

  रेखा जोशी 

Wednesday, 6 December 2017

मुहब्बत की खूबसूरत राहें


प्रियतम
आओ  चलें हम
मुहब्बत की
खूबसूरत राहों पर
देखो वह
बाहें फैलाये हमे
है  बुला  रही
और हम उन पर
चलते ही  रहें निरंतर

दुनिया से दूर
खोये रहे हम
इक  दूजे में  सदा
ज़िंदगी भर
थामें इक  दूजे का हाथ
कदम से कदम मिला कर
चलते ही  रहें निरंतर

भूल कर
दुनिया के  सारे गम
बस  मै और तुम
निभाते रहें साथ
मंजिल मिले न मिले
है कोई नही  गम
बस रहें महकती सदा
प्रेम की राहें
और हम
चलते ही  रहें निरंतर

 रेखा जोशी

Sunday, 3 December 2017

भावी पीढ़ी में बढ़ती अपराधिक प्रवृति

भावी पीढ़ी में बढ़ती अपराधिक प्रवृति

हम सब जानते है कि माँ बच्चे की प्रथम गुरु होती है ,माँ द्वारा दिए हुए संस्कार उसकी औलाद का जीवन संवार सकते है ,लेकिन बहुत दुःख की बात है कि आज भी नारी को वह सम्मान नही मिल पाया जिसकी वह हकदार है अगर नारी सशक्त है तो वह अपनी संतान को नैतिकता का पाठ पढ़ा कर सम्पूर्ण राष्ट्र को सशक्त बना सकती है | कहने को तो नारी सशक्तिकरण पर लम्बे लम्बे भाषण दिए जाते है ,कार्यक्रम किये जाते है परन्तु अगर उनके घर में देखा जाए तो अधिकतर घरों में नारी की आज भी वही स्थिति है ,उसे ऊपर उठने ही नही दिया जाता , पुरुष का अहम नारी को सदा दबा कर रखता है और ऐसी दयनीय स्थिति में कुंठित हुई नारी अपनी संतान को जो दिशा दिखानी चाहिए वह ऐसा नही कर पाती ,पति पत्नी के आपसी झगड़ों के कारण भी नन्हे कोमल बच्चों की मानसिकता पर गहरा प्रभाव पड़ता है । 

जब कोई पुरुष नशे में धुत अपनी पत्नी से गाली गलौज या मार पीट करता है तो उस घर में नारी के साथ साथ बच्चों के सुकोमल मन पर भी गहरी चोट लगती है और वह अंदर ही अंदर घुट कर रह जाते है ,लेकिन उनके भीतर दबा हुआ आक्रोश एक दिन ज्वालामुखी बन फूट पड़ता है ,और अगर वहां आर्थिक परेशानी हो तो भावी पीढ़ी का भटकाव सुनिश्चित हो जाता है ,उनका आक्रोश अपराधिक प्रवृति की ओर उनकी दिशा बदल लेता है |

आज हम देख रहे हैं कि संस्कारहीन और संवेदनशून्य समाज उभर कर आ गया है जो दिशा भ्रमित हो चुका है ,न तो माँ बाप के पास समय है अपनी संतान को सही दिशा दिखाने का और न ही संतान के पास समय है अपने माँ बाप के लिए | भागती दौड़ती जिंदगी में कमी  है तो वक्त की, माता पिता अपने बच्चों को अच्छे बुरे की पहचान नहीं करा पाते और कब उनकी संतान  अपराध की दुनिया की और अग्रसर हो जाते हैं उन्हे पता ही नहीं चलता l हाल ही में गुरूग्राम के रायन स्कूल के एक बच्चे की हत्या का मामला सामने आया है, एक सीनियर क्लास के बच्चे ने छोटे बच्चे की हत्या कर दी l

यह हम सबका कर्तव्य बनता है कि हम अपने बच्चों के. लिए समय निकाल कर उनका सही मार्गदर्शन करें l

रेखा जोशी

Saturday, 2 December 2017

तन्हा तन्हा  बीता हर पल


चाहत हो मेरी कहना था
दिल में मेरे वह रहता था
,
मेरी गलियों में आ जाना
रस्ता वह तेरे घर का था
,
कोई पूछे टूटे दिल से
किस की खातिर दिल रोया था
,
बहते थे आँखों से आँसू
तड़पा  के ज़ालिम हँसता था
,
खुश हूँ जीवन में तुम आये
बिन तेरे सब कुछ सूना था
,
तन्हा तन्हा  बीता हर पल
जीवन सूना ही गुज़रा था
,
तेरी सूरत लगती प्यारी
पर दिल तेरा तो काला था
,
ग़ैरों को अपना कर तुमने
क्यों तोड़ा अपना वादा था

रेखा जोशी

Wednesday, 29 November 2017

अम्मा

टन टन टन दरवाज़े की घंटी बज उठी ,लपक कर मीनू ने दरवाज़ा खोला  उसके सामने पडोस की बूढ़ी अम्मा खड़ी थी ,''बेटा आज पता नही क्यों हलवा पूड़ी खाने का मन हो रहा है ,तनिक बना कर खिला दो न ,''|मीनू ने प्यार से अम्मा को अपने घर के भीतर बुला लिया और पूरी श्रद्धा से उसने बूढ़ी अम्मा  के आगे हलवा और पूड़ी बना कर परोस दिया |पता नही इस बुढ़ापे में शायद अम्मा की सारी की सारी इन्द्रिया उसकी जुबान के रस में केन्द्रित हो गई थी  जो वह आये दिन नयें नयें व्यंजनों की फरमाइश ले कर उसके दरवाज़े पर खड़ी हो जाती थी l

उस दिन मीनू ने अम्मा से पूछ ही लिया ,''अम्मा ,तुम अपनी  बहू से क्यूँ नही कहती ,वह भी तो  तुम्हे यह सब बना कर खिला सकती है ,''पूड़ी खाते खाते अम्मा के हाथ वहीं रुक गए,आँखें उपर कर मीरा को देखते हुए अम्मा बोली   ,''न बाबा न ,वह जो मुझे दलिया देती है ,उसे देना भी वह बंद कर देगी ,बेटा अगर वह कुछ बढ़िया सा खाना बनाती है तो मुझ पर  एहसान कर ऐसे देती है मानो किसी कुत्ते के आगे रोटी का टुकड़ा डाल रही हो ,छि ऐसे खाने को तो  किसी का दिल भी नही करेगा ,''कहते कहते अम्मा की आँखें नम हो गई l मीनू सोच में पड़ गई 'क्या यही है हमारी संस्कृति ?क्या हमारे बुज़ुर्ग सम्मान के हकदार नही है ?"

रेखा जोशी

हाइकु


हाइकु

खुशी के गीत
कुहुकती कोयल
जगाती  प्रीत
,
जगाती प्रीत
सजन अलबेला
मन का मीत
,
मन का मीत
बहुत तड़पाये
जाने न प्रीत
,
जाने न प्रीत
समझ नहीं पाता
प्रीत की रीत

रेखा जोशी