Monday, 23 October 2017

करें  हम  याद  तुमको हर घड़ी हर पल

1222 1222 1222

नहीं  कोई   यहां  दीवार  अब साजन
किया हमने  पिया इकरार अब साजन
,
जिया  लागे  न  सजना अब बिना तेरे
चले  आओ  पुकारे  प्यार अब साजन
,
बहारे  है खिला  उपवन  पिया आ जा
नज़ारों  से न कर  इनकार अब साजन
,
किसे साजन सुनाएँ हाल दिल का हम
चलो  लेकर  हमें  उस पार अब साजन
,
करें  हम  याद  तुमको हर घड़ी हर पल
यहां  पर  ज़िंदगी  संवार  अब   साजन

रेखा जोशी

Saturday, 21 October 2017

दोहे दीपावली पर


दीप जगमगाते रहें , रोशन  करें जहान
आई  है दीपावली, सजा  है हिन्दुस्तान
,
खुशियाँ बरसे अब यहाँ, मिले यही वरदान
ऎसा  उजियारा  करो, दीप्त हो   हर स्थान
,
जाति पाती भेद मिटे, सब हो यहां समान
मानवता  परमों  धर्म, बाँट जगत में ज्ञान

रेखा जोशी

Friday, 20 October 2017

मुक्तक


ज़िन्दगी में बहुत कुछ  है धन माना
सबको   नाच  नचाता  है धन जाना
रिश्तों  के ऊपर  अब है दौलत यहाँ
करे  हर   किसी  को दौलत दीवाना

रेखा जोशी

मुक्तक


कान्हा   के रूप में ईश्वर ने  लिया अवतार
जन्म लिया धरती पर पैदा हुआ तारणहार
वासुदेव ने सर  धर कान्हा  गोकुल पहुँचाया
देवकी ने जाया उसे यशोदा से मिला  दुलार
..
हे माखनचोर नन्दलाला ,मुरली मधुर है बजाये 
धुन सुन  मुरली की गोपाला ,राधिका मन मुस्कुराये 
चंचल नैना चंचल चितवन, गोपाला से प्रीति हुई
कन्हैया से छीनी मुरलिया  , बाँसुरिया अधर लगाये 

रेखा जोशी 

रेखा जोशी

खुशी लाती दिवाली जले नेह का दीप


दीप जलाये सबने रोशन हुआ जहान
सज रही सभी गलियाँ अब सजा हिन्दुस्तान 
,
एक दीपक तो जलाओ अपने अंतस में 
फैैलाओ  उजाला करो दीप्त हर स्थान 
,
घर   घर  हो   उजियारा  दूर  हो अंधेरा
जात पात का भेद मिटे सब जन एक समान
,
जगमग जगमग दीप जले आई दिवाली
खुशियाँ बरसे घर घर ऎसा मिले वरदान
,
खुशी लाती दिवाली जले नेह का दीप
मानवता परम धर्म जगत में बाँट ज्ञान

रेखा जोशी 

मुट्ठी  भर   दाने  अपने  आँगन  में  बिखेरता हूँ

मुट्ठी  भर   दाने  अपने  आँगन  में  बिखेरता हूँ
मैं उन चिड़ियों को अक्सर दाना दुनका  देता हूँ
,
एक से बढ़कर एक लुभाती सुंदर चिड़िया अंगना
चहकती   फुदकती  दाने   चुगते  उन्हें देखता  हूँ
,
चहचहाने  से  उनके  चहक  उठता  आंगन मेरा
वीरान  नैनों   में  भर  खुशियाँ यहां  समेटता  हूँ
,
सुबह शाम  करें कलरव मधुर रस कानों में घोले
मधुर गीतो से  झोली में फिर   जिंदगी  भरता हूँ
,
रिश्ता उनसे अनोखा मेरा है हर रिश्ते से ऊपर
कभी कभी दिल की बातें भी उनसे कर लेता हूँ

रेखा जोशी

Wednesday, 18 October 2017

फुलवारी


अँगना खिली आज फुलवारी है
फ़ूलों  से  महकी अब क्यारी  है
नाचते  झूम  झूम   मोर  बगिया
कुहुके   कोयल   डारी  डारी  है

रेखा जोशी

गणेश वंदना

गणपति बप्पा सुन लो पुकार हमारी 
डोले   नाव   बीच    मझधार  हमारी 
,
हे   गजानन   विघ्नेश्वर  विघ्नहर्ता 
लगा   दीजिये    नैया   पार   हमारी 
,
हे   गौरी  नंदन  सबके   दुःखहर्ता
सुन लो प्रार्थना   इस  बार   हमारी
,
अर्पित करे  हम मोदक  और मेवा
जिंदगी  बप्पा  दो   संवार  हमारी
,
विराजो अब भगवन बुद्धि में सदा तुम
तुम  पर  प्रभु है भक्ति  अपार  हमारी

रेखा जोशी 

Sunday, 15 October 2017

सवाल


आज सालों दिनों बाद प्रिया ने कैफे में कदम रखा, बीस साल पहले उसकी यहां से बदली हो गई थी, फिर वह घर गृहस्थी के चक्कर में ही फंस कर रह गई , टेबल पर बैठते ही बीते दिनों की यादों में खो गई l क्या दिन थे जब वह रवि के साथ यहां अक्सर आया करती था, घंटों दोनों यहां  वक्त गुज़ारा करते थे l प्रिया को रवि पर बहुत गुस्सा था, उसने शादी से इंकार क्यों कर दिया था l तभी उसे एक जानी पहचानी सी आवाज़ सुनाई दी l प्रिया ने घूम कर देखा, उसके सामने रवि था l
" "अरे, तुम यहाँ? क्या इत्तेफ़ाक़ है," कहते हुए उसने हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ाया ।

कैफे में साथ वाली टेबल से जब उसे किसी ने पुकारा तो उसने आवाज़ की दिशा में सिर घुमा कर देखा ।

बीस साल..... एक ही शहर में रहते हुए इतने लंबे अंतराल के पश्चात यह मुलाक़ात....

अपरिचितों से भरे कैफे के शोरो-गुल के बीच दिमाग़ जैसे सुन्न हो गया । अचंभित हो दोनों एक दूसरे को देखते रह गये ।

क्या है ईश्वर की इच्छा, सोचते हुए वो अतीत की यादों में गुम हो गये....."
कभी दोनों ने जीने मरने की कसमें भी खाई थीं, दोनों एक दूसरे को देखते रह गए लेकिन निशब्द, आँखों से आँखे मिली,प्रिया ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा उसकी नज़र रवि के लड़खड़ाते हुए  कदमों  पर रुक गई रवि ने अपनी सीट के पास रखी छड़ी  उठाई और लंगड़ाते हुए धीरे  धीरे दरवाज़े से बाहर चला गया l प्रिया को अपने सवाल का जवाब मिल गया था l

रेखा जोशी

Saturday, 14 October 2017

दोहे


1
मीत प्रीत जाने नहीं, समझे न प्रेम प्यार
मन से जोगी जोगड़ा, सब से प्रीत अपार
2
सूरज निकला है गगन, पंछी करते शोर
जागो तुम अब नींद से, चहक उठी है भोर

रेखा जोशी

Friday, 13 October 2017

काश मिलती तुम हमें जिंदगी

अर्कान= फाइलातुन् फाइलातुन् फाइलुन्
तक्तीअ= (मापनी) 2122 2122 212
.
काश  मिलती तुम हमें ज़िन्दगी
प्यार  तेरे   संग करते  ज़िन्दगी
...
मुस्कुराते संग दोनों फिर सजन
साथ  रोते  साथ हँसते ज़िन्दगी
....
पास  आते तुम हमारे तो कभी
हम दिखाते प्यार से ये जिंदगी
....
जा रहे हम दूर तुमसे अब सजन
अब आखिरी इज़हार ले जिंदगी
....
अब हमारी इल्तिज़ा सुन लो पिया
देख  लो  जी  भर हमें  ए जिंदगी

रेखा जोशी

जिंदगी को खिलखिलाना आ गया


प्यार  हमको अब निभाना आ गया
जिंदगी को खिलखिलाना आ  गया
....
मिल गये आज दिल से दिल हमारे
हाल दिल का अब सुनाना आ गया
....
चूम कर आँचल हवाओं ने कहा
आज मौसम आशिकाना आ गया
....
खुश रहो साजन जहाँ में तुम सदा
ज़िंदगी को खिलखिलाना आ गया
....
कर रही है यह हवायें अब वफ़ा
साथ जीने का ज़माना आ गया

रेखा जोशी

Thursday, 12 October 2017

काश सच हो पाते

इंद्रधनुषी रंगों से
सजाया था हमने
महकता हुआ गुलशन
ख़्वाबों में अपने
गुलज़ार थी जिसमे
हमारी ज़िंदगी
दुनिया से दूर
मै और तुम
बाते किया करते
थे आँखों से अपनी
सपने ही सपने
कुहकती थी कोयलिया भी
बगिया में हमारी
गाती थी वो भी
प्रेम तराने
टूट गए सब सपने
खुलते ही आँखे
बिखर गए सब रंग
और हम
भरते ही रह गए
ठंडी आहें
काश सच हो पाते
वोह प्यारे
ख़्वाब हमारे

रेखा जोशी

जल रहे दीपक से जगमगाना सीख ले

जो गिर गए हैं उनको उठाना सीख ले
जल रहे दीपक से जगमगाना सीख ले

महकती बगिया खिले रंग बिरंगे फूल
संग संग फूल के मुस्कुराना सीख ले
,
गीत गा रहे आज भँवरे उपवन उपवन
संग संग गीत तुम गुनगुनाना सीख ले
,
मचल रहे आज हमारे दिल के अरमान
हमें आज तुम अपना बनाना सीख ले
,
बांट ले अब खुशियाँ सबको गले लगाकर
मिल सभी अपनों से खिलखिलाना सीख ले

रेखा जोशी

हाले दिल यार को लिखूं कैसे


रहते हो दिल में प्रियतम कहूं कैसे
बात  प्यार  की  आज  करूं  कैसे
उमड़  रहे  जज़्बात दिल में साजन
हाले   दिल   यार   को  लिखूं कैसे

रेखा जोशी

Wednesday, 11 October 2017

तिरा फिर रूठ जाना और ही था


तिरा फिर रूठ जाना और ही था 
न मिलने का बहाना और ही था 
चले तुम छोड़ कर महफ़िल हमारी
वफ़ा हम को दिखाना और ही था 

रेखा जोशी 

Tuesday, 10 October 2017

मंदिर मन

मन मुदित
पर्वत की शृंखला
नीरव घाटी
,
प्रभु दर्शन
शांत वातावरण
मंदिर मन
,
स्नेह निश्छल
दीपक प्रज्ज्वलित
मन उज्ज्वल

रेखा जोशी

मुक्तक

दिल  तुमको अपना बनाना चाहता है
तुम पर  पिया जान लुटाना  चाहता है
रूठे रूठे क्यों  हो तुम  प्रियतम हमसे
दर्द   अब   तेरा  अपनाना  चाहता  है

रेखा जोशी

Monday, 9 October 2017

अब हम जियेंगे और मरेंगे साथ साथ

जीवन की राहों में ले हाथों में हाथ
साजन मेरे अब हम चल रहे साथ साथ

अधूरे  है हम  तुम बिन सुन साथी  मेरे
आओ जीवन का हर पल जिएं साथ साथ

हर्षित हुआ  मन देख  मुस्कुराहट तेरी
दोनों सदा खिलखिलाते रहें साथ साथ

आये कोई मुश्किल कभी जीवन पथ पर
मिल कर दोनों सुलझा लेंगे साथ साथ

तुमसे बंधी हूँ मै  साथी यह मान ले
प्रेम बँधन में बंधे हम चलें साथ साथ

छोड़ न जाना तुम कभी राह में अकेले
आरज़ू है यही जिएं और मरें साथ साथ

रेखा जोशी

Saturday, 7 October 2017

मुक्तक


प्रीत  की लौ जलाने की बात कर
साजन  प्यार निभाने की बात कर
अाई  है  चमन  में  बहार   साजन
अब  गीत  गुनगुनाने की बात कर

रेखा जोशी

Friday, 6 October 2017

मुक्तक


दो दिन की है ज़िन्दगी यहां,दो दिन ही साथ निभाना है
प्रेम  कर ले  सभी है अपने,दुख दर्द सबका  मिटाना है
किस बात का करते हो यहां,तुम अहंकार बता ओ बन्दे
है माटी के पुतले हम  सब ,माटी  में  ही मिल जाना है

रेखा जोशी

Thursday, 5 October 2017

वफ़ा करे पुकार है

1212  1212

खिली खिली बहार है
वफ़ा  करे   पुकार  है
कभी मिले  खुशी हमें
मिला  हमें  न प्यार है

रेखा जोशी

खिले जीवन यहां जैसे बगिया में बहार

 
फूलों  से  लदे  गुच्छे   लहराते  डार   डार
है खिल खिल गए उपवन  महकाते संसार
,
सज रही रँग बिरँगी पुष्पित सुंदर  वाटिका
है  भँवरें   पुष्पों  पर   मंडराते    बार  बार
,
सुन्दर गुलाब खिले महकती है खुशी यहां
संग  संग  फूलों  के  यहां  मिलते  है खार
,
है   मनाती   उत्सव  रंग  बिरंगी  तितलियां
चुरा  कर रंग   फूलों  का  कर  रही  सिंगार
,
अंबुआ  की  डाली  पे  कुहुकती कोयलिया
खिले  जीवन  यहां जैसे  बगिया  में  बहार

रेखा जोशी

रात की नींद और दिन का चैन खो गया


कही सुनी पे बहुत एतबार करने लगे
दिल ओ जान से उनको प्यार करने लगे
,
मालूम न था  इक धोखा है यह ज़िन्दगी
इस धोखे का  पिया  इकरार करने लगे
,
लगे देखने हम तो ख्वाब रात दिन सजन
नींद  में  ही  उनका  दीदार करने लगे
,
खोल कर रख दिया हमने दिल अपना सजन
अपने प्यार का सदा इजहार करने लगे
,
रात की नींद और दिन का चैन खो गया
याद उन्हें हम तो बार बार करने लगे

रेखा जोशी

Wednesday, 4 October 2017

टूटते रिश्ते


जीवन की भाग दौड़ में बिखरते  रिश्ते
देखें  भीड़ में भी  यहां सिसकते  रिश्ते
भाषा  प्रेम  की  कोई  नहीं  समझ रहा
पत्थर का दिल हो तो नहीं जुड़ते रिश्ते

रेखा जोशी

चांदनी रात

है याद मिले तुम 
हमें पहले पहल चाँदनी रात में
खामोश लब
बोले नयन
था ह्रदय विहल
चाँदनी रात में थामा था हाथ
इक दूजे का
निभाने के लिये साथ
जगमगा उठा फिर
कल्पनाओं का महल
खूबसूरत
चाँदनी रात में

रेखा जोशी

तेज़ाब (लघु कथा)

तेज़ाब (लघु कथा)

ऋतु की हालत बहुत गम्भीर थी ,उसका सारा बदन बुरी तरह से जल गया था,आफिस से आते समय किसी सिरफिरे ने उस पर तेज़ाब फेंक दिया,उफ़ उसकी तड़प देखी नहीं जा रही थी , ऋतु के मां बाप का रो रो कर बुरा हाल था ,पुलिस में रिपोर्ट की तब तफ्तीश हुई तो पता चला कि यह उसके एक सहयोगी अरुण का किया धरा था  जो एक अमीर आदमी का बिगडै़ल बेटा था और  ऋतु ने उसका प्रणय आग्रह ठुकरा दिया था ।
पुलिस को सबूत दिए गए,कोर्ट में गवाह पेश किए गए और उसे कारावास की सजा भी हुई लेकिन एक महीने के अंदर ही  उसकी जमानत हो गई ।एक बार फिर से पैसा जीत गया और एक अपराधी किसी और पर तेज़ाब फेंकने के लिए आजाद था

रेखा जोशी

Tuesday, 3 October 2017

है खिल खिल गए उपवन कहते संसार


है खिल खिल गये उपवन महकाते संसार
फूलों  से  लदे  गुच्छे   लहराते  डार   डार
सज रही रँग बिरँगी पुष्पित सुंदर  वाटिका
भँवरें  अब   पुष्पों  पर  मंडराते  बार  बार

रेखा जोशी

है बरकत मां के हाथों में


है बरकत मां के हाथों में
भर देती अपने बच्चों की झोली
खुशियों से
रह जाती सिमट कर दुनिया सारी
उसकी अपने बच्चों में
करती व्रत अपने परिवार के
कल्याण के लिए
चाहती सदा उन्नति उनकी
लेकिन अक्सर नहीं समझ पाते
बच्चे मां के प्यार को
जो चाहती सदा भलाई उनकी
नहीं देखा भगवान को कभी
लेकिन रहता
सदा वह संग तुम्हारे
धर कर रूप मां का
मां ही है ईश्वर का रूप
सदा करो सम्मान उसका
सदा करो सम्मान उसका

रेखा जोशी

Sunday, 1 October 2017

ज़िन्दगी का खूबसूरत बन्धन "विवाह"

ज़िन्दगी का खूबसूरत  बन्धन"विवाह"

हमारे शास्त्रों में लिखा हुआ है कि शादी के बाद पति और पत्नी का मिलन ऐसे होना चाहिए जैसे दो जगह का पानी मिल कर एक हो जाता है फिर उस पानी को पहले जैसे अलग नही किया जा सकता ,लेकिन ऐसा होना बहुत ही मुश्किल है क्योंकि दो व्यक्ति अलग अलग विचारधारा लिए अलग अलग परिवेश में बड़े हुए जब एक दूसरे के साथ रहने लगते है तो यह सम्भाविक है कि उन दोनों की सोच भी एक दूसरे से भिन्न ही होगी ,उनका खान पान ,रहन सहन, बातचीत करने का ढंग ,कई ऐसी बाते है जो उनके अलग अलग व्यक्तित्व को दर्शाती है | अगर एक को घर का खाना पसंद आता है तो दूसरेको बाहर खाना अच्छा लगता है , अगर एक को घर सजाना अच्छा लगता है तो दूसरे को घर फैलाना ,लेकिन अगर प्रेम ,एक दूसरे के प्रति विश्वास  और मित्रता पर आधारित है,तो यह छोटी छोटी बातें कोई मायने नहीं रखती।

जब वैवाहिक जिंदगी में एक दूसरे के प्रति अविश्वास पनपने लगे या पुरुष प्रधान समाज में पति का अहम आड़े आने लगे तो ऐसे में असली मुद्दा तो बहुत पीछे छूट कर रह जाता है और शुरू हो जाता है उनके बीच न खत्म होने वाली शिकायतों का दौर ,पति पत्नी दोनों को एक दूसरे की हर छोटी बड़ी बात चुभने लगती है ,इसके चलते उन दोनों का बेचारा कोमल दिल शिकवे शिकायतों के बोझ तले दब कर रह जाता है और बढ़ा देता है उनके बीच न खत्म होने वाली दूरियाँ ,जो उन्हें मजबूर कर देती है कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने पर और खत्म होती है उनके वैवाहिक जीवन की कहानी तलाक पर जा कर ,अगर किसी कारणवश वह तलाक नही भी लेते और सारी जिंदगी उस बोझिल शादी से समझौता कर उसे बचाने में ही निकाल देतें है ,पति पत्नी का आपस में सामंजस्य दुनिया के हर रिश्ते से प्यारा हो सकता है ,अगर पति पत्नी दोनों इस समस्या को परिपक्व ढंग से अपने दिल की भावनाओं को एक दूसरे से बातचीत कर सुलझाने की कोशिश करें तो इसमें कोई दो राय नही होगी और  एक दिन वह अपनी शादी की सिल्वर जुबली या गोल्डन जुबली अवश्य मनाएं गे |

रेखा जोशी 

दे दो सहारे उन बेचारों को

दे के आवाज़ गम के मारों को
दे दो  सहारे  उन   बेचारों को
,
जीवन में उन्हें मिले दुख ओ दर्द
बना लो अपना उन बेसहारों को
,
भटक रहे गली गली हो दर बदर
दे  दो  आवास  उन बंजारों को
,
दुनिया ने चुभाए शूल पांव में
निकाल दो आज तुम उन खारों को
,
नहीं मिली खुशियां कभी जीवन में
उनके लिए बुला लो बहारों को

रेखा जोशी

Friday, 29 September 2017

Happy Dussehra


रावण रहता हर गली,सीता दुखी अपार
राम आज आओ यहां ,कर  रावण संहार

रेखा जोशी

Thursday, 28 September 2017

मुक्तक


ज़िन्दगी  देती  रहे दुख  दर्द  जब इंसान को
बेचता  यूं  ही  नहीं   है  आदमी  ईमान   को
भूख से  देखा  तड़पते आदमी को जब यहां
रख दिया इंसान ने फिर ताक पर सम्मान को

रेखा जोशी

Wednesday, 27 September 2017

छंद स्रग्विणी

छन्द- स्रग्विणी 
मापनी - 212 212 212 212

दर्द सह  कर सजन मुस्कुराते रहे 
राज़ दिल का पिया हम छिपाते रहे
,
ज़िन्दगी में रहा प्यार सपना  सदा
प्यार में लोग सब खिलखिलाते रहे
,
साथ तेरा न हमको मिला है कभी
हर  घड़ी  प्यार  तुमको  बुलाते रहे
,
ज़िन्दगी से मिले है बहुत गम हमें
आंख  आंसू   लिए  गुनगुनाते  रहे
,
काश मिलती हमें ज़िन्दगी में खुशी
ज़िन्दगी  साथ   तेरा   निभाते   रहे

रेखा जोशी

विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं


हर साल
जलाते रावण हम
क्यों मनाते खुशियां
उसे जला कर
पूर्ण ज्ञानी शिव भक्त
था रावण
लेकिन
मरता नहीं वह कभी
अमृत नाभि में है उसके अभी
बार बार जी उठता वह
मानते उसे प्रतीक बुराई का
लेकिन
नहीं मिटा पाते 
बुराई अपने भीतर की
जलाना है रावण
तो
आओ मिटाएं बुराई
जला कर अपने
अंतस का रावण

रेखा जोशी

बेरोज़गारी

बेरोज़गारी

एम काम की डिग्री हासिल करने के बाद सुधीर को आशा थी कि उसके दिन बदल जायेंगे ,एक अच्छी सी नौकरी मिल ही जाएगी,मां बाप ,पत्नी निशा  और अपने बच्चों की जिम्मेदारी वह अच्छी तरह निभा सकेगा ।वह एक के बाद एक इंटरव्यू देता रहा लेकिन केवल निराशा ही हाथ लगी ।दिन प्रतिदिन  वह अवसाद में  डूबता चला गया ,हालत यहां तक पहुंच गए कि उसने  आत्महत्या करने की ठान ली ।निशा उसकी परेशानी समझ रही थी ,उसने हिम्मत नहीं हारी और "स्टार्ट अप" शुरू करने के लिए लोन ले लिया और घर में ही पापड़ और आचार बनाने का काम शुरू कर दिया ,अपने पति के साथ मिल कर उसे केवलअवसाद से बाहर ही  नहीं निकला बल्कि उसकी बेरोज़गारी को अंगूठा दिखा दिया।

रेखा जोशी

Tuesday, 26 September 2017

प्यार किया है हमने तुमसे


दिल हमारा दुखाया न करो
नज़रें  पिया  चुराया न करो
प्यार  किया  है हमने तुमसे
तुम  हमें यूं सताया  न करो

रेखा जोशी

जीत

दो पहलू ज़िन्दगी के
जीत या हार
पर इसके बीच भी
है लेती सांस ज़िंदगी
कुछ सफलता
या लिए
कुछ असफलता
न कर गम असफलता का
सीढ़ी है यह
जो दिखाती राह
सफलता का
होती है खत्म
जो जा कर
इक दिन जीत पर

रेखा जोशी

मिथ्या है यह बन्धन सारे तोड़ जाना इक दिन


बहुत सोये जीवन भर अब तो जाओ तुम जाग
जीवन अपना  ऐसे   जियो   लगे  न कोई दाग
मिथ्या है यह बन्धन सारे तोड़  जाना इक दिन
करते  रहना  सतकर्म  तुम  ह्रदय में धर विराग

रेखा जोशी 

Monday, 25 September 2017

संस्मरण

तीन घंटे तीन घटनाएं (संस्मरण)

वैसे तो मै ऐसी बातों को मानती नहीं हूं,लेकिन हाल ही में मेरे साथ कुछ अजीब सी घटनाएं हुई,22 सितम्बर 2017 को मै झेलम एक्सप्रेस से पठानकोट जा रही थी ,सुबह  होने को थी कि अचानक मेरी नींद खुली,समय देखने के लिए पर्स से मोबाईल निकालने को बंद आंखों से पर्स खोजने लगी तो पर्स नदारद ,जल्दी से उठ कर पूरा बिस्तर झाड़ दिया लेकिन पर्स वहां होता तो मिलता ,वह तो चोरी हो चुका था,मैने जोर जोर से शोर मचाना शुरू कर दियाऔर अपने कैबिन से बाहर की ओर भागी ,"मेरा पर्स चोरी हो गया,मेरा पर्स कोई उठा कर ले गया,"तभी देखा बाहर दो लड़के खड़े थे,मुझे देखते ही बोले ,"आंटी एक पर्स टायलट में तंगा हुआ है ,हम यही सोच रहे थे कि टी टी को सूचित कर देते है "।मैभाग कर टायलट में गई तो देखा कि मेरा पर्स खूंटी पर टंगा हुआ है ,जल्दी से उसे टटोला तो पाया कि कुछ रुपए जो बाहर की पाकेट में ऊपर के खर्च के रखे थे वाह गायब थे ,बाकी सारा सामान ज्यों का त्यों था ,वापिस अपनी सीट पर आईं तो वह दोनो लड़के गायब थे।मै खुश हो गई कि ज्यादा नुकसान नहीं हुआ ।

कैबिन बैठे सभी यात्री इस घटना पर चर्चा का ही रहे थे तभी खिड़की के परदे की राड मेरे सर पर गिरी लेकिन मुझे कोई चोट नहीं आई, बाते करते करते मेरे मुख से यह निकला ,"पता नहीं  आज का दिन कैसा निकला , बातें करते स्टेशन आ गया और मै गाड़ी से उतर गई ।

मुझे पठानकोट से नूरपुर अपने भाई के घर जाना था अपने वयोवृद्ध पापा को देखन मैने एक लड़के से पूछा की नूरपुर की बस कहां से मिलती है तो उसने कहा कि उसे भी उसी तरफ जाना है  ,यहां से रेलवे फाटक क्रास कर के बस मिल जाएगी ,मै उसके साथ चलने लगी ,लेकिन रेलवे फाटक वाला रास्ता बन्द था सो उसने कहा कि साइड से रेलवे लाइनस क्रास कर लेते है ,जैसे ही मै उस तरफ बढ़ी ,रास्ता पथरीला होने के कारण मेरा पांव किसी पत्थर पर  पड़ा मै अपना संतुलन खो  बैठी और गिर गई मेरे मुंह और घुटनों पर हलकी चोटें आईं लेकिन मेरा बायां पांव बुरी तरह से मुड़ गया था और पूरा सूज गया था जिसके कारण मै खड़ी भी नहीं हो पा रही थी ,उस लड़के ने मुझे उठाया और धीरे धीरे बस अड्डे ले गया, मुझे बस मेंबिठाया और नूरपुर मेरे भाई के पास छोड़ कर  आया । बस में बैठे  सब यात्री मुझे देख कर  अपनी अपनी राय दे रहे थे ,""बच गई  कोई भारी ग्रह आया था ,टल गया"। तीन घंटों में तीन घटनाएं ,क्या सचमुच यह किसी ग्रह की साज़िश थी या मात्र संयोग ?,इन घटनाओं ने मुझे भी आश्चर्यचकित कर दिया।

रेखा जोशी

Wednesday, 20 September 2017

मत खेलो अब प्रकृति से मानव तुम


नीला   आसमान   मैला   हुआ   है
प्रदूषण   चहुं  ओर  फैला  हुआ  है
मत खेलो अब प्रकृति से मानव तुम
जल भी अब  यहां  कसैला हुआ है

रेखा जोशी

Sunday, 17 September 2017

जादुई कलम

जादुई कलम ने
मेरी
कर दिया कमाल
लिखते ही
पूरे होने लगे
मेरे ख्वाब
रंगीन तितलियों सी
उड़ती रंग बिरंगी
अनेक ख्वाहिशें
मंडरा कर
सिमटती गई
कलम में मेरी
और
धीरे धीरे
महकाने लगी मेरा आंगन
पुष्पित उपवन
नभ पर विचरते पंछी
गाने लगे नवगीत
संग संग
और
खिल उठी मै भी
लिए हाथ में 
अपनी जादुई कलम

रेखा जोशी

प्रीत के घेरे में बन्ध गए हम और तुम


इंद्रधनुष के रंग
चुरा कर
कल्पनाओं की
कलम से
लिख दी
हसरतें अपनी
उड़ने लगी
आसमान में
फूलों सी लगी
महकने
परिंदों सी लगी
चहकने
आस की डोरी से
छलकने
लगी खुशबू
खुशियां अब
होने लगी
रू ब रू
प्रीत के घेरे में
बन्ध गए
हम और तुम
खो गए
रंगीन जहां में
हम और तुम

रेखा जोशी

Thursday, 14 September 2017

मुक्तक


बीती रात कब  यह  खबर न हुई
तुम  न आये तो क्या सहर  न हुई
मिला न  साथ  तेरा  ज़िन्दगी   में
आओ तुम पास  वो पहर  न  हुई

रेखा जोशी

                                  

Wednesday, 13 September 2017

ख्वाबों में तेरे सो गई आंखें


ख्वाबों में तेरे सो गई आँखे
तुझको सोचा तो खो गई आँखे
,
पाया जो तुमको जहान पा लिया
सपनो  में देखो खो गई आँखे
,
समाया  तेरी  निगाहों में प्यार
प्यार में पिया लो खो गई आँखे
,
सताती हमे अब  यादें तुम्हारी
यादों में अब तो खो गई आँखे
,
बिठाया तुमको पलकों पे  हमने
चाहत में अब जो खो गई आँखे

रेखा जोशी

Tuesday, 12 September 2017

गीतिका

मापनी - 122  122  122  122
समांत - अलो,  पदान्त - तुम

खुशी ज़िन्दगी में मिले गर चलो  तुम
मिले ज़िन्दगी में सभी कुछ फलो तुम
,
हमें तो मिली मंज़िलें ज़िन्दगी में
नही ज़िन्दगी अब कभी फिर छलो तुम
,
रहो आसमाँ में हमेशा चमकते
कभी शाम बन कर न साजन दलो तुम
,
हमेशा  करो  रोशनी ज़िन्दगी में
सदा दीप बन  ज़िन्दगी में  जलो तुम
,
कभी ,जिंदगी में न  छाये अँधेरे
न अपने कभी हाथ साजन मलो तुम

रेखा जोशी

रूप मां का धर आये भगवान धरा पर

मां की आंखों में छिपा असीम प्यार पढ़ो
ममता  स्नेह   अनुराग  का  भंडार   पढ़ो
रूप मां  का  धर  आये भगवान धरा पर
समाया  हृदय   में   सारा    संसार   पढ़ो

रेखा जोशी

Monday, 11 September 2017

कितने ईमानदार है हम?

कितने ईमानदार है हम ?इस प्रश्न से मै दुविधा में पड़ गई ,वह इसलिए क्योकि अब ईमानदार शब्द पूर्ण तत्त्व न हो कर तुलनात्मक हो चुका है कुछ दिन पहले मेरी एक सहेली वंदना के पति का बैग आफिस से घर आते समय कहीं खो गया ,उसमे कुछ जरूरी कागज़ात ,लाइसेंस और करीब दो हजार रूपये थे ,बेचारे अपने जरूरी कागज़ात के लिए बहुत परेशान थे |दो दिन बाद उनके  घर के बाहर बाग़ में उन्हें अपना बैग दिखाई पड़ा ,उन्होंने उसे जल्दी से उठाया और खोल कर देखा तो केवल रूपये गायब थे बाकी सब कुछ यथावत उस  बैग में वैसा ही था ,उनकी नजर में चोर तुलनात्मक रूप से ईमानदार था ,रूपये गए तो गए कम से कम बाकी सब कुछ तो उन्हें मिल ही गया ,नही तो उन्हें उन कागज़ात की वजह से काफी परेशानी उठानी पड़ती|

आज भी समाज में ऐसे लोगों की कमी नही है जिसके दम पर सच्चाई टिकी हुई है | वंदना अपनी नन्ही सी बेटी रीमा की ऊँगली थामे जब बाज़ार जा रही थी तभी उसे रास्ते में चलते चलते एक रूपये का सिक्का जमीन पर पड़ा हुआ मिल गया,उसकी बेटी रीमा ने  झट से उसे उठा कर ख़ुशी से उछलते हुए  वंदना से कहा ,''अहा,मम्मी मै तो इस रूपये से टाफी लूंगी,आज तो मज़ा ही आ गया ''| अपनी बेटी के हाथ में सिक्का देख वंदना उसे समझाते हुए बोली  ,''लेकिन बेटा यह सिक्का तो तुम्हारा नही है,किसी का इस रास्ते पर चलते हुए गिर गया होगा  ,ऐसा करते है हम  मंदिर चलते है और इसे भगवान जी के चरणों में चढ़ा देते है ,यही ठीक रहे गा ,है न मेरी प्यारी बिटिया ।

'वंदना ने अपनी बेटी को  ईमानदारी का पाठ तो पढ़ा इस देश में ईमानदारी और नैतिकता जैसे शब्द खोखले,  निरर्थक और अर्थहीन हो चुके है,एक तरफ तो हम अपने बच्चों से  ईमानदारी ,सदाचार और नैतिक मूल्यों की बाते करते है और दूसरी तरफ जब उन्हें समाज में पनप रही अनैतिकता और भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ता है तब  हमारे बच्चे ,इस देश के भविष्य निर्माता टूट कर बिखर जाते है ,अपने परिवार  से मिले आदर्श संस्कार उन्हें अपनी ही जिंदगी में आगे बढ़ कर समाज एवं राष्ट्र हित के लिए कार्य करने में मुश्किलें पैदा कर देते है  और कुछ लोग सारी जिंदगी घुट घुट कर जीते है | 

हमारे देश में हजारों , लाखों युवक और युवतिया बेईमानी ,अनैतिकता ,घूसखोरी के चलते क्रुद्ध ,दुखी और अवसादग्रस्त हो रहे है ,लेकिन क्या नैतिकता के रास्ते पर चल ईमानदारी से जीवन यापन करना पाप है ?

  रेखा जोशी