Friday, 8 December 2017

प्रेम होना चाहिए


वक्त के
आँचल तले
बीत रही है जिंदगी
चार दिन की चांदनी
है यहाँ
लम्हा लम्हा, हर पल
रेत सी हाथों से
फिसल रही है ज़िन्दगी
बीते लम्हे
लौट कर न आए फिर दुबारा
कभी ज़िंदगी में
आओ जी ले यहां 
हर पल
कर के प्यार सभी से
संवार दें जीवन यहां
दुख और गम से
भरी जिंदगी में सबकी
प्रेम  होना चाहिए

रेखा जोशी

Thursday, 7 December 2017

कालचक्र

कालचक्र

सागर किनारे डूबते सूरज का नज़ारा देख कर वहां जुटी भीड़ तितर बितर हो गई थी, लोग धीरे धीरे वहां से चले गए, गरजते सुमुद्र की लहरें चट्टानों से टकरा कर शोर मचाती वापिस समुद्र में लीन हो रही थी lढलती शाम में परछाइयां लम्बी होती जा रही थी, सूरज के ढलते ही लालिमा कालिमा में बदल गई और रवि सुमुद्र की आती जाती लहरों को निहार रहा था ,मन व्याकुल सा हो रहा था ,"कल फिर सूरज उदय होगा और शाम ढलते ही डूब जायेगा" बिलकुल जीवन के कालचक्र की तरह, 'जीवन और मृत्यु', हम सब भी तो इसी कालचक्र का एक हिस्सा है, आज जीवन जी रहे हैं तो कल हमें मौत अपने आगोश में ले लेगीl
रवि अतीत के उन लम्हों में खो गया जब उसकी जान से भी प्यारी मीना उसे तन्हा छोड़ कालरूपी  सागर में लीन हो गई थी, उसे जब भी अपनी मीना की याद आती है तो वह सागर किनारे सिली सिली रेत पर वक्त के उन हसीन लम्हों में उसे ढूँढता रहता है, संग चलती अपनी परछाई से उसे मीना के होने का एहसास होता है, डूबते सूरज को देख उम्मीद की इक किरण जाग जाती है कि कल फिर सागर से सूर्योदय होगा l

  रेखा जोशी 

Wednesday, 6 December 2017

मुहब्बत की खूबसूरत राहें


प्रियतम
आओ  चलें हम
मुहब्बत की
खूबसूरत राहों पर
देखो वह
बाहें फैलाये हमे
है  बुला  रही
और हम उन पर
चलते ही  रहें निरंतर

दुनिया से दूर
खोये रहे हम
इक  दूजे में  सदा
ज़िंदगी भर
थामें इक  दूजे का हाथ
कदम से कदम मिला कर
चलते ही  रहें निरंतर

भूल कर
दुनिया के  सारे गम
बस  मै और तुम
निभाते रहें साथ
मंजिल मिले न मिले
है कोई नही  गम
बस रहें महकती सदा
प्रेम की राहें
और हम
चलते ही  रहें निरंतर

 रेखा जोशी

Sunday, 3 December 2017

भावी पीढ़ी में बढ़ती अपराधिक प्रवृति

भावी पीढ़ी में बढ़ती अपराधिक प्रवृति

हम सब जानते है कि माँ बच्चे की प्रथम गुरु होती है ,माँ द्वारा दिए हुए संस्कार उसकी औलाद का जीवन संवार सकते है ,लेकिन बहुत दुःख की बात है कि आज भी नारी को वह सम्मान नही मिल पाया जिसकी वह हकदार है अगर नारी सशक्त है तो वह अपनी संतान को नैतिकता का पाठ पढ़ा कर सम्पूर्ण राष्ट्र को सशक्त बना सकती है | कहने को तो नारी सशक्तिकरण पर लम्बे लम्बे भाषण दिए जाते है ,कार्यक्रम किये जाते है परन्तु अगर उनके घर में देखा जाए तो अधिकतर घरों में नारी की आज भी वही स्थिति है ,उसे ऊपर उठने ही नही दिया जाता , पुरुष का अहम नारी को सदा दबा कर रखता है और ऐसी दयनीय स्थिति में कुंठित हुई नारी अपनी संतान को जो दिशा दिखानी चाहिए वह ऐसा नही कर पाती ,पति पत्नी के आपसी झगड़ों के कारण भी नन्हे कोमल बच्चों की मानसिकता पर गहरा प्रभाव पड़ता है । 

जब कोई पुरुष नशे में धुत अपनी पत्नी से गाली गलौज या मार पीट करता है तो उस घर में नारी के साथ साथ बच्चों के सुकोमल मन पर भी गहरी चोट लगती है और वह अंदर ही अंदर घुट कर रह जाते है ,लेकिन उनके भीतर दबा हुआ आक्रोश एक दिन ज्वालामुखी बन फूट पड़ता है ,और अगर वहां आर्थिक परेशानी हो तो भावी पीढ़ी का भटकाव सुनिश्चित हो जाता है ,उनका आक्रोश अपराधिक प्रवृति की ओर उनकी दिशा बदल लेता है |

आज हम देख रहे हैं कि संस्कारहीन और संवेदनशून्य समाज उभर कर आ गया है जो दिशा भ्रमित हो चुका है ,न तो माँ बाप के पास समय है अपनी संतान को सही दिशा दिखाने का और न ही संतान के पास समय है अपने माँ बाप के लिए | भागती दौड़ती जिंदगी में कमी  है तो वक्त की, माता पिता अपने बच्चों को अच्छे बुरे की पहचान नहीं करा पाते और कब उनकी संतान  अपराध की दुनिया की और अग्रसर हो जाते हैं उन्हे पता ही नहीं चलता l हाल ही में गुरूग्राम के रायन स्कूल के एक बच्चे की हत्या का मामला सामने आया है, एक सीनियर क्लास के बच्चे ने छोटे बच्चे की हत्या कर दी l

यह हम सबका कर्तव्य बनता है कि हम अपने बच्चों के. लिए समय निकाल कर उनका सही मार्गदर्शन करें l

रेखा जोशी

Saturday, 2 December 2017

तन्हा तन्हा  बीता हर पल


चाहत हो मेरी कहना था
दिल में मेरे वह रहता था
,
मेरी गलियों में आ जाना
रस्ता वह तेरे घर का था
,
कोई पूछे टूटे दिल से
किस की खातिर दिल रोया था
,
बहते थे आँखों से आँसू
तड़पा  के ज़ालिम हँसता था
,
खुश हूँ जीवन में तुम आये
बिन तेरे सब कुछ सूना था
,
तन्हा तन्हा  बीता हर पल
जीवन सूना ही गुज़रा था
,
तेरी सूरत लगती प्यारी
पर दिल तेरा तो काला था
,
ग़ैरों को अपना कर तुमने
क्यों तोड़ा अपना वादा था

रेखा जोशी

Wednesday, 29 November 2017

अम्मा

टन टन टन दरवाज़े की घंटी बज उठी ,लपक कर मीनू ने दरवाज़ा खोला  उसके सामने पडोस की बूढ़ी अम्मा खड़ी थी ,''बेटा आज पता नही क्यों हलवा पूड़ी खाने का मन हो रहा है ,तनिक बना कर खिला दो न ,''|मीनू ने प्यार से अम्मा को अपने घर के भीतर बुला लिया और पूरी श्रद्धा से उसने बूढ़ी अम्मा  के आगे हलवा और पूड़ी बना कर परोस दिया |पता नही इस बुढ़ापे में शायद अम्मा की सारी की सारी इन्द्रिया उसकी जुबान के रस में केन्द्रित हो गई थी  जो वह आये दिन नयें नयें व्यंजनों की फरमाइश ले कर उसके दरवाज़े पर खड़ी हो जाती थी l

उस दिन मीनू ने अम्मा से पूछ ही लिया ,''अम्मा ,तुम अपनी  बहू से क्यूँ नही कहती ,वह भी तो  तुम्हे यह सब बना कर खिला सकती है ,''पूड़ी खाते खाते अम्मा के हाथ वहीं रुक गए,आँखें उपर कर मीरा को देखते हुए अम्मा बोली   ,''न बाबा न ,वह जो मुझे दलिया देती है ,उसे देना भी वह बंद कर देगी ,बेटा अगर वह कुछ बढ़िया सा खाना बनाती है तो मुझ पर  एहसान कर ऐसे देती है मानो किसी कुत्ते के आगे रोटी का टुकड़ा डाल रही हो ,छि ऐसे खाने को तो  किसी का दिल भी नही करेगा ,''कहते कहते अम्मा की आँखें नम हो गई l मीनू सोच में पड़ गई 'क्या यही है हमारी संस्कृति ?क्या हमारे बुज़ुर्ग सम्मान के हकदार नही है ?"

रेखा जोशी

हाइकु


हाइकु

खुशी के गीत
कुहुकती कोयल
जगाती  प्रीत
,
जगाती प्रीत
सजन अलबेला
मन का मीत
,
मन का मीत
बहुत तड़पाये
जाने न प्रीत
,
जाने न प्रीत
समझ नहीं पाता
प्रीत की रीत

रेखा जोशी

Tuesday, 28 November 2017

कौन करे विश्वास इन पर पहचान अपनी छिपा रहा

सभ्यता का ओढ़े मुखौटा
आज मानव घूम रहा
मुखौटों पर पहन मुखौटे
पहचान अपनी छिपा रहा

मन में ईर्षा द्वेष
होंठों पर मुस्कुराहट
विनीत भाव से
बोली में मिठास ला रहा
कौन करे विश्वास इन पर
पहचान अपनी छिपा रहा

रहना संभल कर इनसे
कब घोंप दे पीठ में खंजर
अपना बन कर
देते धोखा
दोस्ती का पहन के चोला
दुश्मन
पहचान अपनी छिपा रहा

रेखा जोशी

पिंजरे का पंछी

बचपन में माँ एक कहानी सुनाया करती थी कि एक राक्षस किसी देश की राजकुमारी को उठा कर ले गया था लेकिन कहानी का अंत बहुत सुखद होता था, कोई राजकुमार बहुत सी कठिनाइयाँ झेल कर राजकुमारी को राक्षस के चुंगल से बचा लिया करता था l

आज न जाने कितने महीने गुज़र गये मीना को अपने राजकुमार का इंतज़ार करते हुए, उफ़ कितनी भयानक रात थी जब वह रात को आफिस से घर लौट तब किसी राक्षस ने उसे पकड़ लिया था, कितना चीखी थी मीना लेकिन तब से वह उस ज़ालिम की केद में तड़प तड़प कर दिन गुज़ार रही थी, कब इस बंद पिंजरे से उसे आज़ादी मिलेगी, लेकिन आज़ादी उसके नसीब में नहीं थी, नही जानती थी कि उसके राजकुमार ने ही मीना को बेच दिया था उस राक्षस को l

रेखा जोशी

Sunday, 26 November 2017

बादलों की ओट से झांकता है चाँद

बादलों की ओट से झांकता है चाँद
पानी की लहरों पे लहराता है चाँद
.....................................................
आ गये हम तो यहाँ परियों के देश में
यहाँ चाँदनी पथ पे बिखेरता है चाँद
…………………………………
दीप्त हुआ चाँदनी से चेहरा तेरा
रोशन हुआ आलम जगमगाता है चाँद
........................................... ..........
आये तेरी महफ़िल में अब हम भी सनम
तारों संग नभ पे मुस्कुराता है चाँद
…………………………………
सुंदर नज़ारों को बसा लिया पलकों में
अब देख कर हमे यहाँ शर्माता है चाँद

रेखा जोशी

Friday, 24 November 2017

लहर  लहर  लहराते  गाते  नदिया  में  प्रेम  के गीत

हंस  हंसिनी का जोड़ा  निर्मल जल में लगा झूमने
चाँद सा मुखड़ा देख हंसिनी का लगा हंस चहकने
,
कमल खिले खुशियों के तब जैसे खिले कलियों से फूल
मिले  इक  दूजे  के  दिल  लगे  संग  संग वोह  धड़कने
,
लहर  लहर  लहराते  गाते  नदिया  में  प्रेम  के गीत
प्रियतम से मिल लिखी प्रेम कहानी  प्रीत लगी मचलने
,
बना  रहे  स्नेह सदा आती  रहें  बहारें ज़िन्दगी में
देख प्यार दोनों का तरंगिनी भी अब लगी बहकने
,
इक दूजे का बन  सहारा   जीते  इक  दूजे  को देख
हाथ जोड़  भगवन  से मांगे जन्‍म जन्‍म का साथ बने

रेखा जोशी 

Thursday, 23 November 2017

याद तेरी सता रही है मुझे


याद तेरी  सता रही है मुझे 
ज़िन्दगी अब बुला रही है मुझे 

चोट खाते  रहे  यहाँ साजन 
पीड़  दिल की जला  रही है मुझे 

छिप गये हो कहाँ जहाँ में तुम 
याद फिर आज आ रही है मुझे 
.. 
सिलसिला प्यार का न टूटे अब 
मौत जीना सिखा  रही है मुझे 
... 
आ मिला कर चलें कदम हम तुम 
चाह तेरी  लुभा रही है मुझे 

रेखा जोशी 

Tuesday, 21 November 2017

शादी जी हाँ शादी

शादी जी हाँ शादी
था सुना करते
यह तो है बरबादी
,
कहते थे बड़े बुजुर्ग
कर लो मौज अभी
पता चलेगा
आटे दाल का भाव
जब होगी शादी
मत पड़ना इस चक्कर में
यह तो है बरबादी
,
लेकिन नहीं माना मन
ललचा गया
बेताब हो उठा
खा ही लिया शादी का लड्डू
बंध गए विवाह के बंधन में
सोचा अब तो पड़ेगा पछताना
क्योकि
यह तो है बरबादी
,
नहीं सोचा था कभी
खूबसूरत प्यारे इस बँधन से
मिलेंगी खुशियाँ हज़ार  हमेँ
बदल देगा दुनिया हमारी
मिला जीवन साथी इक प्यारा
बना वह सुख दुख का सहारा
वह तो निकला
जन्‍म जन्‍म का साथी
कर दी सुबह और शाम
हमने उसके नाम
नहीं समझे जो
प्यारे इस बँधन को
वोही है कहते
यह तो है बरबादी

रेखा जोशी

Saturday, 18 November 2017

नहीं मुश्किल नदी के पार होना

नहीं मुश्किल नदी के पार होना
रहे माँझी  अगर बेदार होना
,
हमारे ख्वाब है पूरे हुए अब
कहो उनसे न फिर मिस्मार होना
,
कहें कैसे  सजन से बात दिल की
झुकी आँखें कहें है आर होना
,
सहारा कौन देता इस जहां में
उठो खुद ही न फिर बेगार होना
,
रखा हमने छुपा कर प्यार दिल में
निगाहों से बयां हैं प्यार होना
,
सितारों से सजी महफिल यहां पर
किसी का आज  है दीदार होना

रेखा जोशी

अधजल गगरी छलकत जाये

है मौन बहती
सरिता गहरी
उदण्ड बहते निर्झर
झर झर झर झर
करते भंग मौन
पर्वत पर
उछल उछल कर
शोर मचाये
अधजल गगरी छलकत जाये

ज्ञानी रहते मौन
यहाँ पर
ज्ञान बाँचते
पोंगें पंडित
कुहक कुहक कर
रसीले मधुर गीत
कोयलिया गाये
पंचम सुर में
कागा बोले
राग अपना ही
अलापता जाये
अधजल गगरी छलकत जाये

मिलेंगे यहाँ
हज़ारों इंसान
आधा अधूरा  ज्ञान लिये
गुण अपने करते बखान
कौन इन्हे अब समझाये 
अधजल गगरी छलकत जाये

रेखा जोशी

Thursday, 16 November 2017

बीत जायेगा समां यह


फूल बगिया में खिलेंगे
ग़म न कर दिन यह फिरेंगे
बीत जायेगा समां यह
फिर खुशी के पल मिलेंगे

रेखा जोशी

Wednesday, 15 November 2017

जिंदगी

हर  पल इक नया रूप  ले कर आती ज़िंदगी
पल पल छोड़ नये पल में ढल जाती  जिंदगी
जीतें हम सभी ख़ुशी और गम के अनेक पल
आँसू   बहाती  या  फिर  गीत  गाती  ज़िंदगी

रेखा जोशी

Sunday, 5 November 2017

टूटते  रिश्ते  यहां  पत्थरों  के  शहर  में

दुनिया की भीड़ में  देखे  बिखरते रिश्ते
ज़िंदगी की भाग दौड़ में सिसकते रिश्ते
टूटते  रिश्ते  यहां  पत्थरों  के  शहर  में
प्रेम  प्रीति  से  ही  तो  हैं  संवरते  रिश्ते

रेखा जोशी

Friday, 3 November 2017

जीवन में धीरज रखना सीख

उड़ना चाहूँ आसमान  में
पाँव पड़ी  जंजीर 
जो चाहूँ वो न पाऊँ
यह कैसी मिली तकदीर 
रहे  अधूरे  सपने  
देखे  जो  मेरी चाहतों  ने  
भाग्यविधाता क्यों लिख दी
मेरे भाग्य में पीर

थी यही तमन्ना
जीवन में कुछ करने की
सपनों पर अपने
पड़ती रही धूल ही धूल
फूलों की चाहत में
मिले हमें शूल ही शूल
लेकिन
आई दिल से आवाज़
न छोड़ना कभी आस
अधूरे सपनें होंगे पूरे
न हो तुम अधीर

छू लोगे तुम
आसमां इक दिन
पंख मिलेंगे ख़्वाबों को
गर खुद पर हो विश्वास
अवश्य होगे कामयाब
बस जीवन में
धीरज रखना सीख

रेखा जोशी







 रेखा जोशी

Thursday, 2 November 2017

मुक्तक

समाये   तुम   पिया  दिल में  हमारे
चले    आओ    पुकारे    हैं   बहारें
मिले जो तुम हमें दुनिया मिली अब
खिला  उपवन  हमें  साजन  पुकारे

रेखा जोशी

Wednesday, 1 November 2017

कभी रूठती कभी हम को मनाती

है  लाडो  हमारी  सब को  नचाती
कभी रूठती कभी हम को मनाती
खेलती कूदती घर अँगना  बिटिया
बचपन सुहाना  मुझे  याद दिलाती

रेखा जोशी

Monday, 30 October 2017

जय माँ गंगे हर हर गंगे

कल कल शोर मचाती
नाचती इठलाती
उतरी हिमालय की गोद से
आई भारत की धरा पर
जीवन दाती
भागीरथी को करते नमन
है पावन नीर बहती धारा
छलकता अमृत
बूंद बूंद  में इसकी
नदी नहीं यह मैया हमारी
करते माँ  गंगा  को नमन 
इसके लहराते आँचल में
बस रहा हमारा वतन
उगल रही सोना धरती
जाये जहां
निर्मल इसका जल
जय माँ गंगे हर हर गंगे
सदियों तक तुम बहती जाना
जय माँ गंगे हर हर गंगे
देश हमारा समृध्द बनाना
जय माँ गंगे हर हर गंगे
जय माँ गंगे हर हर गंगे

रेखा जोशी

क्या रिश्ता था तुमसे

क्या रिश्ता था तुमसे
एक पड़ोसी ही तो थे तुम
लेकिन
माँ की आवाज़ सुनते ही
भाग आते थे घर हमारे
कभी तरकारी कभी दही
भाग भाग कर लाते थे तुम
और माँ भी न
झट से बुला लेती थी तुम्हें
कोई काम हो
नहीं पूरा होता बिन तुम्हारे
आखिर
क्या रिश्ता था तुमसे
एक बेनाम रिश्ता
फिर भी इतना अपनापन
नहीं नहीं
न होते हुए भी
रिश्ता था तुमसे
आखिर
खून का रिश्ता न होते हुए भी
रक्षाबंधन पर
एक अनमोल रिश्ते में
बाँध लिया तुम्हें
कलाई पर तुम्हारी
नेह की डोर से
एक बेनाम रिश्ते को
नाम दे कर
निभा रहे हो जिसे तुम
अब तक

रेखा जोशी

Sunday, 29 October 2017

अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई
दिल मचलता रहा पर उनसे ना मुलाकात हुई
,
रिमझिम बरसती बूंदों से है नहाया तन बदन
आसमान से आज फिर से जम कर बरसात हुईं
,
काली घनी  घटाओं संग चले शीतल हवाएँ
उड़ने लगा मन मेरा ना  जाने क्या बात हुई
,
झूला झूलती सखियाँ अब पिया आवन की आस
बीता दिन इंतज़ार में अब तो सजन रात हुईं
,
चमकती दामिनी गगन धड़के हैं मोरा जियरा
गर आओ मोरे बलम तो  बरसात सौगात हुईं

रेखा जोशी

बेनाम रिश्ता


रिश्ता तेरा मेरा
है कुछ अजीब सा
अरसा हुआ बिछड़े हुए
लेकिन
रहा आज तक
बेनाम
चाह थी मेरी उसे
इक नाम दूं
प्यार या फिर दोस्ती का
देखो तो विडम्बना
न रहा प्यार न दोस्ती
गुम हो गये कहीं हम
अतीत की गहरे कोहरे में
न कोई अपनापन
न उसका एहसास
सर्द ठंडे बेनाम रिश्ते में
शायद थी कोई चिंगारी
जो तुम याद आये
थी कोई नेह की डोर
बाँध रखा है जिसने
हमारे बेनाम रिश्ते को

रेखा जोशी

बेवफा  प्यार व्यार क्या जाने

2122 1212 22

बेवफा  प्यार व्यार क्या जाने
दर्द दिल का नहीं पिया जाने
,
साथ लेकर हमें चलो साजन
क्या पता कब मिलें खुदा जाने
,
खूबसूरत यहां नज़ारे अब
छा रहा क्यों पिया नशा जाने
,
बात दिल की हमें कहो साजन
कल बहारे न हों  खुदा जाने
,
मुस्कुरा ले यहां घड़ी भर तू
पल मिलें फिर न क्या पता जाने
,
चांदनी है खिली खिली साजन
मुस्कुरा चाँद क्यों रहा जाने

रेखा जोशी

Thursday, 26 October 2017

समझ नहीं पाओ गे तुम


आलीशान बंगलों में बैठ
करते हो बात गरीबों की
नहीं समझ सकते तुम
पेट की आग को
कुलबुलाती है भूख जब
गरीब के पेट में
सु्‍सज्जित मेज़ पर
लज़ीज़  व्यंजन खाते वक्त
नहीं समझ सकते तुम
हालात गरीबों के
क्योंकि तुम्हारी राहों में
बिछे रहते सदा मखमल के कालीन
शान ओ शौकत के
समझ भी नहीं पाओगे तुम
क्योंकि
तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते

रेखा जोशी

Monday, 23 October 2017

करें  हम  याद  तुमको हर घड़ी हर पल

1222 1222 1222

नहीं  कोई   यहां  दीवार  अब साजन
किया हमने  पिया इकरार अब साजन
,
जिया  लागे  न  सजना अब बिना तेरे
चले  आओ  पुकारे  प्यार अब साजन
,
बहारे  है खिला  उपवन  पिया आ जा
नज़ारों  से न कर  इनकार अब साजन
,
किसे साजन सुनाएँ हाल दिल का हम
चलो  लेकर  हमें  उस पार अब साजन
,
करें  हम  याद  तुमको हर घड़ी हर पल
यहां  पर  ज़िंदगी  संवार  अब   साजन

रेखा जोशी

Saturday, 21 October 2017

दोहे दीपावली पर


दीप जगमगाते रहें , रोशन  करें जहान
आई  है दीपावली, सजा  है हिन्दुस्तान
,
खुशियाँ बरसे अब यहाँ, मिले यही वरदान
ऎसा  उजियारा  करो, दीप्त हो   हर स्थान
,
जाति पाती भेद मिटे, सब हो यहां समान
मानवता  परमों  धर्म, बाँट जगत में ज्ञान

रेखा जोशी

Friday, 20 October 2017

मुक्तक


ज़िन्दगी में बहुत कुछ  है धन माना
सबको   नाच  नचाता  है धन जाना
रिश्तों  के ऊपर  अब है दौलत यहाँ
करे  हर   किसी  को दौलत दीवाना

रेखा जोशी

मुक्तक


कान्हा   के रूप में ईश्वर ने  लिया अवतार
जन्म लिया धरती पर पैदा हुआ तारणहार
वासुदेव ने सर  धर कान्हा  गोकुल पहुँचाया
देवकी ने जाया उसे यशोदा से मिला  दुलार
..
हे माखनचोर नन्दलाला ,मुरली मधुर है बजाये 
धुन सुन  मुरली की गोपाला ,राधिका मन मुस्कुराये 
चंचल नैना चंचल चितवन, गोपाला से प्रीति हुई
कन्हैया से छीनी मुरलिया  , बाँसुरिया अधर लगाये 

रेखा जोशी 

रेखा जोशी

खुशी लाती दिवाली जले नेह का दीप


दीप जलाये सबने रोशन हुआ जहान
सज रही सभी गलियाँ अब सजा हिन्दुस्तान 
,
एक दीपक तो जलाओ अपने अंतस में 
फैैलाओ  उजाला करो दीप्त हर स्थान 
,
घर   घर  हो   उजियारा  दूर  हो अंधेरा
जात पात का भेद मिटे सब जन एक समान
,
जगमग जगमग दीप जले आई दिवाली
खुशियाँ बरसे घर घर ऎसा मिले वरदान
,
खुशी लाती दिवाली जले नेह का दीप
मानवता परम धर्म जगत में बाँट ज्ञान

रेखा जोशी 

मुट्ठी  भर   दाने  अपने  आँगन  में  बिखेरता हूँ

मुट्ठी  भर   दाने  अपने  आँगन  में  बिखेरता हूँ
मैं उन चिड़ियों को अक्सर दाना दुनका  देता हूँ
,
एक से बढ़कर एक लुभाती सुंदर चिड़िया अंगना
चहकती   फुदकती  दाने   चुगते  उन्हें देखता  हूँ
,
चहचहाने  से  उनके  चहक  उठता  आंगन मेरा
वीरान  नैनों   में  भर  खुशियाँ यहां  समेटता  हूँ
,
सुबह शाम  करें कलरव मधुर रस कानों में घोले
मधुर गीतो से  झोली में फिर   जिंदगी  भरता हूँ
,
रिश्ता उनसे अनोखा मेरा है हर रिश्ते से ऊपर
कभी कभी दिल की बातें भी उनसे कर लेता हूँ

रेखा जोशी

Wednesday, 18 October 2017

फुलवारी


अँगना खिली आज फुलवारी है
फ़ूलों  से  महकी अब क्यारी  है
नाचते  झूम  झूम   मोर  बगिया
कुहुके   कोयल   डारी  डारी  है

रेखा जोशी

गणेश वंदना

गणपति बप्पा सुन लो पुकार हमारी 
डोले   नाव   बीच    मझधार  हमारी 
,
हे   गजानन   विघ्नेश्वर  विघ्नहर्ता 
लगा   दीजिये    नैया   पार   हमारी 
,
हे   गौरी  नंदन  सबके   दुःखहर्ता
सुन लो प्रार्थना   इस  बार   हमारी
,
अर्पित करे  हम मोदक  और मेवा
जिंदगी  बप्पा  दो   संवार  हमारी
,
विराजो अब भगवन बुद्धि में सदा तुम
तुम  पर  प्रभु है भक्ति  अपार  हमारी

रेखा जोशी 

Sunday, 15 October 2017

सवाल


आज सालों दिनों बाद प्रिया ने कैफे में कदम रखा, बीस साल पहले उसकी यहां से बदली हो गई थी, फिर वह घर गृहस्थी के चक्कर में ही फंस कर रह गई , टेबल पर बैठते ही बीते दिनों की यादों में खो गई l क्या दिन थे जब वह रवि के साथ यहां अक्सर आया करती था, घंटों दोनों यहां  वक्त गुज़ारा करते थे l प्रिया को रवि पर बहुत गुस्सा था, उसने शादी से इंकार क्यों कर दिया था l तभी उसे एक जानी पहचानी सी आवाज़ सुनाई दी l प्रिया ने घूम कर देखा, उसके सामने रवि था l
" "अरे, तुम यहाँ? क्या इत्तेफ़ाक़ है," कहते हुए उसने हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ाया ।

कैफे में साथ वाली टेबल से जब उसे किसी ने पुकारा तो उसने आवाज़ की दिशा में सिर घुमा कर देखा ।

बीस साल..... एक ही शहर में रहते हुए इतने लंबे अंतराल के पश्चात यह मुलाक़ात....

अपरिचितों से भरे कैफे के शोरो-गुल के बीच दिमाग़ जैसे सुन्न हो गया । अचंभित हो दोनों एक दूसरे को देखते रह गये ।

क्या है ईश्वर की इच्छा, सोचते हुए वो अतीत की यादों में गुम हो गये....."
कभी दोनों ने जीने मरने की कसमें भी खाई थीं, दोनों एक दूसरे को देखते रह गए लेकिन निशब्द, आँखों से आँखे मिली,प्रिया ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा उसकी नज़र रवि के लड़खड़ाते हुए  कदमों  पर रुक गई रवि ने अपनी सीट के पास रखी छड़ी  उठाई और लंगड़ाते हुए धीरे  धीरे दरवाज़े से बाहर चला गया l प्रिया को अपने सवाल का जवाब मिल गया था l

रेखा जोशी

Saturday, 14 October 2017

दोहे


1
मीत प्रीत जाने नहीं, समझे न प्रेम प्यार
मन से जोगी जोगड़ा, सब से प्रीत अपार
2
सूरज निकला है गगन, पंछी करते शोर
जागो तुम अब नींद से, चहक उठी है भोर

रेखा जोशी

Friday, 13 October 2017

काश मिलती तुम हमें जिंदगी

अर्कान= फाइलातुन् फाइलातुन् फाइलुन्
तक्तीअ= (मापनी) 2122 2122 212
.
काश  मिलती तुम हमें ज़िन्दगी
प्यार  तेरे   संग करते  ज़िन्दगी
...
मुस्कुराते संग दोनों फिर सजन
साथ  रोते  साथ हँसते ज़िन्दगी
....
पास  आते तुम हमारे तो कभी
हम दिखाते प्यार से ये जिंदगी
....
जा रहे हम दूर तुमसे अब सजन
अब आखिरी इज़हार ले जिंदगी
....
अब हमारी इल्तिज़ा सुन लो पिया
देख  लो  जी  भर हमें  ए जिंदगी

रेखा जोशी

Thursday, 12 October 2017

काश सच हो पाते

इंद्रधनुषी रंगों से
सजाया था हमने
महकता हुआ गुलशन
ख़्वाबों में अपने
गुलज़ार थी जिसमे
हमारी ज़िंदगी
दुनिया से दूर
मै और तुम
बाते किया करते
थे आँखों से अपनी
सपने ही सपने
कुहकती थी कोयलिया भी
बगिया में हमारी
गाती थी वो भी
प्रेम तराने
टूट गए सब सपने
खुलते ही आँखे
बिखर गए सब रंग
और हम
भरते ही रह गए
ठंडी आहें
काश सच हो पाते
वोह प्यारे
ख़्वाब हमारे

रेखा जोशी

जल रहे दीपक से जगमगाना सीख ले

जो गिर गए हैं उनको उठाना सीख ले
जल रहे दीपक से जगमगाना सीख ले

महकती बगिया खिले रंग बिरंगे फूल
संग संग फूल के मुस्कुराना सीख ले
,
गीत गा रहे आज भँवरे उपवन उपवन
संग संग गीत तुम गुनगुनाना सीख ले
,
मचल रहे आज हमारे दिल के अरमान
हमें आज तुम अपना बनाना सीख ले
,
बांट ले अब खुशियाँ सबको गले लगाकर
मिल सभी अपनों से खिलखिलाना सीख ले

रेखा जोशी

हाले दिल यार को लिखूं कैसे


रहते हो दिल में प्रियतम कहूं कैसे
बात  प्यार  की  आज  करूं  कैसे
उमड़  रहे  जज़्बात दिल में साजन
हाले   दिल   यार   को  लिखूं कैसे

रेखा जोशी

Wednesday, 11 October 2017

तिरा फिर रूठ जाना और ही था


तिरा फिर रूठ जाना और ही था 
न मिलने का बहाना और ही था 
चले तुम छोड़ कर महफ़िल हमारी
वफ़ा हम को दिखाना और ही था 

रेखा जोशी