Wednesday, 28 June 2017

बिन तेरे यह ज़िन्दगी वीरानी है

बिन तेरे यह ज़िन्दगी वीरानी है
रह गई अब यह अधूरी कहानी है
,
छाये हो इस कदर जीवन  में मेरे
तेरी यादें ही बस अब  सुहानी है
,
बसी है हमारी जान तुम में प्रियतम
आप से ही ज़िन्दगी में रवानी है
,
ख्यालों में तुम आकर सताया न करो
करते तुम सदा अपनी मनमानी है
,
कैसे बतायें हम हाल ए दिल अपना
क्या कहें जोशी तेरी दीवानी है

रेखा जोशी

Monday, 26 June 2017

टूट जो मोती गये उनको पिरो सकता नही

बहर- रमल मुसम्मन महज़ूफ़
अर्कान- फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
वज़्न-  2122. 2122. 2122. 212. 

काफ़िया का स्वर- ओ
रदीफ़- सकता नहीं

टूट जो मोती गये उनको पिरो सकता नही
ज़ख्म ऐसे अब मिले आंखे भिगो सकता नही
,
रात दिन हम याद करते है सदा  तुमको पिया
दर्द पाया इस कदर अब रात सो सकता नही
,
तुम हमारे प्यार को समझें नहीअब क्या करें
प्यार का देखा कभी जो ख्वाब खो सकता नही
,
बेवफा से प्यार हमने ज़िन्दगी  में क्यों किया
आँख में आँसू हमारे और रो सकता नही
,
रुक जाओ दूर हमसे तुम नही जाना सजन
ज़िन्दगी में प्यार हमसे दूर हो सकता नही

रेखा जोशी

Friday, 23 June 2017

बेवफाई तो उनकी भूल चुके थे ज़िन्दगी में

आसमान  में आज फिर काली घटा घिर आई है
जाने  क्यों आज  तेरी  याद दिल में फिर आई है
बेवफ़ाई तो   उनकी  भूल चुके  थे   ज़िन्दगी  में
मुद्द्त बाद  आज  हमारी  आँख क्यों भर आई है

रेखा जोशी

है गांव में रहते जो बन्धु भाई

गांव में रहते  जो बन्धु भाई है
देते हम उन को आज बधाई है
रूप बदल रहे है वोह भारत का
सुन्दर तस्वीर गांव की बनाई है

रेखा जोशी

यही तो है ज़िन्दगी

ज़िन्दगी
यही तो है ज़िन्दगी
कहीं धूप,छांव है कहीं
बहती धारा वक्त की
सुख दुख किनारों के बीच
जश्न मानते कहीं
कोई ढोते
गम का बोझ कहीं

ज़िन्दगी
यही तो है ज़िन्दगी
आज ख़ुशी का आलम
तो
कल मातम कहीं
फिर भी
थमती ज़िन्दगी नहीं
दामन में इसके
कोई हँस  रहा है
कोई रो रहा है
सफर ज़िन्दगी का
यूँही
चलता जा रहा है
चलता जा रहा है

रेखा जोशी

बीता ज़माना बचपन का


मुस्कुरा
उठे है फूल
मन उपवन में मेरे
याद
आते ही वोह
बीता ज़माना
बचपन का

टेढ़ी मेढ़ी
गाँव की पगडंडियाँ
लहलहाते हरे भरे
खेत
सोंधी सोंधी
माटी की महक
खिलखिलाती फसल संग
वोह
खिलखिलाता ज़माना
बचपन का

भरी दोपहरी में
घर के आंगन में
मिल कर नित
खेल नये नये खेलना
गिल्ली डंडा
चोर सिपाही
गोल गोल घूमते
लट्टू से
मचलता मन
याद आता है बहुत
वोह
मचलता  ज़माना
बचपन का

बरसाती पानी की
लहरों में
वोह
कागज़ की नाव का
लहलहराना
हिलोरे देता
मन उपवन को मेरे
याद आता है बहुत
वोह
बीता ज़माना
बचपन का

रेखा जोशी

Wednesday, 21 June 2017


है  होती  सास    बहू में   तकरार
फिर भी करती वह आपस मे प्यार
एक का बेटा तो दूसरी का पति
जुड़े जिससे उनके दिलों के तार

रेखा जोशी