Monday, 31 March 2014

अंदाज़ अपना अपना -मूर्ख दिवस पर


यह मेरी पूर्व प्रकाशित रचना है

यादों के पिटारे में झांक के देखा तो मानस पटल पर कुछ वर्ष पहले की तस्वीरें उभरने लगी | मौसम करवट बदल रहा था ,सुहावनी सुबह थी और हल्की ठंडी हवा तन मन को गुदगुदा रही थी | गरमागर्म चाय की चुस्कियों के साथ हाथ में अखबार लिए मै उसे  बरामदे में बैठ कर पढने लगी | मौसम इतना बढ़िया था कि वहां से उठने का मन ही नहीं हो रहा था ,घडी पर नज़र डाली तो चौंक पड़ी ,आठ बज चुके थे ,''अरे बाबा नौ बजे तो मेरा पीरियड है ''मन ही मन बुदबुदाई ''|जल्दी से उठी और कालेज जाने कि तैयारी में जुट गई |

 प्रध्यापिका होने के नाते हमे कालेज पहुंच कर सब से पहले प्रिंसिपल आफिस में हाजिरी लगानी पडती थी ,जैसे ही मै वहां पहुंची तो प्रिंसिपल के आफिस के बाहर काला बुरका पहने एक महिला खड़ी थी | एक सरसरी सी नजर उस पर डाल मै आफिस के भीतर जाने लगी ,तभी उसने पीछे से मेरे कन्धे को थपथपाया | मैने मुड कर उसकी ओर देखा ,उसने अपना सिर्फ एक हाथ जिसमे एक पुराना सा कागज़ का टुकड़ा था मेरी ओर बढाया,मैने उससे वह कागज़ पकड़ा ,उसमे टूटी फूटी हिंदी में लिखा हुआ था ,''मै  बहुत ही गरीब हूँ ,मुझे पति ने घर से निकल दिया है ,मेरी मदद करो '' मैने वह कागज़ का टुकड़ा उसे लौटाते हुए उसे उपर से नीचे तक देखा ,वह ,पूरी की पूरी काले लबादे में ढकी हुई थी ,उसके पैरों में टूटी हुई चप्पल थी ,जिस हाथ में कागज़ था ,उसी हाथ की कलाई में हरी कांच की चूड़िया झाँक रही थी |मै उसे बाहर कुर्सी पर बिठा कर ,आफिस के अंदर चली आई|

आफिस के अंदर लगभग सभी स्टाफ मेमबर्ज़ मौजूद थे | वहां खूब जोर शोर से चर्चा चल रही थी ,विषय था वही पर्दानशीं औरत ,हर कोई अपने अपने अंदाज़ में उसकी समीक्षा कर रहा था | किसी की नजर में वह असहाय थी ,किसी की नजर में शातिर ठग,कोई उसे कालेज से बाहर निकालने की बात कर रहा था तो कोई उसकी मदद करने की राय दे रहा था | अंत में फैसला हो गया ,उसे स्टाफ रूम में ले जाया गया और उसके लिए चाय नाश्ता मंगवाया गया ,पता नहीं बेचारी कितने दिनों की भूखी हो ,सभी स्टाफ मेमबर्ज़ से बीस बीस रूपये इकट्ठे किये गए और उन्हें एक लिफ़ाफ़े में डाल उसके हाथ में थमा दिया गया |तभी एक प्रध्यापिका ने उनके चेहरे से  पर्दे को उठा दिया ,यह कहते हुए ,''हम लेडीज़ के सामने यह पर्दा कैसा ''| उनका चेहरा देखते ही सब अवाक रह गये ,''अरे यह तो डा: मसेज़ शुक्ला है |पूरे स्टाफ की नजरें उनके चेहरे पर थी ,उनकी आँखों में थी  शरारत और होंठो पर हसीं,''हैपी अप्रैल फूल ,कहो कैसा रहा मेरा तुम सबको फूल बनाने का अंदाज़ |

 उन्होंने बुरका उतार कर एक ओर रख कर दिया और वो   खिलखिला के हंस पड़ी और उनके साथ साथ हम सब भी खिसियाए हुए हंसने लगे | डा मिसेज़ शुक्ला हमारी सहयोगी और अंग्रेजी विभाग की एक सीनियर प्रध्यापिका थी | उन्होंने उसी लिफ़ाफ़े में से बीस बीस के कई नोट निकाले और कंटीन में चाय पकौड़ों की पार्टी के आयोजन के लिए फोन कर दिया| वो सारा दिन हमने खूब मौज -मस्ती में गुज़ारा ,गीत संगीत के साथ गर्मागर्म चाय और पकौड़ों ने हम सब को अप्रैल फूल बना कर के भी आनंदित किया |डा मिसेज़ शुक्ला भले ही कुछ वर्ष पूर्व रिटायर हो चुकी है लेकिन उनका पूरे स्टाफ को ,''फूल'' बनाना हम सब को हमेशा याद रहे गा खासतौर पर अप्रैल की पहली तारीख को |    

क्यों मनाते है हम नवरात्री ,दुर्गा पूजा जैसे त्यौहार ?


हमारे धर्म में नारी का स्थान सर्वोतम रखा गया है ,नवरात्रे हो या दुर्गा पूजा ,नारी सशक्तिकरण तो हमारे धर्म का आधार है | अर्द्धनारीश्वर की पूजा का अर्थ यही दर्शाता है कि ईश्वर भी नारी के बिना आधा है ,अधूरा है | वेदों के अनुसार भी ‘जहाँ नारी की पूजा होती है ‘ वहाँ देवता वास करते है परन्तु इसी धरती पर नारी के सम्मान को ताक पर रख उसे हर पल अपमानित किया जाता है | इस पुरुष प्रधान समाज में भी आज की नारी अपनी एक अलग पहचान बनाने में संघर्षरत है | जहाँ बेबस ,बेचारी अबला नारी आज सबला बन हर क्षेत्र में पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही है वहीं अपने ही परिवार में उसे आज भी यथा योग्य स्थान नहीं मिल पाया ,कभी माँ बन कभी बेटी तो कभी पत्नी या बहन हर रिश्ते को बखूबी निभाते हुए भी वह आज भी वही बेबस बेचारी अबला नारी ही है | शिव और शक्ति के स्वरूप पति पत्नी सृष्टि का सृजन करते है फिर नारी क्यों मजबूर और असहाय हो जाती है और आखों में आंसू लिए निकल पड़ती है अपनी ही कोख में पल रही नन्ही सी जान को मौत देने | क्यों नहीं हमारा सिर शर्म से झुक जाता ,कौन दोषी है ,नारी या यह समाज ,क्यों कमज़ोर पड़ जाती है नारी | अधूरी है ईश्वर की पूजा अगर यह पाप हम नहीं रोक पाते | अधूरा है नारी सशक्तिकरण जब तक भ्रूण हत्यायों का यह सिलसिला हम समाप्त नहीं कर पाते | सही मायने में नारी अबला से सबला तभी बन पाए गी जब वह अपनी जिंदगी के निर्णय स्वयम कर पाये गी | इसमें कोई दो राय नही है कि आज की नारी घर की दहलीज से बाहर निकल कर शिक्षित हो रही है ,उच्च शिक्षा प्राप्त कर पुरुष के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर सफलता की सीढियां चढ़ती जा रही है l आर्थिक रूप से अब वह पुरुष पर निर्भर नही है बल्कि उसकी सहयोगी बन अपनी गृहस्थी की गाड़ी को सुचारू रूप से चला रही है l बेटा और बेटी में भेद न करते हुए अपने परिवार को न्योजित करना सीख रही है ,लेकिन अभी भी वह समाज में अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघर्षरत है ,कई बार न चाहते हुए भी उसे जिंदगी के साथ समझौता करना पड़ता है ,वह इसलिए कि हमारे समाज में अभी भी पुत्र और पुत्री में भेदभाव किया जाता है ,पुत्र के पैदा होने पर घर में हर्षौल्लास का वातावरण पैदा हो जाता है और बेटी के आगमन पर घरवालों के मुहं लटक जाते है ,”चलो कोई बात नही लक्ष्मी आ गई है ”ऐसी बात बोल कर संतोष कर लिया जाता है | दुःख तो तब होता है जब बेटी को गर्भ में ही खत्म कर दिया जाता है , क्या अर्थ रह जाता है ऐसी पूजा का, क्यों मनाते है हम नवरात्री ,दुर्गा पूजा जैसे त्यौहार जब उसके वास्तविक अर्थ एवं मूल्यों से हम अभी तक अनजान है,? क्या अर्थ रह जाता है ऐसी पूजा का जब हम देवी माँ के पावन अंश को माँ के पेट में ही समाप्त कर देते है ?
रेखा जोशी 

नारी तो केवल है श्रद्धा


नारी 
शक्ति
है शिव की 
प्रेरणा 
है पुरुष की 
अधूरे 
है दोनों 
इक दूजे 
के बिना 
फिर भी 
होती 
सदा नारी 
अपमानित 
और 
पड़ताड़ित 
पुरुष 
द्वारा 
माँ बेटी 
बहन 
बन पत्नी 
सदा संवारे
जीवन
उसका 
न जाने 
क्यों 
टकराता 
अहम उसका 
नारी से 
समझ पाता 
काश 
यह पुरुषों 
का 
समाज 
नारी 
तो केवल 
है श्रद्धा 
और 
मूरत 
त्याग की 

रेखा जोशी 


सभी मित्रों को ''नवरात्री ,नव संवत नव वर्ष "की हार्दिक शुभकामनाएँ

एक नाम ,एक ओमकार ,एक ही ईश्वर और हम सब उस परमपिता की संतान है जिसने हमे इस दुनिया में मनुष्य चोला दे कर भेजा है और धर्म एक जीवन शैली का नाम है ,धर्म के पथ पर जीवन यापन कर हम उस परमपिता परमात्मा को पा सकते है |''|रिलिजियन धर्म का पर्यायवाची हो ही नही सकता ,जहाँ रिलिजियन में विभिन्न विभिन्न सुमदाय के लोग अपने ही ढंग से ईश्वर की पूजा आराधना करते है ,वहां धर्म जिंदगी जीने के लिए मानव का सही मार्ग दर्शन कर इस अनमोल जीवन को सार्थक बना देता है |हमारे वेदों में भी लिखा है ,''मानवता ही परम धर्म है '',और हम सब ईश्वर के बच्चे क्या एक दूसरे के साथ प्रेम से नही रह सकते ?क्यों हम विभिन्न सुमदायों में बंट कर रह गये है ?सोचने का विषय है |

सभी मित्रों को ''नवरात्री ,नव संवत नव वर्ष "की हार्दिक शुभकामनाएँ 

रेखा जोशी

Friday, 28 March 2014

नज़र आये हो मुझे तुम तो हर स्थान


ढूँढ  रहा  हूँ  तुम्हे  हर जगह  भगवान 
इस दुनियाँ का कोना कोना लिया छान
देखा  मंदिर  मस्जिद  चर्च  गुरूद्वारा 
नज़र आये हो  मुझे तुम तो हर स्थान 

रेखा जोशी 

Thursday, 27 March 2014

जो रंग बदलते गिरगिट सा


देख उसका
भोला सा
चेहरा
नही पहचान
उसको पाया 
बना 
मीत मेरा 
और 
दिल का 
हाल 
उसे बताया
निकाला जनाज़ा 
विशवास 
का मेरे 
जग में 
मेरा मज़ाक 
बनाया 
बन दोस्त  
मेरा 
दुश्मन 
सा वो 
मेरे 
सामने आया 
भगवान 
बचाये ऐसे 
दोस्तों से 
जो रंग बदलते 
गिरगिट सा 

रेखा जोशी 



किसको पुकारे

छोड़  पीछे  सब  नज़ारे 
चल   पड़े  उनके  सहारे 
बीच  रस्ते छोड़ कर वो 
चल दिये किसको पुकारे 

रेखा जोशी 

Wednesday, 26 March 2014

आँसू बहाती याँ फिर गीत गाती है यह ज़िंदगी

हर पल इक नया रूप ले कर आती है यह ज़िंदगी
छोड़ पुराना नएँ  पल में ढल जाती है यह जिंदगी
जीतें  है यहाँ हम सब ख़ुशी और गम के अनेक पल
आँसू बहाती  याँ फिर  गीत गाती है यह ज़िंदगी

रेखा जोशी 

Monday, 24 March 2014

धरतीपुत्र

धरती से
सोना उगाता
धरतीपुत्र
कहलाता
भर कर
वह
पेट सबका
खुद भूखा
सो जाता
फिर भी
नहीं
घबराता
वह
देख फसल
खड़ी
खलिहान में
मन ही मन
हर्षाता
लेकिन नही
सह पाता
गरीबी सूखा
क़र्ज़ की मार
लाचार
असहाय
दुखी
आखिर
थक
हार कर
जीवन से
वह
छोड़ कर
सबका
साथ
थाम लेता
मौत का
हाथ


रेखा जोशी

सृजनधर्मिता के समक्ष चुनौतियां'

ऐसा कहते है कि जहाँ माँ सरस्वती का वास होता है वहाँ माता लक्ष्मीजी का पदार्पण नही होता ,माँ शारदे का पुजारी लेखक ,नई नई रचनाओं का सृजन करने वाला ,समाज को आईना दिखा उसमे निरंतर बदलाव लाने की कोशिश में रत ,ज़िन्दगी भर आर्थिक कठिनाइयों से झूझता रहता है |अभी हाल ही की बात है मेरे एक लेखक  मित्र के घर कन्या ने जन्म लिया और उन दिनों वह घोर आर्थिक स्थिति से गुज़र रहे थे ,उस वक्त उन्होंने चाय और पकौड़े  बेच कर अपना और अपने परिवार का पोषण किया । एक लेखक के समक्ष आर्थिक संकट एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सदा उसके आस पास मंडराता रहता है जिससे बाहर आना उसके लिए कभी भी संभव नही  हो पाता  और वह सारी ज़िंदगी अपनी  मूलभूत आवश्यकताओं  को पूरा करने में ही जुटा रहता है| आर्थिक संकट के साथ साथ आये दिन उसे कई अन्य चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता रहता है खुदा न खास्ता अगर उसने व्यंग में ही किसी नेता याँ राजनेता के बारे में  अपने आलोचनात्मक विचार प्रकट कर दिए  तो उसे उनकी नाराज़गी का भी शिकार होना पड़  सकता है | समाज में पनप रही अनेक कुरीतियों को लेखक याँ लेखिका अगर अपनी सृजनात्मक कलम द्वारा उन्हें उजागर कर बदलाव लाना चाहते  है तो वह  सीधे सीधे समाज के ठेकेदारों की आँखों की किरकिरी बन जाते है ,ऐसा ही हुआ था लेखिका तस्लीमा नसरीन के साथ ,जब उसके खिलाफ देश निकाले का फतवा तक जारी कर दिया गया था | इसमें कोई दो राय नही कि कलम की धार तलवार से भी तेज़ होती है | रचनाकार द्वारा सृजन की गई शक्तिशाली रचना समाज एवं देश में क्रान्ति तक  ला सकती है | गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ,शरतचंद्र जी  ,मुंशी प्रेमचंद जैसे अनेक लेखक हिंदी साहित्य में  जीती जागती मिसाल है जिन्होंने समाज में अपनी लेखनी के माध्यम से जागृति पैदा की थी | समय बदला ,समाज का स्वरूप बदला नये लेखकों की बाढ़ सी आ गई ,लेकिन आज भी अपनी लेखनी के जादू से रचनाकार समाज को एक धीरे धीरे अच्छी दिशा की ओर ले जाने में कामयाब हो रहा है ,भले ही इसके लिए  उसे अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है |

Sunday, 23 March 2014

आरक्षण



''तुम अछूत हो इसलिए तुम मंदिर के अंदर कदम तक  नही रख सकते ,तुम अछूत हो तुम हम लोगों के साथ उठ बैठ नही सकते,तुम अछूत हो इसलिए  दूर रहो हमसे , ''एक समय था जब समाज में ऐसे बोल बहुत बोले जाते थे | बहुत सहा था इस समाज में रहने वाले निम्नवर्ग के लोगों ने ,समाज में शून्य था उनका अस्तित्व ,पानी तक नही पी सकते थे उच्चवर्ग के कूओं से |  सदियों  पहले हिन्दू धर्म में जो वर्ण व्यवस्था बनाई गई थी, वह उस समय की आवश्यकता थी ,वह ऐसा समय था जब चार वर्णो में विभाजित समाज के विभिन्न  व्यक्ति निष्ठा से अपना अपना कार्य किया करते थे , लेकिन कालांतर उच्चवर्ग द्वारा निम्नवर्ग का शोषण होने के कारण  उसका स्वरूप बहुत बदलने लगा और  सदियों से चली आ रही परम्पराएँ अभी तक कुछ लोगों की मानसिकता को आहत किये हुए है  | महात्मा गांधी जी भी जाति प्रथा के विरुद्ध थे उनके अनुसार हम सब  एक ईश्वर की संतान है इसलिए वह ऐसे लोगों को  हरी के जन कह कर  सम्बोधित करने लगे  और अनुसूचित जाति के लोग  हरिजन  कहलाने लगे| स्वतन्त्र भारत के संविधान को ध्यान में रखते हुए डॉ भीमराव आंबेडकर जी ने आज़ादी से पूर्व अंग्रेज़  सरकार को ज्ञापन दे कर  ने अनुसूचित जाति के लोगों  को मुख्यधारा में लाने के लिए 1943 एक  ज्ञापन दिया ,जिसके अनुसार अनुसूचित जाति के लोगों को पढ़ने के लिए उन्हें छात्रवृतियाँ और अन्य वितीय सहायता प्रदान करनी चाहिए एवं आगे नौकरी आदि में भी आरक्षण दिया जाना चाहिए ,जिसे अंग्रेज़ सरकार ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था | आज़ादी से लेकर अब तक ''आरक्षण ''भारत में एक ऐसे तूफ़ान की तरह मंडराता और फैलता जा रहा है जो अपने में अनेक अनुसूचित जनजातियाँ ,कई समुदायों को भी लपेटता जा रहा है ,जिसका सीधा सीधा फायदा देश के चुनाव में वोटों की राजनीति में उठाया जाता है  | कहने को तो लोकतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता हमारे  देश से संविधान की नीव है लेकिन धर्म की आड़ में अल्पसंख्यक समुदायों  को आरक्षण प्रदान कर राजनीतिक  पार्टियाँ अपना उल्लू सीधा कर रही है ,लेकिन कब तक आरक्षण के मुद्दे पर रोटियाँ सिकती रहें गी,जनता में आक्रोश बढ़ता जा रहा है  ,जब एक होनहार विद्यार्थी पिछड़ जाता है और आरक्षण के नाम पर किसी और को वह स्थान मिल जाता है याँ कोई अधिकारी आरक्षण के नाम पर तरक्की पा जाता है और योग्य इंसान पीछे रह जाता है |  गरीबी रेखा से नीचे हर व्यक्ति को आरक्षण मिलना चाहिए लेकिन सदा किसी भी वर्ग की पीढ़ी दर पीढ़ी इसका लाभ उठाती  जाये यह सरासर अन्याय है इससे आम व्यक्ति  के मन में विद्रोह उठना सम्भाविक है लेकिन यह बहुत अफ़सोस की  बात है कि हमारे देश की राजनैतिक पार्टियाँ सब कुछ जानते समझते हुए अनजान बनी हुई है | 

रेखा जोशी 

मूक पुकार [लघु कथा ]


वह नन्ही सी चिड़िया गला फाड़ कर जार जार  रो रही थी , उसका जीवन साथी ज़मीन पर औंधा गिरा हुआ अपनी  ज़िंदगी की अंतिम सांसे जो ले रहा था | अपने प्रिय साथी की ऐसी हालत देख वह  दुःख से पुकार उठी ,वह मूक थी लेकिन उसकी आँखे उसका बदन चीख चीख कर पुकार रहा था  ,''क्यों खेल रहे हो  मानव तुम  प्रकृति से, क्यों नही तुम  प्रकृति के साथ संतुलन बना कर चलते  ,जगह जगह गगनचुम्बी  मोबाईल फोन के टावर लगा कर हमारे  अस्तित्व को ही मिटा रहे हो  ,आखिर कब तक तुम  प्रकृति से खिलवाड़  करते रहो गे,क्यों नही समझते कि हम भी इस सृष्टि का एक हिस्सा है,लेकिन याद रखो यदि  प्रकृति का संतुलन बिगड़ा तो एक दिन तुम्हारा अस्तित्व भी खतरे  में पड़  जाएगा ,संभल जाओ ,''लेकिन 'उस निरीह प्राणी की मूक पुकार उसकी दिल दहला देने वाली चीखों में ही दब कर रह गई |

रेखा जोशी


Friday, 21 March 2014

ठोकर में हैअब धर्म ईमान

ये कहाँ जा रहे है हम
बंद आँखों से किसके पीछे
तोड़ते रिश्ते छोड़ते संस्कार
ठोकर में हैअब धर्म ईमान
लहू दौड़ता रगों में जो
बनता जा रहा वह  पानी
न माँ अपनी न बाप अपना
खून के प्यासे  भाई भाई
उड़ गई महक प्यार की
सुनाई देती खनक पैसे की
प्यार है पैसा ईमान है पैसा
बस पैसा ,पैसा और पैसा

रेखा जोशी 

Wednesday, 19 March 2014

आखिर क्यों ?


आखिर 
क्या हासिल हुआ 
उसे दे कर 
अपनी जान 
लड़ती और 
बचाती रही अस्मिता 
अपनी 
समाज के दरिंदों से 
हार गई उनसे 
और लगा लिया 
मौत को गले 
इक दिन 
मनाया शोक 
दो दिन 
फिर भूल गए 
उसे 
क्यों आखिर किया 
उसने अपने 
जीवन का अंत ?

रेखा जोशी 

Monday, 17 March 2014

चहकने लगी बुलबुल अब दिल की

आ गई  बहार जो आये हो तुम
चहकने लगी बुलबुल अब दिल की

फूलों पर भंवरे  भी लगे मंडराने
महकने लगा अब आलम सब ओर

तरसती थी निगाहें तुम्हे देखने को
भूल गये अचानक वो रस्ता इधर का

मुद्दते हो चुकी थी देखे हुए उनको
भर दी खुशियों से आज झोली उसी ने

महकती रहे बगिया मेरे आंगन की
खुशिया ही खुशिया बनी रहे दिल में

आ गई  बहार जो आये हो तुम
चहकने लगी बुलबुल अब दिल की

रेखा जोशी 

Saturday, 15 March 2014

बुलंद हौंसला

न घबराना अगर राहें हो अनजान
चाहे मिले जीवन में अनेक तूफ़ान
बैठ मत जाना कभी तुम थक हार कर
बुलंद हौंसलों से तुम भर लो उड़ान
रेखा जोशी

Friday, 14 March 2014

फिर सुबह होगी

समुद्र तट पर 
चल रहे किनारे किनारे 
मचा रही शोर 
आती जाती लहरे 

सूरज चूम रहा
सागर का आंचल 
रंग सिंदूरी चमक रहा 
आसमां भरा गुलाल 

जीवन चलता रहा 
ढलती है शाम 
फिर सुबह होगी 
होगा नव नाम 

रेखा जोशी 

Thursday, 13 March 2014

प्यार के दो मीठे बोल

जीत लेते सभी  दिलों को प्यार के दो  मीठे बोल
मीठे  बोल से  ही बने   रहते यह  रिश्ते अनमोल
मीठी वाणी  से ही  तो  बनते सब के बिगड़े काम 
कुछ भी कहने से पहले तोल ले फिर बाद में बोल

रेखा जोशी

Wednesday, 12 March 2014

बुरा न मानो होली है[लघु कथा ]

अनीश सुबह सुबह नहा धो कर सोफे पर बैठा ही था कि पीछे से उसकी भाभी ख़ुशी ने उस पर लाल गुलाल डाल कर उसे  रंग से तरबतर कर दिया ,जब तक अनीश संभल पाता  ,''बुरा न मानो होली है ''कह कर ख़ुशी वहाँ से भाग गई | भाभी की इस हरकत पर अनीश का गुस्सा सातवें आसमान को छूने लगा ,''इट इज़ नॉट फेयर ,भाभी ''कहते हुए वह ख़ुशी के पीछे भागा ,''अभी अभी तो मै नहा कर आया हूँ और आपने मुझ पर रंग  डाल दिया  ,अब मै आपको नही छोड़ूँ गा ,''| बाथरूम से पानी की  भरी बाल्टी उठा कर उसने सारा पानी ख़ुशी पर उडेल दिया | घर के सभी सदस्य ठाहका मार कर हंसने  लगे और  कमरे में बिखरे हुए रंगों की महक से देवर  और भाभी का प्यार भरा रिश्ता भी महक उठा |

रेखा जोशी


Tuesday, 11 March 2014

जर्जर मकान

यादें
चिपकी हुई
उस जर्जर
मकान की
दीवारों से
ढह रहा
जो
धीरे धीरे
घर
था कभी
जो
खिलखिलाती
थी जहाँ
पीढ़ी
दर पीढ़ी
न जाने कितनी
ज़िन्दगियाँ
याद दिलाती
होली की
देख
इन पर पड़े
लाल गुलाबी
रंगो  के
कुछ छींटे
तस्वीर बसी
आँखों में
उन ऊँचे
बनेरों
पर जब
जगमगाई
थी कभी
मोमबत्तियाँ
दीपावली
की रात को
गूँजती
थी जहाँ
बच्चों की
किलकारियाँ
गम के
आँसू भी
बहते रहे
जहाँ
आज कैसे
सूना सूना
बेरंग
सा खड़ा
सिसकियाँ
भरता हुआ

रेखा जोशी



गरीबी [लघु कथा ]


आंध्रप्रदेश में एक छोटा सा गाँव अनंतपुर ,गरीबी रेखा के नीचे रहते कई किसान भाई ,जिनका जीवन सदा लहलहाती फसलों के इर्द गिर्द ही घूमता रहता है ,वहां आज कई घरों में चूल्हा ही नही जला , सवेरे से ही रधिया और उसकी छोटी बहन रमिया ने अपने आप को पीछे की छोटी कोठरी में बंद कर रखा हुआ है tघीसू की पत्नी गुलाबो का तो रो रो कर बुरा हाल हो गया ,''क्या इसी दिन के लिए अपनी  बेटी को पाल पोस कर बड़ा किया था ,चंद नोटों के बदले अपने ही जिस्म के टुकड़े को बेचने के लिए ,नही नही वह ऐसा  अनर्थ नही होने देगी ,उधर घीसू के दिल का हाल शायद ही कोई समझ पाता, पत्थर बना बुत  ,घर के बाहर एक टूटी चारपाई पर निर्जीव  पड़ा हुआ था ,लेकिन उसके भीतर  ज़ोरदार तूफ़ान ,एक ऐसी सुनामी आ चुकी थी जिसमें उसे अपना  घर बाहर सब कुछ बहता दिखाई दे रहा था''काश कोई रधिया को मुझ से बचा ले ,''फूट फूट कर रो उठ घीसू  लेकिन रधिया  गरीबी की सूली पर चढ़ चुकी थी ' |'' तभी शहर से आई एक लम्बी सी गाड़ी घीसू के घर के सामने आ कर रुक गई और घीसू ने अपने घर की अधखिली कली, रधिया को गाड़ी में बिठा कर,उसे किसी अंधी गली में भटकने के लिए ,सदा सदा के लिए विदा कर दिया |

रेखा जोशी 

Monday, 10 March 2014

चाहत मेरी का दर्द क्यों दे रहे हो तुम

चाहत मेरी का दर्द क्यों दे रहे हो तुम 
जाने किस कसूर की सजा दे रहे हो तुम 
हमने तो तुम्हे सदा जी जान से है चाहा 
फिर क्यों हमारा इम्तिहान ले रहे हो तुम 

रेखा जोशी 

आयी होली आयी


दिलों में प्यार लिए आज आयी होली
मस्ती चहुं और आज लायी होली

रंगों में उमंग उमंग में है रंग
लाल गुलाल जैसे रंगों से रंगे
करके बदरंग आज लुभाये होली

सूना सूना अंगना बिन फूलों के जैसे
अधूरी है होली बिन मस्ती के वैसे
रंगों की बहार ले कर आयी होली

गुलाबों का मौसम बगिया बहार पे
कूकती कोयल अंबुआ की डाल पे
है हर्षोउल्लास आज लायी होली

दिलों में प्यार लिए आज आयी होली
मस्ती चहुं और आज लायी होली

रेखा जोशी

Sunday, 9 March 2014

दोस्ती में प्यार की कोई कीमत नही होती

सुगंध दोस्ती की  किसी इश्क से कम नहीं होती
इश्क में किसी को  किस  की  परवाह नही होती 
दोस्ती में नही देखा करते गुण अवगुण किसी के 
दोस्ती  में  प्यार   की  कोई  कीमत  नही   होती 

रेखा जोशी 

Saturday, 8 March 2014

माँ तुझे सलाम [लघु कथा ]

 माँ तुझे सलाम [लघु कथा ]

चिलचिलाती धूप से बचने के लिए बीमार छमिया ने साडी के पल्लू से अपने चेहरे को तो ढक लिया लेकिन पसीने से लथपथ थकी हारी,अपने नन्हे को गोद में लिए छमिया सोच में डूब गई ,''क्या वह आज अपने नन्हे का पेट भर पायेगी ,रात भर तो वह बुखार में कराहती रही ,लेकिन अपने नन्हे के लिए उसे काम तो करना ही है ,ऊपर से गर्मी ने भी बेहाल कर रखा है ,अब तो उसके हाथों में भी जान नही रही कि वह और पत्थर तोड़ पाये ''| यह सोचते ही उसके अंदर की माँ कुलबुलाने लगी ,''नही नही ,चाहे मुझे कुछ भी हो जाए मै अपने बच्चे को कभी भूखा नही रख सकती ,चाहे मुझे कितनी भी मेहनत करनी पड़े ,रात दिन एक कर दूंगी लेकिन नन्हे को  भूख से बिलखता नही देख सकती |''अपने नन्हे के मुख पर एक मुस्कराहट देखने के लिए बीमार छमिया फिर से तैयार हो गई भूख से ज़िंदगी की जंग जीतने के लिए | 

रेखा जोशी

HAPPY INTERNATIONAL WOMEN'S DAY

HAPPY INTERNATIONAL WOMEN'S DAY 


पूजते है माँ दुर्गा को सब औ नारी का तिरस्कार किया
खतरे में है उसकी अस्मिता क्यों ऐसा व्यवहार किया
कूचे बाजारों औ गलियों में किया क्यों अपमान उसका
मार कर कोख में उसे मर्दानगी का कैसा इज़हार किया

रेखा जोशी 

Friday, 7 March 2014

ज़िंदगी रूकती नही

सफर नीर का
पर्वत से सागर तक
याँ फिर
सागर से पर्वत तक
चलता जा रहा
निरंतर
रुकता नही
बस केवल
भ्रम है
समाना
नीर का
सागर में
ज़िंदगी भी
रूकती नही
चलती सदा
मृत्यु
के बाद भी
है ज़िंदगी
बदलता
केवल स्वरूप
उसका

रेखा जोशी




खुल जा सिम सिम ”

प्रिया ने सुबह सुबह अपनी पड़ोसन को मुहँ अँधेरे अपने घर से बाहर निकलते देखा ,इससे पहले वह उससे कुछ पूछती उसकी पड़ोसन जल्दी जल्दी कहीं चली गई |प्रिया को उसका इस तरह जाना कुछ अजीब सा लगा ,इतना तो वह जानती थी कि आजकल उनके घर के हालात कुछ ठीक नही चल रहे ,उसके पति काफी समय से बीमार चल रहे थे और उसके बेटे की कमाई भी कुछ ख़ास नही थी और वह अंधाधुंध ज्योतिष्यों और तांत्रिकों के पीछे भाग रही थी ,उसकी सोच पर प्रिया को बहुत दुःख होता था ,क्या ऐसे पाखंडियों के पास कोई जादू का डंडा था जो घुमा दिया तो सारी मुसीबतें खत्म ,बस ”खुल जा सिम सिम ”की तरह उनकी किस्मत का ताला भी खुल जाए गा और वो पाखंडी बाबा उनका घर खुशियों से भर देगा |उन्ही पाखंडी बाबाओं के बहकावे में आ कर वह अपने घर की सुख समृधि के लिए कुछ अटपटे से उपाय भी करती रहती थी ,कई बार तो प्रिया को अपने घर के आंगन में काले रंग के छींटे भी पड़े हुए भी मिले थे ,लेकिन प्रिया इस तरह के अंधविश्वासों को बिलकुल नही मानती थी ,बल्कि उसका कई बार मन होता था की वह अपनी पड़ोसन को समझाये कि इन सब ढकोसलों से उसे कुछ भी हासिल होने का नही और वह व्यर्थ में इन पोंगे पंडितों पर अपनी खून पसीने की कमाई लुटा रही थी |इस संसार में हर इंसान की जिंदगी में अच्छा और बुरा समय आता है ,लेकिन बुरे वक्त में इंसान अक्सर घबरा जाता है और उन परस्थितियों का सामना करने में अपने आप को असुरक्षित एवं असमर्थ पाता है उस समय उसे किसी न किसी के सहारे या संबल की आवश्यकता महसूस होती है ,जिसे पाने के लिए वह इधर उधर भटक जाता है ,जिसका भरपूर फायदा उठाते है यह पाखंडी पोंगे पंडित |अपनी लच्छेदार बातों में उलझा कर वह शातिर लोग उन्हें बेवकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा करते है ,पता नही हमारे देश के कितने लोग ऐसे पाखंडियों के बहकावे में आ कर अपनी जिंदगी भर की कमाई उन्हें सोंप कर अंत में बर्बाद हो कर बैठ जाते है |अपने बुरे वक्त में अगर इंसान विवेक से काम ले तो वह अपनी किस्मत को खुद बदलने में कामयाब हो सकता है ,आत्म विशवास ,दृढ़ इच्छा शक्ति ,लग्न और सकारात्मक सोच किसी भी इंसान को सफलता प्रदान कर आकाश की बुलंदियों तक पहुंचा सकती है ,हम जिस नजरिये से जिंदगी को देखते है जिंदगी हमे वैसी ही दिखाई देती है लेकिन केवल ख्याली पुलाव पकाने से कुछ नही होता ,जो भी हम सोचते है उस पर पूरी निष्ठां और लग्न से कर्म करने पर हम वो सब कुछ पा सकते है जो हम चाहते है |कुछ दिन पहले प्रिया की मुलाकात एक बहुत ही कामयाब इंसान से हुई थी ,यूँ ही प्रिया ने बातों बातों में उससे उसकी सफलता के पीछे किसका हाथ है ,पूछ लिया ,उसके उत्तर ने प्रिया को बहुत प्रभावित किया ,उसने कहा था कि अपनी जिंदगी में उसने बहुत कठिन परस्थितियों का सामना किया था लेकिन जब कभी भी उसे कुछ कर दिखाने का कोई अवसर दिखाई देता , वह आगे बढ़ कर उस अवसर को सुअवसर में बदल देता था और उसके पीछे रहती थी उसकी अनथक लग्न ,भरपूर आत्मविश्वास और सफलता पाने का दृढ संकल्प ,बस जैसे ही उन रास्तों पर चलना शुरू करता ,मंजिलें अपने आप मिलने लग गई थी ,बस यही राज़ था उसके सफलता के द्वार के खुलने का |तभी प्रिया को सामने से अपनी पड़ोसन आती दिखाई दी और वह उससे मिलने और जीवन में सफलता पाने का मूलमंत्र बताने के लिए उसकी तरफ चल पड़ी |

रेखा जोशी 

Thursday, 6 March 2014

होली है भाई होली

होली सब खेलते है ,रंगीन त्यौहार 
मचा रहे हुड़दंग यह ,छलकाएँ सब प्यार 
छलकाएँ सब प्यार ,भरें रंगों से झोली 
बिखरे लाल गुलाल , होली है भाई होली 

रेखा जोशी 

Wednesday, 5 March 2014

कलम की धार


जब
एकरस
होते
दिल और दिमाग
जज़्बात
उतर आते
कागज़ पर
कम नही
किसी
जादूगर से
कलमकार
मचा सकता
तहलका
आ सकती
क्रान्ति
विश्व में
उसकी
कलम की
पैनी
धार से
जो
खामोश
करती
वार
हम सबके
दिलों पर
झकझोड़
कर
विचारों को
दिखा देती
है
इक नवीन
दिशा

रेखा जोशी



साँवली सलोनी

 महिला दिवस पर उन महिलाओं के नाम जो हम जैसी कई महिलाओं के अनगिनत घरेलू काम संभालती है


पाजेब
की
छम  छम
सुनते ही
ख़ुशी की
इक लहर
दौड़ने
लगती है
मन में
मिलता है
सकून
उसके
आने की
आहट से
कैसे
लिख पाती
मै कुछ
अगर
वह न आती
आज
मुस्कुराती हुई
उस
साँवली  सलोनी
के घर में
घुसते
खिल उठा
मेरा मन
क्यों न
धन्यवाद
करें उनका
जो
बुहारती हमारा
घर आंगन
हमारे हाथों
का काम
करती
वह
तभी
निकल  पाते
हम
बाहर घर से
वह
और कोई नही
है वह
मेरे
घर की
बाई

रेखा जोशी






हाइकू [ मन में विशवास ]

राहें कठिन 
फैलाओ तुम पँख 
लम्बी उड़ान 
................ 
नही हारना 
मन में विशवास 
बैठ न जाना   
 
रेखा जोशी 

Tuesday, 4 March 2014

मिलता नही करार खोजें जिसे घूम घूम

घूम लिए चाँद सितारे ,घूम लिया संसार 
घूम ली दुनियाँ सारी ,कहीं न पाया प्यार 
कहीं न पाया प्यार , मचाएँ दिल में धूम 
मिलता नही करार , खोजें जिसे घूम घूम 

रेखा जोशी

Monday, 3 March 2014

प्रेम से अपना लो तो पराये भी अपने हुये

टूट जाता है दिल सिर्फ दर्द ही अपने हुये
ज़िंदगी में जब भी कभी अपने पराये हुये
रूकती नही कभी भी ज़िंदगी किसी के बिना
प्रेम से अपना लो तो पराये भी अपने हुये 

रेखा जोशी 

Saturday, 1 March 2014

एक बेचारा आम आदमी

टूट चुकी
कमर
बेचारे
असहाय
आम आदमी
की
ज़िंदगी के
बोझ तले
पिस रहा
सुबह  शाम
और
रहा खींचता
वह
चादर अपनी
काट दी
और
फाड़ दी
चादर उसकी
महंगाई
और
भ्रष्टाचार
सरीखे
दानवों ने
फिर भी
है संघर्षरत
जीतने को
जंग
ज़िंदगी की
लेकिन
कब तक
आखिर
कब तक
यूँही
पिसता  रहेगा
एक बेचारा
आम आदमी ?

रेखा जोशी

बाबुल की दुआएँ लेती जा

जैसे ही बैंड बाजेवालों ने ”बाबुल की दुआएँ लेती जा ”की धुन बजानी शुरू की ,फूलों से सजी कार में दुल्हन बनी रोशनी की आँखे भीग गई ,अपनी जान से भी प्यारी बेटी को डोली में बिठा कर , बाहर खड़े उसके पापा भी ज़ार ज़ार रो रहे थे ,अपने पापा को रोते देख रोशनी अपने को संभाल नही पाई और वह भी ज़ोर से रोने लगी ,तभी अपने ससुर जी की आवाज़ सुन कर वह चौंक गई ,कार के शीशे से झांक कर देख तो उसके ससुर जी उसके पापा को गले लगा कर कह रहे थे ,”चौधरी जी ,आज तक आपकी बेटी रोशनी से केवल आपका घर जगमगा रहा था लेकिन आज से इस घर के साथ साथ हमारा घर भी जगमगाने लगेगा ,”कार में रोशनी के साथ बैठे दुल्हा बने सौरभ ने अपने रुमाल से रोशनी की आँखों के आँसू पोंछते हुए उससे कहा ,”मेरे पिता जी ठीक ही तो कह रहे है ,तुम्हारे आने से मेरा घर जगमगा उठेगा और मै तुम्हारे मम्मी पापा के घर को हमेशा महकाता रहूँगा यह मेरा वादा है तुमसे ,अब प्लीज़ आँसू पोंछ कर इक प्यारी सी मुस्कान दे दो न ,”| वातावरण को गमगीन बनाते हुए और वही धुन बजाते हुए बैंड बाजे वालों के पीछे पीछे धीमी गति से रोशनी की डोली उसका मायका छोड़ ससुराल की ओर उसे ले कर चल पड़ी ,रोशनी ने पीछे मुड़ कर देखा तो दूर होता हुआ उसे अपने पापा का उठा हुआ हाथ दिखाई दे रहा था |

रेखा जोशी