सफर नीर का
पर्वत से सागर तक
याँ फिर
सागर से पर्वत तक
चलता जा रहा
निरंतर
रुकता नही
बस केवल है भ्रम
समाना नीर का
सागर में
ज़िंदगी भी रूकती नही
चलती सदा
मृत्यु के बाद भी
है ज़िंदगी
बदलता केवल स्वरूप
उसका
चाह थी अब प्यार का मंज़र मिले दोस्त हाथों में लिए ख़ंजर मिले . देख उनको गैर के आगोश में दिल हमारे को सजन निश्तर मिले . तोड़ कर दिल को हमारे क्या मिला चल इधर से अब यहाँ पत्थर मिले . घूँट कड़वा प्यार में हमने पिया ज़हर पी कर अब हमे बिस्तर मिले . . काँच सा यह दिल यहाँ तोडा गया ज़ख्म सीने में हमें अन्दर मिले रेखा जोशी