Monday, 24 December 2012

पुत्रवती भव

जब मै बचपन में अपनी माँ की उंगली पकड़ कर चला करती थी ,बात तब की है ,हमारे पडोस में एक बूढी अम्मा रहा करती थी ,उन्हें हम सब नानी बुलाते थे | जब भी मेरी माँ उनसे मिलती ,वो उनके पाँव छुआ करती थी और नानी उन्हें बड़े प्यार से आशीर्वाद देती और सदा यही कहती ,''दूधो नहाओ और पूतो फलो ''|उस समय मेरे बचपन  का भोला मन इस का अर्थ नहीं समझ पाया था ,लेकिन धीरे धीरे इस वाक्य से मै परिचित होती  चली गई, ''पूतो फलो '' के  आशीर्वाद को भली भाँती समझने लगी |  क्यों देते है ,पुत्रवती भव का आशीर्वाद ,जब की एक ही माँ की कोख से पैदा होते है पुत्र और पुत्री ,क्या किसी को पुत्री की कोई चाह नहीं ? मैने अक्सर देखा है बेटियां ,बेटों से ज्यादा भावनात्क रूप से अपने माता पिता से जुडी होती है |एक दिन अपनी माँ के साथ मुझे अपने पडोस में एक लडकी की शादी के सगीत में जाने का अवसर प्राप्त हुआ ,वहां कुछ महिलायें 'सुहाग 'के गीत गा रही थी ,''साडा चिड़ियाँ दा चम्बा वे ,बाबल असां उड़ जाना |''जब मैने माँ से इस गीत का अर्थ पूछा तो आंसुओं से उसकी आखे भीग गई | यही तो दुःख है बेटियों को पाल पोस कर बड़ा करो और एक दिन उसकी शादी करके किसी अजनबी को सोंप दो ,बेटी तो पराया धन है , उसका कन्यादान भी करो,साथ मोटा दहेज भी दो उसके बाद उसे उसके ससुराल वालों के भरोसे छोड़ दो,माँ बाप का फर्ज़ पूरा हो गया ,अच्छे लोग मिले या बुरे यह उसका भाग्य ,बेटी चाहे वहा कितनी भी दुखी हो ,माँ बाप उसे  वहीं रहने की सलाह देते रहेगे ,उसे सभी ससुराल के सदस्यों से मिलजुलकर रहने की नसीहत देते रहे गे |माना की हालात पहले से काफी सुधर गये है लेकिन अभी भी समाज के क्रूर एवं वीभत्स  रूप ने बेटी के माँ बाप को डरा कर रखा हुआ है | बलात्कार ,दहेज़ की आड़ में बहुओं को जलती आग ने झोंक देना ,घरेलू हिंसा ,मानसिक तनाव इतना कि कोई आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाए ,इस सब के चलते  समाज के इस कुरूप चेहरे ने बेटियों के माँ बाप के दिलों को हिला कर रख दिया है ,उनकी मानसिकता को ही बदल दिया है,विक्षिप्त   कर दिया है |तभी तो समाज और परिवार के दबाव से दबी,आँखों में आंसू लिए एक माँ अपनी नन्ही सी जान को कभी  कूड़े के ढेर पर तो कभी गंदी नाली में फेंक कर,याँ पैदा होने से पहले ही उसे मौत की नीद सुलाकर सदा के लिए अपनी ही नजर में अपराधिन बना दी  जाती है |ठीक ही तो सोचते है वो लोग '',ना रहे गा बांस और ना बजे गी बासुरी ''उनके विक्षिप्त मन   को क्या अंतर पड़ता है ,अगर लडकों की तुलना में लडकियां कम भी रह जाएँ ,उन्हें तो बस बेटा ही चाहिए ,चाहे वह बड़ा हो कर कुपूत ही निकले ,उनके  बुढापे की लाठी बनना तो दूर ,लेकिन उनकी चिता को अग्नि देने वाला होना चाहिए |जब तक सिर्फ बेटों की इच्छा और  कन्याओं की हत्या करने वाले माँ बाप के विक्षिप्त मानसिकता का सम्पूर्ण बदलाव नहीं होता तब तक बेचारी कन्याओं की इस सामाजिक परिवेश में बलि चढती ही रहे गी |नारी सशक्तिकरण के लिए कितने ही कानून बने ,जो अपराधियों को उनके किये की सजा देते रहते है,भले ही  आँखों पर पट्टी बंधी होने के कारण कभी कभी  कानून भी उन्हें अनदेखा कर देता है |  समाज की विक्षिप्त  मानसिकता में बदलाव लाना हमारी ज़िम्मेदारी है  ,जागरूकता हमे ही लानी है ,लेकिन कब होगा यह ? हमारे समाज में बेटी जब मायके से विदा हो कर ससुराल में बहू के रूप में कदम रखती है तो उसका एक नया जन्म होता है ,रातों रात  एक चुलबुली ,चंचल लड़की ,ससुराल की एक ज़िम्मेदार बहू बन जाती है ,और वो पूरी निष्ठां से उसे निभाती भी है ,क्यों की बचपन से ही उसे यह बताया जाता है की ससुराल ही उसका असली घर है ,वहीउसका परिवार है ,लेकिन क्या ससुराल वाले उसे बेटी के रूप में अपनाते है ? बेटी तो दूर की बात है ,जब तक वो बेटे की माँ नहीं बनती उसे बहू  का दर्जा भी नहीं मिलता |  अभी हाल ही में हमारे पड़ोसी के बेटे की शादी हुयी ,नयी नवेली दुल्हन की मुख दिखाई में मै भी  उसे आशीर्वाद देने पहुंची ,जैसे ही उसने मेरे पाँव छुए ,मेरे मुख से भी यही निकला ,''पुत्रवती भव '' |

Friday, 21 December 2012

अबला से सबला तक

हमारे धर्म में नारी का स्थान सर्वोतम रखा गया है \नवरात्रे हो या दुर्गा पूजा ,नारी सशक्तिकरण तो हमारे धर्म का आधार है \अर्द्धनारीश्वर की पूजा का अर्थ यही दर्शाता है कि ईश्वर भी नारी के बिना आधा है ,अधूरा है\ वेदों के अनुसार भी 'जहाँ नारी की पूजा होती है ' वहाँ देवता वास  करते है परन्तु इसी धरती पर नारी के सम्मान को ताक पर रख उसे हर पल अपमानित किया जाता है \इस पुरुष प्रधान समाज में भी आज की नारी अपनी एक अलग पहचान बनाने में संघर्षरत है \जहाँ  बेबस ,बेचारी अबला नारी आज सबला बन हर क्षेत्र में पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही है वहीं अपने ही परिवार में उसे आज भी यथा योग्य स्थान नहीं मिल पाया ,कभी माँ बन कभी बेटी तो कभी पत्नी या बहन हर रिश्ते को बखूबी निभाते हुए भी वह आज भी वही बेबस बेचारी अबला नारी ही है \शिव और शक्ति के स्वरूप पति पत्नी सृष्टि का सृजन करते है फिर नारी क्यों मजबूर और असहाय हो  जाती है और आखों में आंसू लिए निकल पड़ती है अपनी ही कोख में पल रही नन्ही सी जान को मौत देने \ क्यों नहीं हमारा सिर शर्म से झुक जाता \कौन दोषी है ,नारी या यह समाज \क्यों कमज़ोर पड़ जाती है नारी \अधूरी है ईश्वर की पूजा अगर यह पाप हम नहीं रोक पाते \ अधूरा है नारी सशक्तिकरण जब तक भ्रूण हत्यायों का यह सिलसिला हम समाप्त नहीं कर पाते \ सही मायने में नारी अबला से सबला तभी बन पाए गी जब वह अपनी जिंदगी के निर्णय स्वयम कर पाये गी \                    

प्रभु मोरे अंगना दरस दिखा जा

 ''नारायण नारायण ''बोलते हुए  नारद मुनि  जी अपने प्रभु श्री हरि को खोजते खोजते पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगा कर भू लोक में आ विराजे ,लेकिन उन्हें श्री हरि कहीं भी दिखाई नही दिए ,''पता नहीं प्रभु कहाँ चले गए ,अंतर्ध्यान हो के कहाँ गायब हो गए मेरे प्रभु ''यह सोच सोच कर बेचारे नारद मुनि जी परेशान हो रहे थे |उन्होंने श्री हरि को इस धरती के कोने कोने में जा करके कहाँ कहाँ नही ढूंढा,.हिमालय पर्वत  की बर्फीली गुफाओं में ,कंदराओं में ,सारी दुनिया के विभिन्न विभिन्न मंदिरों में ,कभी वह देवी माँ के मंदिरों  में खोजते तो कभी स्वयंभू की शरण में जाते ,कभी श्री राम के मंदिर में खोजते तो कभी संकटमोचन हनुमान जी के दर पर पहुंच जाते ,दर ब दर भटकते हुए मक्का मदीना भी घूम आये ,उनकी तलाश में वह दुनिया भर की मस्जिदों में भी अपनी हाजरी लगा  कर आगये ,लेकिन श्री हरिके दरस उन्हें कहीं पर नहीं हुए ,सोचने लगे,'' क्यों न मै उन्हें गिरिजाघर में भी जा कर देख लूँ उस परमात्मा ने ही तो यह सृष्टि बनाई है ,क्या पता वह गिरिजाघर में ही विश्राम कर रहें हो ,''जल्दी से नारद मुनि जी विभिन्न विभिन्न गिरिजाघरों में भी उन्हें तलाश कर के वापिस उसी स्थान पर आ गए ,इतना घूम घूम कर बेचारे थक गए लेकिन उन्हें श्री हरि को पाने लग्न उन्हें विश्राम करने नही दे रही थी ,बहुत ही  चिंतित हो रहे थे वह उनके लिए ,चलते चलते उन्हें एक पेड़ दिखाई दिया ,वहां पर अपनी थकान मिटाने के लिए वह  उसके नीचे  बैठ गए ,पास में ही एक गुरुदुवारा था जहां से लाउडस्पीकर से आवाज़ आ रही थी ,''एक नूर से सब जग उपजया,कौन भले कौन मंदे |''  लाउडस्पीकर की आवाज़ सुनते ही नारद मुनि जी वहां से उठे ओर उनके  पाँव गुरुदुवारे की ओर चल पड़े  यह  सोचते हुए कि गुरुदुवारे के अंदर भी तो उसी परमात्मा के बन्दे बैठे हुए है शायद प्रभु उनका हालचाल पूछने वहां चले  गयें हो |भीतर जा कर देखा सभी भक्त उस प्रभु का नाम ले रहे है ,ऐसा ही कुछ उन्होंने उन सभी धर्मस्थलों पर देखा था ,पूरी धरती पर सम्पूर्ण मानव जन उसी ईश्वर को याद कर रहे थे लेकिन अलग  अलग नामो से |'' नारायण नारायण ,वाह प्रभु यह कैसी माया ,आप तो सभी धर्मस्थलों से  नदारद और पूरी दुनिया बस आप का ही जप कर रही है ,''नारद मुनि जी के मुख से यह शब्द अन्नान्यास ही निकल पड़े |अपने प्रभु  को कहीं भी न पा कर हताश हो कर नारद मुनि जी वापिस उसी पेड़ के नीचे आ कर बैठ गए,थकावट के मारे उनका अंग अंग दर्द करने लगा था इसलिए वह अपनी आँखें मूंद कर उसी पेड़ के नीचे लेट कर सुस्ताने लगे ,लेकिन उनके मन में  हरि से मिलने की प्रबल इच्छा उन्हें आराम नही करने दे रही थी ,तभी कुछ शोर सुन कर उन्होंने आँखे खोली तो देखा सामने एक छोटा बच्चा उनकी नींद में विघ्न डाल रहा था ,वह छोटा सा बच्चा नारद मुनि जी को देख उन्हें अपना मुहं बना बना कर चिढ़ाने लगा,उस नन्हे से बालक पर मुनि को क्रोध आ गया और वह उसे मारने को दौड़े और वह बालक खिलखिला के हंसने लगा ,''अरे यह क्या हुआ ,यह प्यारी हंसी  तो मेरे प्रभु की है ,''उन्होंने आस पास सब जगह अपनी नजर दौडाई ,हतप्रभ रह गए नारद मुनि ,उन्हें तो हर ओर श्री हरि ही दिखाई दे रहे थे ,घबरा कर उन्होंने आँखे बंद कर ली,आत्मविभोर हो उठे नारद मुनि जी ,बंद आँखों से उन्होंने अपने भीतर ही प्रभु श्री हरि के साक्षात दर्शन कर लिए थे ,प्रभु को देखते ही नतमस्तक हो गए नारद मुनि जी और परम आनंद  में झूमते हुए बोल उठे ,''नारायण नारायण |''

Wednesday, 19 December 2012

मानव न बन सका मनुज


यह कविता मेरे पापा प्रोफसर महेंद्र जोशी ने लिखी है |
मै ही तो एक नही हूं ऐसा,
मुझ से पहले भी लोग बड़े थे :
जिन को तो था संसार बदलना ,
अंधेरों में जो लोग खड़े थे :
उन लोगों में मेरी क्या गिनती ,
मुझ से तो वे सब बहुत बड़े थे :
खा कर भी हत्यारे की गोली ,
गांधी जी कितने मौन पड़े थे :
और अहिंसा हिंसा ने खाई ,
था नफरत ने ही प्यार मिटाया :
प्यार दिया इस जग को जिसने ही ,
क्रास पर गया था वह लटकाया :
पर मानव न बन सका मनुज अभी ,
पशुता उसकी उसके साथ रही |

कहाँ है वो जादुई चिराग ?

अलादीन का जादुई चिराग कहीं खो गया ,कहाँ खो गया ,मालूम नहीं ,कब से खोज रहा था बेचारा अलादीन ,कभी अलमारी में तो कभी बक्से में ,कभी पलंग के नीचे तो कभी पलंग के उपर ,सारा घर उल्ट पुलट कर रख दिया ,लेकिन जादुई चिराग नदारद ,उसका कुछ भी अता पता नहीं मिल पा रहा था आखिर गया तो कहाँ गया, धरती निगल गई याँ आसमान खा गया ,कहां रख कर वह भूल गया |”शायद उसका वह जादुई चिराग उसके किसी मित्र याँ किसी रिश्तेदार के यहाँ भूल से छूट गया है”|यह सोच वह अपने घर से बाहर निकल अपने परिचितों के घरों में उस जादुई चिराग की खोज में निकल पड़ा ,लेकिन सब जगह से उसे निराशा ही हाथ लगी |थक हार ,निराश हो कर अलादीन एक पार्क के बेंच पर बैठ गया ,अपने जादुई चिराग के खो जाने पर वह बहुत दुखी था, रह रह कर उसे अपने जादुई चिराग और उसमे बंद जिन्न की याद सता रही थी ,|,”कही उसका जादुई चिराग चोरी तो नहीं हो गया ,”|यह सोच वह और भी परेशान हो गया ,”अगर किसी ऐरे गेरे के हाथ लग गया तो ,बहुत गडबड हो जाए गी ,अनर्थ भी हो सकता है ,नहीं नहीं मुझे अपना वह जादुई चिराग वापिस पाना ही होगा ”|भारी कदमो से अलादीन बेंच से उठा और धीरे धीरे बाहर की ओर चलने को हुआ ही था कि सामने से एक भद्रपुरुष हाथ में जादुई चिराग लिए उसके पास आये |उसे देखते ही अलादीन उछल पड़ा ,”अरे मेरा यह जादुई चिराग आप के पास कैसे ? मैने इसे कहाँ कहाँ नहीं ढूंढा ,मै इसके लिए कितना परेशान था ,कही आपने इससे कुछ माँगा तो नही ?”अच्छा तो आप ही अलादीन है ,आपका यह जादुई चिराग तो सच में बहुत कमाल का है ,मैने इसे अपडेट कर दिया है और इसने कितने ही घरों के बुझते चिरागों को रौशन कर दिया है ,तुम भी देखना चाहो गे ,”यह कहते हुए उस भद्रपुरुष ने अपने हाथ से उस जादुई चिराग को रगडा और उसमे से जिन्न ने निकलते ही बोला, ”हुकम मेरे आका”| ”कौन हो तुम ?”भद्रपुरुष ने पूछा |जिन्न ने बोलना शुरू किया ,”मै अभी ,इसी समय का एक अनमोल पल हूँ ,वह क्षण हूँ मै जो तुम्हारी दुनिया बदल सकता है ,मै वर्तमान का वह पल हूँ जो एक सुदृढ़ पत्थर है तुम्हारे सुनहरे भविष्य की ईमारत का ,तुम चाहो तो अभी इसी पल से उसे सजाना शुरू कर सकते हो ,इस पल कि शक्ति को पहचानो ,व्यर्थ मत गंवाओ इस कीमती क्षण को ,तुम अपनी जिन्दगी की वह सारी की सारी खुशियाँ पा सकते हो इस क्षण में ,वर्तमान के इस क्षण के गर्भ में विद्यमान है हमारे आने वाले कल की बागडोर ,वर्तमान का यह पल हमारे आने वाले हर पल का वर्तमान बनने वाला है ,जीना सीखो वर्तमान के इसी पल में ,जिसने भी इस पल के महत्व को जान लिया उनके घर खुशियों से भर जाएँ गे ,जगमगा उठे गी उनकी जिंदगी ”|इतना कहते ही जिन्न वापिस उस जादुई चिराग में चला गया”| अलादीन अवाक सा खड़ा देखता रह गया ,कभी वह अपने जादुई चिराग को देखता तो कभी मुस्कराते हुए उस भद्रपुरुष को |हाथ आगे बड़ा के उसने उस भद्रपुरुष से अपना वह जादुई चिराग ले लिया और उसी पल उसने फैसला कर लिया कि वह निकल पड़ा अपने जादुई चिराग के साथ पूरी दुनियां को उसका उसका चमत्कार दिखाने |

Monday, 17 December 2012

पिया के घर

सात समुद्र पार कर,
आई पिया के द्वार ,
नव नीले आसमां पर,
झूलते इन्द्रधनुष पे  ,
प्राणपिया के अंगना ,
सप्तऋषि के द्वार ,
झंकृत हए सात सुर,
हृदय में  नये तराने |
.........................
उतर रहा वह नभ पर ,
सातवें आसमान  से ,
लिए रक्तिम लालिमा
सवार सात घोड़ों पर ,
पार सब करता हुआ ,
प्रकाशित हुआ ये जहां
अलौकिक , आनंदित
वो आशियाना दीप्त
...............................
थिरक रही अम्बर में ,
अरुण की ये रश्मियाँ,
चमकी धूप सुनहरी सी
अब आई  मेरे अंगना ,
है स्फुरित मेरा ये मन ,
खिल उठा ये तन बदन
निभाने वो सात वचन ,
आई अपने पिया के घर |

Saturday, 15 December 2012

इक दूजे के लिए

महक , एक खूबसूरत लड़की न जाने कैसे गलत दोस्तों के संसर्ग में आ कर ड्रग्स के  सेवन में उलझ कर रह गई ,मस्ती के आलम में एक ही सिरींज से  उसने अपने साथियों के साथ बांटा ,इस बात से अनभिज्ञ कि वह एक ऐसी जानलेवा बीमारी  को निमंत्रण दे चुकी है जो लाइलाज है ,जी हाँ एड्स यानीकि'‘एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिसिएंशी सिंड्रोम'' जिसका अर्थ है ''मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर अनेक बीमारियों का उस पर प्रहार '' जो की  एच.आई.वी''. वायरस से होती है.और  यह वायरस ही मनुष्य की प्रतिरोधी क्षमता  पर असर कर उसे इतना कमज़ोर कर देता है,जिसके कारण  खांसी ज़ुकाम जैसी छोटी से छोटी बीमारी  भी रोगी की जान ले सकती है |यह जानलेवा बीमारी किसी भी इंसान में एच.आई. वी. ''ह्यूमन इम्यूनो डेफिसिएंशी वाइरस ''के पाजी़टिव होने से होती है ,लेकिन महक इन सब बातों से दूर थी उसने तो सिर्फ अपने एक साथी से ड्रग्स का इंजेक्शन ले कर लगाया था ,इस  बात से बेखबर कि उसने किसी एच आई वी पासिटिव व्यक्ति  के रक्त से संक्रमित हुए इंजेक्शन का सेवन कर लिया था,जिसने उसे मौत के मुहं की तरफ धकेलदिया था ,क्योकि इस बीमारी का इलाज तो सिर्फ  और सिर्फ बचाव में ही है ,अगर कोई''एच आई वी'' से ग्रस्त व्यक्ति किसी भी महिला यां पुरुष  से असुरक्षित यौन सम्बन्ध बनाता है तोवह उसे तो इस बीमारी  से ग्रस्त करता ही है और अगर इस  बीमारी से पीड़ित किसी पुरुष से कोई महिला गर्भवती हो जाती है तो उसके पेट में  पल रहे बच्चे को भी यह जानलेवा बीमारी अपनी ग्रिफ्त में ले लेती है ,इसी कारण हमारे देश में इस रोग से पीड़ित लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है , समलैंगिक सम्बन्ध ,रेड अलर्ट एरिया भी भारी संख्या में इस खतरनाक बीमारी को फैलाने में अच्छा खासा  योगदान दे रहें है ,आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और अनैतिक संबंधों की बढ़ती बाढ़ से यह बीमारी और भी तेजी से फैल रही है,और  पूरे विश्व के लिए यह एक अच्छी खासी सिरदर्द बन चुकी है,यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस बीमारी को बेहद गंभीरता से लिया है और हर वर्ष पहली दिसंबर को यह दिन ''विश्व एड्स दिवस''के रूप में मनाया जाता है ताकि दुनिया भर में लोगों को इस नामुराद बीमारी से अवगत करा कर इससे बचने के उपाय बताये जा सकें |इस खतरनाक ,लाइलाज बीमारी से अगर कोई ग्रस्त हो गया तो बस समझ लो वह मौत के मुहं में पहुंच चुका है उसके बचने का कोई भी उपाय नही है ,इस जानलेवा बीमारी से बचने का एक मात्र उपाय केवल सावधानी और बस सावधानी ही है ,यह एक ऐसा सुरक्षा चक्र है जो इस भयानक बीमारी से हर किसी को दूर रख सकता है ,वह है पति पत्नी का इक दूजे के प्रति उनका समर्पण भाव ,हमारे हिन्दू धर्म में विवाह को सदा एक पवित्र रिश्ता माना जाता रहा है जिसमे पति के लिए पत्नी और पत्नी के लिए पति पूजनीय है ,कितना ही अच्छा हो अगर हम सब इस रिश्ते की गरिमा को समझ कर सदा अपने जीवन साथी के प्रति समर्पित रह कर एड्स जैसी घिनौनी बीमारी को सदा के लिए अपने से दूर रखें |इससे पहले कि महक जैसे अनेक भटके हुए युवा अपनी जवानी के नशे में जिंदगी के अनदेखे ,अनजाने रास्तों पर चल कर अपनी मौत को खुद ही आमंत्रित करें  हम सबका यह कर्तव्य बनता है कि हम उन्हें सही राह दिखाते हुए इस बीमारी से बचने के लिए पति पत्नी के आपसी प्रेम के सुरक्षा चक्र के बारे में जानकारी दे कर उनका मार्गदर्शन करे ओर उनको एक स्वस्थ और खुशहाल जिंदगी की ओर अग्रसर करे |

Friday, 14 December 2012

आईना झूठ बोलता है

कहते है कि आईना कभी झूठ नहीं बोलता,आईने की इसी खूबी के कारण  , बेचारी नन्ही सी राजकुमारी स्नो वाईट को ,अपनी सौतेली माँ के ज़ुल्मों का शिकार होना पड़ा|  जितनी बार  उसकी माँ आईने से  पूछती ,''आईने, आईने बता सबसे सुंदर कौन ,' आईना बेचारा कैसे झूठ बोलता  ,वो हर बार यही कहता ,''स्नो वाईट और उसकी माँ के गुस्से का पहाड़ टूट पड़ता उस नन्ही सी जान पर | शुक्र है कि उसे सात बौने मिल गए ,जिन्होंने उसकी दुष्ट माँ से उसकी रक्षा की,वरना  वह   उसे मरवा ही देती |स्नो वाईट को तो बौनों ने बचा लिया ,मगर आईना बेचारा परेशान और दुखी हो गया कि उसके कारण प्यारी सी स्नो वाईट को कैसे कैसे दुःख और मुसीबतें झेलनी पड़ी ,वो कुछ कुछ सावधान हो गया, जब  विभिन्न विभिन्न मुखौटे ओढ़े  तरह तरह के लोग उसके सामने आते तो वह थोडा धुंधला जाता और उन लोगों की असलियत को छिपा जाता | झूठ की चादर लपेटे लोग भी सत्यवादी कहलाने लगे |धोखेबाज़ दुष्ट और फरेबी लोगो का बोलबाला होने लगा क्यों कि आईने ने अब सच का दामन छोड़ दिया था |मेरी तरह के गिने चुने लोग चिल्ला चिल्ला कर कहते ,'आईना झूठ  बोलता है ,आईना झूठ बोलता है '',लेकिन सब बेकार ,आईना तो सबूत था उनकी सच्चाई का | अभी हाल ही में मेरी मुलाकात हुई ,ऐसे ही एक करोडपति सज्जन पुरुष से ,जो एक लम्बी बीमारी से उठे थे ,वो जब भी मिलते ,यही कहते ,'',मैने मौत को बहुत करीब से देखा है ,अस्पताल में सारा दिन बिस्तर पर पड़ा पड़ा यही सोचा करता था ,कि मेरे जैसा मूर्ख दुनिया में कोई नहीं ,जो मै पैसे का घमंड करता रहा ,आज मेरे पास इतनी दौलत होने पर भी मै अपने को नहीं बचा पाया तो क्या फायदा'',और वो खूब धर्म करम की बाते किया करते |मै भी उनकी बातो में आ गयी ,सोचा शायद बीमारी में आईने ने इन्हें इनका असली चेहरा दिखा दिया हो ,चलो देर आये दुरुस्त आये ,वह किसी आश्रम में भी जाने लगे |एक दिन वो फिर मुझे मिले ,जनाब नई औडी गाडी में सवार थे ,वही पुराने रंग ढंग ,वही पैसे का गरूर |इंसान की फितरत को इतनी जल्दी रंग बदलते देख मै दंग रह गयी | ओफ हो, अब समझी उनके पैसे के गरूर और घमंड से आईना फिर से धुंधला पड़ गया,वह उन सज्जन को वही दिखाने  लगा जो वह देखना चाहते थे |, अब आप लोग भी सावधान हो जाइए ,आगे से जब भी आप आईने में देखे तो ,उसे पहले  साफ़ कपड़े से जरूर पोंछ लीजिये ताकि आईना झूठ न बोल सके |

Thursday, 13 December 2012

ध्वजावरोहन समारोह वाघा बार्डर.. एक संस्मरण

ध्वजावरोहन समारोह  वाघा  बार्डर.. एक संस्मरण

दिन धीरे धीरे साँझ में ढल रहा था ,हमारी कार अमृतसर से लाहौर की तरफ बढ़ रही थी ,वाघा  के नजदीक बी एस एफ के हेडक्वाटर से  थोड़ी दूर आगे ही  दो बी एस एफ के जवानो ने हमारी कार को रोका ,मेरे पतिदेव गाडी से नीचे उतरे और उन्हें अपना आई कार्ड दिखाया और उनसे आगे जाने की अनुमति ली |आगे भी कड़ी सुरक्षा के चलते हम तीन चार बार अनुमति लेने के बाद वाघा   बार्डर पहुच गये | कार पार्किंग में ,छोड़ हम भारत पाक सीमा की ओर पैदल ही  बढने लगे| सूरज की तीखी धूप सामने से हमारे चेहरों पर पड़ रही थी ,उधर से लाउड स्पीकर पर जोशीला गाना ,''चक दे ,ओ चक दे इण्डिया ''हम सब की रगों में एक अजब सा जोश भर रहा था | जैसे ही हमने सीमा के प्रांगण में कदम रखा ,तो वहाँ कुछ नन्ही बच्चियां और कुछ नवयुवतियां उस जोशीले गाने पर थिरक कर अपना राष्ट्रीय प्रेम व्यक्त कर रही थी |एक बी एस एफ के जवान ने हमें उस प्रांगण की सबसे आगे वाली पंक्ति में बिठा दिया ,ठीक मेरी बायीं ओर भारत पाकिस्तान की सीमा दिखाई दे रही थी ,दोनों ओर के फाटक साफ़ नजर आ रहे थे और बीच में था कुछ खाली स्थान जिसे ,''नो मेन'स लेंड'' कहते है |फाटक के बाएं और दायें ओर बी एस एफ के जवान काले जूतों से ले कर लाल ऊँची पगड़ी तक पूरी यूनिफार्म में तैनात थे |सीमा के इस ओर भारत का तिरंगा लहरा रहा था और सीमा के दूसरी ओर पाकिस्तान का झंडा था |इस ओर का प्रांगण खचाखच  भारतवासियों से भरा हुआ था ,करीब आठ ,दस हजार लोग उस समारोह में शामिल थे   देश प्रेम के गीतों पर जोर जोर से तालियाँ बज रही थी और शायद उतने लोग सीमा पार ढोलक की थाप पर नाच रहे थे |पाकिस्तान के सीमा प्रहरी काली वेशभूषा में तैनात थे ,शाम के साढ़े पांच बज रहे थे ,समारोह की शुरुआत हुई भारत माता की जय से ,गूंज उठा सीमा का प्रांगण ,वन्देमातरम और हिन्दोस्तान की जय के नारों से ,कदम से कदम मिलाते हुए ,बी एस एफ की दो महिला प्रहरी काँधे पे रायफल लिए मार्च करती हुई सीमा के फाटक की ओर बढती चली गयी |एक ध्वनि लोगों को होशियार करती हुई ''आ आ .......अट'' के साथ कदम मिलाते हुए  दो जवान फाटक पर पाक सीमा की और मुख किये जोर से अपनी दायीं टांग सीधी उपर कर सर तक लेजाते हुए फिर उसे जोर से नीचे कर '' अट'' की आवाज़ के साथ पैर नीचे को पटक कर सलामी देते है |भारत माता ,वन्देमातरम और हिन्दोस्तान की जय जयकार के जोशीले  नारे लगातार हवा में गूंज रहे थे, यह पूरी प्रक्रिया तीन,चार बार दोहराई गयी  ,सीमा पार से लगातार ढोलक बजने की आवाज़ आ रही थी |शंखनाद के साथ  श्रीमद भगवत गीता का एक श्लोक ,''यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिरभवति भारत |अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम || ''की लय पर भारतमाता के जवान प्रहरी कदम मिलाते हुए ,फाटक की ओर बढ़ते हुए उसे खोल दिया गया |,यही प्रक्रिया सीमा पार के प्रहरियों ने करते हुए अपनी ओर का फाटक पकिस्तान की जय जयकार करते हुए खोल दिया |रिट्रीट सैरिमोनी में दोनों ओर के सिपाहियों ने  ,अपने अपने देश के झंडों को सलामी देते हुए ,ध्वजावरोहन की प्रक्रिया शुरू की |दोनों ओर के दर्शकों की तालियों से वातावरण गूंज उठा |राष्ट्र प्रेम की भावना से ओतप्रोत वहा बैठा  हर भारतीय अपने दिल से जय जयकार के नारे लगा रहा था |राष्ट्रीय गान के साथ दर्शकों ने खड़े हो कर सम्मानपूर्वक ,बी एस एफ  के जवानो के साथ राष्ट्रीय ध्वज का अवरोहन किया| तालियों और नारों के मध्य दो जवानो ने सम्मानपूर्वक तिरंगे की तह को अपनी कलाइयो और हाथों पर रख कर सम्मान के साथ परेड करते हुए उसे वापिस लेते हुए चल पड़े |अन्य दो जवान मार्च करते हुए फाटक की तरफ बड़े और उसे बंद करने की प्रक्रिया शुरू हो गई |सूर्यास्त होने को था ,आसमान में आज़ाद पंछी सीमा के आरपार उड़ रहे थे ,लेकिन इस आधे घंटे की प्रक्रिया ने सीमा के इस पार हम सबके दिलों को राष्ट्रीय प्रेम के भावना से भर दिया और मै भावविभोर हो नम आँखों से वन्देमातरम का नारा लगते हुए बाहर की ओर चल  पड़ी |

नारी तेरी वही कहानी



नारी तेरी वही कहानी सीने में ममता आँखों में पानी |
सदियों से यूं ही सहती आई फिर भी रही तुम बेगानी ||
प्रेम से बांधा इस जग को ममता आँखों से छलका के
प्रीत के बदले इस दुनिया से आखिर क्या पाया तुमने
....................................................................
जन्म दाती जग की और उसी से तुझे दुःख दर्द मिला
सारे रिश्ते नाते भूला कर बेबस अबला का नाम दिया
फिर भी तुमने बन कर धरा सहशीलता से काम लिया
खुद मिटा के अपने तन को उसको तुमने परिवार दिया
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पूजते है माँ दुर्गा को सब औ नारी का तिरस्कार किया
कूचे बाजारों औ गलियों में क्यों उसका अपमान किया
खतरे में है  उसकी अस्मिता क्यों  ऐसा व्यवहार किया
मार कर कोख में उसे मर्दानगी का कैसा इज़हार किया
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वक्त रहते संभल जायो होश में आयो न हो जाये देर
पछताते रह जायोगे  जब चिड़िया ने चुग लिया खेत
रह जायोगे ठूठ तुम अकेले न होगी जब नारी से भेंट
है स्वर्ग वहीं धरती पर होती सम्मानित बहू बेटी देख

Sunday, 9 December 2012

धर्मान्धता में बंधे हम लोग

जब से मनुष्य इस धरती पर आया है तभी से यहाँ कई देवी देवताओं का भी आगमन हो गया ,जिसे स्वयं मानव ने ही आमंत्रित किया है,भयभीत होना तो मानव के स्वभाव में समाया हुआ है  ,बारिश तूफ़ान से डर गए तो इंद्र देवता की पूजा शुरू हो गई ,आग से डर लगा तो अग्नि देवता क्रोधित हो गए | कालान्तर ऐसे कई देवी देवताओं को मनुष्य अपने भीतर के भय को मिटाने के लिए उन्हें पूजने लगा ,शायद मानव अपने अंदर समाये भय के कारण ही ईश्वर के अस्तित्व को मानने लगा और शायद उसके इसी भय ने ही उसे धर्मान्ध भी बना दिया है | धर्म हमारी जीवन शैली का मूल आधार है ,हमारा हिन्दू धर्म हमे जिंदगी जीने का सही मार्ग दिखाता है ,इस में कोई दो राय नही कि हमारे जीवन में व्याप्त विपरीत परस्थितियों में धर्म ही हमे सशक्त संबल प्रदान करता है ,ईश्वर के प्रति हमारी आस्था से हमारे मनोबल में वृद्धि होती है जो विषम से विषम परिस्थिति का सामना करने की हमें हिम्मत देती है ,लेकिन जब हम अपना विवेक छोड़ अंधाधुंध धर्म का अनुसरण करने लगते है तब मानव धर्म के मार्ग पर न चल कर अधर्म की राह पर चलना शुरू कर देता  है ,मानवीय न हो कर अमानवीय बन जाता है | अभी  हाल ही में विभिन्न अखबारों की सुर्ख़ियों और टेलीविजन के सभी चेनल्स पर एक खबर काफी चर्चा में रही ,आयरलैंड में भारतीय मूल की एक महिला दन्त चिकित्सक सविता हलपन्नवार की मौत जिसे कैथोलिक धर्मान्धता के कारण बलि पर चढ़ा दिया गया ,उसने अपने प्राण इसलिए खो दिए क्योंकि डाक्टर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को गिराने के लिए मना कर रहे थे। यह जानते हुए भी कि सविता की  प्रेगेनेंसी उसकी जान के लिए खतरा हो सकती है ,वहां के चिकित्सकों  ने गर्भपात के लिए मना कर दिया वह इसलिए क्योंकि कैथोलिक धर्म गर्भपात की इजाजत नहीं देता। इस धर्म के अंतर्गत जीवित भ्रूण को मारना अक्षम्य पाप है,उनके अनुसार जब तक बच्चे का दिल धड़कता रहता है वह गर्भपात नही कर सकते ,जब कि उनके सामने सुनीता तिल तिल कर के मर रही थी ,उसके जिस्म में नितन्तर जहर फैल रहा था और वह बार बार वहां के डाक्टरों से अपने जीवन की  गुहार लगा रही थी ,''मुझे यह बच्चा नही चाहिए मै मर रही हूँ ,मुझे बचा लो ,''उसने यह भी कहा कि वह कैथोलिक नही बल्कि हिन्दू धर्म को मानती है और हिन्दू धर्म में किसी के भी प्राण सबसे अधिक मूल्यवान है लेकिन धर्मान्धता में बंधे उस अस्पताल के डाक्टर जैसे बहरे हो गए थे,किसी ने भी उसकी फ़रियाद को नही सुना और उस बेचारी ने धर्म में अंधे कानून के चलते तड़प तड़प कर अपने पति और जीवन देने वाले डाक्टरों के देखते ही देखते अपने प्राणों की आहुति दे दी,कुछ इस प्रकार की घटना आयरलैंड में बीस वर्ष पहले भी हुई थी जब बलात्कार से पीड़ित एक अविवाहित लडकी अपने बच्चे को पैदा नही करना चाहती थी लेकिन इस अंधे कानून के चलते डाक्टरों ने उसके बच्चे को गिराने से इनकार कर दिया था,उस बेचारी लडकी ने बिन ब्याही माँ बन कर अपमानित जिंदगी जीने से बेहतर विकल्प अपनाया और आत्महत्या कर इस दुनिया को ही सदा के लिए अलविदा कह दिया  | वह मासूम लड़की धर्मान्धता से बंधे उनके अंधे कानून की बलि चढ़ गई थी ,उसकी मौत के बाद भी इस कानून में कोई सुधार नही किया गया|यह केवल एक देश की घटना नही बल्कि हमारे भारत सहित पूरी दुनिया में ऐसी अनेक घटनाएँ होती रहती है जो खबरों की सुर्खियाँ नही बन पाती , कई लोग आँखों पर धर्म का चश्मा चढ़ा कर न जाने कितने ही ऐसे काम करते है जो धर्म पर नही धर्मान्धता पर आधारित होते है | इतिहास गवाह है कि धर्मान्धता में बंधे कई लोगों  ने न जाने कितने ही मासूमों की बलि ली है ,कितनो की जिंदगी तबाह करके रख दी , जबकि ईश्वर की नजर में सभी जन बराबर है,हमारे वेदों में भी यही लिखा है ''मानव बनो, ''वह इसलिए कि मानवता ही श्रेष्ठ धर्म है और हर धर्म की शिक्षा मानव कल्याण के लिए है,धर्म मनुष्य को अधात्मिक उत्थान की ओर ले कर जाता है न कि धर्मान्धता की ओर ,धर्म के नाम पर किसी की जान लेना अन्याय ही नही जघन्य पाप भी है |

Sunday, 4 November 2012

,वास्तु विज्ञानं की कसौटी पर

अपना घर ,हमारा अपना प्यारा घरौंदा ,वह स्थान जो सिर्फ हमारा अपना है ,जहाँ हम आज़ाद है कुछ भी करने के लिए \यह वह स्थान है ,जो दर्शाता है हमारे रहन सहन को ,हमारे चरित्र को,जहाँ हम अपनी सारी  इच्छाएं पूरी करना चाहते है \ हमारा अपना घर ही एक  ऐसी जगह है जहाँ हम सिर्फ खुशियाँ ही खुशियाँ चाहते है ,शांति चाहते है जहाँ परिवार का हर सदस्य एक दूसरे के साथ प्यार मुहब्बत से रहे  ,और चाहते है कि घर का हर सदस्य ख़ुशी ,शांति अनुभव करते हुए जिंदगी में सफलता की सीढीयाँ चड़ता जाये \अगर देखा जाये तो व्यवहारिक जिंदगी में ऐसा होता नहीं है ,लोग अपने ही घरों में उदास, परेशान और दुखी रह कर जीवन व्यतीत करते रहते है \कई बार तो लोगों को मुसीबत चारों ओर से घेर लेती है ,उन्हें  तन, मन से पीड़ित होने के साथ साथ आर्थिक कष्टों से भी गुजरना पड़ता है \ यह सब देखते हुए अकसर,मन में यह विचार आता है कि कहीं यह भूमि दोष तो नहीं या उस ईमारत में  ही कोई दोष तो नहीं\ वास्तु , सदियों पुराना विज्ञानं क्या इन सबका समाधान दे सकता है\क्या आज के वैज्ञानिक युग में ,वास्तु विज्ञानं की कसौटी पर खरा उतर सकता है \ऐसे अनेकों सवाल है ,जो तर्क की कसौटी पर सही नहीं उतर पा रहे \ क्या इस वैज्ञानिक युग में वास्तु का कोई महत्व है \ ऐसे कई क्षेत्र है जहाँ सदियों पुराना विज्ञानं ,आधुनिक विज्ञानं के साथ आश्चर्यजनक्  रूप से एकरस हो रहा है \रंगों की दुनिया की ही बात करें तो इस में कोई दो राय नहीं ,कि रंगों का हमारे दिलोदिमाग पर आश्चर्यजनक रूप से असर पड़ता है \ लाल रंग को ही लें ,जो की ऊर्जा का प्रतीक है ,वास्तुशास्त्र के अनुसार दक्षिण पूर्व दिशा रसोईघर के लिए निर्धारित की गई है जिसे अग्निकोण भी कहा जाता है \इसी तरह हरे रंग के लिए पूर्व दिशा निर्धरित  की गई है ,हरा रंग विकास का प्रतीक है इसलिए इस दिशा में बच्चों का कमरा निर्धारित किया गया है ,वह इसलिए क्यों कि बच्चों के शारीरिक ,बौद्धिक व् मानसिक विकास पर इस रंग का और इस दिशा का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है \पदार्थ विज्ञानं के अनुसार पूरी सृष्टि पञ्च तत्वों से बनी है ,अग्नि ,वायु जल, धरती और आकाश\हर तत्व का अपना एक रंग होता है ,अगर किसी इमारत सही दिशा में में पञ्च तत्वों के अनुसार रंगों का सही दिशा में चुनाव किया जाये तो उसमें रहने वाले सभी लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़े गा\ विज्ञानं के अनुसार हम जानते है की हर रंग किअपनी ही उर्जा होती है\अगर किसी स्थान पर रंगों को सही दिशा में नहीं रखा जाता तो रंगों से निकलने वाली तरंगे आपस में उलझ कर रह जाती है जिसके कारण वह उर्जा सहायक न हो कर विपरीत प्रभाव दे सकती है \इसलिए विभिन्न रंगों को अगर हम पञ्च तत्वों के अनुसार किसी भी इमारत  में करवाय तो उस जगह पर ख़ुशी ,शांति और सम्पनता का वास रहे गा चाहे वह घर हो ,व्यवसायक  यां उद्योग क्षेत्र हो|   

Saturday, 27 October 2012

नारी तेरी महिमा महान


जय नारी तेरी महिमा महान
किस विध करूं इसका बखान
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शिव शक्ति का सुंदर रूप धर
ममता लिए आई वो धरा पर
सब के होंठों पर माँ का नाम
है मिला हमे अमूल्य वरदान
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धरती से गगन तक जा पहुंची
कल्पना की थी वो सुंदर उड़ान
याद रखे गा सदा तुम्हे ये जहाँ
समाया तुझ में वह तेज महान
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मिटी देश पे  वो झाँसी की रानी
जोश औ जनूं में वो बनी मर्दानी
था बाँधा पीठ पे लाल अपने को
मार गिराया अंग्रेजों को रण में
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जय नारी तेरी महिमा महान
किस विध करूं इसका बखान






Monday, 24 September 2012

सनम बेवफा

इतने मिले जख्म कि जख्म ही दवा बने 
न पाई ख़ुशी में ख़ुशी न रोये गम में हम 
दिल और यह दिमाग सब शून्य हो गये 
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है मुहब्बत इक फरेब औ प्यार इक धोखा 
साये में है जिसके  बस आंसूओं का सौदा 
चोट पर चोट दिल पे हम खाते चले गये
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वफा को जो न समझे तुम सनम बेवफा हो
रहें गैरों की बाहों में और सिला दो वफा का 
मेरे सपनो की तस्वीर के टुकड़े हुए तुम्ही से 
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इधर दिल टूटा हमारा गूंजी सदा वादियों में 
शोर हुआ हर गली गली  अंजान रहे तुम्ही 
खामोश रही धड़कन न बनी जुबां दिल की

सिलसिले


 तुमने सौगात में दिए है मुझे वो हसीन लम्हे
जिनकी खामोशी से मिले अजब से सिलसिले
आस यही रही दिल में कभी गुफ्तगू हो उनसे
इसी दर्द भरी शाम में मेरी  जिंदगी गुजर जाए
पूरे हो जाए अरमान मेरे तेरी यादों के लम्हों में

Sunday, 23 September 2012

ख्वाहिशें


आवारा कदम,आधी अधूरी खंडहर जैसी पहाड़ सी ख्वाहिशें
उन्ही यादों में भटकते रहते है रात भर अकेले तन्हाईयों में
वो लम्हा लम्हा पिरोई अरमानो से मोतियों की माला हमने
 सुबह होते होते खुद ही तोड़ देते है कल बुनने को वही यादें
यूं लगता है सुबह होने से पहले तुम आती हो मेरी नींदों में
क्योंकि महक उठता है सुबह सुबह कई बार आशियाना मेरा

Thursday, 13 September 2012

गुनगुना रहीं है हवाएं मुस्करा उठी फिजायें 
बदलती  रुत में महकने लगी  मेरी तन्हाई 
तेरी खुशबू बसी है मेरी यादों में मेरे ख़्वाबों में 
बस कुछ ही पल इंतज़ार के बाकी है आने में 

Tuesday, 31 July 2012

टूटता तारा

 शाम ढलते ही पिंकी अपने भाई के साथ छत पर आ गई ,दोनों भाई बहन आज खूब मौज मस्ती के मूड में थे ,तभी पिंकी को चिढ़ाते हुए राजू ने आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहा ,''पिंकी देखो वह तारा टूट कर तुम्हारे सिर पर गिरने वाला है ''|पिंकी ने झट से अपने सिर पर हाथ रखते हुए उपर देखा तो उसे एक टूटता हुआ तारा दिखाई दिया जो तेज़ी से जमीन की तरफ आ रहा था |पिंकी हैरानी से राजू को देखने लगी ,उसकी भोली सूरत देख कर राजू जोर जोर से हंसने लगा और ताली बजा कर उसे चिढ़ाने लगा ,''तुम तो एकदम बुधू हो,वह कोई टूटता हुआ तारा नही है बल्कि उल्का पिंड है ,जब दूर उपर आसमान से कोई भी छोटी यां बड़ी चट्टान हमारी धरती के वायुमंडल में प्रवेश करती है तो उन में आपसी रगड़ के कारण आग उत्पन होती है| धरती उस चट्टान को अपनी तरफ खींचती है तो हमे ऐसा दिखाई देता है जैसे कोई तारा टूट रहा हो ,मेरी भोली बहना,आई बात समझ में ''|पिंकी कहाँ चुप रहने वाली थी वह भी राजू को मुहं चिढ़ा कर बोली ,''तुम भी बुधू हो ,भूल गए उस दिन मौसी ने क्या कहा था ,यह तो विश स्टार है ,जब भी यह दिखाई दे तो जल्दी से कुछ मांग लो ,तुम्हारी वह इच्छा जरुर पूरी हो जाये गी''|उसकी बात सुन कर राजू फिर से हंसने लगा ,''नही नही मेरी नन्ही सी गुडिया विज्ञान इन बातों को नही मानता ,टूटता तारा और कुछ नही बस अन्तरिक्ष से पृथ्वी पर एक गिरती हुई चट्टान है ''|

Wednesday, 27 June 2012

सूरज कभी सोता नही

नन्हे बबलू ने रोहित से पूछा ,''अंकल क्या सूरज थकता नही है ?वह तो कभी सोता ही नहीं ,''उस नन्हे बच्चे के इस सवाल ने रोहित को लाजवाब कर दिया |एक हारे हुए इंसान को उम्मीद की नवकिरण  दिखा रहा था ,उस पांच साल के नन्हे से बच्चे का सवाल |एक हारा हुआ बिल्डर जिसकी बनाई हुई इमारत हाल ही में तांश के पत्तो सी बिखर गई थी और उसके साथ साथ उसकी आर्थिक स्थिति भी डांवाडोल हो  चुकी थी,लेकिन बबलू  का वह वाक्य उसे एक नई राह दिखा रहा था | रोहित ने अपनी कम्पनी के पूरे स्टाफ को फिर से बुलाया ,नयी रूपरेखा तैयार की गई और जुट गया एक बार फिर से उस प्रोजेक्ट को नए सिरे से बनाने में |इस बार रोहित बड़ी सतर्कता से हर काम अपनी  ही देख रेख में करवा रहा था ,उसे न दिन का होश रहता था न रात का ,किसी पर कोई काम छोड़ता ही नही था| नन्हे बबलू के शब्द उसके कानो में सदा गूंजते रहते थे .उसे सूरज की तरह ही बनना है ,कभी थकना नही है |एक दिन उसकी अनथक मेहनत रंग ले ही आई और उसकी हार जीत में बदल चुकी थी |वह उस बुलंद इमारत के सामने खड़ा उसके पीछे प्रेरणा देते हुए चमकते सूरज को टकटकी बांधे निहार रहा था ,आज उस नन्हे बच्चे के सवाल का जवाब उसके पास है ,''सूरज कभी सोता नही ''|