Wednesday, 23 January 2019

ग़ज़ल

प्यार दिल से जुदा नहीं करते.
बेवफा  से   वफ़ा  नही  करते
....
साथ तेरा मिला हमे साजन 
फिर जुदा हो जिया नही करते 
.... 
प्यार जीवन में किया है गर
फिर धोखा दिया नहीं करते
.. .. 
चाँद तारे यहाँ उतर आये 
अब ज़मीं से गिला नहीं करते 
...
बात दिल की सजन बता दो अब 
किसी से  जो कहा नहीं करते  

रेखा जोशी 

ठंड का मौसम


ठंड  के   मौसम  में  भाती   धूप
गुम हुई आज खिलखिलाती धूप
छिप  गई  है  सफेद आँचल तले
धरा  पर  जो  थी  इठलाती  धूप

रेखा जोशी

Friday, 4 January 2019

नेता

पांच सालों में शक्ल दिखलाते
झूठ  बोलते  तनिक न घबराते
करके   झूठे   वादे   ये    नेता  
भोली  जनता  को  है बहकाते

रेखा जोशी

Thursday, 3 January 2019

सदा साथ अपना निभाना पिया

122 122 122 12

सदा  साथ  अपना निभाना पिया
हमें छोड़ तुम  फिर न जाना पिया
...
नहीं  कुछ  हमें   चाहिये  जिंदगी
मिले   प्यार  तेरा   सुहाना  पिया
...
चलें  प्रीत  की  हम गली में सजन
न  करना  नया  तुम  बहाना पिया
...
मिला  के  कदम  संग  चलते चलें
बने  ज़ालिम  फिर  ज़माना  पिया
....
खुशी  जिंदगी    में   हमें  है  मिली
न फिर ग़म कभी तुम बुलाना पिया

रेखा जोशी

Friday, 28 December 2018

है संघर्षरत यह जीवन

सुख दुख की लहरों पर अक्सर
लड़खड़ाती है जीवन नैया
काटना कठिन है जीवन सफर
है संघर्षरत यह जीवन
.
घिर घिर काले घन आते जब
प्रलय की आँधी से फिर तब
रह रह कर उठे बवंडर
ऊंची नीची लहरों से जूझते लड़ते
थक जाता है मानव अक्सर
बाधाओं से घिर जाये मानव तब
है संघर्षरत यह जीवन
.
चमक चमक कर नभ में जब
जिया धड़काती दामिनी
घबराना नहीं डरना भी नहीं
चीर कर घोर तूफानों को तब
बढ़ते रहना तुम निरंतर
पार बाधाओं को कर सारी
उस पार नैया है ले जानी तुम्हें
चलते जाना तुम अविचल
है संघर्षरत यह जीवन

रेखा जोशी

प्यार

हाँ  किया हमने भी प्यार, इंकार नहीं हैं
था  हमें  इंतज़ार  अब  इंतज़ार नहीं  हैं
बेवफा से दिल लगाया बहुत चोट खाई
दर्द  सीनें  में  छुपाया  पर  प्यार नहीं हैं

रेखा जोशी

Friday, 7 December 2018

जूही बेला मोंगरा की कली


जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती
संवारती घर पिया का
गाती गुनगुनाती
.
पीर न उसकी
जाने कोई
दर्द सबका अपनाती
खुद भूखी रह कर भी
माँ का फ़र्ज़ निभाती
जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती
.
कोई उसको समझे न पर
रोती लुटती बीच बाजार
रौंदी मसली जाती
गंदी नाली में दी जाती फेंक
चाहेकितना करे चीत्कार
तड़पाता उसे ज़ालिम सँसार
खरीदी बेचीं जाती
जूही बेला मोंगरा की कली
झूठी मुस्कान होंठो पर लिये
आखिर मुरझा जाती

जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती

रेखा जोशी..