Tuesday, 2 June 2015

पर आह भी तो न भर सके कभी हम

 होती थी  उनसे मुलाकाते बहुत
करनी  थी उनसे हमे  बाते बहुत
पर आह भी तो न भर सके कभी हम
रह गई अधूरी  अब चाहते बहुत

रेखा जोशी 

मै अपने हृदय की बात लिखता हूँ

देखूँ    जो  वही  हालात  लिखता हूँ
रचना में अपने जज़्बात लिखता हूँ
अंतस  उभरती  नित  नई  रचनायें
मै  अपने हृदय  की बात लिखता हूँ

रेखा जोशी 

है बन रहा आज आदमी महान

छू  रहा आज सुनहरी आसमान
भर कर इंसान अब ऊँची  उड़ान
अधिकार जमा रहा ब्रह्मांड पर
है बन रहा आज  आदमी  महान

रेखा जोशी 

Monday, 1 June 2015

घर आजा तू मेरे सनम

रात  चाँदनी  शीतल पवन
घर  आजा  तू  मेरे  सनम

तुझको  बुलाए  ठंडी हवाएँ
आँचल मेरा उड़  उड़  जाए
शीतल पवन अगन लगाये
घर  आजा तू   मेरे  सनम

सूने नैना तुम  बिन सजन
राह  निहारे  पागल  नयन
अब तो तू आ भी जा बलम
घर  आजा  तू   मेरे  सनम

रात  चाँदनी   शीतल पवन
घर  आजा  तू   मेरे  सनम

रेखा जोशी

Sunday, 31 May 2015

मृत्यु के बाद भी है ज़िंदगी

सफर नीर का
पर्वत से सागर तक
याँ फिर
सागर से पर्वत तक
चलता जा रहा
निरंतर
रुकता नही
बस केवल  है भ्रम
समाना नीर का
सागर में
ज़िंदगी भी रूकती नही
चलती सदा
मृत्यु के बाद भी
है ज़िंदगी
बदलता केवल स्वरूप
उसका

रेखा जोशी



चल इधर से अब यहाँ पत्थर मिले

चाह थी अब प्यार का मंज़र मिले 
दोस्त हाथों में लिए ख़ंजर मिले
. 
देख उनको गैर के आगोश में 
दिल हमारे को सजन निश्तर मिले 
. 
तोड़ कर दिल को हमारे क्या मिला 
चल इधर से अब यहाँ  पत्थर मिले 
. 
घूँट कड़वा प्यार में  हमने पिया 
ज़हर पी कर अब हमे बिस्तर मिले  . 
.
काँच सा यह दिल यहाँ तोडा  गया 
ज़ख्म सीने में हमें अन्दर मिले 

रेखा जोशी 

निकला दगाबाज [वर्ण पिरामिड \

ये
दिल
माने न
है पागल
करता याद
उसे बार बार
निकला  दगाबाज

रेखा जोशी