Saturday, 31 October 2015

ज़ख्म हमको इस ज़माने ने दिये अब

हाथ थामें दूर साजन आज जाना 
साथ दे कर प्यार को अब तुम  निभाना
....
राह मुश्किल ज़िंदगी की जान लो तुम
छोड़ कर अब तुम हमें मत दूर जाना
....
जब कभी भी  राह में आये मुसीबत
थाम लेना तुम हमें अपना बनाना

ख़्वाब जो हम को दिखाये ज़िंदगी ने
तोड़ कर फिर तुम उसे वापिस न जाना

ज़ख्म हमको इस  ज़माने ने दिये अब
ज़िंदगी मेरी गई बन इक फ़साना 

रेखा जोशी 

जाग जाओ देश मिलकर है बचाना

जाग जाओ देश मिलकर है बचाना 
नींद में सोये हुओं को  है जगाना 
साँस दुश्मन को मिटा कर आज लेंगे 
साथ मिलकर है बुराई  को मिटाना 
… 
मिट गये है देश पर लाखो सिपाही
आज कुर्बानी ज़माने को बताना
देश के दुश्मन छिपें घर आज  अपने
पाठ उनको ढूँढ कर अब है पढ़ाना 
प्यार  से मिलकर रहें आपस सदा हम 
आज मिलकर देश को आगे बढ़ाना 

रेखा जोशी 


Friday, 30 October 2015

रो रहा अब सत्य और झूठ यहाँ हँसता है

रो रहा अब सत्य और झूठ यहाँ हँसता  है 
पुण्य  मांगे  भीख औ  पाप यहाँ फलता है 
झूठे  पड़े  सब  संस्कार जो दिए  थे माँ ने 
दुराचारी  फले  सदाचारी यहाँ   मरता   है 

रेखा जोशी

Thursday, 29 October 2015

साथ तेरे सजन अब चले ज़िंदगी

मिल  गये  गर  हमें तुम मिले ज़िंदगी 
जो   बहारें    मिले   तो  खिले  ज़िंदगी 
ज़िंदगी कुछ नहीं गर न हम तुम मिले 
साथ   तेरे   सजन  फिर  चले  ज़िंदगी 

रेखा जोशी 




Wednesday, 28 October 2015

चूमती पग नव उषाकिरण


मिलकर खुशियाँ मनायें हम 
पँख    सुनहरी  फैलायें   हम 
चूमती  पग  नव  उषाकिरण 
आसमाँ   को  छू  पायें   हम 

रेखा जोशी 

गुड़िया

गुड़िया

''नही नहीं ,मै अपनी गुड़िया किसी को नहीं दूँगी '' नन्ही मीतू ने अपनी प्यारी गुड़िया को सीने से चिपटा लिया । मीतू तुम्हारी गुड़िया की शादी मेरे गुड्डे से हो चुकी है अब तो तुम्हे अपनी गुड़िया मुझे देनी ही होगी ,अगर नहीं देनी थी तो तुमने उसकी शादी क्यों की ?''मीतू की सहेली नीलू ने उसे समझाया । मीतू के चिल्ला कर कहा ,''कुछ भी ही मै तुम्हे अपनी गुड़िया नहीं दूँगी तो नहीं दूँगी ,तुम अपना गुड्डा लो और चली जाओ यहाँ से । अब तो नीलू को भी गुस्सा आ गया ,''अगर तुमने ऐसे ही करना था तो यह शादी का तमाशा करने की क्या जरूरत थी ''गुस्से में पैर पटकते हुये नीलू चली गई । दूर खड़ी सुरभि अपनी नन्ही सी गुड़िया मीतू की गुड़िया की शादी को देख रही थी ,मन ही मन सोचने लगी ,''मीतू आज तो तुमने ज़िद करके अपनी गुड़िया की विदाई नहीं की लेकिन इक दिन मै तुम्हारी विदाई कैसे रोक पाऊँगी । ''यह सोचते ही सुरभि की आँखों से आँसू बहने लगे ।

रेखा जोशी 

Tuesday, 27 October 2015

जहाँ टेकने पड़ते घुटने वक्त के आगे


मत देखो ख़्वाब 
जो कभी 
पूरे हो नही सकते 
सुन्दर हो कितने भी 
रेत के महल 
आखिर इक दिन तो
 है गिरना  उन्हें 
कभी कभी 
ज़िंदगी भी हमें 
है ले लाती 
ऐसी राह पर 
जहाँ टेकने पड़ते 
घुटने 
वक्त के आगे 
और बस सिर्फ 
है करना पड़ता 
इंतज़ार
न जाने कब तक 

रेखा जोशी 

रूठो तुम हम मनाते रहें

सपनों को हम सजाते रहें
बातें   अपनी  सुनाते  रहें
समाये ह्रदय में तुम ही तुम
रूठो  तुम हम मनाते रहें

रेखा जोशी 

कृपा माँ शारदे की हुये धन्य वाल्मीकि

अंगुलीमार  से  कवि  बने  धन्य  वाल्मीकि
रच  कर रामायण  को भये धन्य वाल्मीकि
मरा मरा का जाप कर  हुआ परिवर्तित ह्रदय
कृपा  माँ  शारदे  की   हुये  धन्य   वाल्मीकि

रेखा जोशी


Monday, 26 October 2015

है दो दिन की यह ज़िंदगी

न कर तू अभिमान ऐ बन्दे
प्रेम  जीवन  जान ऐ  बन्दे
है दो दिन की   यह ज़िंदगी
बात  यह तू  मान ऐ बन्दे

रेखा जोशी 

बन कर अर्धांगिनी प्रियतम हमने

पलकों में अपने स्वप्न सजाये
पथ  में तेरे  सदा नयन बिछाये 
बन कर अर्धांगिनी प्रियतम हमने
है तुम संग सातो वचन निभाये

रेखा जोशी 

लावणी छंद

लावणी छंद

उपवन खिलते फूल फूल जब  रंगीन छटा मन भाये
शीतल समीर दे हिचकोले   मन मोरे  सजन समाये
आये  अँगना  मोरे  सजना    हर्षाया  हमारा  जिया
है   नैनो   में   सपने   तेरे   साँवरिया  सलोने   पिया

रेखा जोशी

Sunday, 25 October 2015

खिलेगे फूल बगिया में नहीं किस्मत हमारी में

दिये  धोखे हमें सबने ज़माने के सताये है
सजी  महफ़िल सजन तेरी चले हम आज आये है
....
हमें आया नही करना कभी भी प्यार जीवन में
निभाया  प्यार हमने  ज़िंदगी तुम पर लुटाये  है
.....
कहाँ जाये करें क्या राह में बैठे अकेले हम
निहारे राह तेरी पर सजन आँखे बिछाये है

खिलेगे  फूल बगिया में नहीं किस्मत हमारी में
सजन बादल घनेरे ज़िंदगी में आज छायें है

कहें क्या अब किसे कैसे यहाँ दिल की लगी को हम
मिले जो  दर्द सीने  में उसे हमने  छिपाये है

रेखा जोशी

Friday, 23 October 2015

आशा की नव किरणे ले कर आई है शुभ प्रभात

है गूँज उठा अंबर पंछियों के चहचहाने  से
है खिल खिल उठा उपवन फूलों के खिलखिलाने से
आशा की नव किरणे ले कर आई है  शुभ प्रभात
जीवन में आई बहार आपके मुस्कुराने से

रेखा जोशी

है थिरकती रश्मियाँ दिवाकर चमके शान से

उतर रहा  नील  नभ पर सातवें आसमान से 
है थिरकती  रश्मियाँ दिवाकर चमके शान से 
सवार सात घोड़ों पे अलौकिक लालिमा लिये
तन मन धरा पर प्रकाशित हुये दीप्तिमान से

रेखा जोशी 

कम नही किसी जादूगर से कलमकार

एकरस होते जब 
दिल और दिमाग
उतर आते जज़्बात 
कागज़ पर
कम नही
किसी जादूगर से
कलमकार
मचा सकता तहलका
आ सकती क्रान्ति
विश्व में
उसकी कलम से 
उसकी पैनी धार से
जो खामोश करती वार
हम सबके दिलों पर
झकझोड़ कर विचारों को
है दिखा देती
इक नवीन दिशा 
सृजन कर रचना का 
बना सकता एक 
स्वस्थ समाज 
कर सकता निर्माण एक 
सशक्त राष्ट्र का 

रेखा जोशी 




रेखा जोशी

आती रहें बहारें फूल खिलें गुलशन गुलशन

आती रहें खुशियाँ सदा  ज़िंदगी में आपकी
मुस्कुराते रहें  गुलाब  ज़िंदगी में आपकी
आती रहें बहारें  फूल खिलें गुलशन गुलशन
महकता रहे चमन सदा ज़िंदगी में आपकी

रेखा जोशी


Thursday, 22 October 2015

थामा हमने इक दूजे का हाथों ने हाथ

देख हमे

जब तुम  मुस्कुराये
आँखों आँखों में
बात हुई
न कुछ हमने कहा
न कुछ तुमने कहा
हलचल सी
हमारे दिल में हुई
थामा हमने
इक दूजे का
हाथों ने हाथ
चल पड़े
हम
साथ साथ

रेखा जोशी 

मिले धोखे यहां करना न तुम प्यार

किया था प्यार हमने आज स्वीकार
हुई   है   ज़िंदगी   में  प्यार  की  हार
लगाना  मत  कभी  तुम  यहां आस
मिले  धोखे यहां करना न तुम प्यार

रेखा जोशी


Wednesday, 21 October 2015

सुनो हे राम आओ फिर रावण का संहार करने

सभी मित्रों को विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनायें 

आ  रहा  यहाँ  रावण  सीता  हरण बार  बार करने 
है  रूप  अनेक बदल बदल कर आता  प्रहार करने
हो रहा फिर से ज़िंदा आज यहाँ मर कर भी रावण 
सुनो  हे  राम आओ  फिर  रावण का  संहार करने 

रेखा जोशी 


ज्ञान का वर दे हमें वरदायिनी

सुर   की   देवी   हे  वीणावादिनी
हंसवाहिनी  धवल  वस्त्र धारिणी
मिले  गीत  तुझसे संगीत  तुझसे
ज्ञान का  वर  दे  हमें  वरदायिनी

 रेखा जोशी 

Tuesday, 20 October 2015

करें सबसे प्यार नफरत को पलने न दें

अस्मिता नारी की हम कभी लुटने न दे
धर्म के नाम किसी को कभी लड़ने न दे
मिटा कर सब दूरियाँ हम रहें साथ साथ
करें  सबसे प्यार नफरत को पलने न दें

रेखा जोशी 

Monday, 19 October 2015

क्यों भूल गये ताकत कलम की

कर  रहे  साहित्य  का अपमान
लौटा  कर  तुम अपना सम्मान
क्यों भूल गये ताकत कलम की
है दी  जिसने   तुम  को पहचान

रेखा जोशी


कर्म ही अर्चना पूजा

अवगुण अपने दमन करें
शुभ कर्मण को नमन करें
कर्म    ही  अर्चना    पूजा
कर्मण कर हम हवन करें
रेखा जोशी




चरणो में तेरे सदा भक्ति रहे

मन में प्रेम की जलती ज्योति  रहे
मिले  तुमसे  सदा हमें  शक्ति रहे
पूजा  करते   हम  तेरी  दिन  रात 
चरणो  में  तेरे   सदा   भक्ति  रहे

रेखा जोशी

Sunday, 18 October 2015

छू नही सकता जिसे कभी समय भी

पिघल जाता 
लोहा भी इक दिन
चूर चूर हो जाता 
पर्वत भी
बहा ले जाता 
समय संग अपने
सब कुछ
नहीं टिक पाता
समय के आगे
कुछ भी 
रह जाती  बस 
माटी ही माटी 
पर समाया
इक तू ही 
सृष्टि के कण कण में
छू नही
सकता जिसे कभी 
समय भी 

रेखा जोशी 

सफलता का मूलमंत्र [मेरी पूर्व प्रकाशित रचना ]

सफलता का मूलमंत्र [मेरी पूर्व प्रकाशित रचना ]

प्रिया ने सुबह सुबह अपनी पड़ोसन को मुहँ अँधेरे अपने घर से बाहर निकलते  देखा ,इससे पहले वह उससे कुछ पूछती उसकी पड़ोसन जल्दी जल्दी कहीं चली गई |प्रिया को उसका इस तरह जाना कुछ अजीब सा लगा ,इतना तो वह जानती थी कि आजकल उनके घर के हालात कुछ ठीक नही चल रहे ,उसके पति काफी समय से बीमार चल रहे थे और उसके बेटे की कमाई भी कुछ ख़ास नही थी और वह अंधाधुंध ज्योतिष्यों और तांत्रिकों के पीछे भाग रही थी ,उसकी सोच पर प्रिया को  बहुत दुःख होता था ,क्या ऐसे पाखंडियों के पास कोई जादू का डंडा था जो घुमा दिया तो सारी मुसीबतें खत्म ,बस ''खुल जा सिम सिम ''की तरह  उनकी किस्मत का ताला भी खुल जाए गा और वो पाखंडी बाबा उनका घर खुशियों से भर देगा |उन्ही पाखंडी बाबाओं के बहकावे में आ कर वह अपने घर की सुख समृधि के लिए  कुछ अटपटे  से उपाय भी करती रहती थी ,कई बार तो प्रिया को अपने घर के आंगन में काले रंग के छींटे भी पड़े हुए भी मिले थे ,लेकिन प्रिया इस तरह के अंधविश्वासों को बिलकुल नही मानती थी ,बल्कि उसका कई बार मन होता था की वह अपनी पड़ोसन को समझाये कि इन सब ढकोसलों से उसे कुछ भी हासिल होने का नही और वह व्यर्थ में इन पोंगे पंडितों पर अपनी खून पसीने की कमाई लुटा रही थी |

इस संसार में हर इंसान की जिंदगी में अच्छा और बुरा समय आता है ,लेकिन  बुरे  वक्त में  इंसान  अक्सर घबरा जाता है और उन परस्थितियों का सामना करने में अपने आप को असुरक्षित एवं  असमर्थ पाता है उस समय उसे किसी न किसी के सहारे या संबल की आवश्यकता महसूस होती है ,जिसे पाने के लिए वह इधर उधर भटक जाता है ,जिसका भरपूर फायदा उठाते है यह पाखंडी पोंगे पंडित |अपनी लच्छेदार बातों में उलझा कर वह शातिर लोग उन्हें बेवकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा करते है ,पता नही हमारे देश के कितने लोग ऐसे पाखंडियों के बहकावे में आ कर अपनी  जिंदगी भर की कमाई उन्हें सोंप कर अंत में बर्बाद हो कर बैठ जाते है |अपने बुरे वक्त में अगर इंसान विवेक से काम ले तो वह अपनी किस्मत को खुद बदलने में कामयाब हो सकता है ,आत्म विशवास ,दृढ़ इच्छा शक्ति ,लग्न और सकारात्मक  सोच किसी भी इंसान को सफलता प्रदान कर आकाश की बुलंदियों तक पहुंचा सकती है  ,हम जिस नजरिये से जिंदगी को देखते है जिंदगी हमे वैसी ही दिखाई देती है लेकिन केवल ख्याली पुलाव पकाने से कुछ नही होता ,जो भी हम सोचते है उस पर पूरी निष्ठां और लग्न से कर्म करने पर हम वो सब कुछ पा सकते है जो हम चाहते है 

|कुछ दिन पहले प्रिया की मुलाकात एक बहुत ही कामयाब इंसान से हुई थी ,यूँ ही प्रिया ने बातों बातों में उससे उसकी सफलता के पीछे किसका हाथ है ,पूछ लिया ,उसके उत्तर ने प्रिया को बहुत प्रभावित किया ,उसने कहा था कि  अपनी जिंदगी में उसने बहुत कठिन परस्थितियों का सामना किया था लेकिन  जब कभी भी उसे कुछ कर दिखाने का कोई अवसर दिखाई देता  , वह  आगे बढ़ कर उस अवसर को सुअवसर में बदल देता था और उसके पीछे रहती थी उसकी अनथक लग्न ,भरपूर आत्मविश्वास और सफलता पाने का दृढ संकल्प ,बस  जैसे ही उन रास्तों पर  चलना शुरू करता ,मंजिलें अपने आप मिलने लग गई थी ,बस यही राज़ था उसके सफलता के द्वार के खुलने का |तभी प्रिया को सामने से अपनी पड़ोसन आती दिखाई दी और वह उससे मिलने और जीवन में  सफलता पाने का मूलमंत्र बताने के लिए उसकी तरफ  चल पड़ी | 

Friday, 16 October 2015

सभी की यहाँ ज़िंदगी दें सँवार

सुनो आज दिल की हमारे पुकार
मिटा  कर  सभी  दूरियाँ दें दुलार
चलो  प्यार से  हम करें दूर आज
सभी  की  यहाँ  ज़िंदगी  दें सँवार

रेखा जोशी

शरण जो आये उसकी जीवन दिया सँवार

ओढ के लाल चुनरिया  माँ शेर पे   सवार
झोली माँ सब की भरे अनुग्रह करे  हज़ार
शीश झुकाये  हम खड़े पालनहार जग की
शरण जो  आये उसकी  ज़िंदगी दे  सँवार

रेखा जोशी

Thursday, 15 October 2015

नवगीत

हाथ पाँव दूर दोनों
नही पहचानते
अलग अलग दोनों
इक दूजे से
.
अनभिज्ञ
आँख कान
दिल और दिमाग
अलग अलग दोनों
इक दूजे से
.
फिर शुरू हुई तकरार
दोनों में
खींच रहे मानव को
सोचना काम  दिमाग का
लेकिन
दिल है कि मानता नही
खेलअपना  दिखाता
डाल  पर्दा सोच पर
भावना में बहा कर
अपनी बात मनवाता
अनजान रहा दिमाग
बेबस हुई सोच
दिल और दिमाग
अलग अलग दोनों
इक दूजे से
.
उलझन ही उलझन
सुलझती नहीं
किया वार फिर दिल ने
घेर लिया सोच को
जज़्बातों ने
धुंधुला गये नयन
बेबस हुई सोच
सुन्न हुआ दिमाग
न जाने रहेगी कब तक
तकरार जारी दोनों में

दिल और दिमाग
अलग अलग दोनों
इक दूजे से

.
रेखा जोशी 

Wednesday, 14 October 2015

तुम मिले हम को मिला दोनों जहाँ का प्यार

ज़िंदगी में आप आये साथ है  स्वीकार
मिल गया हम को सजन सारा यहाँ संसार
......
गर हमे तुम छोड़ दोगे  डूब जायें आज
हाथ  अब पतवार थामो  ले चलो उसपार

ढूँढ़ते हम ज़िंदगी को आज आई शाम
तुम मिले हम को मिला दोनों जहाँ का प्यार

आज तेरा नाम लेकर पी लिया अब जाम
साथ तेरे हम चलें कर साज ओ श्रृंगार

मान लो तुम है अधूरी ज़िंदगी अभिशाप
हाथ थामा आज जो तुमने किया उपकार

रेखा जोशी

यादो में रहे उम्र भर सदा ज़िंदगी बन कर


न  आया  तुम को प्यार का इज़हार करना भी
न आया  हमको  प्यार का  इकरार   करना भी
यादो  में  रहे  उम्र भर सदा   ज़िंदगी  बन  कर
न आया   ज़िंदगी में  हमको  प्यार  करना भी

रेखा जोशी 

Tuesday, 13 October 2015

शीतल पवन के झोंकों संग झूला झुला रही डालियाँ

था ख़्वाब बचपन का इक घरौंदा बनायें हम पेड़ पर
हरे भरे   पुष्पित  पत्तों  से उसे  सजायें हम पेड़ पर
शीतल पवन के झोंकों संग झूला झुला रही डालियाँ
कोयल संग यहाँ  गीत मधुर गुनगुनायें हम पेड़ पर

रेखा जोशी 

Monday, 12 October 2015

नवरात्री पर्व की हार्दिक शुभकामनायें

नवरात्री पर्व की हार्दिक शुभकामनायें 

रचना हूँ मै
रचयिता हो तुम 
हे माता शैलपुत्री 
.....................
पूजते तुम्हे 
जगत की जननी
गौरजा दुर्गा 
....................
नव दिन है 
नवरात्री पूजन
कन्या की पूजा
..................
कन्या भ्रूण की
किसलिए आखिर
घोंट दी सांस
.................
बिना आवाज़
बेरहम समाज
मार दी गई
.................
रचना हूँ मै
रचयिता हो तुम 
हे माता शैलपुत्री 

रेखा जोशी 

नवरात्री

मेरी पूर्व प्रकाशित रचना 

इस वर्ष नवरात्री पर उमा के घर में उत्सव का माहौल था ,उसकी सासू माँ ने देवी माँ से अपनी सुशील बहू के लिए प्रार्थना की थी कि जैसे ही उमा गर्भ धारण करे गी उसकी सास नवरात्रि के हर दिन देवी माँ की पूजा अपने घर में रखवाए गी l पूरे घर में ख़ुशी का माहौल था ,उमा ने शादी के दो वर्ष बाद उसने गर्भ धारण किया था l नवरात्री के पहले दिन घर की साज सफाई कर पूजा आरम्भ की गई ,पंडित को बुलवाया गया उन्होंने बताया ” नवरात्रि में
दुर्गा माता की आराधना का विशेष महत्व होता है। इस समय के तप का फल कई गुना व शीघ्र मिलता है।”परिवार के सभी सदस्य मिल कर हर रोज़ बहुत प्रेम से पूरे नौ दिन तक दुर्गा माँ की पूजा अर्चना करते रहे l 
नवमी को कन्या पूजन पर अड़ोस पड़ोस की सभी कन्याओं को न्योता भेज कर घर में बुलाया गया और उनकी पूजा की गई ल उमा की सास ने भी पूरी निष्ठां से नवरात्री के पूरे नौ दिन तक देवी माँ की अर्चना उपासना की,उसे विश्वास था कि माँ की कृपा से उमा की कोख में उसका पोता ही पल रहा है फिर भी उसने चोरी छुपे गर्भ की जांच करवा डाली जैसे ही उसे पता चला कि उमा की कोख में लड़का नही बल्कि लडकी है तो उस निराशा ने घेर लिया ,वह तो अपने घर का चिराग चाहती थी ,लडकी नही ,उसने एक दिन उमा से कह ही दिया की उसे पोता चाहिए इस लिए वह अपना गर्भ गिरा दे ,उमा को ऐसे लगा जैसे किसी ने उसे आसमान से नीचे पटक दिया हो ,पूरी रात वह सो नही पाई ,सारी रात वह सच्चे मन से माँ की आराधना करती रही l
कहते है देवी माँ कभी भी अपने भक्तों को किसी भी तरह से दुखी नहीं देख सकती है। दुर्गा माँ की आराधना से उनका आशीर्वाद भक्त को सहज ही मिल जाता है जिससे उसे किसी अन्य की सहायता की आवश्यकता ही नहीं पड़ती औ उमा के दिल की आवाज़ को देवी माँ से सुन लिया थाl सुबह होते ही जब उमा की सास ने उसे डाक्टर के पास जाने को कहा तो उसने साहस कर अपनी सास को साफ साफ़ शब्दों में बता दिया कि वह अपना गर्भ नही गिराये गी l उसने अपनी सासू माँ को समझाया ,”जिस देवी माँ की नवरात्रि में हम सब ने कन्या के रूप में पूजा है उसी माँ ने अपने अंश को मेरे पेट में स्थापित कर हम सब को अपना आशीर्वाद दिया है ,अब आप ही बताओ हम उसकी हत्या कैसे कर सकतें है l”उमा की बात सुन कर उसकी सासू माँ चुप हो गई l

रेखा जोशी 

पूजते है माँ दुर्गा को सब औ नारी का तिरस्कार किया

पूजते है माँ दुर्गा को सब औ नारी का तिरस्कार किया
खतरे  में है उसकी अस्मिता क्यों ऐसा व्यवहार किया

क्यों उसका अपमान किया कूचे बाजारों औ गलियों में 
मार उसे कोख  में  मर्दानगी  का  कैसा  इज़हार किया

रेखा जोशी

दिखा दो शक्ति प्रेम की हे माँ अम्बे

हे माँ अम्बे
जगत जननी
पीड़ा तुम्हारी
समझ सकती हूँ मै
इक दूजे के खून के प्यासे
दो भाईयोँ को देख
दर्द से तिलमिला उठी
यह कोख मेरी
.
हे माँ अम्बे
माँ हो न
रचना जो की उनकी
महसूस कर सकती हूँ मै
तड़प तुम्हारे मन की
क्या गुज़रती होगी
सीने में तुम्हारे
रक्त से सनी
लाल धरा देख कर
बमों के धमाको से
जब गूँजता आसमान
नीले गगन पे
जब छाती कालिमा धुएँ की
अपने ही भाईयों से
दम तोड़ती संतान तेरी
.
हे माँ अम्बे
अब सुन ले पुकार
दिखा दे ममता संसार को
आज अपने गर्भ की
आँसू उनके पोंछ दे
खून बन जो टपक रहे
सांस सुख की ले सकें
फिर नीले अम्बर तले
घृणा आपस की मिटा के
दिखा दो शक्ति प्रेम की

रेखा जोशी

दोहे

आँचल लहराती हवा पड़े ठंडी फुहार |
उड़ती जाये चुनरिया बरखा की बौछार ||
....
सावन बरसा झूम के भीगा तन मन आज ।
पेड़ों पर झूले पड़े  बजे है मधुर साज़ ॥
....
रेखा जोशी

Sunday, 11 October 2015

हाइकु


आँसू पोंछता 
यह मानवता है
दर्द बाँटता
…………
जय हो तेरी
आविष्कार करता
मनुज नित
 ………
जीवन मिला
कर परोपकार
मनुज बन
………
पीड़ा पराई
जो हर ले मानव
है सुखदाई

रेखा जोशी 


Saturday, 10 October 2015

दोहे

दोहे

बीती जाये ज़िंदगी जीवन के दिन चार
प्रेम प्रीति कर ले मना दुखिया यह संसार

छोटी सी यह ज़िंदगी कह ले दिल की बात
चार दिवस  की चांदनी फिर अंधेरी  रात
....
पाया मानस तन यहाँ कर ले काम महान
सेवा कर माँ बाप की  बड़ों का कर सम्मान

रेखा जोशी



Friday, 9 October 2015

झाँक रहा दूर नभ से

साया
छा गया
खामोशियों का कैसा
जियरा घबरा गया
देख कर  वीराना घना
छोड़ कर तरुवर का साथ
दूर उड़ गये पत्ते कहीं
दम  घुटने लगा
सांस रुकने लगी
फिर भी ठूठ सा तना रहा
आंधी तूफान से खेलता
पहाड़ सी मुसीबतों को झेलता
आस लिये  नव सृजन की
झाँक रहा दूर  नभ से
रश्मियाँ बिखेर रहा
सबका जीवन दाता
दिवाकर चमक रहा

रेखा जोशी



हाथ अपने अब हम जोड़ करें अरदास'

आज  आये  हम  तेरे द र  पर हे भगवन 
नाथ उपकार करो तुम हम पर हे भगवन 
हाथ  अपने  अब  हम  जोड़ करें अरदास'
आस  टूटे  न  हमारी  तुम  पर हे भगवन 

रेखा जोशी 

Thursday, 8 October 2015

मिले जो तुम हमें तो पाया सारा जहान

हमने तो चाहा जाम पर  सागर मिल गया
हमने  मांगा  तुम्हे आज ईश्वर मिल गया
मिले जो  तुम हमें  तो पाया   सारा जहान
ज़मीन के संग संग हमे अम्बर मिल गया

रेखा जोशी 

बीनता सपने टुकड़ों में

सुबह सुबह
ठिठुरती सर्दी
कूड़े का ढेर
बीनता सपने टुकड़ों में
फलों के रोटी के
नही सोऊँगा खाली पेट
सिर पर हमारे होगी छत
कह रहा वो मांगता वोट
दे दूँगा वोट उसे 
जीते हारे मेरी बला से
सपने जो दिखाये 
उसने हमे 
सच तो होगे इक दिन  
हमारे 

रेखा जोशी

Wednesday, 7 October 2015

तू मेरा मै तेरा बन गया सहारा

दुनिया  ने  चाहे हमसे  किया  किनारा
जीवन में जब हाथ थाम लिया तुम्हारा
पोंछ  लो  बहन   आँखों  से आँसू अपने
तू   मेरा    मै   तेरा   बन  गया   सहारा

रेखा जोशी

बज उठे तार दिल के पिया


तुम मिले आज अपने लगे 
बिन पँख' आज उड़ने लगे 
.... 
बज उठे तार दिल के पिया 
आज फिर साज़  बजने लगे 
… 
छा गई रोशनी अब यहाँ 
रात में दीप जलने  लगे
....
माँग कर साथ तेरा सजन 
आज अरमान सजने लगे 

प्यार है ज़िंदगी में जहाँ 
फिर ख़ुशी संग चलने लगे 

रेखा जोशी 

तोड़ कर दिल हमारा क्यों ज़ख्म दिये उसने

 
नैन मिला कर हमसे ले गया जिया कोई
बेरहम  को  आई  न   शर्म  ओ हया कोई
तोड़ कर दिल हमारा क्यों ज़ख्म दिये उसने
आज  नैनों  में  फिर आँसू  भर गया कोई

 रेखा जोशी

बूँद बूँद में भरा जीवन नीर घट भर लायें


चल री सखी अब नदिया के तीर जल भर लायें
सर अपने  गगरियाँ  धर  के धीर जल भर लायें
फूटे  न  गगरी  संभल  ज़रा छलक न जाये जल
बूँद  बूँद   में भरा   जीवन   नीर  घट  भर  लायें

 रेखा जोशी


Tuesday, 6 October 2015

गुज़रा वक्त तो बीत गया मिलता फिर कहाँ

वक्त तो गुज़र जाता है रुकता  फिर कहाँ
सिमट जाता है  सपनों में रहता फिर कहाँ
क्यों  चिपके  रहें  गुज़रे  वक्त की यादों में
गुज़रा वक्त तो बीत गया मिलता फिर कहाँ

रेखा जोशी

Monday, 5 October 2015

कलियों के महकने से खिलखिलाते फूल

रंग   बिरंगे    बाग़    में  मुस्कुराते   फूल
शीतल  पवन  संग  संग  लहलहाते  फूल
महकने  दो सुन्दर कलिका को उपवन में
कलियों के महकने  से खिलखिलाते फूल

रेखा जोशी 

किससे करें शिकायत किससे करें गिला

कैसा  यह  आया   ज़िंदगी  में  ज़लज़ला
कब तक  चलता  रहेगा जानें  सिलसिला
बोझ   सा बन  गया है यह जीवन अब तो
किससे  करें शिकायत  किससे करें गिला

रेखा जोशी 

Sunday, 4 October 2015

आती रही जीवन में सुख दुःख की लहरे

समुद्र तट पर 
चल रहे किनारे किनारे 
मचा रही शोर 
आती जाती लहरे 
आती रही जीवन में 
सुख  दुःख की लहरे 
जश्न मनाते यहाँ 
कभी आंसू बहाते 
सूरज रहा चूम
सागर का आंचल 
रंग सिंदूरी चमक रहा 
आसमां भरा गुलाल 
सफर ज़िंदगी का 
चलता रहा सुबह शाम 
आज ढल रही शाम 
कल  आयेगी  सुबह 
ले कर  नव नाम 
रेखा जोशी 

Friday, 2 October 2015

तुम मिले साजन हमें रब का इशारा मिल गया


चाह कर तुम को सजन हम को सहारा मिल गया 
ज़िंदगी  में  आप  आये  अब   किनारा मिल गया 
पास   आये   तुम   हमारे   पा   लिया सारा  जहाँ 
तुम मिले  साजन  हमें  रब  का इशारा मिल गया 

रेखा जोशी 




चाहतों में मेरी मुस्कुराने लगा चाँद


मेरे दिल की उमंगों में छाने लगा चाँद
चाहतों में  मेरी  मुस्कुराने  लगा चाँद
......................................... ……
सुहानी चांदनी में नाचता है तन मन 
किरणों से अपनी हमे भिगोने लगा चाँद 
.......................................... ………
उड़ने लगी चाहतें संग  लिये कई रंग
स्वप्निल नैनो में अब झाँकने लगा चाँद 
............................................... …
 खिल गई यह वादियाँ सुन के आहट उनकी
सांसों    में   मेरी  अब  महकने  लगा  चाँद 
................................................
शीतल रश्मियों से जगमगाया है अँगना 
झांकता खिड़की  से शर्माने   लगा चाँद 

रेखा जोशी

बीती बातें भुला दो दिल में उजियारे हुए

टूट जाता जब दिल तो  दर्द ही सहारे हुए
जीवन  में जब भी कभी पराये हमारे हुए
रूकती नही कभी भी ज़िंदगी किसी के बिना
बीती बातें भुला दो  दिल में उजियारे हुए

रेखा जोशी 

Thursday, 1 October 2015

क्या अंदाज़ था गुज़रे उस दौर का

बीत  गया ज़माना जब मिले हम तुम
दिल हुआ  दीवाना जब मिले हम तुम
क्या  अंदाज़   था  गुज़रे  उस  दौर का
बना था अफ़साना जब  मिले हम तुम

रेखा जोशी 

अब पार लगा राम हमे हाथ बढ़ाओ

आधार छंद - बिहारी
मापनी - 22112211221122 
संसार भरा पाप घड़ा राम बचाओ 
उपकार करो आज हमे पार लगाओ 
… 
स्वीकार करो राम यहाँ आज पुकारे 
हे नाथ हमे प्यार भरी राह दिखाओ
....
आशीष हमे प्यार भरा राम मिला अब
तकदीर सँवर आज गई आस जगाओ 

संसार दुखी दीन भरा आज यहाँ पर 
हे  राम  दुख' कष्ट हरो प्राण बचाओ 
.... 
हर मोड़ मिला साथ हमें नाथ हमारे 
अब पार लगा राम हमे हाथ बढ़ाओ 

रेखा जोशी